हिलसा के लिए खतरा

Submitted by admin on Wed, 02/10/2010 - 10:43
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नवचेतन प्रकाशन
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हालांकि हिलसा मछलियों की हड्डियां पहाड़ी मीठे पानी के ट्राउट्स की ही तरह बड़ी तेज और बारीक होती हैं, फिर भी वे सदियों से स्वाद के पारखियों के लिए, खासकर पश्चिम बंगाल और बंगला देश के लोगों के लिए बड़ी ही आकर्षण और स्वादिष्ट खाद्य रही हैं।

हिलसा मछली जब खाड़ी के खारे पानी से मीठे पानी में आती है तब पानी के ऊपर से उछलती चली जाती है। आमतौर पर हिलसा दो बार प्रवास करती है। प्रमुख प्रवास बारिश के बाद का होता है। दूसरा, जाड़े के आखिरी दिनों में। दोनों बार यह मछली ताजे पानी में अंडे देने के बाद अपने मूल निवास स्थान, खाड़ी के जलाशय में लौट आती है। छोटी मछलियों को जीवित रहने के लिए अध खारे पानी की जरूरत पड़ती है। कई देशों में ऐसी मछलियों के रास्ते में पानी की धारा में डूबी एक सीढ़ी बनाई जाती है, जिसके माध्यम से मछलियां रुकावटों को पार कर लेती हैं। लेकिन हमारे यहां बांधों और बैराजों में मछलियों के लिए ऐसी सीढियां नहीं बनाई जाती हैं। उनकी गतिविधियों में इस बाधा के कारण उनकी प्रजनन शक्ति काफी घट गई है।

एक जमाने में गंगा में खूब सारी हिलसा मछलियां रहती थीं। उनका दाम बहुत ऊंचा होता था- 30 से 35 रुपये किलो। एक मछुआरे के दिन भर गुजारे के लिए दो हिलसा काफी होती थीं। लेकिन मुर्शिदाबाद के पास के फरक्का के अलावा हुगली का प्रदूषण बढ़ रहा है। रसायनों और तेल की पतली परत पानी पर तैरती रहती है। कलकत्ता बंदरगाह से और नदी किनारे बसे उद्योग समूहों से आ रही यह गंदगी हिलसा को खत्म कर रही है।

जैसे-जैसे कमी पड़ रही है, वैसे-वैसे मछलियां पकड़ने की मात्रा भी बढ़ रही है। खासकर अब हिलसा को तो अंडे देने से पहले ही पकड़ लिया जाता है। बरसात के मौसम में हिलसा को पकड़ने के काम में 30,000 से ज्यादा मछुआरों को हुगली में रोजगार मिलता है। पर अब फरक्का बांध के कारण हिलसा का मिलना काफी कम हो गया है और पश्चिम बंगाल के मछुआरों की कमाई आधी भी नहीं रह गई है।

बांध के कारण नदी जल में मछली पकड़ने पर जो असर पड़ता है उसका सबसे बड़ा उदाहरण है फरक्का बांध। बांध के ऊपरी और निचले प्रवाहों में मछली पकड़ने से संबंधित जानकारियों से पता चलता है कि निचले प्रवाह में हिलसा का प्रमाण मछलियों का 28 से 30 प्रतिशत तक है जबकि ऊपरी प्रवाह में – राजमहल के पास –कुल मछलियों का केवल 1.5 से 2.2 प्रतिशत ही है।

18 साल पहले तक भी, ऊपरी प्रवाह में दूर-दूर तक- वाराणसी, इलाहाबाद, कानपुर और हरिद्वार तक-हिलसा मछली खूब मिलती थी। आज इन सब जगहों में हिलसा बिलकुल खत्म हो गई है। श्री झींगरान कहते हैं कि ऊपरी धारा में इलाहाबाद के पास कुल मछलियों की पकड़ में भारी कमी आई है- 1958-66 के बीच 195.78 टन रह गई है।

नर्मदा का मुहाना और पश्चिम बंगाल के सुंदरवन हिलसा के अंडे देने के लिए बहुत उत्तम स्थान माने जाते हैं। नर्मदा के मुहाने में मछलियां खूब मिलती हैं। वहां से मीठे पानी वाले अन्य मछलीपालन केंद्रों को बीज प्राप्त होते हैं। आज झींगा मछली के बाद व्यापार के लिए सबसे ज्यादा हिलसा मछली को पकड़ा जाता है। कोई 4000 परिवार बरसात में हिलसा को पकड़ने के काम में लगते हैं।

कुछ ऐसे भी परिवार हैं जो सिर्फ हिलसा के मौसम में किराये की नाव लेकर इस धंधे में उतरते हैं।

नर्मादा पर नवागांव के पास सरदार सरोवर बांध बांधने से हिलसा मछलियों के लिए कठिनाई पैदा हो गई। सरदार सरोवर का प्रभाव निचली धारा के मछलीपालन पर जरूर पड़ेगा क्योंकि ताजा पानी के बहाव में फर्क आएगा और इस कारण नदी में समुद्र का पानी ज्यादा घुस आएगा। फिर मध्य प्रदेश में भी नर्मदा के बांधों और सिंचाई के लिए पानी को कई तरह से मोड़ लेने के कारण खाड़ी के इलाकों में जाता पानी की आपूर्ति में काफी कमी पड़ेगी। सरकारी विशंषज्ञों का कहना है कि हिलसा का उत्पादन रुकने से होने वाली हानि की पूर्ती झींगा मछलियों की पैदावार से की जा सकती है। पर कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हिलसा के साथ-साथ झींगा मछलियां भी कम हो जाएंगी, क्योंकि निचली धारा में ताजा पानी झींगा मछलियां भी कम हो जाएंगी, क्योंकि निचली धारा में ताजा पानी का बहाव ठीक नहीं रहेगा और नदी जल का समूचा पर्यावरण ही बदल जाएगा।

फरक्का बांध के अलावा और भी अनेक बांधों के कारण अंडा देने के लिए हिलसा मछलियों का ऊपरी धारा में जाना रुक गया है। गोदावरी की ऊपरी धारा के 280 किलोमीटर पर बने धवलेश्वरम बांध के कारण बांध से 96 किलोमीटर नीचे की धारा तक ही हिलसा सीमित होकर रह गई है। विजयवाड़ा के पास कृष्णा पर बने बांध का भी हिलसा के आवागमन पर ऐसा ही प्रभाव पड़ा है। कावेरी पर निचले कोनरून बांध के निर्माण के कारण वे निचली धारा के 60 किलोमीटर तक के क्षेत्र में ही घिरी रह गई हैं।

इन सारी विपरीत परिस्थितियों में हिलसा को टिकाने के कुछ प्रयोग जरूर किए गए हैं पर इनसे यह भरोसा नहीं होता है कि आव्रजन की आदत वाली ये मछलियां बगैर आव्रजन के भी जी सकेंगी।

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