‘जल’ की नित्यता पर विचार

Submitted by admin on Sat, 01/23/2010 - 15:39
Author
महेश कुमार मिश्र ‘मधुकर’


पुराणों में ‘जल’के सम्बन्ध मे, उसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में या उसकी ‘नित्यता’ (सदैव विद्यमान रहने) के सम्बन्ध में निम्नलिखित अवधारणाएँ दी हुई हैं, जो अनेक परस्पर विरोधी विचारों या शंकाओं को जन्म देती हैं। इनका क्या रहस्य है? क्या ये मिथ्या कल्पनाएँ हैं? इन पर विचार किया जाना आवश्यक है-

(1) कहा गया है कि सृष्टि से पहले सिवा ‘परब्रह्म’ के कुछ नहीं था। ‘परब्रह्म’ को जब सृष्टि की इच्छा हुई तो उसने सर्वप्रथम अपने को ‘पुरुष’, ‘प्रधान’ और ‘काल’ रूप में विभाजित किया। ‘काल’ ने प्रधान और पुरुष को क्षोभित किया (उनका संयोग कराया) तो चौथे रूप ‘व्यक्त’ (इस समस्त प्रपंच) की सृष्टि हुई। इस ‘व्यक्त’ का सर्वप्रथम रूप महान या ‘महत्तत्व’ कहलाता है। इस ‘महत्तत्व’ से तीन प्रकार का (वैकारिक, तैजस और तामस) ‘अहंकार’ उत्पन्न हुआ।

‘तामस अहंकार’ से क्रमशः शब्द तन्मात्रा (शब्द गुण वाला आकाश), स्पर्श तन्मात्रा (स्पर्श गुण वाला वायु), रूप तन्मात्रा (रूप गुण वाला ‘तेज’), रस तन्मात्रा (रस गुण वाला जल) और गन्ध तन्मात्रा (गन्ध गुण वाली पृथिवी) की उत्पत्ति हुई।

इन्द्रियाँ ‘राजस अहंकार’ से और उनके ‘अधिदेवता’ वैकारिक या सात्विक अहंकार से उत्पन्न हुए।

(2) आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी इन ‘पंच महाभूतों’ ने, महत्तत्व से लेकर प्रकृति के सभी विकारों के सहयोग से एक बृहद्-अण्ड की सृष्टि की जो ‘हिरण्यगर्भ’ कहलाया और सृष्टि का सर्वप्रथम ‘प्राकृत आधार’बना। यह ‘अण्ड’ लगभग एक ‘कल्प’ तक ‘जल’ में स्थित रहा। तदुपरान्त इस अण्डके दो भाग हो गये जिनमें प्रथम भाह ‘द्युलोक’ तथा द्वितीय भाग ‘भूलोक’ के नाम से जाना गया। इन दोनो के मध्यवर्ती भाग को ‘आकाश’ कहा गया। इस ‘अण्ड’ से सर्वप्रथम ‘ब्रह्मा’ की तत्पश्चात् स्थावर जंगम या जड़चेतन की सृष्टि हुई।

(3) वेद और पुराण ‘सृष्टि’ को ‘अनादि’ मानते हैं अर्थात् सृष्टि-स्थिति-संहार – ये तीनों क्रियाएँ ‘नित्य’ हैं तथा अनवरत् चलती रहती हैं। इसे कोई नहीं बता सकता कि ये सर्वप्रथम कब शुरु हुईं और अंतिम बार कब समाप्त होंगी? तदनुसार जब ‘महाप्रलय’ हो जाता है तब केवल ‘जल’ शेष रहता है जिसे ‘एकार्णव’ कहतेहैं। इस जल पर ‘परब्रह्म’ शेष की शय्या पर एक कल्प तक शयन करता है। और एक कल्प की शान्ति के पश्चात् सृष्टि की फिर वही प्रक्रीया शुरु होती है।

उक्त तीनों अवधारणाओं के कारण यह प्रश्न उतपन्न होता है कि जब पाँचों महाभूत प्रकृति में लीन हो जाते हैं, तब परब्रह्म की ‘शेष-शय्या’ के लिए ‘एकार्णव का जल’ कहां से आता है? एवं जब ‘हिरण्य-गर्भ’ अण्ड बनता है तब वह जिस ‘जल’ पर तैरता रहता है, वह ‘जल’ कहाँ से आ जाता है? क्योंकि ‘जल’ तो एक महाभूत है जो तामस-अहंकार से शब्द-स्पर्श और तेज के कारण पैदा होता है। और प्रलयकाल में जब प्रकृति ‘साम्यावस्था’ को प्राप्त होती है, तब जल प्रकृति में ही लीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में ‘एकार्णव’ का जल कहाँ से आता है?

इस प्रश्न का उत्तर देना सरल नहीं है। तथापि उत्तर पूर्व से ही मौजूद है।

‘जल’ वस्तुतः वह ‘तत्व’ है जो सृष्टि के आदि से अन्त तक मौजूद रहता है। ऐसा तत्व केवल ‘परब्रह्म’ ही हो सकता है। यह वह महाभूत नहीं है जो ‘तामस-अहंकार’ के कारण पैदा होता है। बल्कि वह ‘तत्’ है जो परब्रह्म की वाचक है एवं जिसे ब्रह्मा-विष्णु-तथा रुद्र का ‘रसमय-रूप’ माना गया है। संभवतः इसी कारण ‘जल’ के लिए मुख्यतः ‘आपः’ शब्द का प्रयोग किया गया है और वेदों के मंत्रों में इसे ‘आपो देवता’ कहा गया है। आधुनिक वैज्ञानिक भी इस तथ्य को मानते हैं कि सृष्टि से पहले कोई न कोई ‘नित्य तत्व’ अवश्य रहता है।
 

 

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