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खासम-खास

Submitted by Editorial Team on Thu, 05/13/2021 - 10:25
हिन्दुकुश हिमालय, फोटो - इंडिया साइंस वायर

कृष्ण गोपाल 'व्यास'

हिन्दुकुश हिमालय, फोटो - इंडिया साइंस वायर

तिब्बत के पठार तथा लगभग 3500 किलोमीटर लम्बी हिन्दुकुश हिमालय पर्वत श्रृंखला, संयुक्त रूप से, उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव के बाद, दुनिया का स्वच्छ जल का सबसे बड़ा स्रोत है। ध्रुवों की तर्ज पर बर्फ का विशाल भंडार होने के कारण इस क्षेत्र को कुछ लोग तीसरा ध्रुव (The Third Pole) भी कहते हैं।

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Submitted by Shivendra on Fri, 06/11/2021 - 14:42
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इंडिया साइंस वायर
कोटिंग के दौरान एमएओ रिएक्शन चैंबर
एल्युमीनियम मिश्रधातुओं को जंग लगने से बचाने के लिए अधिकतर हार्ड एनोडाइजिंग (एचए) प्रक्रिया अपनायी जाती है, जिसके अंतर्गत इस मिश्रधातु पर एक इलेक्ट्रोलाइट-आधारित कोटिंग की जाती है। इसमें सल्फ्यूरिक/ऑक्सेलिक आधारित इलेक्ट्रोलाइट्स का प्रयोग करना शामिल हैं, जो न केवल जहरीले धुएं का उत्सर्जन करते हैं, बल्कि प्रसंस्करण के दौरान उनको संभालना भी जोखिम भरा होता है। इसके साथ ही यह वायु को प्रदूषित भी करता है। यह तकनीक इन चुनौतियों से निजात दिला सकती है।  माइक्रो-आर्क ऑक्सीकरण (एमएओ) एक उच्च-वोल्टेज पर संचालित की जाने वाली एनोडिक-ऑक्सीकरण प्रक्रिया है, जो एक विद्युत रासायनिक विधि के माध्यम से धातु सब्सट्रेट पर ऑक्साइड फिल्म बनाती है। अंतरराष्ट्रीय उन्नत अनुसंधान केंद्र (एआरसीआई) टीम ने शॉट पीनिंग के लिए एक डुप्लेक्स ट्रीटमेंट को डिजाइन व विकसित किया है,
Submitted by Shivendra on Thu, 06/10/2021 - 13:09
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इंडिया साइंस वायर
हिमालयी क्षेत्र में ब्लैक कार्बन के आकलन में मददगार हो सकता है नया अध्ययन 
शोधकर्ताओं ने पाया है कि हिमालयी क्षेत्र में ब्लैक कार्बन का सटीक आकलन ऑप्टिकल उपकरणों के उपयोग से संभव हो सकता है। यह पद्धति हिमालयी क्षेत्र के लिए मास एब्जॉर्प्शन क्रॉस-सेक्शन (एमएसी) नामक विशिष्ट मानदंड पर आधारित है। शोधकर्ताओं ने एमएसी, जो कि एक आवश्यक मानदंड है, और जिसका उपयोग ब्लैक कार्बन के द्रव्यमान सांद्रता को मापने के लिए किया जाता है, का मान निकाला है। उनका कहना है कि इससे संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान एवं जलवायु मॉडल के प्रदर्शन में भी सुधार हो सकता है। यह अध्ययन आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एरीज), जो कि भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत एक स्वायत्त संस्थान है, के वैज्ञानिकों ने दिल्ली विश्वविद्यालय, आईआईटी कानपुर और इसरो के वैज्ञानिकों के सहयोग से किया है। अध्ययन में, मध्य हिमालयी क्षेत्र में ब्लैक कार्बन और एलिमेंटल कार्बन का व्यापक निरीक्षण किया गया है, और मासिक एवं तरंगदैर्ध्य आधारित एमएसी के मान का आकलन किया गया है।
Submitted by Shivendra on Tue, 06/08/2021 - 16:16
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जीईपी लागू करने वाला पहला राज्य बना उत्तराखंड
पिछले कुछ दशकों से राज्य के मूल्यांकन तंत्र में जीईपी को शामिल करने की मांग लंबित थी और इसके लिये कई शिक्षाविद और पर्यावरणविद सरकारों पर दबाव बना रहे थे। ग्रीन एक्टिविटस द्वारा की गई गणना के मुताबिक उत्तराखंड अपनी जैव विविधता के माध्यम से देश को हर साल 95112 करोड़ रुपये की सेवाएं देता है । राज्य का 71% भू भाग जंगलों से घिरा हुआ है यहाँ  हिमालय का घर के अलावा गंगा, यमुना और शारदा जैसी नदियों का उद्गम स्थल, और कार्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व जैसे वन्य जीव अभ्यारण भी है  दो दशक से अधिक समय से 'ग्रॉस इकोसिस्टम प्रोडक्ट' को महत्वपूर्ण बता रहे एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के जाने माने  इकोलॉजिस्ट और पूर्व कुलपति एसपी सिंह ने उत्तराखंड सरकार द्वारा उठाए गए कदम पर खुशी जताई है ।

प्रयास

Submitted by Shivendra on Sat, 08/14/2021 - 17:50
महिला मंगल दल कार्यकर्ताओं के साथ उनके प्रेरणास्त्रोत मोहन चंद्र कांडपाल,फोटो:पानी बोओ
सीड’ आज 15 गांवों में बालवाड़ियां चला रही है। इनमें ढाई से 5 साल तक के बच्चों को न सिर्फ रोजाना 4 घंटे देखभाल की जाती है, बल्कि तरह-तरह के खेलों, बाल-कार्यों, भावगीतों इत्यादि के जरिए उनको पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों सबसे बढ़-चढ़कर अपनी मिट्टी से प्रेम करना सिखाया जाता है। ‘एक बनेंगे, नेक बनेंगे’ ‘मिलकर के हम काम करेंगे’ और ‘आज हिमालय जागेगा, दूर कुल्हाड़ा भागेगा।’ जैसे नारे पूरे गांव को एकता के सूत्र में बांधने का काम बखूबी करते रहे हैं। प्राइमरी में पढ़ रहे बच्चों के लिए शाम को गांव में संध्या केंद्र चलाते हैं, यहां बच्चे न सिर्फ अपने स्थानीय परिवेश के बारे में चर्चा करते हैं, बल्कि नन्हें हाथों से गांव के झरने, नौले-धारे आदि की साफ करने का, पॉलिथीन के बेकार थैली में पेड़-पौधे लगाने जैसा कार्य करके बड़ों को प्रेरणा दे रहे हैं। कांडे गांव की जानकी कांडपाल बताती हैं कि घर में पड़ी प्लास्टिक की थैली खाली होते ही बच्चों में उसे पाने की होड़ मची रहती है।

नोटिस बोर्ड

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।
Submitted by Shivendra on Sat, 07/17/2021 - 12:48
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गंगा की अविरलता और निर्मलता को स्थापित करने के लिये वर्चुअल मीटिंग
स्वामी सांनद  के जन्मदिन 20 जुलाई को जूम पर एक वर्चुअल बैठक का आयोजन शाम 4:00 बजे से 6:00 बजे तक किया जा रहा है।
Submitted by Shivendra on Thu, 06/10/2021 - 12:03
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मीडिया डायलॉग:जलवायु संकट और बिहार
जलवायु संकट से लगातार जूझ रहे बिहार को नीति आयोग ने अच्छी रैंकिंग नहीं दी है। इससे पहले भी आईआईटी की एक रिपोर्ट ने बिहार के 14 जिलों को जलवायु परिवर्तन के संकट से मुकाबला करने में सबसे अक्षम जिलों की सूची में रखा है। बिहार सरकार के तमाम दावों के बावजूद जलवायु संकट को लेकर उसकी तैयारी जमीन पर क्यों उतरती नजर नहीं आ रही।

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खासम-खास

हिन्दुकुश हिमालय पर्वतमाला: दी थर्ड पोल

Submitted by Editorial Team on Thu, 05/13/2021 - 10:25

कृष्ण गोपाल 'व्यास'

हिन्दुकुश हिमालय, फोटो - इंडिया साइंस वायर

तिब्बत के पठार तथा लगभग 3500 किलोमीटर लम्बी हिन्दुकुश हिमालय पर्वत श्रृंखला, संयुक्त रूप से, उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव के बाद, दुनिया का स्वच्छ जल का सबसे बड़ा स्रोत है। ध्रुवों की तर्ज पर बर्फ का विशाल भंडार होने के कारण इस क्षेत्र को कुछ लोग तीसरा ध्रुव (The Third Pole) भी कहते हैं।

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एल्युमीनियम मिश्रधातुओं का क्षरण रोकने के लिए नई तकनीक

Submitted by Shivendra on Fri, 06/11/2021 - 14:42
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इंडिया साइंस वायर
कोटिंग के दौरान एमएओ रिएक्शन चैंबर
एल्युमीनियम मिश्रधातुओं को जंग लगने से बचाने के लिए अधिकतर हार्ड एनोडाइजिंग (एचए) प्रक्रिया अपनायी जाती है, जिसके अंतर्गत इस मिश्रधातु पर एक इलेक्ट्रोलाइट-आधारित कोटिंग की जाती है। इसमें सल्फ्यूरिक/ऑक्सेलिक आधारित इलेक्ट्रोलाइट्स का प्रयोग करना शामिल हैं, जो न केवल जहरीले धुएं का उत्सर्जन करते हैं, बल्कि प्रसंस्करण के दौरान उनको संभालना भी जोखिम भरा होता है। इसके साथ ही यह वायु को प्रदूषित भी करता है। यह तकनीक इन चुनौतियों से निजात दिला सकती है।  माइक्रो-आर्क ऑक्सीकरण (एमएओ) एक उच्च-वोल्टेज पर संचालित की जाने वाली एनोडिक-ऑक्सीकरण प्रक्रिया है, जो एक विद्युत रासायनिक विधि के माध्यम से धातु सब्सट्रेट पर ऑक्साइड फिल्म बनाती है। अंतरराष्ट्रीय उन्नत अनुसंधान केंद्र (एआरसीआई) टीम ने शॉट पीनिंग के लिए एक डुप्लेक्स ट्रीटमेंट को डिजाइन व विकसित किया है,

हिमालयी क्षेत्र में ब्लैक कार्बन के आकलन में मददगार हो सकता है नया अध्ययन 

Submitted by Shivendra on Thu, 06/10/2021 - 13:09
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इंडिया साइंस वायर
हिमालयी क्षेत्र में ब्लैक कार्बन के आकलन में मददगार हो सकता है नया अध्ययन 
शोधकर्ताओं ने पाया है कि हिमालयी क्षेत्र में ब्लैक कार्बन का सटीक आकलन ऑप्टिकल उपकरणों के उपयोग से संभव हो सकता है। यह पद्धति हिमालयी क्षेत्र के लिए मास एब्जॉर्प्शन क्रॉस-सेक्शन (एमएसी) नामक विशिष्ट मानदंड पर आधारित है। शोधकर्ताओं ने एमएसी, जो कि एक आवश्यक मानदंड है, और जिसका उपयोग ब्लैक कार्बन के द्रव्यमान सांद्रता को मापने के लिए किया जाता है, का मान निकाला है। उनका कहना है कि इससे संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान एवं जलवायु मॉडल के प्रदर्शन में भी सुधार हो सकता है। यह अध्ययन आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एरीज), जो कि भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत एक स्वायत्त संस्थान है, के वैज्ञानिकों ने दिल्ली विश्वविद्यालय, आईआईटी कानपुर और इसरो के वैज्ञानिकों के सहयोग से किया है। अध्ययन में, मध्य हिमालयी क्षेत्र में ब्लैक कार्बन और एलिमेंटल कार्बन का व्यापक निरीक्षण किया गया है, और मासिक एवं तरंगदैर्ध्य आधारित एमएसी के मान का आकलन किया गया है।

जीईपी लागू करने वाला पहला राज्य बना उत्तराखंड

Submitted by Shivendra on Tue, 06/08/2021 - 16:16
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जीईपी लागू करने वाला पहला राज्य बना उत्तराखंड
पिछले कुछ दशकों से राज्य के मूल्यांकन तंत्र में जीईपी को शामिल करने की मांग लंबित थी और इसके लिये कई शिक्षाविद और पर्यावरणविद सरकारों पर दबाव बना रहे थे। ग्रीन एक्टिविटस द्वारा की गई गणना के मुताबिक उत्तराखंड अपनी जैव विविधता के माध्यम से देश को हर साल 95112 करोड़ रुपये की सेवाएं देता है । राज्य का 71% भू भाग जंगलों से घिरा हुआ है यहाँ  हिमालय का घर के अलावा गंगा, यमुना और शारदा जैसी नदियों का उद्गम स्थल, और कार्बेट और राजाजी टाइगर रिजर्व जैसे वन्य जीव अभ्यारण भी है  दो दशक से अधिक समय से 'ग्रॉस इकोसिस्टम प्रोडक्ट' को महत्वपूर्ण बता रहे एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के जाने माने  इकोलॉजिस्ट और पूर्व कुलपति एसपी सिंह ने उत्तराखंड सरकार द्वारा उठाए गए कदम पर खुशी जताई है ।

प्रयास

गांवों को जगाता एक शिक्षक

Submitted by Shivendra on Sat, 08/14/2021 - 17:50
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Source
6 जुलाई 2003,जनसत्ता
महिला मंगल दल कार्यकर्ताओं के साथ उनके प्रेरणास्त्रोत मोहन चंद्र कांडपाल,फोटो:पानी बोओ
सीड’ आज 15 गांवों में बालवाड़ियां चला रही है। इनमें ढाई से 5 साल तक के बच्चों को न सिर्फ रोजाना 4 घंटे देखभाल की जाती है, बल्कि तरह-तरह के खेलों, बाल-कार्यों, भावगीतों इत्यादि के जरिए उनको पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों सबसे बढ़-चढ़कर अपनी मिट्टी से प्रेम करना सिखाया जाता है। ‘एक बनेंगे, नेक बनेंगे’ ‘मिलकर के हम काम करेंगे’ और ‘आज हिमालय जागेगा, दूर कुल्हाड़ा भागेगा।’ जैसे नारे पूरे गांव को एकता के सूत्र में बांधने का काम बखूबी करते रहे हैं। प्राइमरी में पढ़ रहे बच्चों के लिए शाम को गांव में संध्या केंद्र चलाते हैं, यहां बच्चे न सिर्फ अपने स्थानीय परिवेश के बारे में चर्चा करते हैं, बल्कि नन्हें हाथों से गांव के झरने, नौले-धारे आदि की साफ करने का, पॉलिथीन के बेकार थैली में पेड़-पौधे लगाने जैसा कार्य करके बड़ों को प्रेरणा दे रहे हैं। कांडे गांव की जानकी कांडपाल बताती हैं कि घर में पड़ी प्लास्टिक की थैली खाली होते ही बच्चों में उसे पाने की होड़ मची रहती है।

नोटिस बोर्ड

एक्वा कांग्रेस के 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की महत्वपूर्ण जानकारियां

Submitted by Shivendra on Wed, 08/18/2021 - 12:32
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Source
एक्वा कांग्रेस
एक्वा कांग्रेस 15वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन
कार्यक्रम में इस बार पानी का लोगों के पर्यावरणीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के असर को शामिल किया जाएगा।  पानी का मतलब अलग-अलग लोगों के लिए अलग अलग चीजें है। जैसे घरों, स्कूलों और कार्यस्थलों में पानी का मतलब स्वास्थ्य, स्वच्छता, गरिमा और उत्पादकता हो सकता है  तो वही  सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों में, पानी का तात्पर्य  सृजन, समुदाय और स्वयं के साथ संबंध हो सकता है। प्राकृतिक स्थानों में, पानी का मतलब शांति, सद्भाव  और संरक्षण हो सकता है। आज, बढ़ती आबादी के कारण  कृषि और उद्योग की बढ़ती मांगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से पानी अत्यधिक खतरे में है।

गंगा की अविरलता और निर्मलता को स्थापित करने के लिये वर्चुअल मीटिंग का आयोजन 

Submitted by Shivendra on Sat, 07/17/2021 - 12:48
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गंगा की अविरलता और निर्मलता को स्थापित करने के लिये वर्चुअल मीटिंग
स्वामी सांनद  के जन्मदिन 20 जुलाई को जूम पर एक वर्चुअल बैठक का आयोजन शाम 4:00 बजे से 6:00 बजे तक किया जा रहा है।

मीडिया डायलॉग:जलवायु संकट और बिहार

Submitted by Shivendra on Thu, 06/10/2021 - 12:03
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मीडिया डायलॉग:जलवायु संकट और बिहार
जलवायु संकट से लगातार जूझ रहे बिहार को नीति आयोग ने अच्छी रैंकिंग नहीं दी है। इससे पहले भी आईआईटी की एक रिपोर्ट ने बिहार के 14 जिलों को जलवायु परिवर्तन के संकट से मुकाबला करने में सबसे अक्षम जिलों की सूची में रखा है। बिहार सरकार के तमाम दावों के बावजूद जलवायु संकट को लेकर उसकी तैयारी जमीन पर क्यों उतरती नजर नहीं आ रही।

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