अच्छे पर्यावरण के लिये एक गाँव की अनूठी मुहिम

Submitted by RuralWater on Sat, 06/04/2016 - 12:59

विश्व पर्यावरण दिवस, 05 जून 2016 पर विशेष


गाँव पहुँचते ही जैसे दिल बाग-बाग हो जाता है। गाँव में जगह-जगह पेड़-पौधे लगे हुए हैं। पूरा गाँव साफ–सुथरा है। यहाँ कचरा ढूँढे नहीं मिलता है। हर गली-चौराहे पर डस्टबीन रखी हुई है। गाँव के हर चौराहों पर शहर की तरह संकेत बोर्ड लगे हैं। चौराहों को बेहतर ढंग से विकसित किया गया है। उन पर प्रतिमाएँ लगाई गई हैं। यहाँ सरकारी खर्च उतना ही हुआ है जितना बाकी गाँवों में लेकिन यहाँ के लोगों की जागरुकता के चलते गाँव ने अपनी पहचान बना ली है।

पर्यावरण के लिहाज से गाँवों का साफ–सुथरा और पर्यावरण हितैषी होना जरूरी है। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि गाँव साफ–सुथरे नहीं होते। गाँव के लोग इन्हें गन्दा रखते हैं लेकिन इस गाँव को देखकर आप अपनी धारणा बदलने पर मजबूर हो जाएँगे।

अब तक गाँवों को आप भले ही साफ–सुथरे न मानते रहे हों पर इस गाँव में एक बार घूम आइए, जनाब ... लौटकर यही कहेंगे कि कहाँ लगते हैं इसके सामने शहर भी। आपने अब तक ऐसा कोई गाँव शायद ही कहीं देखा हो। जहाँ आपको जतन करने पर भी कूड़ा–करकट नजर तक नहीं आएगा कहीं। महज ढाई हजार की आबादी वाले इस गाँव की किस्मत पलटी है खुद यहाँ के ही लोगों ने।

इन्दौर से करीब एक सौ किमी की दूरी पर देवास जिले के खातेगाँव कस्बे के पास है यह गाँव बछखाल। भोपाल से भी हरदा होते हुए यह करीब डेढ़ सौ किमी दूर है। बड़ी सड़क से गाँव की सड़क की ओर मुड़ते ही गाँव का प्राकृतिक सौन्दर्य दिखाई देने लगता है, नहीं मोहने लगता है। तीन किलोमीटर लम्बी इस सड़क के दोनों ओर हरे-भरे पेड़ हरहराते हुए जैसे हमारा स्वागत करते नजर आते हैं। गाँव पहुँचते-पहुँचते रास्ते से ही दिखने वाले हिरणों और मोरों के झुण्ड इसे और भी मनोरम बना देते हैं।

गाँव पहुँचते ही जैसे दिल बाग-बाग हो जाता है। गाँव में जगह-जगह पेड़-पौधे लगे हुए हैं। पूरा गाँव साफ–सुथरा है। यहाँ कचरा ढूँढे नहीं मिलता है। हर गली-चौराहे पर डस्टबीन रखी हुई है। गाँव के हर चौराहों पर शहर की तरह संकेत बोर्ड लगे हैं। चौराहों को बेहतर ढंग से विकसित किया गया है। उन पर प्रतिमाएँ लगाई गई हैं। यहाँ सरकारी खर्च उतना ही हुआ है जितना बाकी गाँवों में लेकिन यहाँ के लोगों की जागरुकता के चलते गाँव ने अपनी पहचान बना ली है।

हरियाली से भरपूर है बछखाल गाँवसरपंच गीता बाई लक्ष्मीनारायण गौरा बताती हैं कि पहले गाँव में बहुत गन्दगी थी। पहले दो सफाईकर्मी भी रखे गए मगर उनसे सफाई ठीक नहीं होती थी। लोग पहले इसे पंचायत और सरकार का काम समझते थे। गाँव के कुछ लोगों ने फैसला लिया कि गाँव हमारा है तो इसकी सफाई का जिम्मा भी हमारा ही होना चाहिए और सफाई अपने हाथों में ले ली। धीरे-धीरे लोग जागरुक हुए और आज हालात ये है कि हर परिवार सुबह के 10 मिनट देकर अपने घर के सामने की सफाई खुद करने लगे। अब गाँव के लोग सफाई के लिये किसी सरकारी कर्मचारी का इन्तजार नहीं करते। वे बताती हैं कि गाँव की सड़क के दोनों किनारों पर पौधे लगाए। लेकिन लोग अपने खेतों में फसलों की कटाई के बाद आग में उन पौधों को भी जला देते थे। लोगों को समझाइश दी गई फिर भी बात नहीं बनी। फिर पंचायत ने पेड़-पौधों को बचाने वाले कुछ लोगों को 26 जनवरी और 15 अगस्त को प्रोत्साहन राशी देकर पुरस्कृत किया। फिर तो चारों तरफ हरियाली-ही-हरियाली हो गई।

इस मुहिम का असर यह हुआ कि आज यहाँ बच्चों से लगाकर बूढे और महिलाएँ घर का कचरा डस्टबीन मे ही डालती हैं। यहाँ के चौराहे शहरों की तरह के सुसज्जित हैं। हर चौराहे और प्रमुख जगहों पर सुविधाघर बनाए गए हैं। हर घर में शौचालय है। इसे खुले में शौच से मुक्त घोषित भी किया गया है। घरों की दीवारों पर महापुरुषों की तस्वीरें बनाई गई हैं ताकि नई पीढ़ी उनके बारे में जान-समझ सके। गाँव के श्मशान से लगाकर चौराहों तक को विकसित कर उनकी देखरेख का जिम्मा गाँव के लोगों का ही है।

गाँव की सफाई का सकारात्मक असर यहाँ की आबादी के स्वास्थ्य पर भी पड़ा है। इलाके की स्वास्थ्य सेवाओं को देखने वाले ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर दावा करते हैं कि आसपास के अन्य गाँवों से अपेक्षाकृत इस गाँव में बीते दो सालों में बीमारियों का आँकड़ा बहुत कम हुआ है। खासतौर पर गन्दगी से होने वाली बीमारियों में, यहाँ लोगों के स्वस्थ रहने की दर बढ़ी है। वहीं स्वास्थ्य योजनाओं और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में भी ग्रामीणों ने ज्यादा योगदान किया है। साफ पानी पीने से यहाँ जलजनित रोगों का आँकड़ा भी नगण्य है।

इस गाँव में शत-प्रतिशत घरों में शौचालय भी बने हुए हैं। इतना ही नहीं अमूमन गाँवों में घुसते ही नजर आने वाले घूरे भी यहाँ नहीं दिखाई पड़ते। पेड़–पौधों से यहाँ का पर्यावरण तो साफ रहता ही है, गर्मी के दिनों में भी यहाँ आसपास के गाँवों के मुकाबले इतनी गर्मी नहीं पड़ती। यहाँ के नाले पर बोरी बंधान भी किया गया है। अब जन भागीदारी और श्रमदान से तालाब बनाने पर भी ग्रामीण मन बना रहे हैं।

पूरे गाँव में साक्षरता की दर 85 फीसदी है। यहाँ लोगों को आत्मनिर्भर बनाने पर भी खासा जोर दिया जा रहा है। गाँव में ही उपलब्ध संसाधनों के आधार पर सरकारी योजनाओं के जरिए युवाओं को ऋण तथा जरूरी सुविधाएँ दी जाती हैं।

कोशिश की जा रही है कि यहाँ रहने वाले किसी की भी माली हालत कमजोर नहीं रह सके। गाँव के स्कूल को देखकर आप चौंक जाएँगे, साफ-सुथरा और व्यवस्थित बने खेल मैदान और टेनिस कोर्ट देखकर तो भ्रम होता है कि यह सरकारी स्कूल है या कि कोई निजी स्कूल। यहाँ के बच्चे भी अब पर्यावरण, पानी बचाने और सफाई का महत्त्व भली-भाँती समझते हैं। खुद बच्चे भी स्कूल जाने से पहले अपने आसपास की सफाई करते हैं।

बच्चों ने बताया कि साफ-सफाई और पेड़–पौधों से हमें साफ परिवेश मिलता है, जो हमारे पर्यावरण के लिये बहुत जरुरी है।

बछखाल गाँव में पानी सहेजने की भी व्यवस्था हैअब यह गाँव इस इलाके में बदलाव की मिसाल बन चुका है। इस गाँव की बदली तस्वीर को देखने के लिये हर दिन इसे देखने और समझने वालों का मजमा लगा रहता है। अब बदले हुए गाँव की इस तस्वीर को देखने के लिये राज्य ही नहीं बल्कि बाहर से भी कई प्रतिनिधि दल देखने आ रहे हैं। आईआईएम के विद्यार्थियों का दल भी सामुदायिक प्रबन्धन के गुर सीखने यहाँ आ चुके हैं।

अब आदर्श गाँव बन चुका है। इस गाँव के मुखिया गौरा परिवार ने पूरे गाँव की अपने परिवार की तरह देख-रेख की है। कुछ साल पहले उनके मन में खयाल आया कि वो कुछ ऐसा करें कि यहाँ से लोग भोपाल-इन्दौर की खूबसूरती को देखने ना जाये बल्कि भोपाल–इन्दौर के लोग उनके गाँव की खूबसूरती को देखने यहाँ आये।

बछखाल में लोग घरों के साथ ही गाँव–गलियों की भी साफ–सफाई कर रहे हैं। हमारे अच्छे पर्यावरण के लिये यह जरूरी है कि हम सब इसके लिये प्रयास करें। यह हम सबके लिये अनुकरणीय है। जिला प्रशासन ने भी इसे खुले में शौच से मुक्त किया है... आशुतोष अवस्थी, जिला कलेक्टर, देवास मप्र।

बछखाल गाँवशुरुआत में तो हमें भी उम्मीद नहीं थी कि ऐसा हो पाएगा या नहीं लेकिन अब हमें खुशी है कि धीरे–धीरे हमारा गाँव इतना बदल गया... उमेश गुर्जर गायत्रीबाई

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