सदी का सबसे बड़ा पलायन

Submitted by RuralWater on Thu, 06/16/2016 - 12:26
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.गंगाराम के नाम में गंगा और राम दोनों हैं लेकिन उनका भरोसा इन दोनों से ही उठ चुका है। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के तिवारीटोला निवासी गंगाराम अपने परिवार के अकेले सदस्य हैं जो अपने पुस्तैनी घर में रह रहे हैं।

महज एक दशक पहले तक उनके संयुक्त परिवार में सत्तर लोग रहते थे, सामूहिक खेती होती, दिन में भले ही लोग अपने कामों में व्यस्त रहें लेकिन रात का खाना साथ में खाने का रिवाज था। आसपास के कई गाँवों में उनकी खुशहाली की चर्चा होती। पहले कुएँ में मोटर लटकाकर सिंचाई की जाती थी फिर बोरिंग यानी जमीन में पाइप डालकर सीधे पानी खींचा जाने लगा और कुआँ देखते-ही-देखते पिछड़ेपन की निशानी हो गया।

अस्सी के दशक आते-आते घर में लगे हैण्डपम्प और खेतों के बोरवेल से निकलते पानी का रंग बदलने लगा, पानी का रंग क्या बदला, मानों जिन्दगी ही बदल गई। पानी देखने में तो ठीक लगता लेकिन जहाँ गिरता वहाँ अपना निशान छोड़ देता, जैसे जमीन पर जंग लग गई हो। जंग का असर दिखा और परिवार के चार सदस्यों को त्वचा के गम्भीर रोगों का सामना करना पड़ा, सामना मतलब रोग उनकी मौत के साथ ही गया। मानस के पन्ने खोलकर उपाय बताने वाले पंडित से लेकर बनारस हिंदु विश्वविद्यालय के अस्पताल के बड़े डॉक्टर तक, सभी इसका इलाज करने में नाकाम रहे।

परिवार बिखरना शुरू हो गया। जो सक्षम थे उन्होंने दिल्ली, लखनऊ और वाराणसी को अपना ठिकाना बना लिया, शुरू में कुछ जमीनें बिक गईं लेकिन बाद में आर्सेनिक सिंचित जमीन को कोई औने-पौने दामों में भी लेने वाला नहीं मिला। हर कोई जमीन से निकलते शीतल जलजले से दूर भाग जाना चाहता था। जो पढ़ने बाहर गया वो लौटा ही नहीं, सभी सदस्य पारिवारिक सम्पत्ति के अपने हिस्से को नगद में बदलना चाहते हैं ताकि दोबारा यहाँ आना ही ना पड़े। लोग नई पीढ़ी को, अपने बच्चों को, अपनी ही जड़ों से बचाना चाहते हैं, उन जड़ों से, जिनमें आर्सेनिक लग चुका है।

पलायन मानव समाज की सबसे बड़ी त्रासदी रहा है। इसका कारण राजनैतिक, सामाजिक और प्रकृतिजन्य भी रहा है। इसरायल, फिलीस्तीन के मूल में पलायन का अपना इतिहास है, महाभारत के समय से युद्ध भूमि बनी रही हरियाणा की धरती से समाज पलायन हुआ तो वह अपने साथ लोकगीत और लोकनृत्य भी ले गया।

आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में जाँच के नमूनेविश्व की महान नदियाँ नष्ट हुईं तो नदी किनारे बसने वाला समाज सुदूर रेगिस्तान में भटकने पर मजबूर हो गया। हजारों सालों बाद मानों प्रकृति की घड़ी का कांटा घूम कर वहीं आ गया है। गंगा पथ से यह सभ्यता के अन्त का संकेत है, मध्य गंगा मैदान और पूर्वी भारत के लाखों लोग सदी के सबसे बड़े विस्थापन का सामना कर रहे हैं।

कानपुर, इलाहाबाद, मिर्जापुर, वाराणसी, बलिया, गाजीपुर, बक्सर, भोजपुर, आरा, पटना, मूंगेर, कहलगाँव, भागलपुर, सुल्तानगंज, लखीसराय, राजमहल, साहिबगंज, खगड़िया, मालदा जैसे इलाके बुरी तरह आर्सेनिक की चपेट में हैं। इनमें से हर शहर में तिवारीटोला जैसे पचासों गाँव हैं और हर गाँव की कहानी तिवारीटोला की ही पुनरावृति है। ऐसा अनुमान है कि अब तक तीस लाख से ज्यादा की आबादी फ्लोराइड और आर्सेनिक के कारण रोटी और साफ पानी की तलाश में गंगा पथ को छोड़ गई है।

आज मध्य गंगा मैदान से लेकर पूर्वी भारत और ब्रह्मपुत्र घाटी में कुल मिलाकर करीब 50 करोड़ लोग आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हैं। सिर्फ दिल्ली में ही रिक्शा, ई-रिक्शा चलाने और मजदूरी करने वाले करीब तीन लाख लोग गंगा पथ के आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों के हैं, बेशक ये कहा जा सकता है कि ये लोग रोजगार की तलाश में यहाँ हैं ना कि आर्सेनिक मिले पानी से त्रस्त होकर। लेकिन ये समझने की जरूरत है कि जो लोग आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों में हैं वे मजबूरी में वहाँ रह रहे हैं ना कि गंगा और अपनी जमीन से लगाव के चलते।

दिल्ली के एम्स में इलाज करवा रहे दीपक मंडल सन 2003 में यहाँ आये थे उनके हाथों और पैरों में सफेद चकत्ते पड़ गए थे, डॉक्टर ने कहा इलाज लम्बा चलेगा तो वे यहीं रुक गए और जीविका के लिये रिक्शा खींचने लगे। करीब चार–पाँच साल बाद उनके हाथों के निशान गायब हो गए इसका सबसे बड़ा कारण था, पानी में बदलाव।

पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, बंगाल के सभी अस्पताल और दिल्ली के एम्स तक में आर्सेनिक पीड़ित लोगों की भीड़ बता देती है कि हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं। आर्सेनिक प्रभावित पानी से कैंसर, लिवर फाइब्रोसिस, हाइपर पिगमेंटेशन जैसी लाइलाज बीमारियाँ हो रही है। गर्भ में पल रहे बच्चे तक इससे अछूते नहीं हैं। भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी ने खाद्य शृंखला पर भी असर डाला है।

कैम्प में दवाई लेतीं आर्सेनिक से पीड़ित महिलाएँइस क्षेत्र की मछलियों में अच्छा खासा आर्सेनिक पाया गया है और चावल में आर्सेनिक की मौजूदगी को लेकर मीडिया में कई रिपोर्ट आ चुकी है। पालतू जानवरों पर आर्सेनिक के असर को लेकर ना कोई जाँच हुई है ना ही ये सरकारों की प्राथमिक सूची में शामिल हैं। अनुमान है कि पालतू जानवरों के मार्फत आर्सेनिक की मात्रा डेयरी उत्पादों में भी आ गई है इस तरह ये कड़ी कभी ना खत्म होने वाले सिलसिले में तब्दील होती जा रही है।

गरीब और अमीर सभी के लिये पलायन ही नियति है। अमीर पीने के पानी का इन्तजाम कर ले रहा है लेकिन सामाजिक जीवन में पैदा हो रहे शून्य को भरना किसी के लिये भी सम्भव नहीं है। हजारों घर है जहाँ लड़कियों की शादी नहीं हो पा रही, हर कोई बीमारी को अपने घर ले जाने से डरता है। जागरुकता का अभाव भी कोढ़ में खाज का काम करता है।

सुरक्षित क्षेत्रों के लोग भी इन गाँवों में अपनी लड़की नहीं देना चाहते। लड़कियों के साथ लड़कों की भी एक बड़ी फौज है जो फोटो खिंचवाने में भी संकोच करती है। राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय तो दूर राज्य स्तरीय खिलाड़ी भी यहाँ ढूँढे नहीं मिलेंगे। स्कूल-कॉलेजों में बेनूर चेहरे निरुद्देश्य से बैठे नजर आते हैं। उनके खून में जहर घुल रहा है इस बात की गम्भीरता का एहसास छात्रों को छू भी नहीं पाता।

एक समय था जब मध्य गंगा मैदान, दोआब और दियारा की सम्पदा से लबालब था लेकिन अब पानी में मिला आर्सेनिक, हलक से उतरती हर बूँद के साथ लाखों लोगों को मौत के करीब ले जा रहा है। सैकड़ों लोगों के रिसते घाव इस बात का संकेत है कि बात हाथ से निकलती जा रही है। सदियों से गंगा किनारे शान से रहने वाला समाज समझ ही नहीं पा रहा कि उनकी गलती क्या है।

आर्सेनिक के कहर ने अन्धविश्वास को भी बढ़ावा दिया है, जिनके घरों में कैंसर से मौतें हुई हैं वे इसे जादू टोने या अपने ग्राम देवता की नाराजगी से जोड़कर देखते हैं। इस श्राप से मुक्ति के लिये बलि या अन्य पूजा पाठ पहले की तुलना में बेहद ज्यादा है। कई लोग इसे डाकिन की कारगुजारी मानते हैं और इससे छुटकारा पाने के उपाय ढूँढते रहते हैं। इस अन्धविश्वास और अशिक्षा ने पूरे गंगा पथ पर पलायन को गति दी है बहुत लोगों का मानना है कि ये गंगा की वापसी का संकेत है।

भारत के इस सबसे बड़े पलायन पर सरकारें मौन हैं, सरकारी उदासीनता का आलम है कि किसी भी विभाग के पास पलायन से जुड़े कोई आँकड़े नहीं है। आर्सेनिक की जाँच के लिये बेहद कम लैब और अप्रशिक्षित स्टाफ है। लैब के तकनीशियन फील्ड में काम आने वाली किट का उपयोग लैब के अन्दर करते हैं जबकि लैब के भीतर उन्हें विस्तृत जाँच करनी चाहिए।

आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र से पलायन करते ग्रामीणआर्सेनिक रिमुवल प्लांट के साथ जुड़े हैण्डपम्पों के रूटीन जाँच की कोई व्यवस्था नहीं है। आर्सेनिक रिमुवल प्लांट , पाइप लाइन जैसे उपाय भ्रष्टाचार और रखरखाव के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। राज्य सरकारें हैण्डपम्प लगाने के लिये पूरी तरह ठेकेदारों पर निर्भर हैं।

सरकारी कारिंदों को ये भी नहीं पता होता कि कोई हैण्डपम्प निर्धारित सीमा तक खोदा गया है या नहीं। एकबार प्लांट लगाने के बाद ठेकेदार दोबारा गाँव का रूख भी नहीं करते, हालांकि मैंटेनेन्स की जिम्मेदारी उन्हीं की है। उत्तर प्रदेश सरकार ने तो आर्सेनिक उगल रहे पम्पों को और भी गहरा कर कार्बन लेयर तक खोद दिया है इससे उन पम्पों ने आर्सेनिक उगलना कुछ समय के लिये बन्द कर दिया या कम कर दिया है। लेकिन कार्बन लेयर तक खोदना अपने भविष्य को गड्डे में डालने जैसा है।

बलिया-छपरा रेल लाइन पर मौजूद रेलवे स्टेशन सरेमनपुर के एक अधिकारी ने रेल मंत्रालय को भेजे अपने आवेदन में साफ लिखा है कि उसके क्षेत्र का पानी जहरीला हो गया है इसलिये उसका स्थानान्तरण कर दिया जाये। राज्य या केन्द्र के किसी भी विभाग का कोई भी अधिकारी इन क्षेत्रों में तैनाती को सजा के रूप में देखता है, सिवाय स्वास्थ्य विभाग और जल संसाधन विभाग के, इन्हीं दोनों के हाथों आर्सेनिक से लड़ने के लिये जारी करोड़ों का बजट होता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि आर्सेनिक हिमालय से बहकर आया है और नदी की तलहटी पर मौजूद रहता है। सैकड़ों सालों में नदी ने जब रास्ता बदला तो उसकी छोड़ी गई जमीन पर गाँव बस गए, गाँव को पानी चाहिए तो कुएँ खोदे गए लेकिन जरूरत बढ़ती गई कुएँ की जगह हैण्डपम्पों ने ले ली, सिंचाई के लिये भी पानी चाहिए था इसलिये जमीन को और भी ज्यादा खोदा गया, इस लगातार और बेतहाशा दोहन ने पानी को जहरीला बना दिया।

आर्सेनिक से प्रभावित इलाकों में बहुत कम ही लोग बचे हैंदरअसल आर्सेनिक एक सेमी मटैलिक तत्व है जो आयरन, कैल्शियम, कॉपर आदि के साथ क्रिया करता है। इसे इसके जहरीलेपन की वजह से जाना जाता है। इसमें कैंसर पैदा करने की क्षमता है और ये हवा, पानी, त्वचा और भोजन के सम्पर्क में आकर हमारे शरीर में पहुँच जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि 10 पार्ट प्रति बिलियन आर्सेनिक मिला पानी ही सुरक्षित होता है लेकिन बलिया और आसपास के क्षेत्रों में आर्सेनिक की मात्रा एक हजार से पन्द्रह सौ पार्ट प्रति बिलियन तक पहुँच गई है। जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापक से कई सौ गुना ज्यादा है।

गंगा पथ के अलावा असम, बिहार, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में भी आर्सेनिक तेजी से अपने पैर फैला रहा है। संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि 12 राज्यों के 96 जिलों में भूजल बेहद प्रदूषित हो गया है। संसद में पेश रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे ज्यादा 20 प्रभावित जिले उत्तर प्रदेश में पाये गए, जबकि असम के 18, बिहार के 15, हरियाणा के 13, पश्चिम बंगाल के आठ और पंजाब के 6 जिलों में आर्सेनिक की मौजूदगी बड़ी समस्या बनी हुई है।

गंगा के किनारों पर फैल रहा आर्सेनिक का आतंक भी बाजार की नजर से बच नहीं पाया है। यहाँ बोतलबन्द पानी एक बड़ी इंडस्ट्री बनकर उभरा है। बीस लीटर की एक बोतल के लिये बीस रुपए चुकाने होते हैं। इस बोतलबन्द पानी के लिये कोई मापक और किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं है। लोग इस भरोसे में पानी खरीद रहे हैं कि पैसे के बदले मिल रहा ये पानी शायद आर्सेनिक मुक्त हो। सच्चाई ये है कि पानी इंडस्ट्री उसी जगह पर खड़ी है जहाँ आर्सेनिक मौजूद है।

100 रुपए रोज कमाने वाले व्यक्ति को 20 रुपए का पानी खरीदते देख सहसा विश्वास नहीं होता। गंगा पथ पर सैकड़ों वाटर प्लांट हैं जहाँ जमीन से पानी निकाला जाता है और सामान्य फिल्टर प्रक्रिया के बाद बोतलों को भर लिया जाता है, आम लोग ब्रांडेड पानी नहीं खरीद सकते बावजूद इसके मध्य गंगा मैदान के सभी दूसरे और तीसरे श्रेणी के शहरों में बिसलरी, किनले जैसी बड़ी कम्पनियों के डिस्ट्रीब्यूटर मौजूद हैं। इन कम्पनियों को आर्सेनिक मिला पानी सोने की तरह चमकता नजर आता है।

गंगा क्षेत्र में शीतल जहर का प्रकोप बढ़ रहा हैइस पलायन को रोकने के लिये परम्पराओं की ओर लौटना होगा। विज्ञान इस मुद्दे पर एकमत है कि कुएँ के पानी में आर्सेनिक नहीं पाया जाता। कुएँ के पानी में ऑक्सीजन का प्रवाह ज्यादा रहता है और सूर्य की रोशनी पानी में आर्सेनिक को टिकने नहीं देती।

हालांकि सरकारी और निजी सभी लोग अब कुएँ के बजाय हैण्डपम्प पर ही निर्भरता दर्शाते हैं क्योकि इसमें आधुनिकता की झलक है, कई लोगों का कहना है कि कुएँ की देखभाल दुरुह कार्य है और गाँवों में सामूहिकता की भावना का लोप हो गया है। कई जिलों में कुओं को लेकर नए सिरे जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है, कुछ जगह यह तरीका बेहतरीन साबित हुआ है हालांकि ये उदाहरण उँगलियों पर गिने जा सकते हैं।

तिवारीटोला के गंगाराम का बचाखुचा जीवन अब बिस्तर के इर्दगिर्द ही घूमेगा। गंगा और ब्रह्मपुत्र घाटी की करोड़ों की आबादी मानो श्राप काट रही है लोग मर रहे हैं, भाग रहे हैं और लगातार अन्दर से गल रहे हैं। भविष्य में इस पलायन के ऐतिहासिक कारणों की समीक्षा के बजाय पलायन को रोकने के लिये मिशन मोड में काम किया जाना चाहिए। एक बात साफ है कि समाज और सरकार दोनों के लिये वक्त तेजी से बीत रहा है।

पिछले बारह सालों से बलिया, गाजीपुर, भोजपुर, बक्सर आदि क्षेत्रों में आर्सेनिक पर काम एवं क्षेत्र के लोगों को परम्परागत जलस्रोत कुआँ के लिये जागरूक कर रहे इनर वाइस फाउंडेशन के संयोजक सौरभ सिंह से अभय मिश्र की बातचीत पर आधारित साक्षात्कार।

.सौरभ जी आपकी नजर में गंगा और ब्रह्मपुत्र घाटी में पलायन कितना बड़ा है यानी इसकी जड़ें कहाँ तक फैली हैं?

इस क्षेत्र में ग्राउंड वाटर सन्दूषण की समस्या बड़ी गम्भीर है। अगर पलायन की बात करें तो आज उत्तरी भारत के करीब पचास जिले जहाँ आर्सेनिक की समस्या विकराल हैं, तकरीबन पचास लाख लोग पलायन कर चुके हैं। लोगबाग कैंसर और अन्य भीषण बिमारियों से टूटने और अपना घर बार सब कुछ खोने के बाद हताश होकर पलायन करने लगते हैं। ग्रामीणों का भावनात्मक टूटन और अपना घर बार छोड़ना एक त्रासदी से कम नहीं। ये एक तरह से समाज के टूटने की प्रक्रिया है और यह सिर्फ पानी तक ही सीमित नहीं।

क्या आर्सेनिक ही एकमात्र समस्या है जिसके चलते लोग धीरे-धीरे पलायन कर रहे हैं या और दूसरे जहर भी हैं जो सामाजिक जड़ों को काट रहे हैं जैसे फ्लोराइड या रसायनिक कचरा।

आर्सेनिक की समस्या अकेले नहीं हैं। फ्लोराइड भी हैं, अन्य सन्दूषण की समस्या भी है। हमने अपने बारह साल के कार्य के दौरान यह देखा है कि गाँवों में इस समस्या से लोग पीड़ित होते हैं, और इलाज आदि की समुचित व्यवस्था ना मिलने से उनका घर-बार, खेत-खलिहान सब कुछ बिक जाता है। फिर गाँव देहात में रोजगार भी नहीं मिलता। अपने परिवार और सम्बन्धियों को खोने के बाद ग्रामीण जन हताश होकर पलायन कर जाते हैं। यह बात किसी सरकारी आँकड़ों में नहीं मिलेगी लेकिन हमने अपने कार्य के दौरान यह बहुधा देखा है। सामाजिक जड़ें आसानी से नहीं कटतीं। लेकिन जब चौतरफा चोट पहुँचे तभी पलायन होता है। स्वास्थ्य, आर्थिक नुकसान, बेटियों की शादी ना होना (क्योंकि शरीर पर आर्सेनिक युक्त जल के सेवन से चकत्ते उभर आते हैं) पेयजल योजनाओं का फेल होना, फिर सरकारी तंत्र की विफलता पलायन के अभिकर्ता हैं।

कुआँ आर्सेनिक के जहर से बचाव के लिये बेहतर हैआर्सेनिक के कहर से इतनी बड़ी आबादी जूझ रही है, उपाय काम नहीं कर रहे तो अब ये रास्ता जाता कहाँ है?

सरकारी तंत्र फेल हैं। टेंडर और हजार करोड़ का खेल है। हर राज्य की पेयजल परियोजनाओं में चल रहा है। आमजन की कोई पूछ नहीं है। लेकिन कुछ गैर सरकारी और अन्य संस्थाएँ प्रयास कर रही हैं। आज स्थिति इतनी भयावह इसलिये की पेयजल के सेक्टर में बड़ा भ्रष्टाचार है। केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को पैसा देती हैं, लेकिन इस पैसे का कोई फायदा ग्रामीण को नहीं मिलता। कई सरकारी पानी सप्लाई में आर्सेनिक पाया गया। हमने कई बार रिपोर्ट किया। बड़ी-बड़ी बैठकें होती हैं लेकिन कोई नतीजा नहीं है। यह रवैया बहुत ही निराशाजनक हैं। सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो आने वाले समय में उत्तरी भारत की आधी आबादी गम्भीर बीमारियों से जूझती नजर आएगी। सरकार को ध्यान देना होगा।

आप लोगों को जागरूक करने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैं, तो आपको सबसे ज्यादा दिक्कत कहाँ आती है।

दोतरफा दिक्कत आती है। एक तो गाँव के लोग किसी पर भरोसा नहीं करते। क्योंकि सरकारी योजनाएँ विफल हैं। बड़ा समय लगता हैं लोगों का भरोसा जितने और गाँव में कुछ करने में। दूसरा ये है कि हजार-हजार करोड़ की पेयजल हर जिले में कार्यरत हैं, लेकिन रिजल्ट सिफर है। ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल नसीब नहीं। चिट्ठी पत्री, मीडिया, सरकारी रिपोर्टें सब अपनी जगह हैं लेकिन कोई सुधार नहीं दीखता है। ऐसा लगता है ये लोग अपने देश के नहीं हैं। किसी अन्य देश से आये हैं। कष्टकर हैं ये चीजें।

आपको क्या लगता है कि आधुनिकता ने मनुष्य और प्रकृति का तलाक करवा दिया है या इस सम्बन्ध को अब भी बचाया जा सकता है, (ऐसे प्राकृतिक सम्भव उपायों की चर्चा जिनसे आर्सेनिक दूर हो सकता है)

जी बिलकुल सही कहा आपने। लेकिन ये आधुनिकता नहीं हैं। ये कुछ और है। बाजारवाद है। बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ हैं, जो अपना भला देखती हैं। बाजारवाद हावी है। विदेशी विश्वविद्यालय और शोधकर्ता हमारे काम को देखने गाँवों में आते हैं, सीखते हैं, अपने साथ ले जाते हैं। ये आधुनिकता है। लेकिन हमारी सरकारों को कम पैसे के ये उपाय पसन्द नहीं। उन्हें हजार करोड़ में बात करने की आदत हो गई है। ये शुद्ध बाजारवाद है।

नदी से सटी जमीन भी आर्सेनिक उगल रही है और नदी से दूर वाली जमीन भी, आपको इन दोनों जगहों की समस्याओं में कुछ फर्क नजर आता है, या कौन ज्यादा मुसीबत में है।

नदी के किनारे वाले गाँवों में आर्सेनिक की मार ज्यादा हैं क्योंकि यह घनी आबादी का क्षेत्र है। अतः यहाँ रोगी ज्यादा मिलते हैं। नदी के दूर के क्षेत्र में भी स्थिति अच्छी नहीं लेकिन नदी के पास वाले गाँव तो बहुत भयावह स्थिति में हैं।

आर्सेनिक जैसी विकराल समस्या पर ध्यान देने के बावजूद वे कौन से कारण हैं जिसने सरकार और समाज को विरोधी पालों में खड़ा कर रखा है।

आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में कुएँ की सफाई करते ग्रामीणध्यान कहाँ दिया गया यही प्रश्न है? भारत की सरकार 2007 के पहले ये मानने को तैयार नहीं थी कि यूपी और बिहार में आर्सेनिक है। उनका मानना था कि आर्सेनिक केवल बंगाल में है। बड़ा दिलचस्प अनुभव रहा। एक लम्बी लड़ाई और संघर्ष चला। फिर हमने सारा डाटा उन्हें दिया। फिर सरकार मान गई। और बड़े-बड़े सयंत्र व प्रोजेक्ट चालू हो गए। तो ध्यान तो ऐसे दिया गया। लोगों की सुधि किसी ने नहीं ली। ध्यान जहाँ दिया जाना था वहाँ नहीं दिया गया। ऐसा नहीं कि सरकार में अच्छे लोग नहीं या देश में काम नहीं हो रहा। सिस्टम की खामिया हैं जो कि समाज को भुगतना पड़ रहा है। उम्मीद है कि आगे ये स्थिति नहीं रहेगी।

आपके हिसाब से वे कौन से तात्कालिक और दीर्घकालीन उपाय हो सकते है जो केन्द्र और राज्यों को बिना देरी किये करने चाहिए।

देखिए लोगों के बीच जागरुकता एवं ईमानदारी की जरूरत है। वस्तुस्थिति यह है कि आज पेयजल परियोजनाएँ ठेकेदार तय करते हैं। ना कोई इंजिनियर या अफसर इसको देखता, न ही समाज की इनमें कोई भागीदारी है। बंगाल, असम से लेकर उत्तरी राज्यों तक कमोबेश स्थिति यही है। ऐसे उपाय जो कि समाज स्वयं कर सकता है, बढ़ावा देने की जरूरत है। हमने कुएँ के प्रयोग से आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में कई लोगों को बामारियों को ठीक होते देखा। ये प्रयोग सफल रहा। लेकिन सरकार इस बात को मानती तो है, लेकिन बढ़ावा नहीं देती है।

आज अमेरिका की संस्था भारत में कुएँ को जागृत कर रही है। तो इस विरोधावास को दूर करना पड़ेगा। जहाँ समस्या है वहीं समाधान हैं बस उसे खोजकर स्थापित करने की जरूरत हैं। पंचायतों को तैयार करना पड़ेगा। पेयजल के बड़े-बड़े संयंत्र लगते हैं, लेकिन बिजली के बिना कार्य नहीं करते। फिर नई टेक्नोलॉजी आ जाती है, इस कुचक्र से निकलना होगा। काम करने वाले अच्छे लोग पीछे छुट जाते हैं। ऐसा हो रहा है। उन्हें आगे आना चाहिए। समाज को पानी की समझ है बस उनको साथ लेकर चलने की जरूरत है।

 

 

 

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.अभय मिश्र - 17 वर्षों से मीडिया के विभिन्न माध्यमों अखबार, टीवी चैनल और बेव मीडिया से जुड़े रहे। भोपाल के माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर।

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