बद्री गाय और दुग्ध उत्पादन ही हैं स्वरोजगार के साधन

Submitted by UrbanWater on Fri, 10/13/2017 - 16:44

सरकार का दावा है कि वे उत्तराखण्ड में फिर से पशुपालन को बढ़ावा देंगे जिसमें बद्री गाय महत्त्वपूर्ण होगी। बताया जा रहा है कि अब बद्री गाय बछड़े के बजाय बछिया को ही जन्म देगी। राज्य सरकार अमेरिकी पेटेंट की एक तकनीक का इस्तेमाल इस हेतु करने जा रही है। जिसके प्रयोग से बछड़े के जन्म पर काफी हद तक रोक लग सकेगी। वहीं इस तकनीक से पैदा होने वाली गाय दूध भी ज्यादा देगी। उतराखण्ड राज्य की परम्परा में ही पशुधन रहा है, जिसमें बद्री गाय महत्त्वपूर्ण थीं। राज्य का ऐसा कोई घर नहीं था जो बद्री गाय का पालन नहीं करता था। यह परिवार में कुशलता एवं सम्पन्नता का परिचायक थी। जैसे-जैसे लोग शहरों की तरफ प्रवासी बनते गए वैसे-वैसे गाँव से और परिवारों से बद्री गाय लुप्तप्राय होती गई। यही नहीं बद्री गाय के लुप्त होने से राज्य में कई तरह की समस्या खड़ी हो गई। एक तो पशुधन समाप्त हो गया दूसरा राज्य में कृषि के उत्पादन में भारी कमी हो गई।

जिस कारण पलायन का स्पष्ट चेहरा सामने आया और स्वरोजगार के साधनों पर संकट मँडराने लग गया। ऐसा माना जा रहा है कि यदि फिर से पहाड़ में बद्री गाय पालन आरम्भ होता है तो निश्चित तौर पर पहाड़ की पुरानी रौनक वापस लौट सकती है। हालांकि सरकार ने इस ओर विधिवत कमर कस ली है और बद्री गाय के दूध को स्वरोजगार हेतु जोड़ने की कवायद आरम्भ कर दी है।

उल्लेखनीय हो कि पहले-पहल गाँव में जब पशुधन होता था तो लोग इसके साथ-साथ जल संरक्षण का भी काम करते थे। इसलिये गाँव में पशुधन को खुशहाल और सम्पन्नता का प्रतीक मानते थे। क्योंकि पशुओं के लिये पानी और चारा पूर्णरूप से उपलब्ध हो इसके लिये लोगों को जंगल पर ही निर्भर रहना होता था। लोग जल संरक्षण के लिये चाल-खाल, ताल-तलैया, नौले-धारों का निर्माण भी करते थे, इसका रख-रखाव भी करते थे।

इस तरह से पहाड़ के गाँव में पशुपालन की परम्परा में बद्री गाय को महत्त्वपूर्ण मानते थे। अर्थात यह माना जाय कि बद्री गाय पहाड़ की सम्पन्नता की रीढ़ थी। इस विचार को फिर से राज्य सरकार ने पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया है। बद्री गाय की सख्या को बढ़ाने के लिये सरकार ने नई वैज्ञानिक विधि को इजाद किया है। अब देखना यह होगा कि लोग फिर से इस स्वरोजगार से जुड़ पाएँगे या यह सरकारी प्रोजेक्ट मात्र बनकर रह जाएगा। कुल मिलाकर इस योजना को समय पर अमलीजामा पहनाया गया जो सचमुच में यह राज्य में स्वरोजगार के साधन उत्पन्न करेगा।

इधर सरकार का दावा है कि वे उत्तराखण्ड में फिर से पशुपालन को बढ़ावा देंगे जिसमें बद्री गाय महत्त्वपूर्ण होगी। बताया जा रहा है कि अब बद्री गाय बछड़े के बजाय बछिया को ही जन्म देगी। राज्य सरकार अमेरिकी पेटेंट की एक तकनीक का इस्तेमाल इस हेतु करने जा रही है। जिसके प्रयोग से बछड़े के जन्म पर काफी हद तक रोक लग सकेगी। वहीं इस तकनीक से पैदा होने वाली गाय दूध भी ज्यादा देगी। वरिष्ठ पत्रकार अनिल चन्दोला कहते हैं कि किसानों की आय दोगुनी करने की केन्द्र सरकार की योजना के तहत देश के तमाम राज्यों में यह तकनीक इस्तेमाल की जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार बछड़े की अपेक्षा बछिया पैदा करने के लिये सेक्स सॉर्टेड सीमेन के इस्तेमाल की इस तकनीक को सेक्स सपोर्टिव सीमेन स्कीम नाम दिया गया है। इस तकनीक से तैयार होने वाले विशेष सीमेन के इस्तेमाल (असिस्टेड रिप्रोडक्शन) से 90 फीसदी बछिया ही जन्म लेती है। बद्री गाय समेत अन्य प्रजाति के लिये यह सीमेन तैयार किया जा रहा है।

इसके लिये पशुपालन विभाग अलग-अलग स्थानों पर बछड़े तैयार कर रहा है। इधर सम्बन्धित विभाग का कहना है कि लाइव स्टॉक डेवलपमेंट बोर्ड में अभी तक सीमेन इंपोर्ट किया जाता था लेकिन अब स्थानीय स्तर पर सीमेन तैयार किया जाएगा। सचिव पशुपालन डॉ. आ. मीनाक्षी सुंदरम का कहना है कि वर्ष 2019-20 तक इस तकनीक के इस्तेमाल से ‘जेनेटिकली इम्प्रूव्ड’ गाय की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी और इसके साथ-साथ दूध उत्पादन की मात्रा भी बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि पहले चरण में बद्री गाय समेत अन्य स्थानीय नस्लों पर फोकस कर रहे हैं। बद्री गाय के दूध की गुणवत्ता बहुत बेहतर होती है।

राज्य में 75 फीसदी से अधिक स्थानीय नस्ल का पशुधन है जबकि उनका दुग्ध उत्पादन 20 से 30 फीसदी ही है। उनकी नस्ल में सुधार होने से दूध के उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी होगी, इस कारण किसानों की आय भी बढ़ेगी। उत्तराखण्ड में डेरी विकास की असीम सम्भावनाओं के मद्देनजर दुग्ध संघ भी हामी भर रहा है कि वे आगामी वित्तीय वर्ष में दो लाख लीटर दुग्ध को प्रतिदिन विक्रय करने की योजना बना रहा है।

सामान्य सीमेन से ज्यादा होगी कीमत


सेक्स सपोर्टिव सीमेन स्कीम से कृत्रिम गर्भाधान (एआई) करवाना पशुपालकों के लिये कुछ महंगा पड़ेगा। अभी सरकारी और प्राइवेट एआई करने पर 50 से 100 रुपए शुल्क देना होता है। यह विशेष सीमेन लेने पर पशुपालकों को 650 रुपए तक खर्च करने पड़ेंगे। बछिया पैदा करने और दूध उत्पादन बढ़ाने के अलावा इससे पशु पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

पाँच लीटर दूध देगी बद्री गाय


उत्तराखण्ड की बद्री गाय का दूध उत्पादन बढ़ाने के लिये भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिये ऋषीकेश स्थित पशुलोक में बछड़े तैयार किये जा रहे हैं। अगले दो से तीन वर्ष में यह बछड़े तैयार हो जाएँगे। बद्री गाय के साथ इनकी ब्रिडिंग कराई जाएगी, जिससे पैदा होने वाली बछिया सामान्य गाय से ज्यादा दूध देगी। विदेशों में अपनाई गई तकनीक को आधार माना जाये तो दूध उत्पादन में दो से तीन गुना की बढ़ोत्तरी होगी। बद्री गाय सामान्य तौर पर एक से दो लीटर ही दूध देती है। इस तकनीक को अपनाने के बाद गाय पाँच लीटर तक दूध देने लगेगी।

बद्री गाय संवर्द्धन योजना भी पतंजलि को


चंपावत के नारियाल गाँव में सरकार की बद्री गाय संवर्द्धन योजना अब पतंजलि संचालित करेगा। यह सरकारी फार्म 21 हेक्टेयर (करीब 1050 नाली) क्षेत्र में फैला है। यहाँ 193 गाएँ हैं। पशुपालन विभाग ने अगले तीन महीनों के लिये पतंजलि से 1073 मीट्रिक टन चारे की डिमांड की है। जबकि पशुपालन विभाग पतंजलि को 12000 लीटर दूध की आपूर्ति करेगा। पतंजलि आयुर्वेद विवि के शोधार्थियों को अपनी लैब उपलब्ध कराएगा। पतंजलि की ओर से हरिद्वार के सभी आंगनबाड़ी केन्द्रों पर हाईजीन सम्बन्धी सुविधाएँ विकसित करने की सहमति दी है।

राज्य में दुग्ध उत्पादन की स्थिति


अपर सचिव ने डेरी विकास विभाग एवं उत्तराखण्ड सहकारी डेरी फेडरेशन के अधिकारियों के साथ विभागीय योजनाओं की समीक्षा करते हुए निर्देश दिये कि वे दुग्ध विक्रय में अपनी क्षमताओं को और बढ़ाएँ। अपर सचिव ने डेरी में सम्भावनाओं को देखते हुए जनपदीय सहायक निदेशकों को विभागीय योजनाओं के संचालन के साथ-साथ विभिन्न योजना अन्तर्गत किये गए कार्यों के मूल्यांकन एवं भौतिक सत्यापन के भी निर्देश दिये। बताया गया कि प्रदेश में कुल गठित दुग्ध समिति की संख्या 3647 के सापेक्ष वर्तमान में 2469 कार्यरत हैं। उन्होंने उक्त समितियों को पुनर्जीवित करने के निर्देश दिये।

पर्वतीय क्षेत्रों की दुग्ध समितियों में न्यूनतम संख्या 30 से घटाकर 20 करने सम्बन्धी प्रस्ताव शासन को उपलब्ध कराने को कहा। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण कार्यक्रमों को और अधिक पारदर्शी बनाया जाये। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में चारे की व्यवस्था के लिये योजना तैयार करने, दुग्ध उत्पादकों को दुग्ध मूल्य भुगतान सीधे प्राप्त करने के लिये स्मार्ट कार्ड योजना का प्रारूप तैयार किये जाने की भी बात कही।

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