यदि भाखड़ा न होता

Submitted by UrbanWater on Fri, 03/17/2017 - 13:32
Source
सर्वोदय प्रेस सर्विस, मार्च 2017

मानसून में सिंचाई की अधिक जरूरत, नदी के बहाव को कायम रखने की जरूरत और बाँध के निचली और पहले से ही होने वाले पानी के उपयोग-इन तीनों घटकों का ध्यान रखा जाये तो ये बिल्कुल स्पष्ट है कि सर्दी के महीनों तक ले जाने के लिये बहुत कम पानी बचेेगा। इसके बावजूद अगर बाँध ने सर्दियों के लिये पानी का भण्डारण किया है तो वह खासतौर पर आखिरी दो घटकों की कीमत पर किया है। यानी नदी के बहाव को खत्म करके और धारा के निचली ओर पानी की आपूर्ति न करके ही बाँध में सर्दियों के लिये पानी जमा किया गया है।भाखड़ा न होता तो देश की तस्वीर क्या होती? अक्सर पूछा जाने वाला यह सवाल अधिकतर जवाब की तरह पूछा जाता है! दूसरे शब्दों में, अक्सर यह सवाल बड़े बाँधों के पक्ष में एक लाजवाब तर्क के रूप में पेश किया जाता है।

भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय के पूर्व सचिव श्री रामास्वामी अय्यर कहते हैंः ‘एक तर्क यह दिया जाता है कि किसी भी काम को करने में कीमत लगती है। लेकिन कीमत ‘किसी काम को न करने की’ भी चुकानी होती है। यह तर्क अक्सर इस सवाल के साथ जोड़ा जाता है कि अगर भाखड़ा-नांगल न होता तो देश का क्या होता? परियोजना को न बनाने की कीमत का अर्थ सिर्फ ये है कि अगर ये नहीं होती तो इससे होने वाले लाभ नहीं। हम यह तो जानते हैं कि भाखड़ा-नांगल के बनने से क्या तस्वीर बनी। यह बाँध बना और हमारे सामने है। लेकिन हम यह नहीं जानते कि अगर यह नहीं बना होता तो इतिहास क्या होता। हमें इस नतीजे पर भी बहुत जल्द नहीं पहुँच जाना चाहिए कि भाखड़ा-नांगल के न होने पर कृषि के क्षेत्र में सारी उन्नति ही रुक गई होती।’

वाकई, भाखड़ा-नांगल के अलावा भी बड़ी तादाद में विकल्प मौजूद थे और हमने देखा कि 1940 और 1950 के दशक में इन बातों को सामने रखा भी गया था। यह सही है कि पंजाब और हरियाणा ने अनाज उत्पादन के मामले में जबरदस्त वृद्धि दिखाई। लेकिन इसका श्रेय भाखड़ा परियोजना को नहीं दिया जा सकता है। अधिकतर तो वह वृद्धि भूजल के बेहद और दशकों पुरानी नहर व्यवस्थाओं पर आधारित रही है। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अगर भाखड़ा परियोजना नहीं भी होती तब भी पंजाब और हरियाणा में बहुत से काम वैसे ही हुए होते जैसे कि वे आज हैं।

भाखड़ा के मामले में एक बड़ा दावा है कि इसने नए इलाकों को सींचा और पुराने सिंचित इलाकों में अतिरिक्त पानी मुहैया कराया। लेकिन इस सबके पीछे बड़ी वजह थी विभाजन। देश के विभाजन से वह पानी भारत के उपयोग के लिये उपलब्ध हो गया, जो पहले पाकिस्तान में सतलुज घाटी परियोजना के लिये इस्तेमाल हो रहा था।

इसी के साथ बँटवारे के बाद सरहिंद नहरी व्यवस्था को हरियाणा के इलाकों में फैलाया जा सका। ये काम भाखड़ा न करता तो भी होते ही। जैसे रोपड़ और हरिके स्थानों के बीच कहीं से एक नहर निकालकर हिसार, सिरसा और फतेहाबाद जिलों को पानी सीधे भी उपलब्ध कराया जा सकता था। हिसार के इलाकों को सिंचित करने वाली एक ऐसी नहर का प्रस्ताव बहुत पहले जॉन बेन्टन ने सन 1905 में एक विस्तृत रिपोर्ट में दिया था।

इस सन्दर्भ में एक बात यह उठाई जाती है कि भाखड़ा के जल-भण्डारण की अनुपस्थिति में इन नए इलाकों को दी जाने वाली सिंचाई केवल मानसून के मौसम में ही हो सकती थी। यह बात देश में बड़े बाँधों की उपयोगिता को साबित करने के लिये आमतौर पर उठाई जाती है और भाखड़ा इसका एक विशिष्ट उदाहरण है। इस तर्क के अनुसार बाँध इसलिये जरूरी हैं क्योंकि वे मानसून के मौसम में विशाल मात्रा में उपलब्ध अतिरिक्त पानी को सर्दियों के मौसम तक सहेजकर रखते हैं, ताकि सर्दियों में, जब पानी का बहाव कम हो जाता है तब भी सिंचाई की जरूरत को पूरा किया जा सके।

मानसून से सर्दियों तक पानी के बहाव का भण्डारण करने की जरूरत तब ही पड़ती है, जब सिंचाई की जरूरत और नदियों के बहाव के बीच तालमेल नहीं रहता। लेकिन सतलुज नदी का बहाव अधिक सन्तुलित रूप से पूरे साल भर मिलता है। इसका आंशिक कारण इसमें बर्फ पिघलने से मिलने वाला पानी भी है। यानी दक्षिण भारत व मध्य भारत की नदियों से भिन्न सतलुज का 62 प्रतिशत बहाव मानसून में रहता है और 24 प्रतिशत गर्मियों में। इसके विपरीत प्रायद्वीपीय नदियों का, देश की अन्य नदियों का 90 प्रतिषत तक बहाव मानसून में ही पूरा हो जाता है।

यह एक तथ्य है कि सतलुज के बहाव और सिंचाई की जरूरत के बीच समय का एक सामंजस्यपूर्ण सम्बन्ध रहा है। अर्थात गर्मी और जाड़े में भी जब सिंचाई की आवश्यकता होती है, अन्य नदियों की अपेक्षा सतलुज में पानी अधिक रहता आया है। यह तथ्य इससे भी जाहिर होता है कि अधिकांश वर्षों में भाखड़ा बाँध इसकी पूरी क्षमता तक भरा नहीं जा सका।

अगर हम 1975-76 से 2003-04 के बीच बाँध का उच्चतम जल स्तर देखें तो पाते हैं कि जलाशय में जलस्तर इन 29 वर्षों में केवल 4 वर्षों में ही 1685 फीट के निर्धारित सर्वोच्च स्तर को पार कर पाया और केवल 10 वर्ष ही 1,680 फीट के डिजाइन स्तर को पार कर पाया। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि 1977 से व्यास नदी का पानी भी व्यास-सतलुज लिंक के जरिए भाखड़ा जलाशय में आने लगा था, फिर भी भाखड़ा का जलाशय पूरा नहीं भर पा रहा है।

आँकड़े बताते हैं कि भाखड़ा परियोजना के लिये मानसून के दौरान सिंचाई की जरूरत करीब 50 लाख एकड़ फीट की थी और बहाव करीब 80 लाख एकड़ फीट का था। इसका अर्थ हुआ कि मानसून से सर्दियों के मौसम तक ले जाने के लिये मौजूद पानी करीब 30 लाख एकड़ फीट था। अधिक उपज वाले उन्नत कहे गए नए बीजों के आगमन के साथ ही सिंचाई के लिये पानी की माँग बहुत अधिक बढ़ गई थी।

देसी बीजों के मुकाबले इन बीजों को बहुत पानी चाहिए। इस स्थिति में शेष 30 लाख एकड़ फीट पानी से काफी कम बचना था। इसके साथ ही, यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि बचे हुए शेष पानी को रोक कर भण्डारण करने के लिये नदी को पूरी तरह सुखाने की कीमत चुकानी पड़ती। इसका अर्थ यह है कि नदी में से निश्चित मात्रा तक ही पानी लिया जा सकता है, उससे ज्यादा नहीं। ‘उपलब्ध शेष’ पानी की मात्रा का नियंत्रण इस धारणा को ध्यान में रखकर भी किया जाता है।

अगर मानसून के पानी का कुछ भाग नदी को बहती हुई बनाए रखने के लिये छोड़ दिया जाये तो शेष पानी की मात्रा और भी कम हो जाएगी। इसी मानसून के बहाव का कुछ हिस्सा बाँध के निचली और मौजूद सतलुज घाटी परियोजना में भी इस्तेमाल किया जा रहा था।

अगर मानसून में सिंचाई की अधिक जरूरत, नदी के बहाव को कायम रखने की जरूरत और बाँध के निचली और पहले से ही होने वाले पानी के उपयोग-इन तीनों घटकों का ध्यान रखा जाये तो ये बिल्कुल स्पष्ट है कि सर्दी के महीनों तक ले जाने के लिये बहुत कम पानी बचेेगा। इसके बावजूद अगर बाँध ने सर्दियों के लिये पानी का भण्डारण किया है तो वह खासतौर पर आखिरी दो घटकों की कीमत पर किया है। यानी नदी के बहाव को खत्म करके और धारा के निचली ओर पानी की आपूर्ति न करके ही बाँध में सर्दियों के लिये पानी जमा किया गया है। दूसरे शब्दों में, यदि बाँध नहीं होता तो भी मानसून के शेष पानी को जाड़े की सिंचाई के लिये संग्रहित किये जाने से वंचित रहने का नुकसान काफी कम होता।

यह भी कहा जाता है कि भाखड़ा ने उच्च गुणवता वाली सिंचाई मुहैया कराई। नहरीय सिंचाई व्यवस्था से सिंचाई प्राप्त कर रहे देश भर के किसान इस बात की अविश्वसनीयता के गवाह हैं। विशेष रूप से नहरों के आखिरी छोर पर मौजूद किसान। भाखड़ा भी इसमें अपवाद नहीं है। सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य है भाखड़ा के कमान क्षेत्रों में सिंचाई की गुणवता बनाए रखने में भूजल की भूमिका। नियमित सिंचाई, विश्वसनीय आपूर्ति और वक्त पर सिंचाई की शर्तें बड़े पैमाने पर और बहुत बेहतर तरीके से ट्यूबवेलों के जरिए और भूजल आधारित सिंचाई के जरिए ही पूरी की जा सकीं। यह सिंचाई इस मायने में नहरों से बहुत बेहतर थी।

अगर भाखड़ा बाँध न बना होता तो पंजाब और हरियाणा की तस्वीर कैसी होती? अगर भाखड़ा नहीं होता तो सतलुज घाटी परियोजना से छोड़ा गया अतिरिक्त उपलब्ध पानी सरहिंद नहर के क्षेत्रों में पहले से मौजूद सिंचाई में मिलकर बढ़ जाता। अधिक क्षेत्रफल को सिंचित करने के लिये नई नहरें बनाकर उस सारी जमीन को सींचा जा सकता था, जहाँ आज सिंचाई हो रही है। आज जितनी पानी इस जमीन को मिल रहा है, उससे कम मिलता तो शायद बेहतर ही होता। क्योंकि तब ऐसी कृषि उपज पद्धति का विकास होता जो इस क्षेत्र के लिये उचित होती। ज्यादा पानी और गैर मुनासिब फसलें लगाने से उपजाऊ जमीन दलदली बन रही है और ‘चो’, जमीन के खारे होने जैसी विकट समस्याएँ खड़ी हुई हैं और इन दोनों समस्याओं का हल किसी के पास नहीं है।

भाखड़ा के न होने पर भी अधिक उपज वाले नए बीजों की फसलें पंजाब और हरियाणा में जोरदार तरीके से आती थीं। सघन खेती जिलावार कार्यक्रम लुधियाना में शुरू किया गया था जहाँ नहरी सिंचाई न के बराबर है। नए बीजों का कार्यक्रम चलता तो भाखड़ा के न होने पर भी ट्यूबवेल की अधिक जरूरत व उपयोग सामने आते, जैसे कि अभी भी आये।

दशकों पुरानी सरहिंद नहर, अपर बारी दोआब नहर, पश्चिमी यमुना नहर जैसी नहरों के जरिए भूजल पुनर्भरण में मदद हो सकती थी और किसी अन्य नई नहर जैसी नहरों के जरिए उसे बढ़ाया जा सकता था। जगह-जगह तालाबों में पानी को थमाने, वर्षाजल के सरंक्षण आदि के व्यापक व सुनियोजित कार्यक्रमों से भूजल पुनर्भरण को बहुत उच्च स्तर तक बढ़ाया जा सकता था और इससे भूजल उपलब्धता में काफी बढ़ोत्तरी हो सकती थी।

इसलिये, ऐसा नहीं लगता कि अगर भाखड़ा बाँध नहीं होता तो पंजाब और हरियाणा की तस्वीरें आज की तुलना में कुछ बहुत अलग होती। यह जरूर है कि भाखड़ा के न होने की स्थिति में भारी-भरकम खर्च नदी के निचली ओर पड़ने वाले बुरे असर और बड़े पैमाने पर हुए लोगों के विस्थापन से बचा जा सकता था। शायद भाखड़ा के दुष्प्रभावों का सबसे बड़ा असर पंजाब और हरियाणा की जमीन पर पड़ेगा। यह बहुत बड़ी कीमत होगी। देश में कृषि क्षेत्र की सर्वोच्च उपलब्धियों का प्रतीक माना जाने वाला भाखड़ा वह सम्पूर्ण ढाँचा आज ढह रहा है। एक सपना बहुत तेजी से एक दुस्वप्न में बदल चला है।

श्रीपाद धर्माधिकारी म.प्र. में बड़वानी स्थित मंथन अध्ययन केन्द्र जिसकी स्थापना जल एवं ऊर्जा सम्बन्धित विषयों के शोध विश्लेषण एवं निगरानी के लिये की गई है, के समन्वयक रहे हैं।

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