गैस रिसी हवा में पर जमीनी पानी अब भी जहरीला

Submitted by RuralWater on Sun, 11/27/2016 - 11:02

भोपाल गैस त्रासदी के 32 वर्ष पूरे होने पर विशेष


यूनियन कार्बाइड का कचरा नौनिहालों को अपने कब्जे में ले रहा हैयूनियन कार्बाइड का कचरा नौनिहालों को अपने कब्जे में ले रहा है32 साल का वक्त कोई छोटा नहीं होता, लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के लिये इन 32 सालों में कुछ नहीं बदला। हजारों लोगों की मौतें, कई लोगों को बाकी बची पूरी जिन्दगी अपाहिज और अन्धा बना देने और उसकी अगली पीढ़ी को भी उस जहरीली गैस की भेंट चढ़ जाने की भयावह त्रासदी के बाद भी हमने उससे अब तक कोई सबक नहीं लिया है। यहाँ की 22 बस्तियों के करीब दस हजार से ज्यादा लोग अब भी साफ पानी तक को मोहताज है।

02-03 दिसम्बर 1984 की काली रात यहाँ मौत का तांडव हुआ था। इस खूबसूरत शहर के बीचोंबीच कीटनाशक बनाने वाले मल्टीनेशनल कारखाने यूनियन कार्बाइड से निकली जानलेवा मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस के रिसाव होने से 3000 से ज्यादा लोगों की जाने गईं थीं।

यह आँकड़ा तो महज सरकारी रिकॉर्ड में है लेकिन प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि यह आँकड़ा बहुत कम है, वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा भयावह रही थी। आँकड़ों की भयावहता का अन्दाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन दिनों 9 लाख की आबादी वाले इस शहर के करीब 6 लाख लोग इस हादसे में गैस प्रभावित के रूप में सरकारी फाइलों में दर्ज हैं।

इतना ही नहीं गैस के प्रभाव से अब तक भी लोग परेशान हो रहे हैं। यहाँ तक कि गर्भवती महिलाओं से अगली पीढ़ी में बच्चों को जन्मजात विकृतियों से पीड़ित होना पड़ा तो कई लोग अब भी इसके कारण गम्भीर बीमारियों से पीड़ित होकर जिन्दा लाश की तरह अपनी मौत का इन्तजार कर रहे हैं।

सबसे ज्यादा परेशानी तब भी और आज भी इस कारखाने के आसपास रहने वाले लोगों को उठानी पड़ रही है। हालात इतने बुरे हैं कि यहाँ का पूरा जमीनी पानी जहर में तब्दील हो चुका है, खुद सरकार भी इस तथ्य को स्वीकार कर चुकी है। इस जहरीले पानी को पीने से यहाँ हर दिन एक व्यक्ति बड़ी और गम्भीर बीमारियों का शिकार बनता जा रहा है।

दुनिया की सबसे भीषणतम औद्योगिक दुर्घटना भोपाल गैस त्रासदी के 32 साल बाद अब भी हालात बदले नहीं हैं। तब से अब तक शहर के बीचोंबीच स्थित यूनियन कार्बाइड कारखाने में जमा कई टन कचरा अब भी जस-का-तस पड़ा हुआ है। इसके निपटान के लिये लम्बी-चौड़ी कागजी कवायदें होती रहीं लेकिन कोई खास बदलाव नहीं आया। उधर यह कचरा अब भी इसके आसपास रहने वाले हजारों लोगों की सेहत पर भारी पड़ रहा है।

यहाँ बीते सालों में बच्चे अपंग होते रहे, माँ के दूध में जहरीले रसायन पाये जाने की बात भी सामने आई, चर्म रोग, दमा, कैंसर और न जाने कितनी बीमारियाँ धीमा जहर बनकर हजारों लोगों को प्रभावित करती रही, यहाँ तक कि आज भी लोग इसका दंश झेल रहे हैं।

यहाँ-वहाँ गुहार लगा-लगाकर करीब थक चुके ये गैस प्रभावित भी अब मानने लगे हैं कि सरकारें उनके सेहत से जुड़ी हितों की अनदेखी कर रही है। सरकार ने यहाँ के पानी को पीने लायक नहीं मानते हुए इसे प्रतिबन्धित कर दिया है लेकिन जलस्रोत और वितरण के बेहतर इन्तजाम नहीं होने से मजबूरी में इन्हें यही जहरीला पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा है। यहाँ बसी 22 बस्तियों में रह रही बड़ी आबादी के लिये साफ पानी का हर दिन वितरण कर पाना सरकार और नगर निगम के लिये भी आसान नहीं है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के परीक्षण में पुष्टि हुई है कि फैक्टरी और आसपास जमीनी पानी में (साफ पानी के लिये तय किये गए निर्धारित मानकों से) 40 गुना अधिक जहरीले तत्व मौजूद हैं। मध्य प्रदेश प्रदूषण बोर्ड सहित सरकारी और गैर-सरकारी एजेंसियों ने पाया है कि फैक्टरी के अन्दर पड़े रसायन के लगातार जमीन में रिसते रहने के कारण इलाके का भूजल प्रदूषित हो गया है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक इसी इलाक़े में रहने वाले कई लोग शारीरिक और मानसिक कमजोरी से पीड़ित हैं।

जमा कचरे के निपटान की कार्यवाही प्रशासनिक स्तर पर तो की जा रही है लेकिन अब तक महज 10 टन कचरे को ही यहाँ से उठाया जा सका है। कारखाने परिसर में सालों से जमा कचरे की वजह से आसपास करीब चार किमी की परिधि में रहने वाले लोगों के जिन्दगी पर अब भी इसका बुरा साया बरकरार है। कचरे के जमीन में रिसने से यहाँ का भूजल इतनी बुरी तरह प्रदूषित होकर जहरीला हो चुका है कि यहाँ लोग गम्भीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। गैस पीड़ितों के इलाज और उन पर शोध करने वाली संस्थाओं के मुताबिक तीन हजार परिवारों के सर्वेक्षण में 141 बच्चे या तो शारीरिक, मानसिक या दोनों तरह की कमजोरियों के शिकार हैं। इनमें से ज्यादातर साँस की बीमारियों के शिकार हैं। हालांकि अब तक किसी सरकारी संस्था ने इस इलाके में किसी तरह का कोई अध्ययन नहीं किया है या न कभी यह पड़ताल हुई कि गैस त्रासदी के बाद की पीढ़ियों में जन्मजात विकृतियों या गम्भीर बीमारियों के साथ पैदा हो रहे बच्चों का सम्बन्ध इस हादसे से है या नहीं।

सम्भावना ट्रस्ट के सतीनाथ षडंगी बताते हैं कि इस इलाके के भूजल का प्रदूषण यूनियन कार्बाइड कारखाने की ही देन है। उन्होंने इस इलाके के अलग-अलग जगहों से पानी के 25 सैम्पल लेकर पीएचई की सरकारी लैब में जाँच कराई तो रिपोर्ट में आर्गेनोक्लोरिन, डाईक्लोरो बेंजिन और ट्राई क्लोरो बेंजिन जैसे खतरनाक तत्व इन सैम्पलों में मौजूद मिले हैं। इन रसायनों से खून का कैंसर, लीवर, गुर्दे, मस्तिष्क सहित कई जन्मजात बीमारियाँ पनपती हैं। सम्भावना ट्रस्ट के क्लिनिक में भी लगातार ऐसे कई लोग आते हैं जिन्हें इस तरह की बीमारियाँ हैं।

आज भी 346 मीट्रिक टन जहरीला कचरा फैक्टरी परिसर में रखा हुआ है। 10 टन कचरा जुलाई 2015 में पीथमपुर शिफ्ट किया जा चुका है। बाकी कचरा बरसाती पानी में सड़कर जमीन के भीतर उतर रहा है। पड़ताल बताती है कि 1984 में गैस रिसाव होने से पहले ही कई सालों से कम्पनी के तीन बड़े-बड़े तालाबनुमा सोलर ईवेपोरेशन पोंड, जिनमें जहरीले केमिकल को छोड़ा जाता था, यहाँ तक कि उसकी मल्टीपल पॉली लेयर हादसे के कुछ साल पहले ही डैमेज हो गई थी और खतरनाक रसायन का रिसाव जमीन के भीतर होने लगा था। तभी से यहाँ का पानी प्रदूषित होने लगा।

बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि इसकी जानकारी कारखाना प्रबन्धन को होने के बाद भी इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई और न ही इसके बुरे असर को रोकने की कोई कवायद की गई। कम्पनी के स्थानीय अधिकारियों ने विदेश में रहने वाले कारखाना संचालकों को भी इसकी खबर की थी लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ और इसका खामियाजा हमें हजारों लोगों की मौत से चुकाना पड़ा।

यह भी उतना ही सही है कि तब से ही यहाँ जमे कचरे के निपटान की कार्यवाही प्रशासनिक स्तर पर तो की जा रही है लेकिन अब तक महज 10 टन कचरे को ही यहाँ से उठाया जा सका है। कारखाने परिसर में सालों से जमा कचरे की वजह से आसपास करीब चार किमी की परिधि में रहने वाले लोगों के जिन्दगी पर अब भी इसका बुरा साया बरकरार है। कचरे के जमीन में रिसने से यहाँ का भूजल इतनी बुरी तरह प्रदूषित होकर जहरीला हो चुका है कि यहाँ लोग गम्भीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। यहाँ पानी की जाँच में खतरनाक तत्व मिले हैं और इसे प्रतिबन्धित भी कर दिया है लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होने से लोगों को यही पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा है।


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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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