सूखा और भूख का सवाल

Submitted by RuralWater on Thu, 06/30/2016 - 16:36
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‘बिन पानी सब सून’ पुस्तिका से साभार, 5 जून 2016

बुन्देलखण्ड में कुल 13 जिले हैं जिनमें से 7 उत्तर प्रदेश में आते हैं जबकि 6 मध्य प्रदेश में आते हैं। 2011 के जनगणना के मुताबिक बुन्देलखण्ड की कुल आबादी 1 करोड़ 80 लाख है जिसमें से करीब 79 फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है और इनमें एक तिहाई से ज्यादा घर ऐसे हैं जो गरीबी रेखा से नीचे आते हैं। बुन्देलखण्ड में पिछले 8 महीनों की दयनीय स्थिति के सन्दर्भ में हुए एक अध्ययन के अनुसार यहाँ भुखमरी और कुपोषण की स्थिति निर्मित हो गई है। क्या बुन्देलखण्ड में भूखा के सिवाय कुछ भी नहीं है? इस सवाल का उत्तर तलाशने पर हम पाते हैं कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र में कभी संसाधनों का अभाव नहीं रहा। यहाँ मौजूद खनिज और वन सरकार की आय के महत्त्वपूर्ण साधन रहे हैं। लेकिन इन साधनों का उपयोग मानव विकास के लिये नहीं किया गया। नतीजतन बुन्देलखण्ड में भूख का सवाल खड़ा हो गया है।

यह कहा जाता है कि सूखा और अकाल अवर्षा या पानी की कमी से पैदा होता है। किन्तु यदि किसी क्षेत्र के संसाधनों का मानव जीवन के हित में बेहतर उपयोग एवं प्रबन्धन किया जाये तो वह अवर्षा और पानी की कमी को आसानी से सहन कर सकता है।

पिछले करीब 5000 सालों से यहाँ का पन्ना क्षेत्र हीरा के उत्पादन के लिये विश्व विख्यात है। यहाँ 40000 कैरेट हीरा निकाला जा चुका है और 1400000 कैरेट के भण्डार शेष बचे हैं। पन्ना में वार्षिक उत्पादन 26000 कैरेट हीरा है, जिससे 2 करोड़ रुपए की रायल्टी प्रदेश सरकार को प्राप्त होती है।

सरकार अब यहाँ हिनौता, मझगवाँ तथा छतरपुर के अंगोर नामक स्थान पर हीरा की सम्भावना तलाशने में जुटी है, जबकि इसी क्षेत्र के हजारों लोग भूख से संघर्ष करने को विवश है। हीरा के साथ ही महंगे ग्रेनाइट के पत्थर भी कई लोगों की आय के साधन बने हुए हैं। वन सम्पदा के मामले में भी बुन्देलखण्ड पीछे नहीं रहा। यहाँ के पन्ना, दमोह और सागर में मौजूद 32 प्रतिशत जंगल में सागौर तथा शीशम की कीमती लकड़ी उपलब्ध है। खैर की लकड़ी से कत्था। उद्योग चल रहा है।

खजुराहों जैसे पर्यटन स्थल पूरी दुनिया में विख्यात है। इतनी सम्पन्नता के बावजूद बुन्देलखण्ड के लोग बेहद गरीबी में जीवन जीने को विवश हैं। पिछले कुछ सालों से लगातार पड़ रहे सूखे और अकाल ने यहाँ के लोगों के सामने भरण-पोषण का संकट खड़ा कर दिया है और भरपूर सम्पदा वाले इस क्षेत्र के लोग रोजगार की तलाश में दर-दर भटकने को विवश हैं।

बुन्देलखण्ड में कुल 13 जिले हैं जिनमें से 7 उत्तर प्रदेश में आते हैं जबकि 6 मध्य प्रदेश में आते हैं। 2011 के जनगणना के मुताबिक बुन्देलखण्ड की कुल आबादी 1 करोड़ 80 लाख है जिसमें से करीब 79 फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों मेंरहती है और इनमें एक तिहाई से ज्यादा घर ऐसे हैं जो गरीबी रेखा से नीचे आते हैं। बुन्देलखण्ड में पिछले 8 महीनों की दयनीय स्थिति के सन्दर्भ में हुए एक अध्ययन के अनुसार यहाँ भुखमरी और कुपोषण की स्थिति निर्मित हो गई है।

इसके अनुसार पिछले 8 महीने में 53 प्रतिशत गरीब परिवारों को दाल तक खाने को नहीं मिली। 69 प्रतिशत गरीब लोगों ने दूध नहीं पिया है। बुन्देलखण्ड में हर पाँचवाँ परिवार हफ्ते में कम-से-कम एक दिन भूखा सोता है। 17 फीसदी परिवारों ने घास की रोटी खाने की बात कबूली है। इस सर्वे के मुताबिक मार्च के बाद से अब तक 40 फीसदी परिवारों ने अपने पशु बेच दिये हैं। जबकि 27 फीसदी ने जमीन बेच दी है या फिर रुपयों के लिये गिरवी रख दी है।

बुन्देलखण्ड के सन्दर्भ में दूसरी बड़ी महत्त्वपूर्ण घटना राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग द्वारा मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश सरकार को अप्रैल माह में जारी नोटिस है, जिसमें आयोग ने मीडिया की खबरों के आधार पर संज्ञान लेते हुए दोनों राज्य सरकारों के मुख्य सचिव से पूछा है कि लोग महज आलू या नमक के सहारे रोटी खाकर स्वस्थ कैसे रह सकते हैं। सरकार उनके बारे में क्या उपाय कर रही है।

मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार यूपी के बुन्देलखण्ड के 59 प्रतिशत गाँवों में 10 से ज्यादा परिवारों को दो समय का भोजन नहीं मिलता। यही आँकड़ा एमपी में 35 प्रतिशत गाँवों का है। इस सन्दर्भ में प्रस्तुत अध्ययन के माध्यम से यहाँ की खाद्य सुरक्षा की स्थिति का गहराई से आकलन किया गया। प्रस्तुत अध्ययन में बुन्देलखण्ड क्षेत्र के सागर, छतरपुर एवं टीकमगढ़ जिलों 66 गाँवों में लोगों के साथ सीधा संवाद करते हुए खाद्य सुरक्षा से सम्बन्धित कई जानकारियाँ हासिल की गई।

इस प्रक्रिया में यह तथ्य सामने आता है कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के 29 प्रतिशत परिवार आज खाद्य सुरक्षा के संकट से जूझ रहे हैं। यह वे परिवार है, जिनके खेतों में अनाज की कोई उपज नहीं हुई। पिछले खरीफ के मौसम में बीज के लिये उधार लिये गए रुपयों पर आज भी लगातार ब्याज बढ़ता जा रहा है। गाँव और उसके आसपास रोजगार के कोई अवसर उपलब्ध नहीं हैं। इस दशा में बाहर जाकर रोजगार तलाशना ही एकमात्र विकल्प बचा है। जो लोग किसी कारण बाहर नहीं जा सके, उनके लिये दो वक्त की रोटी कमाना मुश्किल हो गया है।

प्रस्तुत अध्ययन से यह बात सामने आई है कि 4 प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जो दिन में दो समय खाना नहीं खा पाते। वे सिर्फ एक वक्त खाना खाकर अपना जीवन गुजार रहे हैं।

पहुँच से दूर होता अनाज


बुन्देलखण्ड में सूखे और अकाल से उत्पन्न इस स्थिति को देखते हुए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को इन क्षेत्रों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिये। न्यायालय ने सूखाग्रस्त क्षेत्र के प्रत्येक परिवार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए सस्ती कीमत पर अनाज उपलब्ध करवाने के लिये कहा, वहीं छुट्टियों में भी स्कूलों में बच्चों के लिये मध्यान्ह भोजन जारी रखने के निर्देश दिये।

न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि खाद्य सुरक्षा तक लोगों की पहुँच को बाधित करने वाली किसी भी तरह की औपचारिकता तुरन्त हटाई जाये। यानी सूखाग्रस्त क्षेत्र में यदि किसी के पास आधार कार्ड, फूड कूपन आदि नहीं भी हो, तब भी उसे सस्ती कीमत पर पूरा अनाज उपलब्ध करवाया जाये!

प्रदेश सरकार द्वारा इस सन्दर्भ में प्रशासनिक तंत्र को आदेश भी जारी किये जा चुके हैं। किन्तु जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की इस स्थिति का अन्दाज इस बात से लगाया जा सकता है कि आज भी बुन्देलखण्ड क्षेत्र के 43 प्रतिशत परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) से अपने हिस्से का अनाज नहीं मिल पा रहा है।

न्यायालय और सरकार किसी भी तरह की औपचारिकता व बाधा के बगैर लोगों को अनाज उपलब्ध करवाने की बात कर रही है, जबकि राशन दुकान का डीलर या दुकानदार यह कहकर लोगों को खाली हाथ वापस कर रहे हैं कि उनके फूड कूपन आधार नम्बर से लिंक नहीं हैं, वर्ष में 90 दिन मजदूरी नहीं करने पर कर्मकार मंडल व मुख्यमंत्री मजदूर सुरक्षा कार्ड रद्द हो गया है आदि।

यही कारण है कि 43 प्रतिशत परिवारों को खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अनुसार अपने हिस्से का अनाज नहीं मिल पा रहा है।

उपरोक्त तथ्य से स्पष्ट है कि कूल परिवारों में 57 प्रतिशत परिवारों को पीडीएस से राशन मिल रहा है, किन्तु इसमें भी कई तरह की दिक्कतें आ रही हैं। प्रस्तुत अध्ययन के अन्तर्गत ग्रामवासियों से की गई चर्चा से यह बात स्पष्ट हुई है कि पीडीएस से अनाज प्राप्त करने वाली 33 प्रतिशत परिवारों को नियमित अनाज नहीं मिल रहा है। यानी जब वे राशन दुकान पर अनाज लेने जाते हैं तो या तो दुकान बन्द मिलती है या खुली मिलती है तो दुकानदार द्वारा बताया जाता है कि अभी अनाज नहीं आया।

इस तरह लोग बार-बार राशन दुकान के चक्कर लगाने को विवश हैं। इस प्रक्रिया में कई बार पूरा महीना बीत जाता है और जब अगले महीने राशन दुकान पर जाते हैं तो दुकानदार द्वारा कहा जाता है कि पिछले महीने का अनाज समाप्त हो गया है, यानी अब वह नहीं मिलेगा। अब सिर्फ इसी महीने का अनाज ले सकते हैं।

यहाँ यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि सरकार के किसी भी नियम या किसी भी मार्गदर्शिका में यह नहीं लिखा है कि एक महीने का अनाज नहीं लेने पर वह अगले महीने नहीं मिलेगा। बल्कि भारत से सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में स्पष्ट निर्देश दिया है कि व्यक्ति अपने हक का अनाज कभी भी ले सकते हैं और यदि एक साथ पूरा पैसा नहीं है तो एक महीने का अनाज चार किश्तों में भी ले सकते है। किन्तु बुन्देलखण्ड में इन निर्देशों का पालन होते हुए दिखाई नहीं देता।

अध्ययन से यह तथ्य भी सामने आता है कि पीडीएस से अनाज प्राप्त करने वाले परिवारों में से 76 प्रतिशत परिवारों को पूरा अनाज नहीं मिलता। यानी उन्हें उनकी पात्रता से कम अनाज दिया जाता है। इससे यह सवाल सामने आता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राशन दुकान द्वारा की जा रही मनमर्जी को रोकने के लिये प्रशासनिक तंत्र द्वारा अब तक कोई कार्यवाही क्यों नहीं की गई। यहाँ जिला प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों की मॉनिटरिंग व्यवस्था फेल होती हुई दिखाई देती है।

भरण-पोषण के लिये फूलवती का संघर्ष
सागर जिले के बंडा विकासखण्ड के चकेरी गाँव की 59 वर्षीय फूलवती को किसी भी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है। 1460 की आबादी वाले इस गाँव में दलित एवं अन्य पिछड़ा वर्ग की आबादी सबसे ज्यादा है। फूलवती दलित समुदाय की है और गाँव में अकेली रहती है। फूलवती बताती है कि 41 साल पहले मेरी शादी हो गई थी, तब मैं बहुत छोटी थी। शादी के दस दिन बाद ही पति ने दूसरी शादी कर ली और मुझे घर से बाहर निकाल दिया। इस पर गाँव में पंचायत बैठी और गाँव के बुजुर्गों ने पति द्वारा दूसरी शादी करने और मुझे घर से निकलने की बात पर फैसला लिया, जिसमें उन्होंने मुझे 3 एकड़ जमीन दिलवाई। इसी जमीन के सहारे मैंने अब तक की जिन्दगी बिताई। आज मेरी उम्र 59 साल है। पिछले साल मैंने अपने खेत में सोयाबीन की फसल लगाई थी। लेकिन सूखे में सब खत्म हो गई। उसका मुआवजा सिर्फ 3600 रुपए ही मिला। फूलवती को अब तक किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला। वह बताती है कि मैंने पंचायत सचिव से पेंशन के लिये कहा था, उसने बताया कि पेंशन 60 साल की उम्र में शुरू होती है। अभी मेरी उम्र 59 साल है। इसलिये पेंशन के लिये मुझे एक साल इन्तजार करना पड़ेगा। वह कहती है कि सूखे के चलते मेरी हालत बहुत खराब है और आँखों से दिखाई नहीं देने के बावजूद मुझे 2 किमी पानी लेने जाना पड़ता रहा है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत गरीबी रेखा का कार्ड बना है, जिसके माध्यम से फूलवती को 10 किलो अनाज प्राप्त होता है। किन्तु यह अनाज पूरे माह के लिये पर्याप्त नहीं होता है। जमीन से कोई उपज नहीं होने के कारण वह तेंदूपत्ता तोड़कर एवं अन्य मजदूरी करके अपना गुजारा कर रही है। फूलवती के पास मनरेगा का जॉब कार्ड तो है, लेकिन आज तक काम नहीं मिला। वह बताती है कि मैं वृद्ध हो गई हूँ, इसलिये पंचायत मुझे रोगजार नहीं देती। सूखे की स्थिति में बुजुर्ग फूलवती के सामने भरण-पोषण का गम्भीर संकट पैदा हो गया है। इस दशा में पंचायत की जिम्मेदारी है कि वह उनकी शारीरिक स्थिति के अनुसार मनरेगा में रोजगार दें। साथ ही गाँव में कम्युनिटी किचन शुरू करवाने की जरूरत है, ताकि फूलवती और उसकी तरह की अन्य बुजुर्गों को दो समय का भोजन मिल सके।


खाद्य सुरक्षा से वंचित बच्चे
सरकार के कानून कुछ भी हो, लेकिन बेड़ी गाँव की सरकारी उचित मूल्य की दुकान में नियम-कायदे सिर्फ दुकानदार के ही चलते हैं। छतरपुर जिले के लवकुशनगर ब्लाक में स्थित इस गाँव के लोग बताते हैं कि राशन दुकान का डीलर ही तय करता है कि कब और किसे अनाज देना है और किसे नहीं। इस दुकानदार ने पिछले दिनों गाँव के अनुसूचित जाति के 14 वर्ष के रवि और 12 वर्षीय ज्योति को उनके हिस्से का अनाज इसलिये देने से इनकार कर दिया कि उसके दादाजी का निधन हो चुका है और उसके परिवार में कोई वयस्क सदस्य या अभिभावक नहीं है। राशन दुकानदार का कहना है कि अनाज उसी को दिया जाएगा जिसके परिवार में वयस्क सदस्य है या बच्चों के अभिभावक मौजूद हैं। पिता को पहले ही खो चुके इन बच्चों को अपनी भूख मिटाने के लिये गाँव छोड़ना पड़ा। बेरोजगारी, जलसंकट और पलायन से जूझ रहे इस गाँव में निवास करने वाले 250 परिवारों को सरकारी राशन दुकान से अपने हिस्से का अनाज लेने के लिये अक्सर संघर्ष करना पड़ता है। कई बार दुकानदार द्वारा यह कहकर वापस भेज दिया जाता है कि अभी अनाज नहीं आया। यदि एक माह का अनाज नहीं ले पाये तो दूसरे माह वह अनाज नहीं दिया जाता। ग्रामवासी बताते हैं कि उन्होंने राशन दुकान डीलर के इस व्यवहार कि शिकायत एसडीएम से की, लेकिन अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई और राशन दुकान डीलर के अपनी मनमर्जी से अनाज वितरण करने से हर माह गाँव के करीब एक चौथाई परिवार अपने हक का अनाज नहीं ले पाते।

इस गाँव के दो बच्चों ज्योति और रवि को अनाज नहीं देने के राशन दुकान डीलर का फैसला न सिर्फ संवेदनहीन, बल्कि खाद्य सुरक्षा कानून का भी उल्लंघन है। सात साल पहले ज्योति और रवि के पिता रामबाबू की मृत्यु हो गई थी। पिता की मृत्यु के बाद इस परिवार में उनकी माँ और दादा थे। पिता की मृत्यु के एक साल बाद माँ ने 10 किलोमीटर दूर भवानीपुर गाँव के आदमी से शादी कर ली और वहीं रहने लगी। ज्योति और रवि अपने दादा रामाधार के साथ ही रहने लगे। दादा रामाधार अपने पोते और पोती का अच्छी तरह से पालन पोषण करते थे और उनके भरण-पोषण तथा शिक्षा का पूरा ख्याल रखते थे। उन्होंने इन दोनों बच्चों को स्कूल में भर्ती करवाया।

आज से करीब छह महीने पहले इनके दादा रामाधार की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के बाद गाँव वालों ने इन बच्चों का ख्याल रखा। उनके दादा के फूड कूपन में इन दोनों बच्चों का नाम था और दादा राशन दुकान से अनाज प्राप्त करते थे। लोग बताते हैं कि दादा की मृत्यु के बाद जब ये दोनों बच्चे फूडकूपन लेकर राशन दुकानदार के यहाँ पहुँचे तो उसने डाँटकर भगा दिया और कहा कि तुम्हारे परिवार में कोई बड़ा व्यक्ति नहीं है, इसलिये तुम्हें अनाज नहीं देंगे। गाँव के कुछ लोगों ने जब राशन दुकानदार से इन दोनों बच्चों को अनाज देने के लिये कहा तब भी उसने अनाज देने से इनकार कर दिया। अपने दादा की मृत्यु के एक-दो महीने तक ये दोनों बच्चे गाँव में ही रहे और उसके बाद दोनों अपने माँ शकुन्तला के पास भवानपुर गाँव चले गए। इन बच्चों के साथ ही कई और परिवार भी पिछले तीन-चार महीनों से अपने हक के अनाज से वंचित हैं। यहाँ के सत्यदेव पाल बताते हैं कि तीन महीने से मुझे अनाज नहीं मिल रहा है। मैं अपना फूड कूपन लेकर जब राशन दुकान पहुँचा तो दुकानदार ने कहा कि तुम्हारा फूड कूपन निरस्त हो चुका है, अब इस पर अनाज नहीं मिलेगा। मुझे यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि अचानक फूड कूपन कैसे निरस्त हो गया? इसी तरह यहाँ के प्यारेलाल को भी मार्च माह से अनाज नहीं मिल रहा है। वे कहते हैं कि राशन दुकानदार ने मुझे भी बताया कि मेरा फूड कूपन निरस्त हो गया। गाँव में चर्चा करने पर हम पाते हैं कि करीब 10 से 15 परिवार पिछले तीन-चार महीनों से अनाज नहीं ले पा रहे हैं।

गाँव में लोगों को इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि उनके फूड कूपन क्यों निरस्त कर दिये गए। खाद्य सुरक्षा कानून के अनुसार अनुसूचित जाति एवं जनजाति के परिवारों को प्राथमिक सूची में रखा गया है, जिसके अनुसार उन्हें एक रुपए कीमत पर अनाज दिया जाएगा। इसके बावजूद इन समुदायों के कई लोगों को राशन दुकानदार द्वारा फूड कूपन निरस्त होने की बात कहकर बनाकर अनाज नहीं दिया जा रहा है। सूखा और अकाल से जूझ रहे बुन्देलखण्ड क्षेत्र में फूड कूपन निरस्त होने और पात्र एवं जरूरतमन्द परिवारों को अनाज से वंचित करने पर उनका भरण-पोषण कठिन हो गया है। ग्राम पंचायत द्वारा भी इस बारे में लोगों को सही जानकारी नहीं दी जा रही है। जबकि सूखे और अकाल तथा उसके प्रभावों से बचने के लिये खाद्य सुरक्षा एक महत्त्वपूर्ण आयाम है। किन्तु खाद्य सुरक्षा जैसे मजबूत कानून होने और सरकार द्वारा अनाज का आवंटन होने के बावजूद इस गाँव के लोगों को सरकारी राशन दुकान से अनाज नहीं मिल पा रहा है।


इन कारणों से नहीं दिया जा रहा पीडीएस का अनाज
1. फूड कूपन फट गया या गुम हो गया है।
2. फूड कूपन आधार नम्बर से लिंक नहीं किया गया है।
3. फूड कूपन का पंचायत से नवीनीकरण नहीं करवाया गया है।
4. वर्ष में कम-से-कम 90 दिन मजदूरी नहीं करने से कर्मकार मण्डल व मुख्यमंत्री मजदूर सुरक्षा कार्ड निरस्त होने से अनाज लेने की पात्रता समाप्त हो गई है।


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