बुन्देलखण्ड - तालाबों की खुदाई में ही खुदाई है

Submitted by RuralWater on Tue, 09/20/2016 - 13:04

चरखारी का जय सागर, रौनक लौट आई हैचरखारी का जय सागर, रौनक लौट आई हैबुन्देलखण्ड में जलसंकट कोई नया नहीं है। आज के हजार साल पहले से सूखे से निपटने के लिये बुन्देलखण्ड का समाज कोशिश करता रहा है। तब के राजाओं ने पानी के संकट से जूझने के लिये बड़े-बड़े तालाब बनाए थे। जल संकट से निजात के लिये बुन्देलखण्ड में आठवीं शताब्दी के चन्देल राजाओं से लेकर 16वीं शताब्दी के बुन्देला राजाओं तक ने खूब तालाब बनाए।

चन्देल राजकाल से बुन्देला राज तक चार हजार से ज्यादा बड़े-विशाल तालाब बनाए गए। समाज भी पीछे नहीं रहा। बुन्देलखण्ड के लगभग हर गाँव में औसतन 3-5 तालाब समाज के बनाए हुए हैं। पूरे बुन्देलखण्ड में पचास हजार से ज्यादा तालाब फैले हुए हैं।

चन्देल-बुन्देला राजाओं और गौड़ राजाओं के साथ ही समाज के बनाए तालाब ही बुन्देला धरती की हजार साल से जीवनरेखा रहे हैं और ज्यादातर बड़े तालाबों की उम्र 400-1000 साल हो चुकी है। पर अब उम्र का एक लम्बा पड़ाव पार कर चुके तालाब हमारी उपेक्षा और बदनीयती के शिकार हैं।

तालाबों को कब्जेदारी-पट्टेदारी से खतरा तो है ही, पर सबसे बड़ा घाव तो हमारी उदासीनता का है। हमने जाना ही नहीं कि कब तालाबों के आगोर से पानी आने के रास्ते बन्द हो गए। हम समझना नहीं चाहते कि हमारी उपेक्षा की गाद ने कब तालाबों को पाट दिया।

तालाबों की बदहाली की कहानी


हजार साल की लम्बी उम्र पार कर चुके तालाबों की कहानी भी बहुत लम्बी है। बुन्देलखण्ड में तालाबों के पनघट गुलजार रहे हैं। तालाबों से पानी सूख गया तो पनघट सूने हो गए और पनघट के गीत बीती बात हो गए। पर इसमें दोष पनघट का कहाँ था? हमारी उपेक्षा और लालच की विष बेलों ने सारे स्रोतों को सोख ही लिया। हमारी सुरसा जैसी बढ़ती पानी की जरूरतों के लिये सागर, तालाब-जोहड़ सब कम पड़ गए, नदियों को सुखा डाला। फिर भी प्यास है कि बुझती नहीं।

बुन्देलखण्ड में कुआँ खोदते समय खोदने वालों का जब पहला सम्पर्क भूजल से होता था, तो आसमान ‘गंगा मैया की जै’ के जयकारे से गूँज जाता था। कुएँ में मिला जल ‘ पवित्र गंगाजल’ के समान ही है, यह समाज की समझ काम करती थी। नाम चाहे कुछ भी दें; नभ की गंगा, आकाश गंगा, ‘मानसून’ का प्रवाह, पालात गंगा, भूजल या हिमालयी गंगा; समाज अपनी गंगा को ऐसे ही याद रखता है। हिमालयी गंगा भले ही बुन्देलखण्ड नहीं आती हो, पर बुन्देलखण्ड है तो गंगा-बेसिन का ही हिस्सा।

बुन्देलखण्ड की हर नदी यमुना से मिलकर अन्ततः गंगामय ही हो जाती है। महोबा के इतिहास पर किताब लिखने वाले बुजुर्ग समाजसेवी वासुदेव चौरसिया पुराने दिनों को याद करते हैं, ‘पहले पानी की कमी होने पर लोग कुआँ खोदते थे।
यह पानी के उचित इस्तेमाल और फिर से रिचार्ज करने के नियम पर काम करता था। लेकिन अब झट से एक हैण्डपम्प लगा दिया जाता है।’ वरिष्ठ पत्रकार रेयाज उल हक लिखते हैं “अकेले महोबा शहर में ही वासुदेव चौरसिया की बात को सही ठहराने के अनेक उदाहरण मिल जाएँगे। एेसे अनेक कुएँ हैं जो पहले पानी के अच्छे स्रोत हुआ करते थे, लेकिन अब उनके पास हैण्ड पम्प लगा दिए जाने के कारण वे सूख गए हैं। महोबा शहर को मदन सागर जैसे तालाबों के अलावा मदनौ और सदनौ दो कुओं से पानी मिला करता था। मदनौ कुआँ अब ढक दिया गया है और सदनौ कुएँ पर अतिक्रमण करके घर बना लिया गया है।”

अब जय सागर

तालाबों से ट्यूबवेल तक


आगे की कहानी कुछ यूं है; ट्यूबवेल तकनीक को सूखा प्रबन्धन के लिये सरल-सहज नुस्खा मान लिया गया। यह काम बुन्देलखण्ड के साथ-साथ पूरे देश में भी हुआ, तालाब पुरानी समझ का मामला हो गया, ट्यूबवेल तकनीक नया और आधुनिक।

मानव श्रम से खुदने वाले कुओं की गहराई सामान्यतः 40 से 150 फीट तक ही रही है। क्योंकि 150 फीट के बाद मानव श्रम से खोदना मुश्किल है। 1960-70 के दशक से बहुत तेजी से बुन्देलखण्ड में ट्यूबवेल लगाए गए। पर 20वीं शताब्दी के बाद ट्यूबवेल तकनीक आ जाने से 2000 से 3000 फीट तक खोदना सम्भव हो गया। चूँकि ट्यूबवेल तकनीक श्रम आधारित न होकर मशीन आधारित थी, जिसकी वजह से यह महंगी थी और सार्वजनिक सम्पत्तियों के मालिकाना हक में परिवर्तन को मजबूर करती थी।

ट्यूबवेल या तो सरकारें खुदवाती हैं, या फिर सम्पन्न तबका। जिससे आमलोगों के हाथ से पानी दूर होता गया। गहरे ट्यूबवेलों ने कुओं और तालाबों का पानी पी डाला। लोगों को अन्दाजा ही नहीं था कि समाधान के नाम पर लाई गई ट्यूबवेल तकनीक भारी जल संकट का कारण बन जाएगी। ट्यूबवेल-बोरवेल बढ़ते गए और शैलोवेल (कुएँ), स्टेपवेल (बावड़ी), सूखते गए।

पानी के अनियंत्रित दोहन ने शैलोवेल यानि 40 से 150 फीट तक के कुएँ को सुखा ही डाला है। बुन्देलखण्ड के ज्यादातर गाँवों के कुओं में 20-20 साल से पानी नहीं आया है। ट्यूबवेलों ने पातालगंगा को सुखा ही डाला है, बुन्देलखण्ड के गाँवों में भूजल अब दुर्लभ चीज हो गई है।

सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में जलवायु मुद्दे के प्रमुख नवरोज दुबाश कहते हैं, “जब पानी का स्तर नीचे चला जाता है, तो सम्पत्ति मामले में असमानता और बढ़ जाती है।”

भूजल पर बढ़ती हुई निर्भरता धनिकों की सत्ता को मजबूत करती है। ग्रामीण इलाके में धनिक तबके की सत्ता को बनाए रखने में एक टूल्स की तरह काम करने लगती हैं। 2008 में महोबा के दैनिक में खबर छपी। खबर के अनुसार, “4 साल से लगातार गिरते भूजल स्तर से कृषि व्यापार ध्वस्त हो गया है। मुख्यालय सहित जनपद के 5 प्रमुख कस्बों में पानी का जुगाड़ लगाना ही एक काम बचा है। धोबियों का कारोबार ठप्प है। पानी के अभाव से दर की सामाजिक व्यवस्था में लोग उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ने में कोई संकोच नहीं करते हैं। हालत इतनी बदतर हो गई है कि तमाम सक्षम लोग पानी का इन्तजाम कराने के नाम पर युवतियों की आबरू लूटने से बाज नहीं आते हैं। जैतपुर की एक युवती अपना दर्द बताते हुए कहती है कि पति व जेठ रोजी-रोटी की जुगाड़ में दिल्ली चले गए हैं। वो खुद बूढ़ी माँ की सेवा के लिये घर में रह गई है। गेहूँ खरीदने का तो वह पैसा भेज देते हैं। पर पानी अहम समस्या है। बगल में एक घर में लगे जेटपम्प से पानी लेने की जुगाड़ लगाई तो चाचा लगने वाले गृहस्वामी के युवा बेटे ने दबोच लिया। विरोध किया तो भविष्य में पानी न देने की धमकी दी। लाचारी में आबरू से समझौता करना पड़ा। जो हुआ सो हुआ। किसी तरह जरूरत भर का पानी तो मिल रहा है।”

तालाबों के गुलजार पनघटविडम्बना यह है कि अभी भी कुछ लोग ट्यूबवेल तकनीक की वकालत करते मिल जाएँगे। इसमें कुछ तथाकथित विद्वानों द्वारा समर्थित किसान संगठन भी हैं। इनकी प्रमुख माँग का हिस्सा रहता है कि ‘गहरे ट्यूबवेल खोदे जाएँ’। विसंगति ही है कि अभी भी बुन्देलखण्ड में ट्यूबवेल और हैण्डपम्प पर बजट आबंटन और ध्यान ज्यादा है, तालाबों के लिये कम। ट्यूबवेल और हैण्डपम्प पर खर्चा बढ़ता ही जा रहा है, और एक दो साल के ही अन्दर 50 फीसदी से ज्यादा ट्यूबवेल औप हैण्डपम्प सूख जाते हैं।

बेवकूफी की गजब होड़ मची है जलस्तर गिर जाने से कम गहराई के ट्यूबवेल और हैण्डपम्प जब सूख जाते हैं, तो और गहरे खोदने की तैयारी शुरू हो जाती है। 100 फीट जलस्तर वाले सूख जाते हैं तो 200 फीट खोदने की तैयारी शुरू हो जाती है, फिर 200 से 300 सिलसिला जारी रहता है नीचे और नीचे जाने का। कोई भी इस बर्बादी पर सवाल नहीं उठाता।
अपना तालाब अभियान के संयोजक पुष्पेन्द्र भाई कहते हैं कि कठोर चट्टानों वाली भूगर्भ की धरती बुन्देलखण्ड में भूजल की होड़ पैसे के लिये ज्यादा है, पानी के लिये कम। होना तो यह चाहिए कि किसी भी ट्यूबवेल खोदने वाले को एक तालाब बनवाना अनिवार्य कर देना चाहिए। जितना भूजल दोहन ट्यूबवेल वाले लोग करते हैं, उतना उन्हें धरती में उतारना अनिवार्य होना चाहिए।

संकट का विस्तार


मिटते हुए तालाब, सूखते कुएँ और मरती नदियाँ बुन्देलखण्ड में सूखे के कारण हैं। कम या ज्यादा बारिश को दोष देना बहानेबाजी है। कुदरत के खाते से कभी कम तो कभी ज्यादा बारिश तो होती ही है। पर बारिश से ज्यादा पानी का प्रबन्धन जिम्मेदार है। प्रबन्धन के बजाय उपेक्षा, लापरवाही और कब्जेदारी ने तालाबों के संकट को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। टीकमगढ़, छतरपुर, महोबा में विशालकाय तालाब, प्रायः जिनको स्थानीय समाज सागर की संज्ञा देता है, की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है।

गर्मियां में जय सागर काम के दौरानबुन्देलखण्ड में पानी का काम करने से पहले यह समझ लेना चाहिए कि बुन्देलखण्ड में भूजल पर निर्भरता स्थायी समाधान नहीं है। क्योंकि बुन्देलखण्ड के भूगर्भ में ग्रेनाइट जैसी कठोर चट्टानों की मोटी परत फैली हुई है। ट्यूबवेल या हैण्डपम्प से लगातार पानी पाना मुश्किल होता है और ग्रेनाइट चट्टानों वाले भूगर्भ में भूजल को बढ़ाना दुष्कर ही है। ऐसे में तालाब ही समाधान का रास्ता हैं। सूखा, सूखे से फसलों का सूख जाना, भुखमरी व आत्महत्याओं का सिलसिला और पलायन लाइलाज बीमारी बनती चली जा रही हैं। यह संकट का विस्तार 78 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले बुन्देलखण्ड के लगभग हर हिस्से में है।

वाटर एक्सप्रेस ने गर्माया महौल


4 मई को झांसी पहुंची वाटर एक्सप्रेस ने बुन्देलखण्ड का महौल गरमा दिया। 4 मई को आई वाटर एक्सप्रेस 9 मई की शाम प्यास बुझाए बिना ही चली गई। ट्रेन जब तक रही, बुन्देलखण्ड पर राजनीति गरमा गई। हमीरपुर-महोबा के भाजपा सांसद पुष्पेन्द्र कुमार ने बताया कि उनकी माँग पर रेल मंत्रालय ने पानी वाली ट्रेन भेजी है।

भाजपा सांसद की माँग पर आई हुई ट्रेन को उत्तर प्रदेश सरकार के जल संसाधन मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने और तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन ने निरर्थक कवायद करार दी। आलोक रंजन ने कहा, ‘पानी की ऐसी दिक्कत नहीं है कि हमें बाहर से रेल से पानी मँगवाना पड़े। हमने पानी के लिये प्रबन्ध किये हैं।’

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ट्वीट करके जल प्रबन्धन के नमूने पेश किये। चरखारी के पानी से लबालब तालाबों की फोटो (कोई पुरानी फोटो) अपने ट्विटर हैण्डल पर शेयर की। इसके जवाब में बुन्देलखण्ड के तालाबों के हालात से परिचित बहुत सारे लोगों ने सूखे तालाबों की फोटो कमेंट्स में शेयर की। जो सरकारी दावों को झुठला रहे थे। परिणाम यह हुआ कि पानी के दावों की यह गरमागरमी सचमुच के काम में बदल गई।

सरकार ने आनन-फानन में समाजवादी जलसंचय योजना की घोषणा की और बुन्देलखण्ड के चयनित 100 तालाबों के पुनर्जीवन के काम को तत्काल प्रभाव से शुरू कर दिया। तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन और मुख्य सचिव सिंचाई दीपक सिंघल को इस अभियान की देख-रेख का जिम्मा सौंपा गया।

मशीनों का हुजूम

काम कैसे हुआ


बुन्देलखण्ड के 100 तालाबों के पुनर्जीवन के काम को लेकर सिंचाई मंत्री शिवपाल यादव ने युद्धस्तर पर करने के निर्देश दिये। 20 दिन के अन्दर 100 तालाब खोदे जाने का लक्ष्य तय किया गया। तालाबों की खुदाई से 60 मिलियन क्यूबिक मीटर की अतिरिक्त भण्डारण क्षमता बढ़ाने का अनुमान किया गया। इतने बड़े भण्डारण के लिये एक बड़े बाँध की जरूरत पड़ती है, जिसका बजट अनुमानतः 700 करोड़ तक हो जाता है। पर इन 100 तालाबों की खुदाई का बजट लगभग मात्र 140 करोड़ रुपये रखा गया।

बिना टेंडर, आधे-अधूरे डीपीआर के आधार पर ही तालाबों की खुदाई का काम शुरू कर दिया गया। लोगों का आरोप था कि ज्यादातर ठेकेदार इटावा से थे, जिनके ऊपर प्रशासनिक अधिकारियों का भी कोई नियंत्रण नहीं था। चरखारी में लगातार मुख्यमंत्री के दौरों की वजह से चरखारी के तालाबों का पुनर्जीवन तो ठीक से हुआ, पर दूसरे अन्य गाँवों में पुनर्जीवन के नाम पर थोड़ी बहुत ही खुदाई की गई।

तालाबों के पालों की मजबूती पर ठीक से काम नहीं हुआ। वेस्टवियर बहुत ही कम गहराई के बनाए गए हैं जिससे कि पाल पर पानी का जोर ना आये और पाल सुरक्षित रह सके, लेकिन इससे हो यह रहा है कि पानी बहुत ही कम गहराई तक भर रहा है।

तालाबों की खुदाई में काम कर रही मशीनों के ठेकेदारों का पेमेंट अभी रुका हुआ है क्योंकि शुरू से ही इसमें टेंडर प्रक्रिया नहीं की गई है; तो पेमेंट किस आधार पर होगा और किसको होगा यह एक बड़े विवाद का कारण बनेगा।

'समाजवादी जल संचय योजना' के तहत 100 से ज्यादा तालाबों के पुनर्जीवन के होर्डिंगठेकेदारों में से कई भयानक घाटे में आ गए हैं। कुछ ठेकेदारों का मजदूरी, किराए की मशीनें और डीजल पर खर्च करोड़ रुपए से भी ज्यादा हो चुका है, पर अभी उनको पेमेंट नहीं हुआ है और होने की कोई उम्मीद नहीं है। और यदि पेमेंट किया गया तो बिना लेखा-जोखा के किया गया पेमेंट बड़े विवाद का कारण बनेगा। और एक बड़े घोटाले की नींव पर खड़ा होगा।

काम क्या हुआ


इन सब के बावजूद अकेले महोबा में ही करीब 50 से ज्यादा तालाबों का पुनरुद्धार हुआ है। चूँकि मुख्यमंत्री का दौरा चरखारी ही होता रहा इसलिये चरखारी के सभी तालाबों की खुदाई और सौन्दर्यीकरण का काम रिकार्ड अवधि में और दुरुस्त हुआ। चरखारी के जिन तालाबों पर काम हुआ वे हैं- जयसागर, कोठीताल, बंसियाताल, मलखान तालाब, रपट तलैया, गुमान बिहारी तालाब, गोलाघाट तालाब और रतन तालाब। चरखारी तालाबों के पुनर्जीवन की कार्यान्वयन एजेंसी सिंचाई विभाग था।

चरखारी के तालाबों के पुनरुद्धार के बाद एक कार्यक्रम में बोलते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि समाजवादी सरकार संकट की इस घड़ी में बुन्देलखण्ड के लोगों के साथ खड़ी है। गाँव के लोग सरकार के इस कदम की वाहवाही कर रहे हैं। केन्द्र की सरकार की जलसंसाधन मंत्री उमा भारती ने भी चन्देलकालीन तालाबों के पुनुरुद्धार का संकल्प जताया, पर देर हो चुकी थी।

मुख्यमंत्री जी की यात्रा के दौरान जय सागरचुनावी साल में समाजवादी जलसंचय योजना के मकसद पर भी कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं। पर इसका जवाब एक किसान ने दिया। तालाबों की खुदाई में गोलमाल की आशंका पर सवाल पूछने पर एक किसान ने कहा कि ‘भैया! चाहे जो हुआ हो, पर खोदा ऐसा है कि अब 30-40 साल तक खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हाँ थोड़ा पहले जाग जाते, तो हमारा और भला हो जाता।’

बारिश खूब हो रही है। बुन्देलखण्ड के हालात बदले-बदले से नजर आते हैं। भयानक सूखे से जूझ रहा बुन्देलखण्ड अब बाढ़ से परेशान है। जबरदस्त बारिश राहत का पैगाम लेकर आई है। किसानों की खुशी का ठिकाना नहीं है, 4 साल बाद फिर अच्छी बारिश वाला साल आया है। 900 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश हो चुकी है।

बुन्देलखण्ड के सारे बाँध लबालब हो गए हैं। सारे तालाब खूब भरे हुए हैं। और उनके पनघट गुलजार हो गए हैं। हालांकि 400 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश बुन्देलखण्ड के तालाब और बाँध समा नहीं पाते, ऐसे में जरूरत है कि तालाबों की भण्डारण क्षमता और दो-तीन गुना बढ़ाई जाए। सूखा और बाढ़ दोनों से मुक्ति का रास्ता तो तालाब से होकर ही जाता है। फिलहाल तो तालाबों की खुदाई में ही खुदाई है।

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