कहाँ है बुन्देलखण्ड का पानी

Submitted by RuralWater on Thu, 06/30/2016 - 15:40
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‘बिन पानी सब सून’ पुस्तिका से साभार, 5 जून 2016

पेयजल के मामले में सबसे गम्भीर स्थिति सागर जिले में पाई गई, जहाँ 50 प्रतिशत गाँवों के लोग पेयजल हेतु कुओं पर निर्भर हैं और 7 प्रतिशत लोग तालाब का पानी पी रहे हैं। जबकि छतरपुर जिले में कुएँ पर निर्भर परिवारों की संख्या 19 प्रतिशत और तालाब पर 9 प्रतिशत परिवार निर्भर है। इसी तरह टीकमगढ़ जिले में हैण्डपम्प पर निर्भर 85 प्रतिशत गाँवों के साथ ही 10 प्रतिशत कुओं और 5 प्रतिशत गाँव तालाब या नदी-नालों पर निर्भर है। सूखा की परिस्थिति में बुन्देलखण्ड में प्यास बुझाना मुश्किल हो गया है। यहाँ ज्यादातर गाँवों में पेयजल स्रोत या तो सूखा चुके हैं या उनसे बहुत कम पानी मिल रहा है। इस दशा में लोगों को गाँव के दूर खेतों में बने कुओं से पीने का पानी लाना पड़ रहा है। लोग साइकिल, बैल गाड़ी से पानी ला रहे हैं। ज्यादातर गाँवों के ट्यूबवेल और हैण्डपम्प सूखा चुके हैं। कुएँ बहुत पहले ही जवाब दे चुकेहैं। भूजल की स्थिति बद-से-बदतर हो चुकी है।

बताया जाता है कि बुन्देलखण्ड में कई स्थानों पर भूजल स्तर रोजाना 3-6 इंच गिर रहा है। कहीं-कहीं तो जल स्तर 400 फीट से भी नीचे पहुँच चुका है।

सूखे और गिरते भूजल स्तर के कारण गाँवों के कई हैण्डपम्प बन्द हो गए हैं या उनमें बहुत कम पानी आता है। पेयजल एवं स्वच्छता राज्यमंत्री रामपाल यादव ने लोकसभा के पिछले सत्र में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि केन्द्र और राज्यसरकारें इस स्थिति से निपटने के लिये संयुक्त रूप से प्रयास कर रही हैं। केन्द्र ने राज्य सरकारों को निर्देश जारी किये हैं। सभी जलापूर्ति प्रणालियों को सुधारा जा रहा है और टैंकरों से पानी उपलब्ध कराया गया है।

भूजल की पर्याप्तता वाले क्षेत्रों में निजी कुओं और बोरवेल को किराए पर लिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सूखा प्रभावित राज्यों को 2172.43 करोड़ रुपए जारी किये गए हैं। राज्यों से यह भी कहा गया है कि वे स्थिति में सुधार के लिये किये गए उपायों पर दैनिक रिपोर्ट केन्द्र सरकार को भेजे। संसद में यह बात स्पष्ट की गई कि मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र के छह जिलों के 1578 गाँव पेयजल की कमी का सामना कर रहे हैं।

बुन्देलखण्ड में पेयजल की स्थिति के सन्दर्भ में प्रस्तुत अध्ययन के अन्तर्गत छतरपुर, सागर एवं टीकमगढ़ जिले के 66 गाँवों में लोगों से चर्चा की गई, ग्राम पंचायतों से जानकारियाँ एकत्र की गईं और गाँवों का अवलोकन किया गया। इस प्रक्रिया से सामने आये तथ्यों के अनुसार वर्तमान में बुन्देलखण्ड के लोग पेयजल के लिये तीन प्रकार के जलस्रोतों पर निर्भर हैं, एक हैण्डपम्प, दूसरा कुएँ और तीसरा तालाब व नदी-नाले।

स्पष्ट है कि कुएँ, तालाब और नदी-नालों का पीने के लिये सुरक्षित नहीं है, क्योंकि उसमें कई प्रकार की अस्वच्छता या गन्दगी पाई जाती है। इसके बावजूद बुन्देलखण्ड के लोग पेयजल के इन असुरक्षित स्रोतों का पानी पीने को विवश हैं।

प्रस्तुत अध्ययन से सामने आये तथ्यों के अनुसार बुन्देलखण्ड के 70 प्रतिशत गाँवों के लोग पेयजल हेतु हैण्डपम्प पर निर्भर हैं, वहीं 30 प्रतिशत गाँवों के लोग कुएँ, तालाब और नदी नालों का पानी पीने को मजबूर है। इनमें 23 प्रतिशत गाँवों के लोग कुएँ और 7 प्रतिशत गाँव के लोग नदी-नाले व तालाब पर निर्भर हैं।

पेयजल के मामले में सबसे गम्भीर स्थिति सागर जिले में पाई गई, जहाँ 50 प्रतिशत गाँवों के लोग पेयजल हेतु कुओं पर निर्भर हैं और 7 प्रतिशत लोग तालाब का पानी पी रहे हैं। जबकि छतरपुर जिले में कुएँ पर निर्भर परिवारों की संख्या 19 प्रतिशत और तालाब पर 9 प्रतिशत परिवार निर्भर है। इसी तरह टीकमगढ़ जिले में हैण्डपम्प पर निर्भर 85 प्रतिशत गाँवों के साथ ही 10 प्रतिशत कुओं और 5 प्रतिशत गाँव तालाब या नदी-नालों पर निर्भर है।

यदि हम गाँवों के साथ ही पेयजल स्रोतों पर आबादी की निर्भरता का आकलन करें तो स्थिति लगभग एक जैसी दिखाई देती है। सर्वेक्षित गाँवों की कुल आबादी का 72 प्रतिशत हिस्सा हैण्डपम्प पर निर्भर है, वहीं 21 प्रतिशत कुओं पर और 7 प्रतिशत आबादी तालाब व नदी-नाले के पानी पर निर्भर है। इस तरह हम देखते हैं कि अस्वच्छ पेयजल पर कुल मिलाकर 28 प्रतिशत आबादी निर्भर है। हालांकि अध्ययन के दौरान 6 गाँवों में नल-जल योजना पाई गई, किन्तु एक भी गाँव में नल-जल योजना चालू हालत में नहीं थी।

जैसा कि ऊपर उल्लेखित है, 70 प्रतिशत गाँवों के लोग पेयजल के लिये मुख्य रूप से हैण्डपम्प पर निर्भर है। इस सन्दर्भ में यह देखना होगा कि क्या इन गाँवों में हैण्डपम्प पर्याप्त पानी दे पा रहे हैं और एक हैण्डपम्प पर कितनी आबादी निर्भर है। अध्ययन से सामने आये तथ्यों के अनुसार 37 प्रतिशत गाँवों में 150 आबादी एक हैण्डपम्प पर निर्भर है। जबकि 17 प्रतिशत गाँवों में 300 की आबादी पर एक हैण्डपम्प है। 13 प्रतिशत गाँव ऐसे पाये गए जहाँ 500 से 700 की आबादी पर एक हैण्डपम्प मौजूद है। 2 प्रतिशत गाँवों में तो 1000 या उससे अधिक आबादी हैण्डपम्प पर निर्भर है।

इस तरह हम देखते हैं कि बुदेलखण्ड के जलस्रोतों पर आबादी का इतना दबाव है कि उनसे पानी प्राप्त करने के लिये लोगों को घंटों लग जाते हैं। कई हैण्डपम्प एवं कुओं में तो 1-2 घंटे में पानी खत्म हो जाता है तथा 3-4 घंटे इन्तजार के बाद पानी एकत्र होता है। पानी का संकट उन महिलाओं के लिये ज्यादा संघर्षपूर्ण है, जिन्हें कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है। प्रस्तुत अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ज्यादातर महिलाओं को पानी लाने के लिये 1-3 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है।

कितना स्वच्छ है पानी?


प्यास बुझाने के लिये 1-3 किलोमीटर दूर से कठोर मेहनत करके लाया जा रहा पानी कितना साफ है, इस सवाल का उत्तर तलाशने पर हम पाते हैं कि दूर खेत में स्थित कुओं में बहुत कम पानी बचा है और वह भी मटमैला हो गया है। यानी उसमें मिट्टी के कण घुले हुए हैं। यह पानी पीना सेहत के लिये नुकसानदायक है। यही कारण है कि सर्वेक्षित गाँवों में से 23 गाँवों के लोग उल्टी, दस्त, पेचिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त हैं।

अध्ययन में पाया गया कि कुल सर्वेक्षित गाँवों में से 71 प्रतिशत गाँवों के लोगों को दूषित पानी पीना पड़ रहा है। इनमें से ज्यादातर गाँव वे हैं, जिन्हें पीने का पानी कुओं, तालाबों व नदी-नालों से मिल रहा है।

स्पष्ट है कि इन जलस्रोतों में कई तरह की गन्दगी होती है, जो मानव स्वास्थ्य के लिये बेहद नुकासनदायक है। बीमारियों के इलाज की सुविधा गाँव के आसपास नहीं होने से उन्हें ब्लाक मुख्यालय या उसके समीप किसी बड़े गाँव में जाना पड़ता है, जहाँ डॉक्टर उपलब्ध हो। ज्यादातर लोग प्राइवेट गैर डिग्रीधारी डॉक्टरों से इलाज करवाते हैं। एक बार के इलाज में 500 रुपए तक खर्च हो जाते हैं। लोगों के अनुसार एक बार बीमार होने पर तीन-चार बार डॉक्टर के पास जाना पड़ता है और बीमारी ठीक होते-होते एक से डेढ़ हजार रुपए खर्च हो जाते हैं।

इस तरह स्पष्ट है कि बुन्देलखण्ड में पेयजल हासिल करना बहुत ही तकलीफदेह है। इसका सीधा असर महिलाओं पर पड़ रहा है, जिन्हें दूर से पानी लाना पड़ रह है। किन्तु पानी की इस गम्भीर समस्या को हल करने के लिये कोई कदम प्रशासन व पंचायत द्वारा नहीं उठाए गए।

लगभग सभी ग्रामवासियों ने बताया कि पिछले छह महीनों में इन गाँवों में पेयजल समस्या हल करने के लिये कोई नई संरचनाएँ विकसित या स्थापित नहीं की गई। हैण्डपम्प दिन-पर-दिन बन्द होते जा रहे हैं। जिन गाँवों में नल-जल योजनाएँ हैं, वे उनमें से ज्यादातर बन्द पड़ी हैं और उसे दुरुस्त करने के कोई प्रयास नजर नहीं आता। वर्तमान में कुछ पंचायतों में सार्वजनिक एवं निजी कुआँ का निर्माण जारी है, किन्तु ये कुएँ आगामी कुछ महीनों बाद ही पानी देने की स्थिति में होंगे। अत: बुन्देलखण्ड की पेयजल समस्या हल करने के लिये दूरगामी योजना बनाने के साथ ही लोगों को तात्कालिक राहत एवं उपाय की जरूरत है।

विकलांगता पर भारी पानी का बोझ
पानी के संकट से किस तरह लोगों के मानव अधिकार का हनन होता है, यह गीता विश्वकर्मा और उनके पति अनन्तराम विश्वकर्मा की पीड़ा से पता चलता है। छतरपुर जिले के राजनगर ब्लाक के ग्राम डहार्रा के 31 वर्षीय अनन्तराम और उनकी पत्नी 27 वर्षीय गीता दोनों के विकलांग होने के बावजूद एक किलोमीटर दूर से पानी लाने को विवश हैं। अनन्तराम 100 प्रतिशत दृष्टि बाधित हैं, यानि उन्हें दिखाई नहीं देता है। जबकि उनकी पत्नी गीता 100 प्रतिशत अस्ति बाधित विकलांग है। गीता बताती है कि मेरे माता-पिता बचपन में ही खत्म हो गए, उनकी जमीन थी, वह बाँध में चली गई और उसका मुआवजा भी आज तक नहीं मिला। वहाँ से विस्थापित होने पर यहाँ आई, लेकिन यहाँ पानी की समस्या से जीवन जीना मुश्किल हो गया। दोनों पति-पत्नी हर रोज अपनी ट्राईसाईकिल पर डब्बे रखकर गाँव से तीन किलोमीटर दूर से पानी लाते हैं। चूँकि छोटी बच्ची को घर में अकेला नहीं छोड़ सकते, इसलिये उसे भी साथ ले जाते हैं। घर की जरूरत के लिये वे तीन डब्बे पानी गाड़ी में रखते हैं। गीताबाई साईकिल का हैण्ड पकड़ती है और अनन्तराम पीछे से साईकिल को धक्का देकर आगे बढ़ाते हैं। इस तरह बड़ी मुश्किल से यह परिवार अपनी जरूरत का पानी लेकर घर पहुँचता है।


पानी, बीमारी और कर्ज का चक्रव्यूह
बाँधों पहाड़ गाँव में पानी के संकट ने एक ऐसे चक्रव्यूह का रूप ले लिया है, जिसमें लोग एक के बाद एक कई समस्याओं में घिरते जा रहे हैं। दमोह जिले के तेन्दूखेड़ा ब्लाक के इस गाँव में सिर्फ दो कुओं में ही पानी बचा है और वह भी मटमैला और गन्दा। इस पानी के पीने से लोग बीमार होते हैं, बीमारी का इलाज करवाने के लिये पैसा उधार लेना पड़ता है। इस तरह यहाँ पानी की समस्या ने लोगों को बीमार और कर्जदार बना दिया है।

यहाँ के काशीराम की कहानी इस बात को अच्छी तरह साबित करती है। उनकी पत्नी पार्वती को पिछले दो माह में 6 बार उल्टी-दस्त की बीमारी हुई। गाँव के आसपास कोई सरकारी अस्पताल नहीं होने से 5 किलोमीटर दूर ग्राम तेजनगर के प्राइवेट डॉक्टर से इलाज करवाया गया, जिसमें 3000 रुपए से अधिक खर्च हो गए। इसी बीच काशीराम के पेट में भी दर्द होने लगा। उसे भी अपना इलाज करवाना पड़ा। डॉक्टर का कहना था कि दूषित पानी पीने से यह पेट की बीमारी हुई है। काशीराम अपनी इलाज में 1000 रुपए खर्च कर चुके हैं। काशीराम की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी और इस बार के सूखे में फसल नहीं होने से स्थिति बहुत ज्यादा गम्भीर हो गई। इस पर भी बीमारी होने से खर्च असहनीय हो गया। काशीराम को अपनी पत्नी एवं अपने इलाज के लिये साहूकार से पाँच रुपए सैकड़ा प्रतिमाह यानी 60 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर पैसा उधार लेना पड़ा। यानी इलाज के इन 4000 रुपयों के बदले में उसे 6400 रुपए चुकाने होंगे। चूँकि गाँव में कमाई का कोई साधन नहीं है इसलिये यदि कोई और खर्च आ जाये तो उसे फिर उधार लेना होगा। इस तरह पानी के संकट ने काशीराम की जिन्दगी कर्ज का बोझ लाद दिया।

यह कहानी अकेले काशीराम की ही नहीं है। गाँव में उनकी तरह कई लोग हैं जो दूषित पानी से बीमार हो रहे हैं और उधार लेकर अपना इलाज करवाने को विवश हैं। बाँधों पहाड़ गाँव में 160 परिवार गाँव से 1 किलोमीटर दूर दो कुओं से पानी भरते हैं। करीब 30 से 40 फिट गहरे इन कुओं में भी पानी इतना कम है कि कुछ ही घंटों में पानी खत्म हो जाता और दो-तीन घंटों के इन्तजार के बाद पानी फिर इकट्ठा होता। कुएँ के अन्दर मिट्टी और अन्य पदार्थ भी पानी में घुले होते हैं, जिससे लोगों को उल्टी, दस्त, आँव-पेचिस जैसी बीमारियाँ हो रही हैं। हालांकि गाँव में कई हैण्डपम्प भी मौजूद हैं, किन्तु जलस्तर नीचे चले जाने से कोई भी हैण्डपम्प पानी देने की स्थिति में नहीं है। मार्च माह से ही लोग इन दो कुओं से ही अपनी प्यास बुझा पा रहे हैं।

पानी के इस संकट का सबसे ज्यादा असर महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। दूषित पानी के कारण वे बीमार तो हो ही रही हैं, साथ ही उन्हें घर का पानी भी भरना पड़ता है। कई महिलाएँ बीमार होने के बावजूद कुएँ से पानी लाने को विवश हैं। यहाँ की गोपाबाई, लक्ष्मी और शीला बताती हैं कि पूरे परिवार का पानी भरने के लिये उन्हें कुएँ से घर तक 10 राउंड लगाने पड़ते हैं। घर से कुएँ की दूरी 1 किलोमीटर है, किन्तु गाँव पहाड़ी पर बसा है और कुआँ नीचे मैदानी क्षेत्र में है। इस दशा में सिर पर पानी का वजनदार घड़ा लेकर पहाड़ी पर चढ़ना बहुत ही तकलीफदेह होता है। पानी भरते-भरते गोपाबाई के घुटनों में इतना दर्द होने लगा कि वे ठीक से चल भी नहीं पाती। किन्तु परिवार की प्यास बुझाने के लिये वह यह कष्ट सहन कर रही हैं। पानी भरने वाली सभी महिलाओं को कमरदर्द और हाथ-पैरों में दर्द आम बात है। इस गाँव की शीला बताती हैं कि उल्टी-दस्त जैसी बीमारियों का इलाज तो परिवार वालों द्वारा करवा दिया जाता है, किन्तु कमरदर्द और हाथ-पैर दर्द जैसी बीमारी पर तो परिवार के लोग भी ध्यान नहीं देते। इसे तो हमें सहन करते हुए ही जीना पड़ता है और घर का पूरा काम करना पड़ता है।

पेयजल संकट से उन बुजुर्गों की स्थिति भी बहुत गम्भीर हो गई है, जिनके परिवार के लोग पलायन पर चले गए हैं। 70 वर्षीय केरिया किसी तरह अपना खाना तो बना लेते हैं, लेकिन कुएँ से पानी भरकर लाना बहुत मुश्किल है। इस दशा में उनका 15 वर्षीय नाती उनके लिये पानी भरकर लाता है। गाँव के करीब 60 परिवार पलायन पर है, जिनमें से कई लोग बुजुर्गों को गाँव में ही छोड़ गए हैं। पानी के इस संकट से इन बुजुर्गों के लिये जीवन जीना बहुत ही कठिन हो गया है। बुजुर्गों के जीवन को आसान बनाने के लिये पंचायत द्वारा भी कोई प्रबन्ध नहीं किया गया। लोग बताते हैं कि 14 अप्रैल की ग्रामसभा में लोगों ने पानी की समस्या पर बातचीत की थी। लोगों ने हैण्डपम्प लगवाने और कुओं के गहरीकरण की बात कही थी। किन्तु सचिव ने पंचायत में राशि नहीं होने की बात कहकर प्रस्ताव लिखने से इनकार कर दिया। इससे यह बात साफ होती है कि पंचायत लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील नहीं है। क्योंकि पंच परमेश्वर योजना के अन्तर्गत पंचायतों को राशि आवंटित की जा चुकी है और ग्रामसभा के प्रस्ताव पंचायत इस राशि से पेयजल के संसाधन निर्मित कर सकती है। किन्तु पंचायत द्वारा ऐसा कोई प्रयास अब तक नहीं किया गया।


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