बेफिक्र सरकार, फूल-फल रहा पानी का कारोबार

Submitted by RuralWater on Mon, 08/22/2016 - 16:02
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.सरकार जब अपने दायित्वों से मुँह मोड़ लेती है तो निजी कम्पनियाँ उसका फायदा उठाती हैं। पेयजल के मामले में भी यही हो रहा है। जिन क्षेत्रों में साफ पेयजल उपलब्ध नहीं है वहाँ सरकार की तरफ से शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं की गई है लिहाजा निजी कम्पनियाँ इन क्षेत्रों में अपने पाँव फैलाने लगी हैं।

एक वक्त था जब साफ पानी सबके लिये उपलब्ध था। उस वक्त कोई भी व्यक्ति खरीदकर पानी पीने की कल्पना नहीं करता होगा लेकिन अब ऐसी बात नहीं है। अब गाँवों में भी लोगों को साफ पानी खरीदकर पीना पड़ रहा है। यह सीधे तौर पर संविधान का उल्लंघन है क्योंकि संविधान में पानी और हवा को मौलिक अधिकार के दायरे में रखा गया है। संविधान के अनुच्छेद 21 में कहा गया है, ‘शुद्ध पानी और हवा प्राप्त करना लोगों का अधिकार है।’

देश का शायद ही कोई राज्य है जहाँ निजी कम्पनियाँ पानी का कारोबार नहीं कर रही हैं। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के बरौली अहिर ब्लॉक का पचगाँय खेड़ा ग्राम पंचायत में भी यह कारोबार खूब फूल-फल रहा है। इस ग्राम पंचायत के अन्तर्गत आने वाले तीन गाँव पचगाँय, पट्टी पचगाँय और पचगाँय खेड़ा की कुल आबादी लगभग 20 हजार है। कई सर्वेक्षणों में पता चला है कि इस पंचायत के गाँवों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा सामान्य से अधिक है। फ्लोराइड की अधिकता के कारण इन गाँवों के दर्जनों लोग फ्लोरोसिस बीमारी की चपेट में आ गए हैं।

पचगाँय की 42 वर्षीया मीनादेवी पर फ्लोराइड ने ऐसा कहर बरपाया है कि वे सीधे होकर चल नहीं पाती हैं। उन्हें पुरी तरह झुककर चलना पड़ता है। इसी गाँव के रहने वाले 24 वर्षीय सचिन को डॉक्टर ने कहा है कि वह स्केलेटल फ्लोरोसिस (हड्डी से सम्बन्धित रोग) नाम की बीमारी की चपेट में है। सचिन के पिता सुरेश चंद्र और बड़े भाई सुदामा को भी फ्लोरोसिस है। सचिन का छोटा भाई मुकेश शहर में रहता है इसलिये वह इसके कहर से बच गया। वृद्धा भूदेवी को लाठी के सहारे उठना बैठना पड़ता है। भूदेवी कहती हैं, ‘मैं आधे मिनट भी खड़ी नहीं रह पाती हूँ। पैर में असह्य दर्द होने लगता है।’

इस गाँव में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से दो फ्लोराइड रिमूवल प्लांट स्थापित किये गए थे जिनमें से एक बन्द पड़ा है और दूसरे प्यूरिफायर से रोज 200 से 250 लीटर पानी निकलता है। इससे निकलने वाला पानी कितना साफ है इसकी कोई गारंटी नहीं है। इस गाँव की आबादी लगभग 5 हजार है अतएव इस प्लांट से यहाँ के लोगों की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं। यही वजह है कि यहाँ निजी कम्पनियों ने पानी का कारोबार शुरू कर दिया है। ग्रामीण बताते हैं कि रोज निजी कम्पनियों की 3 गाड़ियाँ आती हैं जो 500 से 700 लीटर पानी लोगों को देती हैं।

पचगाँय के स्थानीय निवासी रवि मोहन शर्मा कहते हैं, ‘हम लोगों ने 20 लीटर वाला जार रखा है। पानी के टैंकर आते हैं और जार में 20 लीटर पानी देते हैं जिसके बदले में 10 रुपए देने पड़ते हैं। इस गाँव की 50 प्रतिशत आबादी इन टैंकरों से पानी लेती है, अन्य कुछ लोग फ्लोराइड रिमूवल प्लांट से पानी लेते हैं और बाकी लोग ट्यूबवेल का पानी ही पीते हैं।’

पचगाँय खेड़ा और पट्टी पचगाँय में भी एक जैसी सूरत-ए-हाल है। ब्यूरो आफ इण्डियन स्टैंडर्ड के अनुसार एक व्यक्ति को रोज 5 लीटर पीने का पानी मिलना चाहिए। पचगाँय खेड़ा पंचायत की आबादी लगभग 20 हजार है जिसका मतलब है कि इस क्षेत्र को हर रोज 1 लाख लीटर शुद्ध पेयजल चाहिए। पंचायत के प्रधान राधेश्याम कुशवाहा से जब इस सम्बन्ध में बातचीत की गई तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार की ओर से पंचायत में साफ पानी मुहैया नहीं करवाया जा रहा है।

राधे श्याम कुशवाहा कहते हैं, ‘पचगाँय खेड़ा और पचगाँय पट्टी में सरकार की तरफ कोई व्यवस्था नहीं की गई है और यही वजह है कि निजी कम्पनियों ने यहाँ पानी बेचना शुरू कर दिया है।’ कुशवाहा पचगाँय खेड़ा के रहने वाले हैं। वे बताते है, ‘मेरे गाँव में निजी कम्पनियों के 4-5 टैंकर रोज आते हैं और 10 रुपए में 20 लीटर पानी देते हैं। सरकार की तरफ से पचगाँय खेड़ा और पट्टी पचगाँय में कोई फ्लोराइड रिमूवल प्लांट नहीं लगाया गया है। जो सक्षम हैं वे तो साफ पानी खरीद लेते हैं लेकिन जो नहीं हैं उन्हें फ्लोराइड युक्त पानी ही पीना पड़ता है।’

पंचायत क्षेत्र की 80 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है। इसमें एक तबका के पास खेत भी नहीं है और वे दूसरे के खेतों में मजदूरी किया करते हैं। जाहिर सी बात है कि इनके पास आय के सीमित विकल्प है ऐसे में उनके लिये पानी खरीदकर पीना घाटे का सौदा है लेकिन उनके पास दूसरा कोई विकल्प भी तो नहीं है। सुरेश चंद्र कहते हैं, ‘हम न कोई बिजनेस करते हैं और न ही अपने पास खेत हैं। बताइए 10 रुपए का पानी खरीदें कि सब्जियाँ?’

.पचगाँय खेड़ा के रहने वाले प्रमोद सिंह के परिवार में 10 सदस्य हैं जिनके लिये रोज पीने के लिये कम-से-कम 50 से 60 लीटर पानी खरीदना पड़ता है। खाना बनाने के लिये भी साफ पानी का ही इस्तेमाल होता है इसलिये रोज कम-से-कम 50 रुपए केवल पानी पर खर्च करना पड़ता है। प्रमोद सिंह कहते हैं, ‘2-3 साल पहले गाँव के एक किनारे पर एक प्लांट स्थापित किया गया था लेकिन वह निष्क्रिय हो चुका है। प्राइवेट कम्पनियों के टैंकर यहाँ आते हैं जिनसे हम लोग पानी खरीदते हैं। रोज 50-60 रुपए पानी पर खर्च हो जाते हैं लेकिन हमारे पास और कोई विकल्प भी तो नहीं है।’

कई बार ऐसा भी होता है कि टैंकर गाँव में नहीं आता है। प्रमोद सिंह बताते हैं, ‘समस्या उस वक्त और विकट हो जाती है। तब हमारे पास फ्लोराइड युक्त पानी पीने के सिवा और कोई विकल्प नहीं बचता है।’ टैंकर जब नहीं आते हैं तो प्रमोद सिंह जैसे दर्जनों लोगों का परिवार गन्दा पीने को विवश हो जाता है।

पचगाँय खेड़ा से कुछ दूर डेबरी रोड में 12 मिलियन लीटर क्षमता वाला सीवर ट्रीटमेंट प्लांट चलता है इससे भी दिक्कतें आ रही हैं। राधे श्याम कुशवाहा ने कहा, ‘प्लांट तक जाने वाला गन्दा पानी खेतों में पसर जाता है जिससे फसलों को नुकसान तो होता ही है साथ ही भूजल में भी गन्दगी फैल रही है। उन्होंने कहा, इस प्लांट में सेमरी, नंदपुरा आदि का गन्दा पानी आता है।’

पंचायत प्रधान ने कहा कि फ्लोराइड की समस्या से जिला मजिस्ट्रेट को अवगत करवाया गया है। उन्होंने कहा, ‘6 महीने पहले जिला मजिस्ट्रेट हमारे गाँवों में आये थे। उनसे हमने फ्लोराइड की समस्या बताई लेकिन अब तक इस दिशा में सरकार की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया है।’

आगरा के जिला मजिस्ट्रेट पंकज कुमार से इस सम्बन्ध में बात की गई तो उन्होंने कहा कि उन्होंने इन गाँवों की समस्याअों से सरकार को अवगत करवा दिया है।
 

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मीनाक्षी अरोरामीनाक्षी अरोराराजनीति शास्त्र से एम.ए.एमफिल के अलावा आपने वकालत की डिग्री भी हासिल की है। पर्या्वरणीय मुद्दों पर रूचि होने के कारण आपने न केवल अच्छे लेखन का कार्य किया है बल्कि फील्ड में कार्य करने वाली संस्थाओं, युवाओं और समुदायों को पानी पर ज्ञान वितरित करने और प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करने का कार्य भी समय-समय पर करके समाज को जागरूक करने का कार्य कर रही हैं।

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