नदी है तो गाँव में कोई बेरोजगार नहीं

Submitted by RuralWater on Fri, 10/28/2016 - 11:20


छोटी कालीसिंध नदीछोटी कालीसिंध नदीहमारे पुरखे नदी को माँ मानकर उसकी आराधना करते थे। लेकिन नए चलन में नई सोच के चलते हमने नदी को भी महज पानी का एक संसाधन मानकर उसकी उपेक्षा करना शुरू कर दिया है। अब हमारे तथाकथित सभ्य समाज में अपनी या अपने अंचल की नदी के प्रति उस तरह की फीलिंग्स नहीं रह गई है। यही कारण है कि देश की ज्यादातर नदियाँ अब उपेक्षित और लावारिस जैसी स्थिति में आती जा रही हैं। पहले जो नदियाँ कभी पीढ़ियों तक सदानीरा हुआ करती थीं, वे ही अब गर्मियों में सूखने लगी हैं। छोटी नदियाँ तो बरसात के बिदा होते ही गन्दे पानी के डोबरों में बदल जाती हैं।

ऐसे में इस गाँव की एक छोटी-सी नदी की बानगी हमारे पूरे नदी तंत्र को समझने में हमारी मदद तो करती ही है, हमें नदियों से जोड़ने के साथ हमारे सभ्य कहे जाने वाले समाज की समझ को भी साफ करती है। यहाँ गाँव के लोगों ने अपने गाँव के पास से बहती इस नदी का दामन थामा तो नदी की कुछ ऐसी मेहरबानी यहाँ हुई कि आज गाँव का एक भी शख्स बेरोजगार नहीं है। यह कोई धार्मिक आस्था या जादू–टोटके से जुड़ी कहानी नहीं है, बल्कि सौ फीसदी सच है।

मध्य प्रदेश में इन्दौर से करीब एक सौ किमी दूर उज्जैन जिले के तराना तहसील के सीमावर्ती गाँव चूनाखेड़ी जाने के लिये पक्की सड़क तक नहीं है। बारिश के दिनों में कीचड़ और नदी–नालों से होते हुए यहाँ पहुँचना होता है। लेकिन यहाँ पहुँचकर अच्छा लगता है। छोटी कालीसिंध नदी के किनारे पर बसा यह छोटा-सा गाँव कई मायनों में अनूठा है।

गाँव के लोग खेती को भी खासी तवज्जो देते हैं। नदी के पास होने से पानी अच्छा है तो खेती में उत्पादन भी अच्छा होता है। यहाँ सीताफल बड़ी तादाद में होता है पर बीते कुछ सालों से संतरा उत्पादन में अग्रणी है। यहाँ के संतरा दूर–दूर तक मशहूर हैं। काश और गाँव भी ऐसे हो जाएँ।

ज्यादातर गाँवों में युवाओं की खेती–किसानी में कम होती रुचि और बेरोजगारी की समस्याएँ आम होती हैं लेकिन इससे उलट यहाँ एक ऐसे गाँव की बात हो रही है, जहाँ के युवा छोटी सरकारी नौकरियों से लेकर डॉक्टर, इंजीनियर, वकील ही नहीं तीनों सेनाओं से लेकर मल्टीनेशनल कम्पनियों तक में पदस्थ हैं। यह गाँव खेती में भी अव्वल है और यहाँ के संतरे व सीताफल मशहूर हैं। यहाँ खेती–किसानी को भी उतना ही महत्त्व दिया जाता है जितना कि सरकारी नौकरियों को।

यहाँ 111 घरों की कुल बस्ती में 678 लोगों की आबादी है और इसमें से करीब आधे दलित समाज से हैं। वैसे तो यह खेती आधारित गाँव हैं पर अब यहाँ के युवा देश भर में नौकरियाँ कर रहे हैं।

इस गाँव में बड़ी बात यह है कि यहाँ कोई बेरोजगार नहीं है। ज्यादातर लोग या तो नौकरियों में हैं या वे उन्नत खेती–किसानी से जुड़े हैं। यहाँ के कई लोग दूर–दूर तक नौकरियों में हैं। करीब 65 साल पहले यहाँ से मनोहरसिंह पंवार रेलवे पुलिस में भर्ती हुए थे। वे कुछ साल पहले थानेदार बनकर सेवा निवृत्त हुए हैं। अब वे युवाओं को पुलिस भर्ती के लिये तैयार कर रहे हैं। इसी तरह शिक्षक बृजकिशोर शर्मा बच्चों को छोटी उम्र से नौकरियों के लिये तैयार करते हैं। उनके पढ़ाए कई बच्चे छोटी सरकारी नौकरियों से लगाकर रेलवे, पुलिस, नौसेना, थल, वायु सेना, ही नहीं डॉक्टर, वकील, इंजीनियर और मल्टीनेशनल कम्पनियों तक में काम कर रहे हैं।

छोटी कालीसिंध नदी के पानी से सिंचाई करते किसानग्रामीण हरिसिंह बताते हैं, 'हमारी कई पीढ़ियों से यह नदी हमारे खेतों को सींचने के साथ ही हमारे दुःख तकलीफ भी दूर करती रही है। हम जब भी कोई दुःख तकलीफ में होते हैं तो नदी से प्रार्थना करते हैं और देर–सबेर ही सही, हमारी बात नदी समझती है।'

गाँव के ही युवा राजेश कहते हैं, 'आसपास के गाँवों के लोग भी पर्व स्नान जैसे मौकों पर नदी में डुबकी लगाने यहाँ आते रहते हैं। डुबकी लगाकर ऐसा लगता है, जैसे हम हल्के हो गए हों। शास्त्रों में नदियों को पापमोचिनी कहा जाता है। नदियाँ पाप धोती हैं या नहीं, यह तो नहीं पता पर हाँ इतना तय है कि इनके प्रति लगाव और सम्मान से हमें धन-दौलत के साथ एक तरह की आत्मिक शान्ति की अनुभूति जरूर होती है। हमारे यहाँ तो नदी ने हमारी किस्मत ही बदल दी है।'

जीव विज्ञान में स्नातक राजेश इस बात से नाराज हैं कि इन दिनों लोग नदियों को उनका यथोचित आदर नहीं देते हैं। उनमें तमाम तरह का कचरा और पूजन सामग्री के साथ मलबा और पीओपी से बनी मूर्तियाँ तक प्रवाहित कर देते हैं। इससे कई बार मछलियाँ और दूसरे जीव मर जाते हैं। कई जलीय जीवों के अस्तित्व पर ही संकट है। हमारी नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। इनके पानी का फायदा तो सब सोचते हैं पर इनकी सफाई और इन्हें प्रदूषण से बचाने के लिये कोई नहीं सोचता। आसपास की नर्मदा और क्षिप्रा जैसी बड़ी नदियाँ भी प्रदूषण के कारण खराब हो रही हैं।

चूनाखेड़ी के सरपंच मानसिंह कीर कहते हैं, 'गाँव में शिक्षा का अच्छा वातावरण है। बड़ी संख्या में युवा बाहर जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि यहाँ कोई बेरोजगार नहीं है। 170 लोग स्थायी और 319 लोग अस्थायी रोजगार से जुड़े हैं। खेती अच्छी होने से गाँव समृद्ध है। बस सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की दरकार है।'

वे हमें बताते हैं कि हम लोग पूरे साल नदी के पानी का खास ध्यान रखते हैं। नदी के आसपास खेती करने वाले सभी किसान इस बात का ख्याल करते हैं कि किसी भी वजह से नदी और उसके प्रवाह तंत्र को कोई नुकसान नहीं हो। हम न तो नदी में किसी को कचरा डालने देते हैं और न ही किसी को गन्दा करने देते हैं। इससे हमारे यहाँ नदी के पानी का हम पूरा इस्तेमाल कर पाते हैं। हमने नदी के आसपास शौच जाने वालों को सख्ती से रोका है और इसके लिये गाँव में ही पक्के शौचालय भी बनाए गए हैं। गाँव के किसान रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं करते हैं।

नदी में पानी भरा रहने से गाँव के दूसरे जलस्रोतों और बोरवेल का जलस्तर भी बना रहता है। कई बार कम बारिश के बाद भी हमारे गाँव के जलस्रोत पर्याप्त मात्रा में पानी देते रहते हैं। हम सबने ग्रामसभा में भी प्रस्ताव किया है कि नदी की मेहरबानी तब तक ही बनी रहेगी, जब तक कि हम उसका ख्याल करते रहें।
 

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ स

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