सफाई के नाम पर गंगा का निजीकरण

Submitted by UrbanWater on Tue, 09/13/2016 - 15:50
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नदियों में पानी के जलस्तर को बरकरार रखने के लिये बरसाती मौसम में नदियों के माध्यम से सीधे समुद्र में पहुँचने वाले अतिरिक्त पानी को वैज्ञानिक विधि से कम-से-कम खर्च पर इस तरह संचय करके रखा जा सकता है जिससे एक न तो लोगों को विस्थापित करना पड़े और दूसरे इससे नदियों में आने वाली बाढ़ के खतरों को बहुत हद तक कम किया जा सकता है और गर्मियों में नदियों के जलस्तर को बरकरार रखने के उपयोग में लाया जा सके। गंगा की सफाई के लिये पिछले दो वर्षों में 1958 करोड़ रुपये खर्च किये गए लेकिन इस पवित्र नदी की दशा आज भी वैसी बनी हुई है जैसी मोदी सरकार के गठन से पहले थी।

नरेन्द्र मोदी सरकार गंगा की सफाई को लेकर काफी संवेदनशील है इसके बावजूद मोदी सरकार ने गंगा की सफाई के मामले में कानूनी तौर पर तेजी लाने और इसके लिये दिशा-निर्देश तय किये बगैर ही नमामि गंगे कार्यक्रम के लिये बीस हजार करोड़ की और धनराशि का आवंटन कर गत सात जुलाई को गंगोत्री से पश्चिम बंगाल के गंगा सागर तक गंगा की सफाई के लिये एक साथ 100 स्थानों पर कुल 1500 करोड़ की लागत 231 और नई योजनाओं को भी शुरू कर चुकी है और अब एक तरफ मोदी सरकार गंगा कानून बनाकर नमामि गंगे कार्यक्रम में तेजी लाने और इसके लिये दिशा-निर्देश तय करने के लिये दो समितियों का गठन कर चुकी है और दूसरी तरफ केन्द्रीय मंत्री उमा भारती संसद में दावा कर चुकी हैं कि गंगा की सफाई करके रहेंगे या मर जाएँगे।

लेकिन जिस तरह मोदी सरकार के पिछले दो वर्षों के शासनकाल में गंगा की सफाई के पर अनुमानित तीस अरब रुपए की धनराशि खर्च हो जाने के बावजूद किसी भी तरह के उत्साहजनक परिणाम आये उसको देखते हुए एक गंगा के किनारे आबाद आश्रमों, व्यवसायिक परिसरों, कस्बों, शहरों, नगरों और महानगरों में बहने वाले मल-मूत्र और औद्योगिक कचरे के गन्दे नालों को गंगा में बहाकर ठिकाने लगाने पर रोक लगाए बगैर दूसरे पर्वतीय क्षेत्र में गंगा की सहायक नदियों के सूख रहे प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाए बगैर और तीसरे गंगाजल के दोहन को कम किये बगैर गंगा को न तो निर्मल किया जा सकता है और न अविरल।

बावजूद इसके केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने जिस तरह संसद में वायदा किया है कि उनकी सरकार 2020 तक या तो गंगा निर्मल होगी या मर जाएँगे। संसद में उनके वायदे की गम्भीरता और उनके निहितार्थों को किस आधार पर जाँचा या परखा जाये तो यह आज भी गंगा में आस्था रखने वाले और गंगा पर निर्भर करोड़ों-करोड़ लोगों के लिये उन अनसुलझे सवालों की तरह है जिनका हल मौजूदा तौर-तरीकों से निकलना सम्भव नहीं है।

ऐसा नहीं है कि उमा भारती के द्वारा गंगा की सफाई के मामले में संसद में किया गया पहला वायदा हो बल्कि 2014 के आम चुनाव में वाराणसी में भाजपा ने नारा लगाया था ‘गंगा मैया करे पुकार अबकी बार मोदी सरकार’ इस भावनात्मक नारे के साथ वाराणसी से मोदी जी के चुनाव का शंखनाद किया गया। उस वक्त नरेन्द्र मोदी ने अपने को गंगापुत्र बताते हुए इसकी सफाई के लिये कसम खाई थी। गंगा के नाम पर पहली बार वोट माँगे जा रहे थे लोगों ने गंगा के नाम पर भाजपा को पूरा फायदा दिलाया और मोदी ने भारी अन्तर से चुनाव जीता।

मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही गंगा के प्रति करोड़ों लोगों की भावनाओं और इसकी सफाई के लिये खाई अपनी कसम को पूरा करने के लिये गंगा की सफाई के लिये गंगा को लेकर गहरी आस्था रखने वाली उमा भारती को जल संसाधन, नदी विकास व गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय सौंपकर इस मिशन पर लगाया।

उमा भारती ने भी गंगा की सफाई की जिम्मेवारी मिलते ही ऐलान किया था कि उनकी सरकार गंगा की ऐसी सफाई करेगी जिससे गंगोत्री से निकलने वाले गंगाजल की धारा अविरल बहते हुए गंगा के आखरी पड़ाव बंगाल की खाड़ी तक पहुँचने लगेगी। यही नहीं उमा भारती ने उन्हें गंगा की सफाई की जिम्मेवारी देने वाले नरेन्द्र मोदी को उस वक्त धरती पर दूसरा भागीरथ तक बताया था।

उमा भारती के द्वारा उस वक्त की गई उक्त घोषणा के बाद एक यह बात तो साफ हो चुकी थी कि वह नदियों को कृत्रिम तरीके से बचाने की अपेक्षा प्राकृतिक तरीके से बचाने की सोच रखती हैं।

गंगा में आस्था रखने वाले और गंगा पर निर्भर करोड़ों-करोड़ लोगों सहित गंगा की तरह अन्य नदियों की दुर्दशा देेख चुके लोगों के मन में उमा भारती के द्वारा गंगा की सफाई को लेकर की गई घोषणा के बाद आशा की ऐसी किरण जगी थी जिससे लगने लगा था कि अब वह दिन दूर नहीं है जब न केवल नदियों के अत्यधिक जल के दोहन करने पर रोक लगाई जाएगी बल्कि नदियों के किनारे आबाद आश्रमों, व्यावसायिक परिसरों, कस्बों, शहरों, नगरों और महानगरों में बहने वाले मल-मूत्र और औद्योगिक कचरे के गन्दे नालों को नदियों में बहाकर ठिकाने लगाने पर भी रोक लगाई जाएगी।

लेकिन जिस तरह गंगा की सफाई से सम्बन्धित मंत्रालय का कार्यभार सम्भालने वाली उमा भारती की घोषणा के चन्द रोज बाद केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गंगा डेवलपमेंट प्लान के तहत गंगा के जरीए ट्रांसपोर्ट और टूरिज्म की योजना का खुलासा करते हुए जो घोषणा की थी वह उमा भारती की सोच, संकल्प और योजना के एकदम विपरीत थी।

प्रधानमंत्री की योजना गंगोत्री से निकलने वाले गंगाजल को बंगाल की खाड़ी तक पहुँचाने की बजाय उनकी योजना के तहत पहले चरण में वाराणसी से लेकर कोलकाता में हुगली तक मालवाहक और यात्री नावें चलाई जाएँगी और दूसरे चरण में इस रूट को इलाहाबाद तक बढ़ाने का भी प्लान है।

उमा भारती की घोषणा और नरेन्द्र मोदी के गंगा डेवलपमेंट प्लान के खुलासे के बाद यह बात साफ हो चुकी है कि गंगा की सफाई को लेकर मोदी और उमा भारती की सोच और माॅडल में जमीन आसमान का अन्तर है। जहाँ उमा भारती के माॅडल को गंगा को गंगोत्री से लेकर बंगाल की खाड़ी तक प्राकृतिक रूप से जिन्दा करने की पहल के रूप में देखा जा सकता है वहीं केेन्द्र सरकार के द्वारा नरेन्द्र मोदी के माॅडल के बारे में किये गए खुलासे के बाद जमीनी स्तर पर जारी योजनाओं से लगता है कि वह गंगा को प्राकृतिक रूप से बचाने की बजाय गंगा के किनारे आबाद कस्बों, शहरों और नगरों में बहने वाले गन्दे पानी और औद्योगिक कचरे को छानकर गंगा कर कृत्रिम रूप से जीवित रखना चाहते हैं।

गंगा की सफाई को लेकर केन्द्र सरकार ने जिस मोदी माॅडल का खुलासा किया है उससे लगता है कि मोदी सरकार नदियों का निजीकरण करने जा रही है और इसकी शुरुआत वह गंगा सेे करने जा रही है यही कारण है कि मोदी गंगोत्री से निकलने वाले गंगाजल को कोलकाता तक पहुँचाने की बजाय निजी क्षेत्र के हवाले कर गंगा को पर्यटक केन्द्र और जलमार्ग के रूप में विकसित कर इसमें मालवाहक और यात्री नावें चलवाने की योजना बना चुके हैं।

गंगा की सफाई को लेकर न केवल सम्बन्धित मंत्रालय सम्भाल रही उमा भारती और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के माॅडल में विरोधाभास है बल्कि मोदी सरकार तीस अरब रुपए खर्च कर और बीस हजार करोड़ की धनराशि का आवंटन कर अभी तक गंगा की सफाई को लेकर किसी भी तरह के कायदे कानून भी नहीं बना पाई है। यही कारण है कि गंगा की सफाई का काम जमीनी स्तर पर कम और कागजातों में अधिक हो रहा है।

इसका खुलासा एक तो लखनऊ की 10वीं कक्षा की ऐश्वर्य शर्मा नामक विद्यार्थी ने 9 मई को सूचना के अधिकार के तहत जानकारी माँगी, जिसके जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय से जो खुलासा किया गया है, उससे साफ है कि बहुप्रचारित ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम ज्यादातर कागजों तक सीमित है। यही हाल पिछले 30 वर्षों के दौरान घोषित हुईं अन्य योजनाओं का रहा है और दूसरे मोदी सरकार के द्वारा दो वर्ष से अधिक अवधि के बाद नमामि गंगे कार्यक्रम में तेजी लाने और इसके लिये दिशा-निर्देश बनाने के लिये गंगा कानून का मसौदा तैयार करने के लिये दो समितियों का गठन करने से होता है।

उक्त समितियों में पंडित मदनमोहन मालवीय के पोते सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय जो स्वयं गंगा महासभा के प्रमुख भी हैं और उनके अलावा कानून विभाग के पूर्व सचिव वीके भसीन, आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर एके गोसाई, आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर एन शर्मा, नेशनल क्लीन गंगा मिशन के निदेशक सन्दीप सहित कुछ और सदस्य शामिल हैं। दोनों समितियाँ नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा की सफाई के काम में तेजी लाने और गंगा की सफाई के लिये आवश्यक दिशा-निर्देश तैयार करने के लिये मसौदा तैयार करेंगी।

उक्त समितियों के द्वारा कितनी अवधि तक गंगा कानून का मसौदा तैयार करके सरकार को सौंपा जाता है और सरकार उस मसौदे के अनुसार कब तक कानून बना पाने में सफल हो पाती है यह तो वक्त बताएगा। लेकिन मोदी सरकार का कार्यकाल वर्ष 2019 में पूरा होना तय है ऐसे में केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने संसद में वर्ष 2020 तक गंगा को निर्मल और अविरल करने या मरने का जो वायदा किया है वह उन दोनों वायदों में किस वायदे को पूरा करने में सफल होती हैं यह देखना रोचक होगा।

लेकिन उमा भारती और प्रधानमंत्री दोनों ही माॅडलों को अमलीजामा पहनाने के लिये गंगा के जलस्तर को बरकरार रखना आवश्यक है। लेकिन एक तरफ तापमान में वृद्धि के कारण बर्फ पिघलने से हिमालय का क्षेत्रफल सिमटता जा रहा है और पर्वतीय क्षेत्रों में सत्तर-अस्सी के दशक के बाद से ऐसे प्राकृतिक जलस्रोत सूखते जा रहे जिनका पानी सीधे गंगा में या गंगा की सहायक नदियों के माध्यम से गंगा में बहता था और दूसरी तरफ हमारी आबादी में गुणात्मक वृद्धि और जीवनशैली में आये बदलाव के कारण पानी की खपत बढ़ रही है।

इसलिये नदियों में पानी के जलस्तर को बरकरार रखने के लिये बरसाती मौसम में नदियों के माध्यम से सीधे समुद्र में पहुँचने वाले अतिरिक्त पानी को वैज्ञानिक विधि से कम-से-कम खर्च पर इस तरह संचय करके रखा जा सकता है जिससे एक न तो लोगों को विस्थापित करना पड़े और दूसरे इससे नदियों में आने वाली बाढ़ के खतरों को बहुत हद तक कम किया जा सकता है और गर्मियों में नदियों के जलस्तर को बरकरार रखने के उपयोग में लाया जा सके।

लेकिन कुछ ऐसे कारण हैं जिन पर निगाह डालने के बाद यह एहसास होता है कि मौजूदा केन्द्र सरकार गंगा की सफाई कर गंगाजल और नावों को वाराणसी से लेकर हुगली तक पहुँचाना चाहती है या प्रधानमंत्री बनने से पूर्व गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह गन्दे नाले में तब्दील हो चुकी साबरमति नदी को साफ करने की बजाय अहमदाबाद के मध्य से गुजरने वाली साबरमती नदी पर साढ़े दस किलोमीटर की लम्बाई तक साबरमती रिवरफ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के तहत नर्मदा के जल का तालाब और नदी के दोनों किनारों को संकरा कर समतल जमीन के रूप में विकसित किया और योजना पर सरकारी खजाने से किये गए खर्च की भरपाई के लिये ज्यादातर जमीन को आम जनता की जरूरत के नाम पर सांस्कृतिक, नागरिक संस्थानों, मनोरंजन स्थल, बाजार और होटल बनाने के लिये निजी लोगों को लीज पर दिलवाने या बिकवाने का जो कारनामा कर किया।

उससे लगता है कि मोदी सरकार नदियों का निजीकरण करने जा रही है और इसकी शुरुआत वह गंगा सेे करने जा रही है यही कारण है कि मोदी गंगोत्री से निकलने वाले गंगा जल को कोलकाता तक पहुँचाने की बजाय निजी क्षेत्र के हवाले कर गंगा को पर्यटन केन्द्र और जलमार्ग के रूप में विकसित कर इसमें मालवाहक और यात्री नावें चलवाने की योजना बना चुके हैं।

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.पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम मानने वाले प्रदीप सिंह एक दशक से दिल्ली में रहकर पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों और पत्रिकाओं से जुड़कर काम किया।

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