संविधान, जल नीति और मौजूदा जल संकट

Submitted by RuralWater on Sun, 05/08/2016 - 15:11

.मौजूदा जल संकट की गम्भीरता का अनुमान सुप्रीम कोर्ट की 6 अप्रैल 2016 की उस टिप्पणी से लगाया जा सकता हैं जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से कहा है कि देश के दस राज्य सूखे की मार झेल रहे हैं। पारा 45 डिग्री पर पहुँच रहा है। लोगों के पास पीने का पानी नहीं है। उनकी मदद कीजिए। हालात बताते हैं कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, कर्नाटक, ओड़िशा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, और आन्ध्र प्रदेश अप्रैल माह से ही सूखे का दंश भोग रहे हैं।

महाराष्ट्र के लगभग 20 हजार गाँव सूखे की चपेट में हैं। मराठवाड़ा में हालात इतने खराब हैं कि अस्पताल और जेल तक शिफ्ट करने की नौबत आ चुकी है। सौराष्ट्र इलाके के जलाशयों में केवल दो माह के लिये पानी बचा है। बुन्देलखण्ड में पलायन की स्थिति है। पानी पर पहरा है। पानी की कमी झेल रहे इलाकों में रेल द्वारा पानी पहुँचाने पर विचार हो रहा है।

देश के 70 करोड़ लोग सूखे से प्रभावित है। देश के 91 प्रमुख जलाशयों में केवल 25 प्रतिशत पानी बचा है। आने वाले दिनों में बढ़ती गर्मी और वाष्पीकरण के कारण जलाशयों में बचे पानी का क्या हश्र होगा, कहना बहुत कठिन नहीं है। इसके अलावा, प्रभावित राज्यों में 90 प्रतिशत भूजल का दोहन हो चुका है। प्रभावित राज्यों के संकटग्रस्त इलाकों में बचे 10 प्रतिशत भूजल की मदद से अगले 3 माह लोगों की पेयजल आवश्यकताएँ पूरा करने की चुनौती है।

जिम्मेदार लोग, जल संकट के पीछे अनेक कारण गिनाते हैं। वे कहते हैं, ग्लोबल वार्मिंग का असर है। जंगल कट गए हैं। बरसात का चरित्र बदल गया है। देश के अनेक इलाकों में कम बरसात हुई है। बाँध कम भर रहे हैं। भूजल दोहन अनियंत्रित है।

जागरुकता की कमी के कारण पानी बर्बाद हो रहा है। प्रमुख नदियों को छोड़कर अधिकांश मझोली तथा छोटी नदियाँ मौसमी रह गईं है। स्टापडैम, कुएँ, नलकूप और तालाब साथ नहीं दे रहे हैं। प्रदूषण बढ़ रहा है। कुछ कारण सही लगते हैं तो कुछ छलावा। कुछ तकनीकी खामियों का तो कुछ नीतियों का प्रतिफल।

दुर्भाग्यवश, विभिन्न मंचों पर प्रावधानों और जलनीति की उन खमियों की चर्चा नहीं होती जिन पर चलकर देश संकट के मौजूदा मुकाम पर पहुँचा है। सब जानते हैं, योजनाओं का रोडमैप संविधान के दायरे और राष्ट्रीय नीति के प्रावधानों के अनुसार ही बनता है इसलिये उन्हें समझने में ही समझदारी है। इस कड़ी में सबसे पहले चर्चा संविधान की।

संविधान के प्रवेश-56, सूची-I एवं II में पानी के सम्बन्ध में केन्द्र और राज्यों के दायित्वों का निम्नानुसार निर्धारण किया गया है -

सूची-I केन्द्र सूची


56, अन्तरराज्यीय नदियों तथा घाटियों का संचालन और विकास, उस सीमा तक, जहाँ तक कि ऐसा संचालन और विकास, जनहित में संसद द्वारा विधि के अन्तर्गत केन्द्र के नियंत्रण में घोषित किया गया है।

सूची-II राज्य सूची


17, जल, अर्थात जल प्रदाय, सिंचाई और नहरें, निकास और बाँध, जलाशय और जल विद्युत, सूची- I के प्रवेश 56 के अधीन।

संविधान में जल का अर्थ केवल जल प्रदाय, सिंचाई और नहरें, निकास और बाँध, जलाशय और जल विद्युत एवं अन्तरराज्यीय नदियों तथा घाटियों का संचालन और विकास है। संविधान में भूजल, उससे जुड़ी समस्याओं या उनके समाधान का जिक्र नहीं है। संविधान में समाज के पानी पर अधिकारों या भागीदारी या वर्षाजल के समग्र प्रबन्ध का भी उल्लेख नहीं है।

संवैधानिक प्रावधानों के अर्न्तगत बाढ़ के पानी की मदद से बाँध बनाए जाते हैं। बाँध के पानी का लाभ केवल कमाण्ड को मिलता है। कैचमेंट प्यासे रह जाते हैं और सूखे दिनों में उनमें जलसंकट गहराता है। कैचमेंट के संकट को कम करने का कोई रास्ता नहीं है। यह वर्षा आश्रित इलाकों के सालाना जल संकट का मुख्य कारण है।

संविधान में चूँकि भूजल तथा उससे जुड़ी समस्याओं के समाधान का जिक्र नहीं है इसलिये भूजल एवं वर्षाजल के समग्र प्रबन्ध हेतु संविधान की भूमिका बेहद सीमित है। सब को पता है कि पेयजल संकट का असली कारण जल स्रोतों यथा नदियों, तालाबों, कुओं और नलकूपों का असमय सूखना है। वे उस समस्या के इलाज हेतु समानुपातिक रीचार्ज की आवश्यकता से भी परिचित हैं। इसके बावजूद, राज्यों द्वारा समानुपातिक रीचार्ज के लिये प्रयास नहीं करना, चकित और चिन्तित करता है। कई बार डराता भी है। सम्भवतः यह स्थिति संविधानिक प्रावधानों के अभाव और भूजल पर सरकार की मिल्कियत नहीं होने के कारण है। गौरतलब है, बाढ़ पर सरकार का अधिकार है इसीलिये बाँध निर्माण पहली पायदान पर है।

भारत सरकार के पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 में केन्द्रीय भूजल अथॉरिटी और राज्य स्तरीय भूजल अथॉरिटी के गठन का प्रावधान है। अधिनियम में नियमन और विकास के नियंत्रण का उल्लेख है पर वह प्रावधान भूजल स्रोतों की सतत सेवा हेतु भूजल दोहन की सीमा तय कराने की अनदेखी करता है। यह भूजल स्रोतों के संकट का महत्त्वपूर्ण कारण है। प्रावधान का उद्देश्य समस्या के निराकरण के लिये दृष्टिबोध भी होना चाहिए।

भूजल एवं वर्षाजल के समग्र प्रबन्ध हेतु संविधान की भूमिका बेहद सीमित है। सब को पता है कि पेयजल संकट का असली कारण जल स्रोतों यथा नदियों, तालाबों, कुओं और नलकूपों का असमय सूखना है। वे उस समस्या के इलाज हेतु समानुपातिक रीचार्ज की आवश्यकता से भी परिचित हैं। इसके बावजूद, राज्यों द्वारा समानुपातिक रीचार्ज के लिये प्रयास नहीं करना, चकित और चिन्तित करता है। कई बार डराता भी है। सम्भवतः यह स्थिति संविधानिक प्रावधानों के अभाव और भूजल पर सरकार की मिल्कियत नहीं होने के कारण है। संविधान के बाद, पानी पर दूसरा बन्धनकारी दस्तावेज 1987 में देश की जलनीति के रूप में सामने आया। पानी पर सरकार का वह पहला नीतिगत दस्तावेज था। इस दस्तावेज के लागू होने के बाद, सन 2002 में दूसरा और सन 2012 में केन्द्र सरकार ने जलनीति पर तीसरा दस्तावेज जारी किया।

राष्ट्रीय जलनीति 2012 के पैरा 1.2 के अनुसार जल परिदृश्य की चुनौतियाँ मुख्यतः बढ़ती माँग, उपलब्धता में अन्तर, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ, स्वच्छ जल की कमी तथा असमान वितरण, भूजल पर समाज का स्वामित्व, परियोजनाओं का विखण्डित क्रियान्वयन, क्षेत्रीय एवं अन्तरराज्यीय जल विवाद, आधा-अधूरा रखरखाव, अतिक्रमण, जागरुकता में कमी के कारण जल की बर्बादी एवं अकुशल उपयोग, अप्रशिक्षित अमला, समग्र दृष्टिबोध का अभाव तथा जनसहभागिता की कमी है।

क्या उपरोक्त खामियाँ, प्रावधानों के आधे-अधूरे होने तथा बिना सही दृष्टिबोध के चलाई योजनाओं के क्रियान्वयन का प्रतिफल है? मौजूदा समस्याओं के चलते इस सवाल पर बहस होना चाहिए और उसका उत्तर खोजा जाना चाहिए।

संविधान के आर्टिकल 21 का सम्बन्ध जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से है। आर्टिकल में कहता है कि किसी भी व्यक्ति को जीवन के अधिकार तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से उस समय तक वंचित नहीं किया जा सकता जब तक ऐसा करना कानूनन आवश्यक नहीं हो।

आर्टिकल 21 ने पानी को मूलभूत अधिकारों की श्रेणी में नहीं रखा है पर उच्चतम न्यायालय की व्याख्या के अनुसार मनुष्यों के जिन्दा रहने के लिये पानी मूलभूत आवश्यकता है। उसे मानव अधिकार की श्रेणी में रखा जा सकता है। आर्टिकल 21 में पर्यावरण की भी व्याख्या की गई है जिसके अनुसार मूलभूत पर्यावरणी घटकों यथा हवा, पानी और मिट्टी, जो जीवन के लिये आवश्यक हैं, को जोखिम में डालने का अर्थ है जीवन को जोखिम में डालना।

जल (रोकथाम और प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम में पानी की समग्र सतत स्वच्छता को हासिल करने का उल्लेख है। अधिनियम में जल प्रदूषण की रोकथाम के साथ-साथ जल प्रदूषण पर नियंत्रण तथा पानी की शुद्धता की बहाली एवं बहाल शुद्धता को बनाए रखना अपेक्षित है। क्या जल प्रदूषण नियंत्रण तथा पानी की शुद्धता सम्बन्धी हकीकत, निर्धारित मानकों की कसौटी पर पूरी तरह खरी उतर रही है?

संवैधानिक प्रावधान और राष्ट्रीय जल नीति, हकीकत में पानी सम्बन्धी दृष्टिबोध, सामाजिक सरोकारों को मान्यता देते कल्याणकारी राज्य से समाज की अपेक्षाओं का पारदर्शी आईना, विभाग की प्रज्ञा का जगमगाता फलक, जल स्वावलम्बन सुनिश्चित कराते कार्यक्रमों का यशस्वी रोडमैप और जीवधारियों के सुरक्षित भविष्य का स्थायी गारंटी कार्ड होना चाहिए।

मौजूदा हालात काफी हद तक प्रावधानों के अनुसार नहीं हैं। लगता है, उचित संवैधानिक प्रावधान और जल स्वराज सुनिश्चित करती जलनीति ही आशा की अन्तिम किरण है। उस लक्ष्य तक कैसे पहुँचे, कैसे संविधान और जलनीति में सार्थक प्रावधान जोडें, कई बार बहुत आसान नहीं लगता पर उसके बिना गुजारा भी नहीं है।

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