गोवा, दमण और दीव खनन रियायत (उत्सादन और खनन) पट्टा के रूप में घोषणा) अधिनियम, 1987 (Declaration of Goa, Daman and Diu mining concessions (excavation and mining) as lease) Act, 1987)

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(1987 का अधिनियम संख्यांक 16)


{23 मई, 1987}


गोवा, दमण और दीव संघ राज्य क्षेत्र में प्रचलित और पहली तथा दूसरी अनुसूचियों में विनिर्दिष्ट खनन रियायतों के उत्सादन का और ऐसी खानों के, जिनसे ऐसी रियायतें सम्बन्धित हैं, विनियमन की दृष्टि से तथा संघ के नियंत्रणाधीन खनिजों के विकास के लिये, ऐसी खनन रियायतों की, खान और खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957 के अधीन खनन पट्टों के रूप में घोषणा का और उनसे सम्बन्धित या उनके आनुषंगिक विषयों के लिये उपबन्ध करने के लिये अधिनियम

भूतपूर्व पुर्तगाली सरकार द्वारा और गोवा, दमण और दीव की सरकार द्वारा ऐसे, राज्य क्षेत्रों में जो अब गोवा, दमण और दीव के संघ राज्य क्षेत्रों में सम्मिलित हैं, तत्कालीन पोर्तगीज माइनिंग लाॅज (20 सितम्बर, 1906 की डिक्री) के अधीन कुछ खनन रियायतें शाश्वत रूप में दी गई हैं;

और पूर्वोक्त खनन विधियाँ प्रवर्तन में नहीं रह गई हैं और इस सम्बन्ध में सन्देह व्यक्त किये गए हैं कि क्या ऐसी खनन रियायतें खान और खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957 (1957 का 67) के अर्थ के अन्तर्गत खनन पट्टा हैं;

और ऐसी खनन रियायतों का उत्सादन करना और उन्हें, सामूहिक हित साधन के लिये, ऐसी खानों के विनियमन की दृष्टि से और संघ के नियंत्रणाधीन खनिजों का विकास करने के लिये, उस अधिनियम के उपबन्धों को ऐसी खानों पर, जिनसे ऐसी रियायतें सम्बन्धित हैं, लागू करने के प्रयोजन के लिये, पूर्वाेक्त अधिनियम के अधीन खनन पट्टों के रूप में घोषित करना लोकहित में समीचीन है;

भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

अध्याय-1


प्रारम्भिक


1. संक्षिप्त नाम


इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम गोवा, दमण और दीव खनन रियायत (उत्सादन और खनन पट्टा के रूप में घोषणा) अधिनियम 1987 है।

2. परिभाषाएँ


इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) ‘‘नियत दिन’’ से 20 दिसम्बर, 1961 अभिप्रेत है;
(ख) ‘‘आयुक्त’’ से धारा 8 के अधीन नियुक्त सन्दाय-आयुक्त अभिप्रेत है;
(ग) ‘‘रियायत धारक’’ से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे खनन रियायत अनुदत्त की गई है;
(घ) ‘‘अनुमति की तारीख’’ से वह तारीख अभिप्रेत है, जिसको राष्ट्रपति द्वारा इस अधिनियम की अनुमति दी जाती है;
(ङ) ‘‘गोवा, दमण और दीव’’ से गोवा, दमण और दीव संघ राज्य क्षेत्र अभिप्रेत है;
(च) ‘‘खान और खनिज अधिनियम’’ से खान और खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957 (1957 का 67) अभिप्रेत है;
(छ) ‘‘खनन रियायत’’ से पोर्तगीज कोलोनियल माइनिंग लाॅज, 1906 (20 सितम्बर, 1906 की डिक्री) के अधीन अनुदत्त खनन रियायत अभिप्रेत है;
(ज) ‘‘अधिसूचना’’ से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(झ) ‘‘विहित’’ से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ञ) ‘‘विनिर्दिष्ट तारीख’’ से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के प्रयोजन के लिये, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे; तथा इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिये भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी;
(ट) उन शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं है, किन्तु जो खान अधिनियम, 1952 (1952 का 35) या खान और खनिज अधिनियम में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उन अधिनियमों में उनके हैं।

3. अधिनियम का अन्य सभी अधिनियमितियों आदि पर अध्यारोही होना


इस अधिनियम के उपबन्ध किसी अधिनियमिति में (इस अधिनियम से भिन्न) या किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश में या इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में, इस अधिनियम से असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे।

अध्याय 2


खनन रियायतों का उत्सादन और खान और खनिज अधिनियम के अधीन खनन पट्टा के रूप में घोषणा


4. खनन रियायतों का उत्सादन, आदि


(1) पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्रत्येक खनन रियायत, नियत दिन से ही, उत्सादित कर दी गई समझी जाएगी और, उस दिन से खान और खनिज अधिनियम के अधीन अनुदत्त खनन पट्टा समझी जाएगी, तथा उस अधिनियम के उपबन्ध, इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, ऐसे खनन पट्टा को लागू होंगे।

(2) दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्रत्येक खनन रियायत, उक्त अनुसूची के आठवें स्तम्भ में तत्स्थानी प्रविष्टि में विनिर्दिष्ट और उक्त रियायत के अनुदान की तारीख के अगले दिन से ही उत्सादित कर दी गई समझी जाएगी और, उस दिन में, खान और खनिज अधिनियम के अधीन अनुदत्त खनन पट्टा समझी जाएगी, तथा उस अधिनियम के उपबन्ध, इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, ऐसे खनन पट्टा को लागू होंगे।

(3) यदि, अनुमति की तारीख के पश्चात केन्द्रीय सरकार का उसे प्राप्त किसी सूचना के आधार पर अथवा अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि पहली या दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी खनन रियायत या किसी रियायत धारक के नाम और निवास-स्थान की विशिष्टियों के सम्बन्ध में कोई गलती, लोप या गलत वर्णन हो गया है, तो वह, अधिसूचना द्वारा, ऐसी गलती, लोप या गलत वर्णन को ठीक कर सकेगी, और ऐसी अधिसूचना के जारी किये जाने पर, पहली या दूसरी अनुसूची को तद्नुसार संशोधित किया गया समझा जाएगा।

5. खनन रियायतों को खनन पट्टा घोषित करने का साधारण प्रभाव


(1) जहाँ खनन रियायत धारा 4 के अधीन खनन पट्टा समझी गई है वहाँ रियायत धारक, उस धारा में वर्णित दिन से ही उस खान के सम्बन्ध में, जिससे खनन रियायत सम्बन्धित है खान और खनिज अधिनियम के अधीन इस शर्त के अधीन रहते हुए ऐसे खनन पट्टा का धारक बन गया समझा जाएगा कि ऐसे पट्टा की अवधि, इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, अनुमति की तारीख से छह मास की अवधि तक बढ़ जाएगी।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी खनन पट्टा की अवधि की समाप्ति पर, ऐसे पट्टा का, यदि उसके धारक द्वारा ऐसी वांछा की जाती है और उसके द्वारा खान और खनिज अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अनुसार आवेदन किये जाने पर, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, और ऐसी अधिकतम अवधि तक जिस तक, उस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अधीन ऐसे पट्टा को नवीकृत किया जा सकता है, नवीकृत किया जा सकेगा।

अध्याय 3


रकम का सन्दाय


6. रियायत धारकों को रकम का सन्दाय


पहली और दूसरी अनुसूची के दूसरे स्तम्भ में विनिर्दिष्ट प्रत्येक रियायत धारक को, केन्द्रीय सरकार द्वारा, उसके द्वारा धारित खनन रियायत के उत्सादन के लिये और धारा 4 के अधीन उस खनन पट्टा के रूप में घोषित करने के लिये, नकद में और अध्याय 4 में विनिर्दिष्ट रीति से उतनी रकम का सन्दाय किया जाएगा, जो, यथास्थिति, पहली अनुसूची के आठवें स्तम्भ और दूसरी अनुसूची के नौवें स्तम्भ की तत्स्थानी प्रविष्टि में उसके सामने विनिर्दिष्ट रकम के बराबर है।

7. अतिरिक्त रकम का सन्दाय


(1) केन्द्रीय सरकार द्वारा, पहली और दूसरी अनुसूची के दूसरे स्तम्भ में विनिर्दिष्ट प्रत्येक रियायत धारक का, पहली अनुसूची के आठवें स्तम्भ और दूसरी अनुसूची के नौवें स्तम्भ में तत्स्थानी प्रविष्टि में ऐसे रियायत धारक के सामने विनिर्दिष्ट रकम पर चार प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज भी उस अवधि के लिये नकद दिया जाएगा जो अनुमति की तारीख को प्रारम्भ हो और ऐसी रकम का आयुक्त को सन्दाय करने की तारीख को समाप्त हो।

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट रकम, यथास्थिति, पहली अनुसूची या दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट रकम के अतिरिक्त होगी।

अध्याय 4

सन्दाय आयुक्त


8. सन्दाय आयुक्त का नियुक्त किया जाना


(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन रियायत धारकों को सन्देय रकमों के संवितरण के प्रयोजन के लिये, ऐसे व्यक्ति को सन्दाय आयुक्त नियुक्त कर सकेगी, जिसे वह ठीक समझे।

(2) केन्द्रीय सरकार, आयुक्त की सहायता करने के लिये ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी जिन्हें हैं वह ठीक समझे और तब आयुक्त इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिये ऐसे एक या अधिक व्यक्तियों को भी प्राधिकृत कर सकेगा और भिन्न-भिन्न शक्तियों का प्रयोग करने के लिये भिन्न-भिन्न व्यतियों को प्राधिकृत किया जा सकेगा।

(3) कोई व्यक्ति, जो आयुक्त द्वारा प्रयोक्तव्य किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिये आयुक्त द्वारा प्राधिकृत किया गया है, उन शक्तियों का प्रयोग उसी रीति से कर सकेगा और उनका वैसा ही प्रभाव होगा मानो वे उस व्यक्ति को इस अधिनियम द्वारा प्रत्यक्षतः प्रदत्त की गई हैं न कि प्राधिकार के द्वारा।

(4) इस धारा के अधीन नियुक्त आयुक्त और अन्य व्यक्यितों के वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएँगे।

9. केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को सन्दाय


(1) केन्द्रीय सरकार, विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर, रियायत धारक को सन्दाय के लिये धारा 7 में निर्दिष्ट ब्याज की रकम सहित ऐसी धनराशि का नकद सन्दाय करेगी जो पहली और दूसरी अनुसूची में खनन रियायतों के सामने विनिर्दिष्ट धनराशि के बराबर है।

(2) केन्द्रीय सरकार, भारतीय लोक खाते में, आयुक्त के नाम से निक्षेप खाता खोलेगी और आयुक्त इस अधिनियम के अधीन उसे सन्दत्त प्रत्येक रकम, उक्त निक्षेप खाते में जमा करेगा और उक्त निक्षेप खाते को चलाएगा।

(3) आयुक्त, ऐसे प्रत्येक रियायत धारक की बाबत, जिसके सम्बन्ध में इस अधिनियम के अधीन उसे सन्दाय किये गए है, अभिलेख रखेगा।

(4) उपधारा (2) में निर्दिष्ट निक्षेप खाते मद्दे जमा रकम पर उद्भूत होने वाला ब्याज रियायत धारकों के फायदे के लिये प्रवृत्त होगा।

10. दावा, आयुक्त को किया जाना


(1) धारा 6 में निर्दिष्ट रकम के सन्दाय के लिये दावा रखने वाला प्रत्येक रियायत धारक विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर आयुक्त के समक्ष ऐसा दावा करेगाः

परन्तु यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि दावेदार प्रर्याप्त कारण से तीस दिन की उक्त अवधि के भीतर दावा करने से निवारित रहा था तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर दावा ग्रहण कर सकेगा, किन्तु उसके पश्चात नहीं।

(2) आयुक्त एक निश्चित तारीख नियत करेगा जिसको या जिसके पूर्व प्रत्येक दावेदार अपने दावे का सबूत फाइल करेगा।

(3) इस प्रकार नियत तारीख की कम-से-कम चौदह दिन की सूचना अंग्रेजी भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में और ऐसी प्रादेशिक भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में, जो आयुक्त उपयुक्त समझे, विज्ञापन द्वारा दी जाएगी और ऐसी प्रत्येक सूचना में दावेदार से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह विज्ञापन में विनिर्दिष्ट समय के भीतर अपने दावे का सबूत आयुक्त के पास फाइल करे।

(4) प्रत्येक ऐसे दावेदार को, जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट समय के भीतर अपने दावे का सबूत फाइल करने में असफल रहता है, आयुक्त द्वारा किये जाने वाले संवितरण से अपवर्जित कर दिया जाएगा।

(5) आयुक्त, ऐसा अन्वेषण करने के पश्चात जो उसकी राय में आवश्यक है, और रियायत धारक को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात, लिखित आदेश द्वारा, दावे को पूर्णतः या भागतः ग्रहण या अस्वीकार करेगा।

(6) आयुक्त को अपने कृत्यों के निर्वहन से उद्भूत होने वाले सभी विषयों में, जिसके अन्तर्गत वह या वे स्थान हैं जहाँ वह अपनी बैठकें करेगा, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी और इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिये निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियाँ होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अथार्त:-

(क) किसी साक्षी को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज या अन्य तात्त्विक पदार्थ का, जो साक्ष्य के रूप में पेश किये जाने योग्य हो, प्रकटीकरण और पेश किया जाना;
(ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) किन्हीं साक्षियों की परीक्षा के लिये कोई कमीशन निकालना।

(7) आयुक्त के समक्ष कोई अन्वेषण भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और आयुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिये सिविल न्यायालय समझा जाएगा।

(8) कोई दावेदार, जो आयुक्त के विनिश्चय से असन्तुष्ट है, उस विनिश्चय के विरुद्ध अपील, आरम्भिक अधिकारिता वाले उस प्रधान सिविल न्यायालय को कर सकेगा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर सुसंगत खान स्थित है।

11. दावे के सन्दाय पर केन्द्रीय सरकार के दायित्व का समाप्त होना


इस अधिनियम के अधीन दावा स्वीकार करने के पश्चात, ऐसे दावे की बाबत शोध्य रकम आयुक्त ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को सन्दत्त करेगा जिसे या जिन्हें ऐसी रकम शोध्य है और, ऐसा सन्दाय किये जाने पर, ऐसे दावे की बाबत केन्द्रीय सरकार के दायित्व का उन्मोचन हो जाएगा।

12. विवादों का निपटारा किस प्रकार किया जाएगा


धारा 6 या धारा 7 में निर्दिष्ट रकम पूर्णतः या भागतः प्राप्त करने के किसी व्यक्ति के अधिकार के बारे में कोई सन्देह या विवाद की दशा में आयुक्त मामले को विनिश्चय के लिये न्यायालय को निर्देशित करेगा और न्यायालय के विनिश्चय के अनुसार संवितरित करेगा।

स्पष्टीकरण


इस धारा में, खनन रियायत के सम्बन्ध में, ‘‘न्यायालय’’ से आरम्भिक अधिकारिता वाला वह प्रधान सिविल न्यायालय अभिप्रेत है जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर ऐसी रियायत से सम्बन्धित खान स्थित है।

13. असंवितरित या अदावाकृत रकम का साधारण राजस्व खाते में जमा किया जाना


आयुक्त उसे सन्दत्त किसी धन को, जो ऐसे सन्दाय के पश्चात तीन वर्ष की अवधि तक असंवितरित या अदावाकृत रहता है, केेन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते में अन्तरित करेगा; किन्तु ऐसे सन्दाय के लिये हकदार रियायत धारक अन्तरित किये गए ऐसे किसी धन के लिये दावा केन्द्रीय सरकार को कर सकेगा और उसके सम्बन्ध में कार्यवाही इस प्रकार की जाएगी मानो ऐसा अन्तरण नहीं किया गया हो और दावे के सन्दाय के आदेश को यदि कोई है, राजस्व के प्रतिदाय के लिये आदेश की तरह माना जाएगा।

अध्याय 5


प्रकीर्ण


15. शास्तियाँ


कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा।

16. कम्पनियों द्वारा अपराध


(1) जहाँ इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहाँ ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किये जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिये उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था, साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएँगे तथा तद्नुसार उनके विरुद्ध कार्रवाई की जा सकेगी और उन्हें दण्डित किया जा सकेगाः

परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का किया जाना रोकने के लिये सब सम्यक तत्परता बरती थी।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है या अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहाँ ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार उसके विरुद्ध कार्यवाही की जा सकेगी और उसे दण्डित किया जा सकेगा।

स्पष्टीकरण


इस धारा के प्रयोजनों के लिये,-

(क) ‘‘कम्पनी’’ से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत कोई फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और
(ख) किसी फर्म के सम्बन्ध में, ‘‘निदेशक’’ से उस फर्म का कोई भागीदार अभिप्रेत है।

17. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई का संरक्षण


(1) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिये आशयित किसी बात के लिये कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार या उस सरकार के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी, या उस सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के विरुद्ध, नहीं होगी

(2) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिये आशयित किसी बात से कारित या कारित होने के लिये सम्भाव्य किसी नुकसान के लिये कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार या उस सरकार के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी या उस सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी।

18. शक्तियों का प्रत्यायोजन


(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन प्रयोग की जा सकने वाली, धारा 20 और धारा 21 द्वारा पदत्त शक्तियों से भिन्न, सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा भी किया जा सकेगा जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किये जाएँ।

(2) जब भी उपधारा (1) के अधीन शक्ति का कोई प्रत्यायोजन किया जाये, तब वह व्यक्ति जिसको ऐसी शक्तियाँ प्रत्यायोजित की जाएँ, केन्द्रीय सरकार के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करेगा।

19. राज्य की नीति के सम्बन्ध में घोषणा


यह घोषित किया जाता है कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 39 के खण्ड (ख) और खण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट तत्वों को सुनिश्चित करने के लिये राज्य की नीति को प्रभावी करने के लिये है।

स्पष्टीकरण


इस धारा में, ‘राज्य’ का वही अर्थ है जो संविधान के अनुच्छेद 12 में है।

20. नियम बनाने की शक्ति


(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिये नियम बना सकेगी।

(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिये रखा जाएगा। यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिये सहमत हो जाएँ तो तत्पश्चात वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएँ कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात वह निष्प्रभाव हो जाएगा। किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

21. कठिनाइयाँ दूर करने की शक्ति


यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, कठिनाई को दूर कर सकेगीः

परन्तु ऐसा कोई आदेश अनुमति की तारीख से दो वर्ष की अवधि के अवसान के पश्चात नहीं किया जाएगा।

22.विधिमान्यकरण


(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश में किसी बात के होते हुए भी,-

(क) प्रत्येक रियायत धारक उस तारीख से ही जब उसकी खनन रियायत को खनन पट्टा घोषित किया गया है, प्रारम्भ होने वाली और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन उसके पट्टा की अवधि के अवसान की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि के लिये (जिसे इस धारा में इसके पश्चात उक्त अवधि कहा गया है), खान और खनिज अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अधीन, ऐसे पट्टा की बाबत शोध्य अनिवार्य भाटक या स्वामिस्व का सन्दाय करने का दायी होगा और ऐसी रकम, इस धारा में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, उससे वसूल की जाने योग्य होगी;
(ख) रियायत धारक द्वारा, उक्त अवधि के लिये, नियत कर या आनुपातिक कर, या दोनों, के रूप में अथवा अभ्यापत्ति सहित स्वामिस्व के रूप में सन्दत्त किसी रकम को, विधि के अनुसार सन्दत्त अनिवार्य भाटक या स्वामिस्व समझा जाएगा और ऐसी रकम लौटाए जाने के दायित्व के अधीन नहीं होगी; और
(ग) खण्ड (ख) के अधीन किसी रियायत धारक द्वारा सन्दत्त ऐसी सब रकमों का खण्ड (क) के अधीन उसके द्वारा सन्देय अनिवार्य भाटक या स्वामिस्व का अवधारण करने में उसे सम्यक मुजरा दिया जाएगा,

मानो यह अधिनियम और खान और खनिज अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियम, सब तात्त्विक समयों पर प्रवृत्त थे और तद्नुसार इस आधार पर, कि रियायत धारक द्वारा धारित खनन रियायत खनन पट्टा नहीं है,:-

(i) खण्ड (ख) के अधीन किसी रियायत धारक द्वारा सन्दत्त किन्हीं रकमों के प्रतिदाय के लिये सरकार या किसी व्यक्ति या प्राधिकारी के विरुद्ध किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकरण में कोई वाद या अन्य कार्यवाही संस्थित नहीं की जाएगी, चलाई नहीं जाएगी या जारी नहीं रखी जाएगी; और

(ii) कोई भी न्यायालय इस प्रकार सन्दत्त किन्हीं रकमों के प्रतिदाय का निदेश देने वाली कोई डिक्री या आदेश, प्रवर्तित नहीं करेगा।

(2) शंकाओं को दूर करने के लिये यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (1) की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी व्यक्ति को,:-

(क) खान और खनिज अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अनुसार, उक्त अवधि के लिये किसी अनिवार्य भाटक या स्वामिस्व के निर्धारण को प्रश्नगत करने से; या
(ख) खान और खनिज अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उससे शोध्य रकम से अधिक, उसके द्वारा सन्दत्त किसी अनिवार्य भाटक या स्वामिस्व के प्रतिदाय का दावा करने से निवारित करती है।

नियत दिन से ही उत्सादित और खनन पट्टों के रूप में घोषित की गई खनन रियायतों के ब्यौरे

नियत दिन से ही उत्सादित और खनन पट्टों के रूप में घोषित की गई खनन रियायतों के ब्यौरे

नियत दिन के पश्चात्वर्ती तारीख से ही उत्सादित और खनन पट्टों के रूप में घोषित की गई खनन रियायतों के ब्यौरे

सन्दर्भ


1. 2001 के अधिनियम सं० 31 की धारा 2 और पहली अनुसूची द्वारा निरसित।

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