मल से मालामाल करने वाले शख्स थे ध्रुवज्योति घोष

Submitted by RuralWater on Tue, 03/13/2018 - 13:54
Printer Friendly, PDF & Email
Source
डाउन टू अर्थ, मार्च 2018

डॉ. ध्रुवज्योति घोषडॉ. ध्रुवज्योति घोष कोलकाता रोजाना लगभग 75 करोड़ लीटर सीवेज निकालता है। किसानों और मछुआरों के जलस्रोतों में यह मलजल पहुँचता है। पूर्वी कोलकाता वेटलैंड (ईकेडब्ल्यू) परिसर रामसर साइट का हिस्सा है, जहाँ सीवेज की सूर्य के प्रकाश, सूक्ष्मजीव और ऑक्सीजन द्वारा व्यवस्थित रूप से सफाई की जाती है। इससे यह पोषक तत्वों का पावरहाउस बन जाता है जो प्रतिदिन प्रतिदिन 150 टन सब्जियाँ, प्रतिवर्ष 10,500 टन मछली पैदा करता है और 50,000 लोगों को सीधे आजीविका देता है।

इसे सम्भव किया है डॉक्टर ध्रुवज्योति घोष ने, जिन्होंने 16 फरवरी को दुनिया को अलविदा कह दिया। वह झीलों पर दुनिया का ध्यान केन्द्रित कराने के लिये जिम्मेदार थे। एक जवान आदमी के रूप में एक जल निकासी इंजीनियर, घोष ने शहर के रहने वाले लोगों को इन झीलों के महत्त्व का एहसास कराया। इन झीलों पर आसन्न खतरों को महसूस करते हुए एक सार्वजनिक गैर सरकारी संगठन ने घोष के साथ एक कानूनी याचिका दायर की। इसके कारण कोलकाता हाई कोर्ट ने 1992 में ऐतिहासिक फैसला दिया।

पूर्वी कोलकाता के पूरे 12,500 एकड़ भूजल को पवित्र बना दिया और इसे बाद में जलीय भूमि के बुद्धिमान-उपयोग के लिये एक रामसर साइट के रूप में घोषित किया गया। ईकेडब्ल्यू ने दुनिया भर में प्रसिद्धि प्राप्त होने के बाद से, यह एक आदर्श प्रणाली के रूप में पहचाना गया है जो टिकाऊ रहने का वर्णन करता है। ऐसे समय में जब धन, भ्रष्टाचार और शासन लगभग समानार्थी हैं और भूमि हथियाना आसान और समर्थन वाला अभ्यास है, समाज को पहले से कहीं ज्यादा ईकेडब्ल्यू के मूल्य का एहसास करने की जरूरत है।

घोष का ज्यादातर योगदान झीलों के लिये है, लेकिन आर्द्रभूमि को वन्यजीव के लिये नजरअन्दाज करने के लिये उनकी अक्सर आलोचना की जाती थी। ईकेडब्ल्यू के बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग के लिये एक आर्द्रभूमि के रूप में बढ़ावा देने के उद्देश्य से, घोष ने पर्यावरण सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण वन्य जीवों के संरक्षण में झीलों के महत्त्व को अनजाने में अनदेखा कर दिया था। इसके बजाय आर्द्रभूमि को मानव उपयोग के लिये अधिक मुखर किया गया था, जो कि गहन जलीय कृषि थी।

उन्होंने अक्सर आर्द्रभूमि में भारी धातु विषाक्तता और मछली और सब्जियों में दूषित पदार्थों के संचय को इंगित किया था। उन्होंने कहा था कि सीवेज दूषित पानी चिन्ता का कारण नहीं था, लेकिन झीलों के किनारे लगे चमड़े के कारखानों से कैंसर फैलाने वाले अपराधी हैं। कैसे भी वे आर्द्र भूमि को बचाने के लिये बाध्य थे और उसी समय योजनाएँ बनाई गई थीं जो आर्द्रभूमि को समाप्त करने के लिये तैयार की जा रही थीं।

लेखक


टिआसा आद्या
(लेखिका वन्यजीव शोधार्थी, कार्यकर्ता और आईयूसीएन की सदस्य हैं)

Add new comment

This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.

1 + 6 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

नया ताजा