सूखा और आजीविका संकट

Submitted by RuralWater on Tue, 06/28/2016 - 13:08
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‘बिन पानी सब सून’ पुस्तिका से साभार, 5 जून 2016

बुन्देलखण्ड में अकाल और सूखा राहत के लिये लागू योजनाओं और पहले से चल रही विकास योजनाओं के बावजूद अकाल की स्थिति उत्पन्न होना और उसका लगातार कायम रहना इस बात का पुख्ता सबूत है। प्रस्तुत अध्ययन में हमने पाया कि मनरेगा जैसी योजना भी प्रावधान के बावजूद पूरे 100 दिनों का रोजगार नहीं दे पा रही है, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार की तलाश में बाहर जाना पड़ रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट की 20 1 4 की रिपार्ट के अनुसार बुन्देलखण्ड क्षेत्र में रोजगार का संकट इतना गम्भीर है कि यहाँ हर रोज 6000 लोग पलायन कर रहे हैं।

बुन्देलखण्ड में सूखा और आजीविका संकट आपस में जुड़े हुए हैं। सूखे के कारण यहाँ आजीविका संकट पैदा हो गया है,वहीं आजीविका संकट के कारण सूखे की स्थिति कायम है। आमतौर पर यह माना जाता है कि सूखे का एक बड़ा कारण अवर्षा या प्राकृतिक प्रकोप है, जिसका सीधा असर खेती पर पड़ता है।

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में पिछले कई सालों से यही स्थिति कायम है। यहाँ पिछले 30 सालों में 18 बार सूखा पड़ चुका है। इसके पीछे मुख्य कारण क्लाईमेट चेंज है, जिसके कारण उत्पन्न हुई तबाही ने यहाँ के 21 मिलियन गरीब-वंचित लोगों को प्रभावित किया है। केन्द्र सरकार के अनुमान के अनुसार वर्ण 2015 में यहाँ औसत बारिश के मुकाबले 44.3 प्रतिशत बारिश हुई है, जिससे 90 प्रतिशत फसल बर्बाद हो गई।

मध्य प्रदेश में शामिल बुन्देलखण्ड क्षेत्र के पाँच जिलों पर नजर डालें तो वर्ण 2015 में औसत से सबसे कम वर्षा दमोह जिले में हुई। यहाँ औसत बारिश 1246 मिमी. की तुलना में सिर्फ 495 मि.मी. बारिश ही हुई। टीकमगढ़ जिले की स्थिति भी कुछ ही तरह की है, जहाँ औसत बारिश के तुलना में 45 प्रतिशत बारिश हुई। इनके साथ ही दतिया जिले को छोड़कर किसी भी जिले में औसत से आधी बारिश ही बीते मानसून में हुई।

बारिश के उपरोक्त आँकड़ों के साथ ही यह समझने की भी जरूरत है कि अकाल का एकमात्र कारण अवर्षा नहीं है, बल्कि संकट को रोकने में नाकाम रहने वाली व्यवस्था भी अकाल का एक कारक है।

बुन्देलखण्ड में अकाल और सूखा राहत के लिये लागू योजनाओं और पहले से चल रही विकास योजनाओं के बावजूद अकाल की स्थिति उत्पन्न होना और उसका लगातार कायम रहना इस बात का पुख्ता सबूत है। प्रस्तुत अध्ययन में हमने पाया कि मनरेगा जैसी योजना भी प्रावधान के बावजूद पूरे 100 दिनों का रोजगार नहीं दे पा रही है, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार की तलाश में बाहर जाना पड़ रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट की 20 1 4 की रिपार्ट के अनुसार बुन्देलखण्ड क्षेत्र में रोजगार का संकट इतना गम्भीर है कि यहाँ हर रोज 6000 लोग पलायन कर रहे हैं।

खेती का घटता रकबा


बुन्देलखण्ड की खेती पर सिर्फ इस वर्ष के सूखे का असर ही नहीं है, बल्कि यह पिछले कई सालों से पड़ रहे सूखे और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के अभाव के कारण खेती सिकुड़ती जा रही का असर/प्रभाव है। राजस्व विभाग के आँकडों के अनुसार वर्ण 2005-06 में 19607592 हेक्टेयर जमीन पर खेती होती थी। जिसमें 5878311 हेक्टेयर भूमि सिचिंत थी। यानि कुल खेती योग्य जमीन का 30 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचित था।

बुन्देलखण्ड की इसी बदहाली को देखकर तब की केन्द्र सरकार ने पैकेज के तहत भारी-भरकम राशि आवंटित की। दो चरणों में खर्च के बाद अनुमान था कि इससे 296140 हेक्टेयर जमीन को सींचा जाएगा। पैकेज के तहत खेतों में कुआँ एवं 146 छोटी सिंचाई परियोजनाओं को तैयार किया गया। जिन पर अरबों रुपए खर्च हो गए। माना तो यही जा रहा था कि इससे किसानों के दुख-दर्द समाप्त हो जाएँगे। सूखे के समय यह सिंचाई योजनाएँ वरदान साबित होंगी। हकीकत कुछ और ही नजर आ रही है।

सरकारी दावों के अनुसार सिंचाई का रकबा बढ़ा है। दूसरी ओर खेती का रकबा कम होता जा रहा है। यह जमीनी सच सरकार के आँकड़े ही गवाही दे रहे हैं। हासिल आँकड़ों के अनुसार 2015-16 में रबी फसल का कुल लक्ष्य 1604 हजार हेक्टेयर का था पर 1041.52 हेक्टेयर में ही बुआई हो सकी। सीधा अर्थ कि लक्ष्य से 35 प्रतिशत कम बुआई का आँकड़ा रहा।

इसी तरह 2013-14 में 1664.40 लक्ष्य था तो 1633.01 हजार हेक्टेयर में ही बुआई हुई। वर्ष 2014-15 में भी कुछ यही हाल रहे जब 1657 हजार हेक्टेयर के बदले मात्र 1483.19 हजार हेक्टेयर में किसानों ने फसल की बुआई की थी। बुन्देलखण्ड के सागर सम्भाग के पाँच जिलों छतरपुर, पन्ना, दमोह, टीकमगढ़ और दमोह में अमूमन गेहूँ की फसल किसानों की पहली पसन्द होती है। अब गेहूँ के उत्पादन और बुआई के आँकड़ों पर नजर डाली जाये तो यह चिन्ता से कम नहीं है।

वर्ष 2011-12 में 695.80 हजार हेक्टेयर में गेहूँ की बुआई हुई थी, वहीं 2012-13 में 701.40, 2013-14 में 746.20, 2014-15 में 673.56 एवं 2015-16 में मात्र 347.70 हजार हेक्टेयर में ही गेहूँ बोया गया। आँकड़े साफ दर्शाते हैं कि स्वयं अन्नदाता के पास ही रोटी खाने के लाले पड़ते जा रहे हैं। यह इस आर भी इंगित करता है कि खेती का रकबा दिनों-दिन कम होता जा रहा है।

कृषि विभाग सागर से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार सागर सम्भाग के पाँचों जिलों में सागर में 578.38, दमोह में 315.49, पन्ना में 245.36, टीकमगढ़ में 256.71 और छतरपुर में 407.39 हजार हेक्टेयर भूमि शुद्ध काश्त का रकबा है। कृषि संगणना 2000-01 के अनुसार सागर में 255098, दमोह में 159018, पन्ना में 157045, टीकमगढ़ में 173159 एवं छतरपुर में किसानों की संख्या 235237 है। आँकड़ों के अनुसार काश्त रकबे और बुआई के रकबे में अन्य फसलों का 20 प्रतिशत हेक्टेयर और जोड़ भी दिया जाये तो अधिकांश भूमि पर खेती न होना इस बात का संकेत है कि किसान अब खेती से तंग होता जा रहा है। किसान की बेरुखी के पीछे कई कारण है।

आज किसान को लागत के हिसाब से फसलों की कीमतें नहीं मिल पा रही। इस कारण वह कर्ज में डूबता जा रहा है। खेत की जुताई-बुआई से लेकर खाद-बीज की जुगाड़ में किसान टूट जाता है।

कितनी क्षति और कितनी पूर्ति


राज्य सरकार के अनुमान के अनुसार अक्टूबर 2015 में मध्य प्रदेश में 4.4 मिलियन हेक्टेयर की 13846 करोड़ रुपए की खरीफ फसल का नुकसान हुआ। केन्द्रीय दल के मध्य प्रदेश दौरे के बाद दिसम्बर 2015 में मध्य प्रदेश के लिये नेशनल डिजास्टर रीलिफ फंड (NDRF) से 2033 करोड़ रुपए स्वीकृत किये गए। इसके बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने बुन्देलखण्ड दौरे के दौरान 15000 रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से मुआवजा देने का ऐलान किया था। इस सन्दर्भ में यह देखने की जरूरत है कि क्या बुन्देलखण्ड क्षेत्र में वितरित मुआवजा राशि सरकार की घोषणा के अनुरूप प्राप्त हुई है?

प्रदेश में सूखा घोषित होने के बाद यहाँ सरकार द्वारा मुआवजा हेतु सर्वे की प्रक्रिया प्रारम्भ की गई। किन्तु ज्यादातर गाँवों में खरीफ की फसलों के मुआवजे का वितरण फरवरी 2016 में किया गया। मध्य प्रदेश में शामिल बुन्देलखण्ड के जिलों में खरीफ की फसल 76482 एकड़ जमीन पर बोई गई थी, जबकि रबी की फसल बुआई 7 से 10 हजार एकड़ में की गई थी, जो पानी के अभाव में सूख गई। बुन्देलखण्ड में दतिया को छोड़कर बाकी जिलों में 80 प्रतिशत से अधिक फसल नष्ट हो गई।

सूखे के कारण फसल नष्ट होने से किसानों पर कर्ज का भार बढ़ गया। कर्ज लेकर बोई गई फसल जब कोई उपज नहीं दे पाई तो पुराने कर्ज पर तो ब्याज बढ़ता गया, वहीं यह सवाल भी खड़ा हो गया कि अगले साल खेती के लिये पैसा कहाँ से आएगा।बुन्देलखण्ड में स्वराज अभियान द्वारा किये गए सर्वे के अनुसार बुन्देलखण्ड में 62 प्रतिशत किसानों पर बैंकों का कर्ज है, वहीं 72 प्रतिशत किसानों पर साहूकारों का कर्ज है। इस साहूकारी कर्ज का बोझ करीब 60 प्रतिशत वार्षिक ब्याज (5 रुपए सैकड़ा प्रतिमाह) की दर से बढ़ता जा रहा है। अकाल की स्थिति और सरकारी राहत एवं योजनाओं के क्रियान्चयन की स्थिति के सन्दर्भ में प्रस्तुत अध्ययन से पता चलता है कि छतरपुर, सागर एवं टीकमगढ़ जिलों में खरीफ और रबी दोनों की फसलें बड़े पैमाने पर बर्बाद हो गई।

अध्ययन से सामने आये तथ्यों के अनुसार सर्वेक्षित गाँवों में कुल 22317 एकड़ कृषि भूमि में से 18313 एकड़ में खरीफ और 7519 एकड़ में रबी की फसल बोई गई थी। यानी कुल कृषि रकबा में से खरीफ में 18 प्रतिशत भूमि पर खेती नहीं की गई, वहीं रबी के मौसम में कुल रकबा से 66 प्रतिशत पर खेती नहीं हुई। स्पष्ट है कि रबी के मौसम में उन्हीं खेतों में खेती सम्भव है, जहाँ सिंचाई की सुविधा है।

ढाई बीघा जमीन का


वर्ष 2015 में उपरोक्त रकबे में हुई खेती अवर्षा से बुरी तरह प्रभावित हुई और ज्यादातर गाँवों में 50 से 100 प्रतिशत तक फसल बर्बाद होने के तथ्य सामने आते हैं। प्रस्तुत सर्वेक्षण के अनुसार 17 प्रतिशत गाँवों में 50 प्रतिशत तक खरीफ की फसल बर्बाद हुई, जबकि 32 प्रतिशत गाँवों में 50 से 75 प्रतिशत खरीफ फसल बर्बाद हो गई। 17 प्रतिशत गाँवों में 76 से 90 प्रतिशत फसल खराब हो गई। जबकि सबसे ज्यादा 34 प्रतिशत गाँवों में पूरी-की-पूरी यानी 100 प्रतिशत फसल बर्बाद हो गई।

फसलों की क्षति के सन्दर्भ में प्रस्तुत अध्ययन के अन्तर्गत यह जानने का प्रयास किया गया कि सरकार द्वारा घोषित राहत राशि सम्बन्धित किसानों को प्राप्त हुई या नहीं। और जिन्हें प्राप्त हुई है वह वास्तव में सरकार द्वारा घोषित मानकों और किसानों को हुई क्षति के अनुसार है या नहीं? इस सन्दर्भ में सर्वेक्षित गाँवों में चर्चा करने पर हम पाते हैं कि 24 प्रतिशत किसानों को अब तक कोई मुआवजा राशि प्राप्त नहीं हुई। इन गाँवों में कुल 5252 किसानों में से 4012 किसानों को मुआवजा प्राप्त हुआ, जबकि 1240 किसान मुआवजे से वंचित रहे। इन किसानों द्वारा मुआवजे की माँग हेतु तहसीलदार से लेकर कलेक्टर तक आवेदन प्रस्तुत किये गए तथा मुख्यमंत्री हेल्प लाइन में भी शिकायत दर्ज करवाई गई। किसानों का कहना है कि इस सबके बावजूद वे अब तक मुआवजे से वंचित ही हैं।

किसानों को प्राप्त मुआवजे की राशि पर चर्चा करने पर हम पाते हैं कि उन्हें 1250 रुपए प्रति हेक्टेयर (500 रुपए प्रति एकड़) से लेकर 2500 रुपए प्रति एकड़ तक का मुआवजा प्राप्त हुआ, जो सरकारी घोषणा से बेहद कम है। सर्वे के दौरान 16 प्रतिशत किसान ऐसे पाये गए, जिन्हें सिर्फ 500 रुपए प्रति एकड़ मुआवजा प्राप्त हुआ, जबकि सर्वाधिक 53 प्रतिशत किसानों को 501 से 1000 रुपए मुआवजा मिला। 24 प्रतिशत को 1001 से 2000 रुपए और 7 प्रतिशत को 2001 से 2500 रूपए प्रति एकड़ मुआवजा दिया गया।

इस सन्दर्भ में हम सिर्फ 7 प्रतिशत किसानों को ही सरकारी घोषणा से थोड़ा नजदीक पाते हैं, बाकी 93 प्रतिशत किसानों को सरकारी घोषणा से कम मुआवजा प्राप्त हुआ।

साढ़े सात सौ मुआवजा
सूखाग्रस्त किसानों के लिये मुआवजे की सरकारी घोषणा सुनने में चाहे कितनी ही अच्छी क्यों न लगे, लेकिन हकीकत कुछ और ही होती है। यह बात टीकमगढ़ जिले बो निवाड़ी ब्लाक के पुछीकरगुवाँ गाँव के लालाराम की कहानी से समझ सकते हैं।

करीब चार हजार की जनसंख्या बाले इस गाँव में दलित परिवार के छह भाई-बहनों- हेमराज, मोतीलाल, कपूरे, लालाराम, रमेश और शान्तिबाई अहिरवार के पास संयुक्त रूप से ढाई बीघा जमीन है। खरीफ की फसल के तौर पर उन्होंने उड़द की फसल लगाई थी जो कि कम बारिश होने के कारण पूरी तरह सूख गई। उन्हें बुआई और बीज का खर्च भी नहीं मिल सका। यही हाल गाँव के ज्यादातर किसानों का हुआ। पानी न होने के कारण रबी की फसल की बुआई भी न हो सकी।

सरकार द्वारा घोषित मुआवजा देने के लिये किसानों की खरीफ की फसल के नुकसान का सर्वे पटवारियों द्वारा किया गया। बताया जाता है कि सर्वे सिर्फ खानापूर्ति के लिये किया गया। पटवारी ने न तो खेतों में जाकर फसल देखी और न ही किसी से कोई जानकारी ली। जब मुआवजा मिला तो लालाराम और उसके दो भाइयों मोतीलाल और रमेश को सिर्फ ढाई-ढाई सौ रुपए ही मिले।अन्य दो भाई और बहन को तो यह भी प्राप्त नहीं हुआ। इस तरह ढाई बीघा जमीन का 750 रुपए ही मुआवजा मिला। जबकि उन्हें अपना बैंक खाता खुलवाने के लिये 6000 रुपए जमा करवाने पड़े।


मुआवजा से वंचित बटाईदार
कई खेतीहर परिवार अपनी आजीविका के लिये बटाईदारी पर निर्भर है। बुन्देलखण्ड में अकाल और सूखे का ज्यादा असर अन्य किसानों की तरह ही बटाईदारों पर भी पड़ा। किन्तु पटवारी रिकॉर्ड ने बटाईदारी प्रथा दर्ज नहीं होने और मुआवजे के अन्तर्गत बटाईदारों के नाम पर मुआवजा देने का प्रावधान नहीं होने से कई बटाईदार किसान मुआवजे से वंचित रहे। अध्ययन से सामने आया तथ्यों के अनुसार दस प्रतिशत बटाईदारों को उनके खेत मालिक ने मुआवजे की राशि दी।

दो प्रतिशत बटाईदारों को खेत मालिक द्वारा उन्हें प्राप्त मुआवजे का आधा हिस्सा दिया गया। जबकि 88 प्रतिशत बटाईदारों को कोई उन्हें हुए नुकसान का कोई मुआवजा नहीं मिला। स्पष्ट है कि बटाईदारों को खेती करने की लागत के लिये ऊँची ब्याज दर पर साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता है। क्योंकि जमीन उनके नाम का नहीं होने से वे बैंक द्वारा उन्हें ऋण नहीं दिया जाता। इस दशा में बटाईदारों को नुकसान उठाना पड़ता है। सूखे और अकाल में फसल नष्ट होने तथा उसका मुआवजा नहीं मिलने से बुन्देलखण्ड के बटाईदारों के सामने आजीविका, रोजगार और भरण-पोषण का संकट पैदा हो गया है।

किसान आत्महत्या का डरावना सच
टीकमगढ़ जिले के मोहनगढ़ थाना के ग्राम खाकरौन निवासी 26 वर्षीय लक्ष्मण पाल कर्ज न चुका पाने के कारण इस तरह विचलित हुआ कि 20 मई को उसने फाँसी पर झूलकर आत्महत्या कर ली। मृतक के भाई गोविन्ददास का कहना है कि लक्ष्मण करीब डेढ़ लाख रुपए के कर्ज में दबा हुआ था। पिता भागीरथ की बीमारी और पारिवारिक कार्यों के लिये यह कर्ज लिया था। उम्मीदें डेढ़ एकड़ फसल पर थी जो सूखे की भेंट चढ़ गई। साहूकारों का कर्ज दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था। इस कारण वह दिल्ली मजदूरी करने चला गया था। पिता की तबितय बिगड़ने पर वह उसे देखने आया था।

बताया जा रहा है कि दिल्ली में इस बार मजदूरी की कमी आई है। इस कारण लक्ष्मण वहाँ भी भटकता ही रहा। परिवार का भरण-पोषण, पिता की बीमारी और साहूकारों के कर्ज के दबाव में इस तरह लक्ष्मण पाल घिरा कि उसने आत्महत्या कर ली। यह वो किसान था जो मजबूर होकर मजदूर बना पर मजदूरी में भी कर्ज न चुकाने के हालातों ने उसे तोड़ दिया। यही हाल बुन्देलखण्ड के किसानों का है।

दो हफ्ता पूर्व ही सात मई को सागर जिले के सुरखी थाना के गाँव समनापुर में पारिवारिक तंगी और भूख से बिलखते बच्चों को देखकर महेश चढार नामक व्यक्ति ने हाईटेंशन पर चढ़कर आत्महत्या का प्रयास किया था। जिसे बचा लिया गया था। महेश के अनुसार उसके पास न तो राशन कार्ड है और न ही जॉबकार्ड। घर में बच्चों को खिलाने के लिये राशन नहीं। जब चारों बच्चों ने खाना माँगा तो उसके सामने आत्महत्या करने के सिवाय रास्ता नहीं था।

अप्रैल माह में भी बुन्देलखण्ड के छतरपुर जिले में कर्ज से दबे दो किसानों ने आत्महत्या कर ली थी। 8 अप्रैल को छतरपुर जिले के लवकुश नगर थाना के ग्राम पटना में 10 बीघा जमीन के मालिक 58 वर्षीय बाबूलाल ने खेत से लौटकर घर में जहरीला पदार्थ खा लिया था। इसी तरह 14 अप्रैल को बड़ामलहरा थाना के ग्राम चिरोदाँ में कर्ज से परेशान किसान साधना फाँसी पर झूल गई थी। साधना के पति इन्द्रपाल पर साहूकारों का कर्ज था। इस कर्ज ने साधना को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया। किसानों के आत्महत्या करने का सिलसिला पूर्व से चला आ रहा है।


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