किसानों ने कहा-नहीं मिले पम्प, फिर किधर गया करोड़ों रुपए

Submitted by RuralWater on Sun, 06/19/2016 - 13:11

राज्य में 37.46 लाख किसान हैं जिनमें 80 प्रतिशत से भी ज्यादा छोटे किसान हैं जिनके पास दो एकड़ से भी कम जमीन है। इसी तरह, छत्तीसगढ़ में 46.85 लाख हेक्टेयर कृषि जमीन है जिसमें अधिकतम 30 प्रतिशत खेती की जमीन ही सिंचित है। यानी 70 प्रतिशत से अधिक किसानों के पास सिंचाई का कोई साधन ही नहीं हैं। इसमें भी जिनके पास सिंचाई के साधन थे, उन्होंने विभिन्न कारणों से अपने खेत में धान की खेती की सिंचाई न कर पाने का दावा किया था। मगर सरकार ने इस श्रेणी के किसानों को मुआवजा देने के मामले में कोई विचार ही नहीं किया। श्यामनगर गाँव के रविंद्र पाल से जब सरकारी योजना के तहत पम्प मिलने की बात पूछी गई तो वे चौंक गए। बोले, मुझे कोई पम्प नहीं मिला है, न ही किसी फार्म पर मैंने दस्तखत किये। यही हाल मृणाल कांति का है। वे बताते हैं कि उनके नाम पर पम्प की बात कैसे हो सकती है, जब दो साल के अन्दर उनसे कोई फार्म ही नहीं भरवाया गया।

कोयलीबेड़ा क्षेत्र के जुगड़ा में तीन किसानों की सूची में नाम है, लेकिन किसी को कोई पम्प नहीं मिला। गुड़ाबेड़ा के लखीराम ने बताया कि उनके खेत के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जहाँ से पानी निकाला जा सके। चारामा, नरहरपुर, दुर्गूकोंदल और अन्तागढ़ में कुछ जगहों पर पम्प दिये भी गए तो उनसे पम्पों की कीमत वसूली गई।

यह है शाकम्भरी योजना का सच, जिसके माध्यम से राज्य सरकार लघु-सीमान्त किसानों को सिंचाई का लाभ पहुँचाती है। इसके लिये सरकार डीजल और केरोसीन पम्प पर 75 फीसदी अनुदान और कूप निर्माण कार्य पर 50 फीसदी अनुदान देती है। इसके तहत एक किसान को 20 से 40 हजार रुपए तक का फायदा मिल जाता है। इस लिहाज से आदिवासी बहुल कांकेर जिले में एक हजार 72 किसानों को फायदा पहुँचाना था। इसमें कोयलीबेड़ा ब्लॉक के 776 और शेष छह ब्लाकों के 231 किसानों को शामिल किया गया था।

जब पड़ताल की तो हकीकत पता चली। इस योजना में गजब के खेल सामने आएँ। जैसे कि पखांजुर क्षेत्र के कल्याणपुर गाँव के परिमल धरामी ने दो साल पहले अनुदान के तहत डीजल पम्प खरीदा था। इस साल उसे किसी अधिकारी ने सम्पर्क नहीं किया। मगर उसका नाम हितग्राहियों की सूची में नाम दर्ज किया गया। अब सवाल है कि एक हजार से ज्यादा किसानों को सिर्फ फाइलों में फायदा पहुँचाकर उनके नाम करीब दो करोड़ रुपए राशि कौन हजम कर गया।

किसने किये फर्जी दस्तखत


योजना के अन्तर्गत एक फार्म भरवाया जाता है, जिस पर किसानों का खसरा नम्बर सहित उसका हस्ताक्षर होता है, जबकि बहुत सारे किसानों को इस बारे में पता ही नहीं है। जाँच का विषय है कि कहाँ से फर्जी हस्ताक्षर कर किसानों के नाम पर घोटाला किया गया है।

योजना के तहत लाभ पहुँचाने की जिम्मेदारी कृषि अधिकारियों की थी, इसलिये इस पूरे गड़बड़झाले को लेकर कृषि विभाग कठघरे में आ गया है। वहीं, शुरू से ही इस गड़बड़झाले को छिपाने की कोशिश की जा रही है। यही वजह है कि हितग्राहियों की सूची देने के लिये कलेक्टर ने खुद चार बार कृषि उप-संचालक को कहा। इसके बावजूद उप-संचालक ने हितग्राहियों की सूची देने में दो माह लगा दिये।

ठगे गए किसानों का कहना है कि ऐसे ही अधिकारी सरकार से किसानों का मोह भंग करने में लगे हुए हैं। इस गड़बड़झाले ने एक बार फिर जाहिर किया है कि किसानों के लिये सरकार भले ही तमाम योजनाएँ चला रही है, लेकिन कुछ अधिकारी किसानों का अधिकार उन तक पहुँचने में बाधा बने हुए हैं। वहीं, कलेक्टर कांकेर शम्मी आविदी बताते हैं कि पूरा मामला अब संज्ञान में आया है। ऐसा कुछ हुआ है तो जाँच जरूर कराएँगे।

मुआवजे के नाम पर फिर ठगे गए अन्नदाता


वहीं, सरगुजा जिले में बर्बाद फसल की मार झेल रहे किसानों के साथ अब मुआवजे के नाम पर प्रशासन ने भी मजाक किया है। पिछले साल बारिश के मौसम में आदिवासी बहुल सरगुजा जिले में जमकर ओले पड़े जिससे कई किसानों की खड़ी फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई। इन्हीं किसानों में एक किसान हैं जयराम जिनकी 4 एकड़ की फसल ओले में पूरी तरह नष्ट हो गई।

जयराम का कहना है कि उसे उम्मीद थी कि सरकार बर्बाद फसल के बदले जो मुआवजा देगी, उससे किसी तरह अपना हजारों का कर्ज चुका पाएगा, लेकिन सरकार ने मुआवजे के नाम पर किसानों के साथ मजाक किया और हजारों की बर्बाद फसल के एवज में 81 रुपए का चेक थमा दिया। ये कहानी अकेले जयराम की नहीं है। इलाके के अन्य किसानों को भी इसी तरह मुआवजे के रूप में 100 से हजार रुपए के चेक थमा दिये गए। हालात ये हैं कि कुछ किसान तो अब चेक लेने भी नहीं जा रहे, क्योंकि जितना खर्च जिला मुख्यालय जाकर चेक लाने में होगा, उतने का चेक भी सरकार नहीं दे रही है।

राज्य सरकार ने मुआवजा वितरण के लिये ऐसी शर्तों को बनाया कि ज्यादातर सूखा प्रभावित किसान राहत राशि से बाहर हो गए। संयुक्त परिवारों में रहने वाले 25 एकड़ तक के कई छोटे किसान परिवारों की 20 से 30 फीसदी से ज्यादा फसल खराब होने पर भी उनका नाम राहत सूची में नहीं हैं।

राज्य में 37.46 लाख किसान हैं जिनमें 80 प्रतिशत से भी ज्यादा छोटे किसान हैं जिनके पास दो एकड़ से भी कम जमीन है। इसी तरह, छत्तीसगढ़ में 46.85 लाख हेक्टेयर कृषि जमीन है जिसमें अधिकतम 30 प्रतिशत खेती की जमीन ही सिंचित है। यानी 70 प्रतिशत से अधिक किसानों के पास सिंचाई का कोई साधन ही नहीं हैं। इसमें भी जिनके पास सिंचाई के साधन थे, उन्होंने विभिन्न कारणों से अपने खेत में धान की खेती की सिंचाई न कर पाने का दावा किया था। मगर सरकार ने इस श्रेणी के किसानों को मुआवजा देने के मामले में कोई विचार ही नहीं किया, जबकि इस साल सूखे के चलते भूजल स्तर काफी नीचे जाने से नलकूप काम नहीं कर रहे थे। वहीं, सिंचाई के दौरान बिजली आपूर्ति में भी भारी कटौती की गई थी।

नतीजन कई इलाकों में भूख और पलायन धीरे-धीरे पैर पसार रहा है। जिनके नाम राहत सूची में हैं वह भी देरी के चलते अधीर हो रहे हैं। किसानों की फसल खराब होने के कारण उनकी रही-सही सारी जम-पूँजी खर्च हो चुकी है। राज्य की रमन सिंह सरकार ने केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार से सूखा राहत के लिये छह हजार करोड़ रुपए माँगे थे। केन्द्र ने 12 सौ करोड़ रुपए का राहत पैकेज आवंटित किया। राज्य सरकार ने करीब 800 करोड़ रुपए की राशि सूखा पीड़ित किसानों को मुआवजा बाँटने के लिये रखी।

राजस्व और आपदा प्रबन्धन विभाग की मानें तो प्रदेश में मुआवजा वितरण का काम पूरा हो चुका है और इससे ज्यादा राशि बाँटने की जरूरत नहीं है। विभाग के सचिव केआर पिस्दा के मुताबिक, 'किसी जिले से सूखा राहत के लिये और अधिक राशि की माँग नहीं आने के बाद यह निर्णय लिया गया है।' विभाग ने सूखा पीड़ितों में सिर्फ 380 करोड़ रुपए की राशि बाँटी है।

विशेषज्ञों की राय में सूखा पीड़ितों के लिये सरकार की यह राशि वैसे ही बहुत कम है, उसमें भी इतनी बन्दरबाँट हुई है कि प्रदेश के लाखों पात्र किसानों तक राहत पहुँची ही नहीं है। कई इलाकों में किसानों ने लागत न निकलने के डर से अपनी फसलों को मवेशियों के हवाले कर दिया है। अब ऐसे किसानों को भी शासन सूखा राहत सूची के योग्य नहीं मान रही। महासमुंद जिले के बागबाहरा, पिथौरा, बसना, झलप, सरायपाली, भंवरपुर क्षेत्र के सैकड़ों परिवार पलायन कर चुके हैं।

जांजगीर-चांपा में बलौदा क्षेत्र के मनरेगा मजदूरों का तीन महीने से भुगतान नहीं हुआ है। यहाँ भी पलायन ने दस्तक दे दी है।

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शिरीष खरेशिरीष खरेमासक्मयुनिकेशन में डिग्री लेने के बाद चार साल डाक्यूमेंट्री फिल्म आरगेनाइजेशन में शोध और लेखन.उसके बाद दो साल 'नर्मदा बचाओ आन्दोलन, बडवानी' से जुड़े रहे.

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