नई प्रकृति-प्रेमी तकनीक का विकास हो

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Source
सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म, 2006

 

राजा ने भोग के लिये धरित्री का स्वीकार नहीं किया। वात्सल्य से, प्रेम से उसका पालन करने के लिये उसे स्वीकार। उससे राजा ने खेती की कला सीखी, सबको सिखाई। गुरु रूप में उसकी सेवा करने का व्रत लिया। ग्राम-नगर बसाये। यह सारा विकास धरती ने राजा से करवाया। जमीन के साथ, धरा के साथ मनुष्य का नाता पवित्रता का है। उसकी सेवा करके, जीवन के लिये जो आवश्यक है वह प्रणाम पूर्वक उससे स्वीकार करें। सभी प्राणियों के लिये उसका दोहन करें। भोग नहीं प्रसाद उससे पाएँ।

आज धरती पर प्रदूषण का जो घना संकट आया है वह काल का रूप लेकर ही पधारा है। उसे कहीं दूर भगाना चाहेंगे तो एेसा दूसरा ग्रह कहाँ से लाएँगे? पृथ्वी को ही उसका बोझ उठाना पड़ेगा। लेकिन यह तो जान को खतरे में डालने वाला बोझ है। स्व-पराक्रम से प्रदूषणों से मुक्ति किस तरह पा सकते हैं इसकी युक्ति मानव जाति को सीखनी पड़ेगी। इसके लिये जीवन-जीने की पद्धति बदलनी पड़ेगी। नई प्रकृति-प्रेमी तकनीक विकसित करनी होगी । इसके लिये गोकुल-वृन्दावन का निर्व्याज, पाप-रहित निर्मल जीवन पुनः निर्माण करना होगा।

सर्वव्याप्त एकात्मता की साकार मूर्ति श्रीकृष्ण थे यह हमने अनेक कथाओं से समझ लिया। उसका वर्णन ‘आप्तकामः’ इस शब्द से किया जाता है। जहाँ पहुँचकर सभी कामनाएँ,वासनाएँ विश्राम पाती हैं, सभी भोगेच्छाएँ शान्त हो जाती हैं एेसा स्थान ही श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व है। कामना के लिये द्वैत की दो-पनकी आवश्यकता होती है।

कृष्ण जीवन में द्वैत की सत्ता कभी थी ही नहीं। इसलिये गोपियों के साथ शरद ऋतु की पूर्णिमा की रात्रि में यमुना के तट पर हुई रास लीला थी वासना-शून्य आनन्द-नृत्य की अभिव्यक्ति। वेद में जीवन के मूल तत्व को आत्मा को ‘रस’ कहा है। ‘रसो वै सः। रसं हि एवं लब्ध्वा आनंदि भवति’। वह मूल तत्त्व रसरूप है। उसकी अनुभूति जिसे हुई वह आनन्द रूप होकर जीता है, आनन्द में ही सभी व्यवहार करता है।

‘इसी आनन्द में सभी जीवमात्र जन्म लेते हैं, इसी में जीते हैं और इस आनन्दरस में प्रविलीन होते हैंः आनन्दात् हि खलु इमानि भूतानि जायते, आनंदेन जातानि जीवन्ति, आनंदं प्रयान्ति अभिसंविशंति। आनंदं ब्रह्मोति व्यजानात्। ब्रह्म स्वयं ही आनन्द रूप है इसे खूब समझना होगा। खाने-पीने-पहनने के सुख को इन्द्रिय सुख कहते हैं, यह कितना क्षण-भंगुर है यह हम सब जानते हैं।

जो स्वयं क्षणिक है वह कालातीत अनन्त की अनुभूति कैसे करा सकता है? इसलिये आत्मा या ब्रह्म का आनन्द केवल ‘होने’ का, ‘टू बी’ का अथवा ‘दि ईजनेस आॅफ लाईफ’ का होता है। इसी कारण से सभी प्राणियों को, जीवन की सभी अभिव्यक्तियों का मात्र ‘होना’ जिन्दा रहना पसन्द है। शरीर उसके अवयव-इन्द्रिय, मल्कियत की चीजें, विद्वता इत्यादि के साथ स्वयं एकरूप होकर ‘ममत्व’ मेरा-मेरा का भाव-निर्माण हो गया कि ये ही चीजें सुख-दुख का कारण बन जाती हैं- इनका वियोग ही दुःख बन जाता है- इनके संयोग से भोग सुख मिलता है- यह एक दुष्चक्र ही चलता रहता है।

लेकिन यह समूचा खेल कुछ ही समय का, क्षणमात्र का है यह बात पकड़ में आ जाये, बुद्धि गम्य हो जाये, इसमें रुचि लग जाये और पचन भी हो गया इसका कि दृष्टि परिवर्तन हुआ करता है। तब भोग के लिये असत्य, अन्याय, भ्रष्टाचार, स्पर्धा-कलह के कुमार्ग पर चलने की वृत्ति शेष नही रहती। फिर भोगों को अतिभोगों को निमन्त्रण देकर, स्वयं उनके पीछे भागते रहने की सभ्यता व संस्कृति विकसित करने का कारण ही शेष नहीं रहता। जीवन एक निर्मल खेल बनकर रहता है। खेलों का उपयोग तब राजनीति चलाने या पैसा कमाने के लिये नहीं होगा। यह खेल वासनामुक्ति की भूमि से उद्घाटित हुआ करता है।

रासलीला यह ऐसी निर्मल, मात्र मैत्री के लिये, एकात्मता व्यक्त होना चाहती है इसलिये खेली गई नृत्य-गायन की महफिल थी। इससे स्त्रीत्व-पुरुषत्व का भान भी विलीन हो गया था। कृष्ण तो आत्मस्वरूप थे। ‘भवतीनां वियोगों में नहि सर्वात्मना क्वचित्।’ आप स्त्रियों का वियोग मुझ सर्वात्म को कभी भी हो नहीं सकता- ऐसा सन्देश उद्धव के पास उन्होंने ब्रज-गोपियों के लिये भेजा था और गोपियों की कैसी थी अवस्था! उनकी वासना का बीज ही शुद्ध और तीव्र भाव विश्व से एकरूप हो जाने से जल गया था। ‘भर्जिता क्वथिता धानाः प्रायः बीजाय नेश्यते।’ भूना हुआ और कूटा हुआ धान खेत में बोया गया तो भी उसमें से अंकुर नहीं फूटता। ऐसे व्यक्ति व्यवहार में कर्म करने उतरते हैं तो भी उनकी शारीरिक-मानसिक आवश्यकताएँ स्पर्धा में उतर कर, तुलना में रमकर कामना और वासनाओं का रूप धारण कभी नहीं करती।

श्रीमद् भागवत का कथन है कि रासलीला छोटे बच्चे के -अर्भक के-निर्व्याज आनन्द के जैसी थी-

रेमे रमेशो व्रज सुंदरीभिः।
यथार्भको स्व प्रतिबिम्ब विभ्रमः।


दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखकर अर्भक जिस तरह उसके साथ खेल करेगा वैसा ही खेल विष्णु ने ब्रज की सुन्दर लड़कियों के साथ किया। बात इतनी ही नहीं है। श्रीमद् भागवत का यह भी दावा है कि जो भी कोई भक्त या साधक वासुदेव के द्वारा ब्रज कन्याओं के साथ की हुई रास क्रीड़ा का वर्णन या श्रवण श्रद्धापूर्वक करेगा, उसका काम-वासना रूपी हृद्रोग कायम के लिये मिट जाएगा और उद्धव ने गोपियों को प्रणामपूर्वक यह निवेदन किया थाः अहो यूयं स्म पूर्णार्थाः। आपके चारों पुरुषार्थ सध चुके हैं, आप पूर्णार्थ हो गई हैं। ‘वन्दे नन्दव्रजस्त्रीणां यासां हरिकथो द्विप्त पुनाति भुवन त्रयम्।।’ ब्रज की स्त्रियों की गाई हुई हरि कथाओं से त्रिलोकी पवित्र हो गयी है।

इस तरह का कामनाशून्य जीवन जिया जा सकता है यह गोकुल-वृन्दावन के कृष्ण कालीन प्रेम जीवन ने दिखा दिया है। मूलतः सम्यक् विश्व-जीवन ऐसा ही है। ग्रह-नक्षत्र-तारकों की मण्डलाकार गतियों में से रासलीला का सूचन होता है और मानवी चित्त में उठने वाली वृत्तिओं के आवर्तनों में से रास क्रीड़ा का निर्व्याज रूप विशद हो सकता है। इस क्रीड़ा के समय दो-दो गोपियों के बीच एक-एक श्रीकृष्ण नृत्य कर रहे थे। तासां मध्ये द्योर्व्दयोः। ऐसा वर्णन किया गया है। आद्य शंकराचार्य के गाये हुए मन्त्रों में ब्रह्मानुभव की आकांक्षा रखने वाले साधकों के लिये उपदेश है:

नष्टे पूर्वविकल्पे तु यावदन्यस्य नादेयः।
निर्विकल्पक चैतन्यं तावरेव विभासते।।
एक-द्वि-त्री क्षणेष्वेव विकल्पस्य निरोधनम्।
प्रयत्नात् साधित्तब्योहि ब्रह्मानुभव कांक्षिभिः।।


चित्त की वृत्तियाँ ही हैं गोपियाँ और दो गोपियों के मध्य में नृत्यमग्न कृष्ण ही निर्विकल्प चैतन्य है। जब तक एक वृत्ति शान्त होकर दूसरी की उदय नहीं हुआ तब तक स्फुरित होता है निराकार-निर्विकल्प चैतन्य! शंकराचार्य कहते हैं कि सर्व व्याप्त ब्रह्म से एकरूप होने के लिये प्रयत्नपूर्वक दो वृत्तियों के मध्य का अवकाश बढ़ाते रहना होगा। प्रारम्भ तो एक-दो या तीन क्षणों से ही होगा लेकिन अभ्यास से कालातीत होना सम्भव होता है। इसके लिये साधना की तीव्रता आवश्यक है।

रासलीला के इन व्यक्तिगत, सामाजिक और वैश्विक रूपों में से मानव-जीवन के विकास के निष्पाप, पावन स्वरूप ध्यान में आ सकते हैं। प्रकृति के स्वभावगत तत्वों को समझकर उनका सन्तुलन बिगाड़े बिना, नम्रतापूर्वक उनका शिष्यत्व स्वीकार करके मानव अपने जीवन की तह लगा सका, उसका स्वरूप निश्चित कर सका तो कल का आने वाला युग धरती के जीवन को अभिशप्त नहीं करेगा। इसके लिये जो विविध कार्य-साधनाएँ आवश्यक हैं उनकी सूचना भी श्रीमद्भागवत ने अनेक कथाओं के माध्यम से की है।

चतुर्थ स्कन्ध में राजा पृथु की कथा आती है। उससे पहले वेन राजा का शासन था। वेन भोगवादी था। उसने समूची सृष्टि को और समाज को न्याय देनेवाली, सबको सन्तुष्ट, तृप्त व सन्तुलित रखने की शिक्षा देने वाली यज्ञ-संस्था नष्ट कर दी थी। समाज के हित कर्ता व मार्गदर्शक ऋषि-मुनियों ने एक मत से वेन राजा को पदच्युत किया और आखिर उसे मृत्युदण्ड दिया। उसके कारण प्राकृतिक और सामाजिक जीवन का सन्तुलन पूर्णतः बिगड़ चुका था। तरुण राजा पृथु पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

कुछ दिनों बाद उसके पास शिकायत आई कि धरती ने अन्नौषधियों की वनस्पतियाँ छिपा दी हैं। उसे सजा देनी होगी और अन्न और औषधियाँ सभी के लिये प्रकट करा देना आवश्यक होगा। राजा सभी की तरफ से धरती पर आक्रमण करके उसे सबके हित के लिये कार्य करने को कह सकता था।

 

 

 

राजा ने भोग के लिये धरित्री का स्वीकार नहीं किया। वात्सल्य से, प्रेम से उसका पालन करने के लिये उसे स्वीकार। उससे राजा ने खेती की कला सीखी, सबको सिखाई। गुरु रूप में उसकी सेवा करने का व्रत लिया। ग्राम-नगर बसाये। यह सारा विकास धरती ने राजा से करवाया। जमीन के साथ, धरा के साथ मनुष्य का नाता पवित्रता का है। उसकी सेवा करके, जीवन के लिये जो आवश्यक है वह प्रणाम पूर्वक उससे स्वीकार करें। सभी प्राणियों के लिये उसका दोहन करें। भोग नहीं प्रसाद उससे पाएँ।

राजा का रुद्ररूप देखकर धरती ने गाय का रूप लेकर भागना शुरू किया पीछे-पीछे राजा धनुष-बाण ले करके निकला। एक मोड़ पर धरती रुक गई। राजा से कहने लगी-तुम मुझे क्यों पकड़ ना चाहते हो? मुझे जीतकर अन्नौषधि सभी को मिल जाएगी ऐसा तुम्हें लगता है सचमुच? सच्ची बात तो यह है कि ब्रह्म देव ने स्वभावतः उत्पन्न किया हुआ अन्न और औषधियों का भण्डार संभालने वाले वन सभी को उपलब्ध होते ही नहीं। उन पर चोरों ने अधिकार जमाया है। उन पापी आक्रमणकारियों का तुम बन्दोबस्त करो पहले।

मैंने जो वनौषधियाँ छिपाकर रखी हैं उनकी यज्ञ के लिये आवश्यकता होगी-वे सब आप लोगों के लिये ही हैं। परन्तु सृष्टि के सभी जीवों को, प्राणियों को स्वयं श्रम करके उनका उत्पादन बढ़ाना होगा। तुम मुझे समतल बनाओ, खेती में बीज बोने की व्यवस्था करवाओ, परिश्रमपूर्वक वृक्ष-वनस्पति लगाओ, उगाओ इस सबकी शिक्षा प्रजा को दो। मैं तो हूँ मातृरूपा सृष्टि में जो जाति-जमातियों के, मानव-सुर-असुरों के प्रमुख हैं उन्हें बछड़े बनाकर मेरे पास भेजो। तब मैं उन सभी को जीवन रस पिलाकर पुष्ट कर दूँगी।

धरती के वचन राजा को प्रिय लगे। उन्होंने मानवों की ओर से मनु को, दानवों की ओर से प्रह्लाद को, देवों की तरफ से इन्द्र को वृक्षों की तरफ से वट वृक्ष को और अन्यों की तरफ से उन प्रमुखों को बछड़े बनाकर धरती (गौ) माता के पास भेजा। वे अपने-अपने पात्र लेकर पहुँचे, पय पाकर तृप्त हुए, पुष्ट हुए सब! पृथु राजा प्रसन्न होकर धरती के पास नम्रतापूर्वक गया और उसने कहा- तुम तो मेरे लिये पूजनीय बन गई हो। कन्या के समान तुम मुझे प्रिय हो गई हो। ‘दुहित्रुत्वे चकारेमां, प्रेम्णादुहित्रु वत्सलः।’

राजा ने भोग के लिये धरित्री का स्वीकार नहीं किया। वात्सल्य से, प्रेम से उसका पालन करने के लिये उसे स्वीकार। उससे राजा ने खेती की कला सीखी, सबको सिखाई। गुरु रूप में उसकी सेवा करने का व्रत लिया। ग्राम-नगर बसाये। यह सारा विकास धरती ने राजा से करवाया। जमीन के साथ, धरा के साथ मनुष्य का नाता पवित्रता का है। उसकी सेवा करके, जीवन के लिये जो आवश्यक है वह प्रणाम पूर्वक उससे स्वीकार करें। सभी प्राणियों के लिये उसका दोहन करें। भोग नहीं प्रसाद उससे पाएँ। उस प्राचीन काल से (करीब पचास हजार सालों से) पृथु-कन्या धरती को ‘पृथ्वी’ संज्ञा प्राप्त हो गई।

चतुर्थ स्कन्ध में बालक ध्रुव की कहानी भी कही गई है। यह कहानी मालूम न हो ऐसा कोई भी भारतीय शायद नहीं होगा। सुरुचि ध्रुव की सौतेली माँ थी। पिता उत्तानपाद राजा की गोद में बैठे पाँच वर्ष के छोटे ध्रुव को सुरुचि ने अपमानित करके निकाल दिया। राजा केवल द्रष्टा बनकर रहा। रोता हुआ ध्रुव अपनी जन्मदात्री-सुनीति के पास पहुँचा। उसने कहा- बेटे, जिस आसन पर से कोई भी उतार नहीं सकेगा ऐसा आसन तुम्हें केवल सर्वव्याप्त परमेश्वर विष्णु ही दे सकेंगे। उन्हें प्रसन्न करके तुम्हारी इच्छा पूूर्ण कर लो। ध्रुव वन जाने के लिये तैयार हुआ। नारद गुरु रूप में उसे मिल गए। उपासाना का मंत्र उनसे प्राप्त हुआ, ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय। इस द्वादश अक्षरों का मंत्र जप करता हुआ वह आगे चला। राजा ने उसे आधा राज्य देना चाहा, वापस आओ कहा। लेकिन ध्रुव का निश्चय बदला नहीं। तब नारद जी ने उसे आशीर्वाद देकर कहाँ भेजा?

तत्तात गच्छ भद्रंते यमुनायाः तटे शुचि।
पुण्यं मधुवनं यत्र सान्निध्यं नित्यदा हरेः।।


“यमुना के शुचिर्भूत तट पर मधुवन में सदा सर्वकाल पापहारी भगवान निवास करते हैं वहाँ पर तुम अपना तप करो, जप करो। जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, वत्स!”

ध्रुव की जप-साधना में प्राणायाम का अनुष्ठान भी सहज होता गया। प्राणायाम से चित्त की स्थिरता सधती है और जप के कारण वासुदेव चित्त में बैठ गए थे। इसलिये चित्त वासुदेवमय हो गया। अब वासुदेव को प्रणाम करने का क्या अर्थ होता है? प्रणाम का अर्थ है प्रणम्य के साथ एकरूप होना और वासुदेव का स्वरूप कैसा है?

वासनात् वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम्।
सर्वभूत निवासोसि वासुदेव नमोेेेSस्तु ते।।


वासुदेव के निवास के कारण त्रिभुवन वासुदेव से व्याप्त हो गए। समूचे अस्तित्व में, सभी भूतमात्रों में वासुदेव ही बस गए। ऐसे सर्वव्याप्त वासुदेव को प्रणाम है।

ध्रुव की उग्र तपस्या भी प्राणायाम और जप के साथ हो ही रही थी। आहार कम होता गया। आखिर वायु भक्षण करके यह बच्चा एक पैर के केवल अँगूठे पर खड़ा होकर जप करने लगा। छः महीने पूरे हो रहे थे और ध्रुव के प्राणायाम के फलस्वरूप आन्तर्कुम्भक में श्वास स्थिर हो गया। वासुदेवमय सर्व व्याप्ति का भाव चित्त में होने से ध्रुव में सृष्टि व्यापत वायु भी स्थिर हो गया। सारी सृष्टि की वायु ध्रुव के कुम्भक में बद्ध हो गया। दश दिशाओं का वायु तत्त्व कुंठित हो जाने से सृष्टि के प्राण छटपटाने लगे। परन्तु यह छटपटाना प्रदूषण के कारण नहीं हो रहा था। स्वार्थी ऐश आराम के अभिशाप से यह वेदना सृष्टि में नहीं फैल गई थी। यह तो बालक ध्रुव की निर्मल, शुद्ध तपस्या में से निर्मित हुई उपकारक अवरोध की अवस्था थी।

सर्व देवता, सभी दिशाएँ विश्व की इस संकट से मुक्ति करवाने की प्रार्थना लेकर वासुदेव-विष्णु के निकट पहुँच गए। इन सभी को आश्वस्त करते हुए विष्णु ने कहा “आप सबको भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। वह उत्तानपाद का बेटा ध्रुव तपस्या कर रहा है। उसे जो चाहिए वह देने के लिये मैं उसके पास पहुँच ही रहा हूँ। थोड़े ही समय में उसका आन्तर्कुम्भक खुल जाएगा और सृष्टि का वायु भी मुक्त हो जाएगा।” ध्रुव को विश्व का सबसे स्थिर स्थान मिल गया और सृष्टि का भी इससे कल्याण ही हुआ। ध्रुव-तारक आकाश में निश्चित स्थान पर स्थिर हुआ और पृथ्वी को सूर्य के चारों ओर घूमते समय एक-लक्ष्य होना सहज बन गया। वायु की मुक्तता और शुद्धता सृष्टि के अखिल जीवन के लिये आवश्यक है ही। परन्तु व्यक्तिगत साधना में से भी वायु तत्व-वातावरण-अधिक उन्नत हो जाता है और सर्वव्याप्त जीवन के साक्षात्कार के लिये वह सहायक तत्व भी बन जाता है।

जल तत्व के विषय में भी यही घटित होता है। पंचम, अष्टम और नवम स्कन्धों में भागवतकार व्यास देव गंगावतरण की कथा तीन हिस्सों में बाँटकर कथन करते हैं। उसका जल तत्व का स्वरूप स्पष्ट करने के लिये जितना हिस्सा आवश्यक है उतना ही हम देख लेंगे। सम्राट सगर के अश्वमेघ यज्ञ का अश्व भयभीत इन्द्र ने चुराया और पाताल में एकान्त साधना करने वाले कपिल महामुनि की ध्यानस्थ मूर्ति के पास उसे बाँध दिया। इस सगर के अश्वमेघ पूर्ण हो गए तो अपने को स्थानच्युत होना पड़ेगा।

इस भय के कारण इन्द्र ने यह युक्ति की थी और वह यशस्वामी हो गए। साठ हजार सगर पुत्र अश्व को खोजकर थक गए और धरातल को खोदते हुए पाताल तक पहुँच गए। वहाँ कपिल मुनि को ही चोर समझकर उन पर इन अविवेकी लोगों ने हमला बोल दिया। हल्ले-गुल्ले की आवाज से ध्यान भंग हुआ। मुनि ने आँख खोलकर शान्ति से देखा। हजारों क्रुद्ध सैनिक आगे बढ़ कर आए तब उनका क्रोध मुनि की शान्त आँखों से टकराकर बूम रंग की तरह वापस उन्हीं पर बरसा। नतीजा यही हुआ कि वे साठ हजार सगर-पुत्र अपने ही क्रोध की ज्वाला में जलकर भस्म हो गए। अश्वमेघ तो हो ही नहीं सका और यह नई समस्या खड़ी हो गई।

सगर का पुत्र अंशुमान अपने भाइयों की खोज में पाताल पहुँचा तब उसने कपिल मुनि के पास प्रणाम पूर्वक पूछताछ की। क्रोधाग्नि में जले हुए बाँधवों को सद्गति कैसे मिलेगी, यह सवाल था। कपिल मुनि ने उपाय बताया। प्रह्लाद का पोता बलिराजा भी भगवान का भक्त ही था। अति उदार व दानी था वह। उसकी कीर्ति सर्वत्र थी फिर भी असुर कुल का था वह इसलिये देवताओं को बेचेनी थी। भगवान विष्णु के पास शिकायत की देवताओं ने असुरों के पास कब तक त्रिलोकी का राज्य रहेगा? भगवान् ने कहा है- “युद्ध में तो आप जीतेंगे नहीं क्योंकि वह प्रह्लाद का पोता सद्गुणी, निर्मोही है। उसके पास भीख ही माँगनी पड़ेगी।” फिर देवताओं के आग्रह से विष्णु बली के पास उसकी यज्ञ-शाला में पहुँच गए। वामन रूप में वे गए थे और बली से तीन पग जमीन का दान उन्होंने माँगा।

निश्च्छल बलिराजा ने उदक छोड़ा और जमीन दी। लेकिन दो पग में स्वर्ग-पृथ्वी को नाप लिया वामन ने, तीसरे पैर के लिये बली के पास कहाँ थी जगह? पाताल तो बहुत दूर। तब बली ने अपना मस्तक आगे किया। पाताल में बली को भेजने पर उसके द्वार पर प्रभु को दरवान बनकर रहना पड़ा। भक्त की चाकरी करने में प्रभु को खुशी ही थी और इसी नाटक में पहला पग जब स्वर्ग में पहुँचा तब वामन के अगूँठे से ब्रह्म- कटाह का ऊपरी हिस्सा कट गया- और ब्रह्मदेव को उनके अगूँठे के दर्शन हो गए। दर्शन के बाद फिर पदक्षालन जरूरी हो गया। दाैड़कर ब्रह्मदेव ने अपनी लुटिया से भगवान के अगूँठे का स्नान करवाया- वही जल-आकाश में फैल गया। यही स्वर्गंगा थी जिसे धरातल पर लाकर सगर पुत्रों को सद्गति मिलेगी ऐसा कपिल मुनि ने अंशुमान को बताया। तब गंगा को प्रसन्न करने के लिये अंशुमान ने तपस्या की किन्तु गंगाजी प्रसन्न नहीं हुईं। तब दिलीप राजा ने पुनःतपस्या की उसे भी अपयश ही मिला।

आखिर राजा भगीरथ की विरक्ति और तपस्या की उन्नत अवस्था देखकर गंगाजी प्रसन्न होकर पूछने लगी ‘कोअपि धारयति वेगं पतत्त्या मे महीतले।’ मैं धरातल पर आने को तैयार हूँ परन्तु मेरा आवेग सहन होना कठिन है धरती के लिये। कौन धारण करेगा मुझे? अन्यथा मैं पार पाताल में धँस जाऊँगी। तत्काल जवाब देते हुए राजा भगीरथ ने कहाः

धारयिष्यति ते वेगं रुद्रस्त्वात्मा शरीरिणाम्।
यास्मिन्नोतमिदं प्रोतं यथा शाटीव तंतुषु।।


वस्त्र में जैसे ताने-बाने होते हैं वैसे भूतमात्रों में ओत-प्रोत वाह्य रहने वाले आत्म स्वरूप रुद्र हैं, वे ही, माता, तुम्हें धारण करने के लिये समर्थ होंगे।

वचन दिया तो रुद्रभगवान को भी तपस्या से प्रसन्न करना जरूरी था। उस तपस्या से प्रसन्न होकर भगीरथ को वरदान देने रुद्र पधारे। गंगाजी को अपनी जटाओं में धारण करने को वे तैयार हुए।

फिर भी गंगाजी को एक आशंका थी। उन्होंने भगीरथ से पूछा-भगवान की जटाओं में से मैं जब धरातल पर पहुँचूँगी तब मुझ में केवल तुम्हारे पितरों का भस्म ही पाप-क्षालन करने पहुँचेगा ऐसा नहीं। दुनिया के कितने ही पापी भी अपनी मलिनता धोने मेरे जल में नहाएँगे। उस मलिनता को मैं कैसे सहन करूँगी? उसे कैसे और कहाँ धोऊँगी मैं? राजा भगीरथ पहुँचे हुए साधक थे। वे हार कैसे मानेंगे? उन्होंने माँ को भारतीयों की तरफ से जवाब दिया-

साधवो न्यासिनः शांता ब्रह्ष्ठिा लोकपावनाः।
हरन्ति ते अद्यं ते अंग संगात्तेषु आस्तेअघभिद् हरिः।।


माता! (जैसे पापीजन तुम में नहाएँगे वैसे) लोकपावन, ब्रह्मनिष्ठ, शान्त, सन्यासी साधु भी तुम्हारे पास (शीतल होने के लिये) पहुँच जाएँगे। उनके पवित्र स्पर्श से तुम्हारी मलिनता धुल जाएगी, क्योंकि उनके चित्त में पापहरण करने वाले हरी जो निवास करते हैं!

यह आश्वासन पाकर स्वर्गंगा जी भारत में उतरकर हिमालय के क्षेत्र को पावन करती रही। युग-युग में भारतीय साधु-सन्तों ने भगीरथ के दिये वचन का पालन किया। अनेक गृहस्थाश्रमी और वानप्रस्थी लोगों के साथ असंख्य गरीब, अनेक जाति-पाँति के, ठेठ विदेशों से आए हुए पवित्र साधक भी ब्रह्मनिष्ठ होकर गंगाजी का स्पर्श करते रहे हैं। पवित्र जीवन जीते हुए भी गंगा-हिमालय के दर्शन-स्पर्श करने के लिये श्रद्धापूर्वक आते रहे हैं लोग क्योंकि इनके स्पर्श के बिना अपना भारतीयत्व, अपनी धर्मनिष्ठा सिद्ध नहीं होती, कसौटी पर खरी उतरती नहीं इस मान्यता के कारण आते रहे हैं।

इसीलिये मात्र हिमालय की ही नहीं, पूरे देश की ही नदियाँ ‘एच टू ओ’ यानी हाइड्रोजन व आॅक्सीजन के मिलन में से जन्म लेने वाला द्रव देती आई ही नहींः मानवों की आन्तर्बाह्य शुचिता सिद्ध करने वाली जगन्माता ही जल रूप में बहती हुई सागरगामी होती आई है। गंगाजी के आश्रम में आकर अनेक स्त्रोत पूर्वीय क्षेत्रों में बहते हुए सागर तक पहुँच पाए और सगर-पुत्रों ने धरातल खोद कर जो पातालगामी स्थान निर्माण किया, उसमें भागीरथी के साथ अन्य हिमालयीन प्रवाह भी नित्य जलार्पण करते रहे। इन सबके कारण सागर का विशाल जलस्वरूप क्षितिज-स्पर्शी हो सका। दक्षिण में तो तीन सागरों का मिलन कन्या कुमारी के पास, रामेश्वर के निकट होता रहा है। मानव के पराक्रम के साथ, उसके शुद्ध हेतुओं के साथ इस देश की नदियाँ और समुद्र आन्तरिक सम्बन्धों में जुड़ गए हैं।

आज के युग का पर्यावरण शास्त्र का कहना है कि वायु, जल और भूमि इन जीवन धाराओं की शुद्धता नहीं रहेगी और प्रदूषित अवस्था ही चलती रहेगी तो सभी की इतिश्री होने का खतरी टलेगा नहीं। हमने अब तक भारतीय परम्परा के उदाहरण देखते हुए यह समझ लिया है कि यहाँ प्राचीन विचारवान, महान लोगों ने मानव-धर्म की शिक्षा देते समय मनुष्य के चारित्र्य की उँचाई, चित्त की शुद्धता व पवित्रता इनका सम्बन्ध समग्र सृष्टि के साथ जोड़ दिया। भारतीय वन-संस्कृति की वह अभिव्यक्ति ही बन गयी। आध्यात्मिक जागृति का शिक्षण कण-कण से, कदम-कदम पर देते रहने से संयम का, नम्रता का, सख्य भक्ति का, नित्य साधनारत रहने का, व्रत-अनुष्ठान का संस्कार यहाँ जन्म-जात प्राप्त होता रहा है। इसलिये हमारी जिम्मेदारी युग-परिवर्तन के लिये अधिक ही है यह मान्य करना होगा।

हमारे इन संस्कार-पुंज में अधिक तेजस्विता और व्रतनिष्ठा लेकर बुद्ध-महावीर के योगदान शामिल हुए हैं। विकार-वासना-ममत्व-अहन्ता इन सबको तिलांजलि देकर विशुद्ध एकात्मता से जीने वाले महावीर सच्चे अर्थ में महावीर सिद्ध हुए हैं। शान्ति और संयम का जीवन उन्हें बचपन की घुट्टी में से प्राप्त हुआ। क्योंकि राजगृह में रहने में उन्हें प्रयास पड़ा, वन में एकान्तवास करना उनके लिये अधिक सहज, सरल था। असंख्य अनुयायियों को अहिंसा का व्रत देकर उन्होंने बहुत से भारतीयों के भोजन में से मांसाहार का उच्चाटन ही कर दिया। ऋतुओं की विशेषताएँ ध्यान में लेकर, मौसम का ताल-मेल बिठाकर मनुष्य का आहार कब और कैसा होना चाहिए इसका शास्त्र जैन धर्म ने जैसा विकसित किया वैसा अन्य किसी धर्म-पन्थ या सम्प्रदाय ने किया होगा ऐसा दिखता नहीं है। स्वयं सहना, किन्तु दूसरों को कष्ट नहीं देना, यह अहिंसा के परमधर्म का स्वरूप उन्होंने जीकर दिखाया। अपने लिये कड़ाई से व्रत-पालन, अन्यों के लिये क्षमा-व्रत इसी में से अनाक्रमण का शील, चारित्र्य गहरे पैठ गए समाज में। वैदिक जीवन-दर्शन के समान्तर महावीर का जीवन-दर्शन विकसित हुआ। दिखने के लिये दो लेकिन प्रत्यक्ष में एक ऐसा ही इनके लिये कहना होगा।

और बुद्ध भगवान ने तो यह अहिंसा का मंत्र विश्वभर में प्रसृत करने का पराक्रम अपने भिक्षुओं से करवाया। वेद काल से चली आई सिखावन पचाकर बुद्ध ने तो एक सन्तुलित और श्रमनिष्ठ अर्थशास्त्र को ही जन्म दिया। एशिया के आधुनिक काल में ही हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ई. एफ शूमाकर ने बुद्ध का चलाया मानव-जीवन का शुद्धिकरण करने वाला अर्थशास्त्र आज की परिभाषा में प्रस्तुत किया है। उनकी ‘स्मॉल इज ब्यूटीफुल’ (छोटा ही बड़ा सुन्दर) किताब में उन्होने बुद्ध का वचन उद्धृत किया है- ‘वन’ एक विशेष स्वरूप का, इन्द्रिय व अवयवों से युक्त जीवन्त शरीर है। असीम करुणा तथा उपकार-क्षमता वन का स्वभाव है। वन स्वयं अपने लिये किसी की भी अपेक्षा नहीं करता और स्वयं जीते हुए जो-जो निर्मित करता है वन, वह सारा उदारता से सभी में बाँट देता है। सभी प्राणियों को वह संरक्षण देता है इतना ही नहीं, उसका विनाश करने के लिये आए हत्यारे को भी छाया देता है।

श्रीमद्भागवत में भी ऐसे ही अर्थ के शब्द श्रीकृष्ण के मुख में आये हैं और सात सौ साल पुराने महाराष्ट्र के सन्त कवि ज्ञानेश्वर की ओवी छन्द की अभिव्यक्ति भी यही बताती आई है।

जो खाण्डावया धावो घाली।
लावणी जयाने केली।
दोघां एकचि साउली। वृक्षु दे जैसा।।


जो काटने के लिये आघात करता है और जिसने रोपण किया-पाला-पोसा-उन दोनों को ही वृक्ष समानरूप से छाया प्रदान करता है। उसी के जैसा होता भगवान का भक्त।

भगवान बुद्ध का प्रमाण देकर शूमाकर कहते हैंः मानव की करीब-करीब सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले वृक्ष उपलब्ध हैं। भारत के महान गुरुओं में से एक हैं गौतम बुद्ध। अपने उपदेशों में उन्होंने एक आदेश यह दिया था कि प्रत्येक अच्छे बौद्ध व्यक्ति को अपना यह कर्तव्य मानना चाहिए कि हर पाँच वर्षों में कम-से-कम एक वृक्ष का तो रोपण और संवर्धन वह अवश्य करें। शूमाकर बताते हैं कि जब तक इस आदेश का पालन होता रहा तब तक पूरे भारत में विशाल क्षेत्रोंं को वनों ने आच्छादित किया था। उसका परिणाम यह हुआ था कि इन सभी भू-प्रदेशों में धूल का नाम नहीं रहा और जल, अन्न और छाया की भरपूरता रही, अन्य आवश्यक चीजों की भी सबके लिये विपुलता हुई।

शूमाकर आगे कहते हैंः आप कल्पना तो कीजिए-सभी निरोग स्त्री-पुरुष और बच्चों में से हरेक एक वृक्ष प्रति वर्ष लगाकर उसका पोषण करता रहा तो पाँच वर्षों में बीस वृक्ष खड़े हो जाएँगे। कागज के एक टुकड़े पर कोई भी हिसाब कर सकेगा कि सुबुद्ध पद्धति से यह कार्यक्रम लागू किया तो इसका आर्थिक मूल्य भारत में अब तक चलाई गई पंचवार्षिक योजनाओं में से किसी एक ने भी दिये आश्वासन से वह अधिक होगा। सिवाय इसके यह योजना एक पैसे की भी विदेशी सहायता न लेते हुए कार्यान्वित का जा सकती है। इसकी वजह से अन्न, (वस्त्रों के लिये) रेशा, गृह-निर्माण की आवश्यक चीजें, छाया, जल और मनुष्य को आवश्यक करीब सभी वस्तुएँ इन वन-विस्तारों के उत्पादन में से प्राप्त हो जाएँगी।

भगवान बुद्ध की अहिंसा की सिखावन भारत से बाहर ले जाने का बहुत सा श्रेय सम्राट अशोक के पुत्र-पुत्री के पास जाता है। कलिंग देश के साथ हुए युद्ध में मानव-हिंसा का क्रूर-वीभत्स दर्शन हुआ था। उससे चन्द्र अशोक का परिवर्तन सौम्य, शान्ति-प्रेमी अशोक में कैसा हुआ था यह इतिहास विख्यात ही है। आगे के सभी युगों के भारतीयों के लिये अशोक-स्तम्भ मानव-जीवन में शान्ति और सौहार्द किस तरह विकसित होंगे इसका उपदेश करते हुए अभी भी खड़े हैं। श्रीलंका, चीन, जापान इत्यादि देशों में सर्वत्र बौद्ध धर्म का स्वागत हुआ तो मानव-विश्व में सख्य और सेवा का व्रत प्रसृत करने वाले बुद्ध-अशोक के सन्देश के कारण ही। धर्म प्रचार-प्रसार का सौम्य, शान्तिपूर्ण तरीका बौद्ध धर्म ने पेश किया है।

जिन लोगों को अपना स्वातन्त्र्य प्रिय है और गुलामी किस कारण से आती है यह मालूम है उन सभी का यही मन्त्र रहेगा- स्वावलम्बन, स्व-कष्ट का भरोसा और अपनी मर्यादा समझकर, पहचानकर पैर पसारने का निश्चय। इससे कहीं इधर-उधर हो गए तो शरीर की तथा मन की गुलामी स्वीकारनी पड़ती है। इसलिये राम-कृष्ण-बुद्ध-महावीर इन महामानवों ने संयम का, विवेक का, मित्रता का और अध्यात्म-साधना का व्रत चलाया। उसके लिये सत्य और प्रेम इन मूल्यों के आधार-स्तम्भों की आवश्यकता पहचान ली। प्रकृति के, निसर्ग रमणीय परिसर के प्रेम में ये सभी नित्य रहे। इन्हें मालूम था कि चित्त-शान्ति का वरदान मानव-निर्मित ऊँचे महलों में या बाह्य ऐश्वर्य में प्राप्त नहीं होता। नैसर्गिक ऐश्वर्य ही वस्तुतः शान्तिदायी होता है। इन सभी के निर्वाण भी सागर-तत्व इन महापुरूषों के रूपोंं में व्याप्त हो गया यह श्रद्धा इस देश में दृढ़ रही है। ब्रह्मदेव एवं अन्य देवताओं ने श्रीकृष्ण-जन्म से पहले स्तवन करते समय सत्य का ही जिक्र किया है- यह सत्य-स्वरूपता इन चारों महात्माओं पर समानरूप से लागू होती है-

सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं
सत्यस्य योनिंं निहितं च सत्ये।
सत्यस्य सत्यमृत सत्य नेत्रं
सत्त्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः।। -(महापुराण भागवत)


मात्र भारतीयों की ही यह प्रत्ययात्मक भूमिका रही ऐसा नहीं है। मानव विश्व में सभी युगों में जो-जो महान व्यक्ति, अखिल धर्म-विचार व धर्म-संस्थापक, पथ-प्रवर्तक हुए उन सभी ने सत्य-प्रेम-दया-करुणा ही सिखाए। विश्व-मैत्री का इन्होंने जो आह्वान किया उसे वैदिक ऋषि की प्रार्थना में प्राचीन काल में ही स्थान प्राप्त कियाः मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे। हम सभी परस्पर की ओर मित्रत्व की आँख से ही देखेंगे।

इसी के साथ जुड़ी है वैदिक ऋषि की एक अन्य प्रार्थनाः

समानीव आकूतिः समाना हृदयानिवः।
समानमस्तु वो मनो यथावः सुसहासती।।


हम सबकी समझ समान हो, हमारे हृदय समभाव से भरपूर हों, हमारे मनों की धारणा समान हो जिससे हमारा संघटन सुघड़-सुन्दर हो।

आज विश्व भर में सर्वत्र इसी भाव की, इसी प्रार्थना की आवश्यकता है। प्रकृति और मानव के आरोग्य के लिये, सन्तुलन के लिये यही सम्बल होगा।

परन्तु मनुष्य का धरती पर, अब तक जो निवास हुआ है इसका इतिहास कहता है कि यह शिक्षा ग्रहण करके पूर्णतः आचरण में उतारने का पराक्रम मानव-जाति से हुआ नहीं। सभी काल के महात्माओं का दुःख व्यास की प्रसिद्ध उक्ति में ठीक-ठीक शब्दांकित हुआ हैः

ऊर्ध्व बाहुं विरोम्येष नच कश्चित् श्रुणेतिमाम्।
परोपकारस्तु पुण्याय पापाय परपीडनम्।।


हाथ ऊँचा उठाकर मैं कहता आया हूँ कि- परोपकार ही पुण्यप्रद है और दूसरों को पीड़ा देने जैसा दूसरा पाप नही है। परन्तु मेरे कहने पर कोई ध्यान नहीं देता है, कोई सुनता ही नहीं है।

इन सभी महात्माओं में से किसी को भी मृत्यु भयकारी नहीं लगती थी। ‘जातस्य हि धृवो मृत्युः’। जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। यह जीवन का सत्य हँसते हुए स्वीकारना होता है। उसका हौवा क्यों खड़ा करना? इतना ही नहीं, मृत्यु का अवभान नम्रता सिखाता है, विरक्ति का भाव निर्माण करता है और सदाचार की प्रेरणा भी दे सकता है। दूसरों को बचाने के लिये, उनकी सेवा करते हुए भी प्राण त्यागने की तैयारी रखना यह सच्ची वीरता है। ऐसी वीरता ईश्वर-निष्ठा की प्रतीक होती है। और सत्य के लिये जीवन समर्पित करने की वीरता तो मानवता का भूषण है।

येशू खिस्तका अद्भुत जीवन इस तरह का मानवता का भूषण रहा जो शतकानु-शतक सबको प्रेरणा देता आया है। जिन्हें ईश्वर के अमृतमय प्रेम स्वरूप का, दयार्द्रता का प्रत्यात्मक साक्षात्कार हुआ उन येशू अथवा मुहम्मद पैगम्बरों के जैसे ईश्वर-दूतों ने भी भ्रातृभाव की, सेवा-व्रत की और सादे-सरल जीवन की शिक्षा अपने जीवन से और वाणी से दी। शोषण के आधार से समाज-धारणा होती नहीं, बल्कि समाज की एक-संघता, पारस्परिकता शोषण के कारण, अत्याचारों के परिणामस्वरूप टूटती है, बिखरती है- यही इन महा-मानवों ने दुनिया को अपने शिष्य और अनुयायियों को समझाने की पराकाष्ठा की थी।

अपने गिरि-प्रवचन में येशू ने अखिल मानव जाति को जागृत किया है। उसका एक-एक वाक्य मानव के आन्तर्विकास की ओर अँगुली निर्देश करता है। वह कहता हैः

जो स्वभाव के गरीब होते है, वे भाग्यशाली होते हैं; क्योंकि स्वर्ग का राज्य उनके लिये होता है।

जो सहनशील होते हैं, वे भाग्यवान हैं, कारण पृथ्वी की विरासत उन्हें मिलती है।

जो सद्गुणों के भूखे और प्यासे होते हैं उनकी भूख और प्यास तृप्त की जाती है, इसलिये वे भाग्यवान हैं।

जो शुद्ध-हृदय हैं वे सच्चे भाग्यवन्त, कारण उन्हें ईश्वर का साक्षात्कार प्राप्त होता है।

शान्ति के उपासक भाग्यवान होते हैं। कारण उन्हें ईश्वर के बालकोंं के रूप में गौरवान्वित किया जाएगा।

मैं तुमसे कहता हूँ कि दुष्टता का, आक्रमण का प्रतिकार मत करो। किसी ने तुम्हारे दाहिने गाल पर चपत मारी तो अपने बाएँ गाल को भी उनकी ओर कर दो।

मैं तुमसे कहता हूँ कि जो तुम्हें अभिशाप देंगे उन्हें आशिष दो, जो द्वेष करेंगे उनसे भला बर्ताव करो और जो तुम्हारा अपमान करके उपयोग करते रहेंगे, तुम्हें तकलीफ देते रहेंगे, उनके लिये तुम प्रार्थना करो।

ऐसा करने से तुम स्वर्गस्थ ईश्वर के बच्चे बन सकोगे। कारण वह अपने सूर्य का उदय अच्छे और बुरे उभय प्रकार के लोगों के लिये कराता है और न्याय व अन्यायी दोनों के लिये वह वर्षा भेजता रहता है।

सार्वकालीन सत्य को येशू ने अत्यन्त सरल भाषा में सामान्य लोगों के लिये प्रकट किया। आत्मप्रत्यय का, निश्चयात्मक अनुभूति का प्रसार उसके शब्द-शब्द में से भर-भरकर प्रवाहित होता है।

येशू आगे कहता है- तुम सरल दरवाजे से प्रवेश करना, कारण बड़ा दरवाजा और चौड़ा मार्ग विनाश की ओर जाते हैं और इनमें अनेक लोग प्रवेश करते हैं। परन्तु जीवन की तरफ ले जाने वाला दरवाजा सरल होता है और मार्ग अरुन्द रहता है व थोड़े लोगों को ही इसका पता होता है।

येशू बताता है कि जो मेरा यह कहना सुनता है और उस तरह व्यवहार करेगा तो मैं उसे प्रज्ञावान कहूँगा। क्योंकि वर्षा फूट पड़ी, बाढ़ का आक्रमण हुआ और तूफान ने मकान घेर लिया तो भी वह गिरा नहीं, कारण वह पत्थर की नींव पर बाँधा गया था।

और जिसने इन वचनों में सुझाया वर्तन प्रत्यक्ष व्यवहार में उतारा नहीं, उसे मूर्ख ही कहना होगा, कारण उसने अपना घर रेत की नींव पर खड़ा किया और संकट काल में वह धराशायी हो गया।

धरती पर रहने वाली मानव जाति को चाहिए कि वह प्रेम के और सहयोग के पत्थर पर मकान बाँधे, भोग के लिये स्पर्धा के लिये ईश्वर-दत्त-प्रकृति का विनयोग हुआ तो मूर्खता पल्ले में आएगी और विनाश अटल होगा। समूचा ख्रिश्चन-विश्व येशू के स्पष्ट शब्दों में सुझाये मार्ग को चुन-चुन लेंगे तो? तो शेष मानव-जाति उसी अरुन्द रास्ते की ओर मुड़े बिना नहीं रहेगी।

येशू का परमभक्त आसिसीका सेंट फ्रांसिस स्वेच्छा से दारिद्र्य स्वीकारने वाला विलक्षण प्रेमी सन्त था। वन के हिंंसक पशुओं के साथ भी उसकी दोस्ती थी। ‘अहिंसा प्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ बैर त्यागः। इस योगसूत्र का मूर्तिमन्त उदाहरण था वह। प्रत्येक श्रेष्ठ धर्म में सेंट फ्रांसिस जैसे तेजस्वी तारक सभी युगों के लिये प्रकाश-दीप बनकर रहते हैं।

मनुष्य को पैसे का कितना लोभ रहता है यह सरल हृदय के, निष्पाप मुहम्मद पैगम्बर साहब ने जाना हुआ था। ‘इस्लाम’ यानी शान्ति। वह तभी मनुष्य को मिलती है जब उसका लोभ मिट जाता है, ‘चाहिए-चाहिए’ की रट अस्तंगत हो जाती है। ‘कुरान शरीफ में’ मूल मुद्दल पर सूद लेने की सख्त मनाई है। आज की दुनिया में सूद के बिना आर्थिक व्यवहार का कदम ही नहीं उठता! इस अधर्म का मुहम्मद साहब को कितना तिरस्कार था। उनके सम्बन्ध में ऐसी कथा बताई जाती है कि वे किसी सम्बन्धी से मिलने जा रहे थे तब दूर से ही उन्हें एक मकान दिखाई पड़ा। उन्होंने पूछा- यह मकान किसका है? उन्हें बताया गया कि वही तो मकान है जिसके मालिक से आप मिलने जा रहें हैं। तुरन्त मुहम्मद साहब ने कह दिया। तब तो हम वापस जाएँगे। मैं इनसे मिलने नहीं जा सकता वह मकान आलीशान था, पर्दे झिलमिला रहे थे। अमीरी का ऐश्वर्य खिड़कियों में से झाँक रहा था। अन्याय और शोषण किये बिना अधिक पैसा कैसे कमा सकता है कोई भी? यही उनको सुझाना था।

कुरान शरीफ में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि धर्म के, मजहब के क्षेत्र में कभी जबर्दस्ती बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। ‘आप लोगों को जबरन मजहब कबूल करने को कहेंगे क्या? जबकि मजहब की श्रद्धा तो ईश्वर से, अल्लाह से ही आती है यह मालूम होकर भी?’

ईश्वर का एकत्व और मानव-जाति की बन्धुता ये दो तत्व इस्लाम की खास विशेषताएँ हैं।

प्रत्येक राष्ट्र के लिये कोई सन्देशवाहक और मार्गदर्शक ईश्वर की ओर से निश्चित किये गए थे यह इस्लाम की मान्यता है और सभी से बन्धुत्व का-भाईचारे-का, रिश्ता ही रखना- यह दूसरी महत्वपूर्ण मान्यता भी है इसके साथ। बन्धुत्व ही शान्ति का रहस्य है यह इस्लाम का अनुभव भी है इस्लाम की यह देन सर्वत्र व्यवहार में उतर सकेगी तो सभी धर्म-पन्थों की मूलभूत एकता आध्यात्मिक जागृति का शंख बजाने के लिये तैयार हो सकती है।

विशेष बात यह भी है कि इस्लाम के अहाते में सूफी सन्तों की परम्परा भारतीय वेदान्ती सन्यासियों की परम्परा के समान गूढ़वादी और जीवन की एकात्मता की पुष्टि करने वाली है। प्रत्यक्ष आन्तरिक अनुभूति के बिना शाब्दिक ज्ञान को तनिक भी महत्त्व न देने वाली सूफियों की परिपाटी है। उनका फक्कड़पन उनके साधुत्व को, वैराग्य को, अधिक ही तेज, तीखापन बहाल करता है। ऐश-आराम को सूफियों में तनिक भी जगह नहीं है।

मध्य युग में आठवें शतक में राबिया नाम की सूफी सन्त विख्यात हो गई। उसके बचपन में अकाल पड़ा और वह अनाथ हो गई। किसी ने उसे उठाकर बसरा शहर के एक अमीर को चाँदी के छः सिक्कों में बेच दिया। राबिया तेज दिमाग की, रोशनदार लड़की थी। उसका यह अमीर मालिक उसे बहुत तकलीफ देता था, उससे खूब काम करवाता था। एक बार उसने भागने की कोशिश की, परन्तु जंगल में प्रवेश करते समय वह गिर गई और उसका हाथ टूटा। निराश होकर वह वापस मालिक के पास आयी। गुलाम होकर भी उसके दिल की उदारता कम नहीं हुई थी। एक बार वह मालिक के साथ उसके घोड़े की गाड़ी में बैठकर शहर गई थी। मालिक तो अपना काम करने के लिये निकल गया। राबिया अकेली ही गाड़ी में बैठी थी। कोई गरीब आदमी उसके पास भीख माँगने पहुँचा। आगे-पीछे का विचार न करते हुए राबिया ने मालिक की गाड़ी में रखी तलवार ही भिखारी को दे डाली। मात्र अल्लाह की पागल बनी राबिया किसी का भी दुख-दर्द सह नहीं सकती थी।

ऐसी यह अल्लाह की आशिक बनी राबिया उसी के ख्वाब में हमेशा मगन रहा करती थी। घर के सारे काम-काज वह अकेले करती थी। रात को भी उसी के लिये उसको जागकर सब निपटाना पड़ता था। एक बार रात को अपना काम खत्म करके वह अपने कमरे में इबादत-प्रार्थना-बोलती हुई बैठी थी। मालिक के महल में उसका कमरा मालिक की खिड़की से दिखाई पड़ता था। उसे राबिया का बूत बना रूप उस रात को नजर आया। लेकिन उसने जो देखा उससे वह चौंक गया। राबिया के सिर पर एक दीपक बिना रस्सी बँधा खाली जगह मेंं तैरता हुआ अपनी रोशनी फैला रहा था। वह रोशनी कुदरती नहीं थी- दिव्य थी। उसे देखकर मालिक के मन में राबिया के लिये महानता का भाव जागा। उसने सोचा- इस अल्लाह की बन्दी को मैंने कितनी तकलीफ दी। अपने को वह माफ नहीं कर सका। सबेरे उठकर उसने राबिया को बुलाकर बताया- अब से तू मेरी गुलाम नहीं है। आजाद हो तुम, जहाँ जाना चाहो, रहना चाहो तुम जा सकती हो। अल्लाह के राह पर आगे बढ़ो, बेटी!’

और राबिया जंगल की ओर दौड़ पड़ी। उसे आजादी का समारोह मनाना था एकान्त में। अपने हाथों से उसने एक घास-फूस की झोंपड़ी बना ली। खजूर के अनेक पेड़ आस-पास में थे। वे उसके साथी-सखा बने। धीरे-धीरे हिरन, सर्प, बिच्छू, अनेक पक्षी, क्रूर पशु सभी से राबिया की दोस्ती हो गई। इस वनवासी लड़की का नाम सर्वतोमुखी हो गया। उससे अनेक सवाल पूछे जाने लगे ,चर्चाएँ होने लगीं, रूहानियत-अध्यात्म की इस मूर्तरूप का मार्गदर्शन पाने के लिये कहाँ-कहाँ से लोग आने लगे। एक बार एक मौलवी जी उससे मिलने आ रहे थे। दूर से ही उन्होंने देखा कि राबिया के आस-पास, उसकी गोद में बिच्छू-सर्प, हिरन और पक्षी आराम से बैठे या खड़े थे, लेकिन उनकी आहट पाकर ये सब भाग निकले। सर्प अपने बिल में छिप गया। हिरन घने जंगल में दौड़ता चला गया। पक्षी ऊँची टहनी पर बैठ गए! मौलवी जी ने राबिया से बड़े दुख के साथ पूछा- राबिया क्या बात है कि मेरे नजदीक आने पर ये सारे तुम्हारे दोस्त हट क्यों गए? राबिया ने इसका जवाब देने से पहले उनसे पूछा- मौलवी जी आज आप खाना खाकर आए होंगे, क्या खाया आपने? उन्होंने जवाब दिया- ‘कबूतर का गोश्त!’ तब राबिया ने जवाब में सवाल ही किया। जिसके पेट में पक्षी का गोश्त पड़ा हो, क्या उसके कन्धे पर जिन्दा पक्षी बैठ सकता है? क्या कोई भी जिन्दा जानवर उससे दोस्ती करेगा कभी? विशुद्ध प्रेम की, अहिंसा की परिपक्वता हिंसक, क्रुद्ध पशुओं का आक्रमण स्वभाव भी बदल देता है- इस अर्थ का योगसूत्र का कहना राबिया के जीवन में सिद्ध हो गया था।

भगवान बुद्ध के जीवन में अँगुलीमाल की कथा तो यह भी सिद्ध करती है कि मानव का क्रूर स्वभाव भी बदल जाता है, वैरभाव का शमन होता है और अत्याचारी परोपकारी साधु-स्वभाव में परिवर्तित हो जाता है। यह सर्वव्याप्त प्रेम-शक्ति का ही चमत्कार है। वैज्ञानिक खोजों से जो नया मानवी विश्व बना है- अत्याचार को, भोग को, सृष्टि के अपमान को दबाने वाला व्यवहार पनप चुका है उसका उपाय क्या राबिया के, बुद्ध-महावीर के जीवन में नहीं सुझाया गया है।

राबिया से किसी ने पूछा- राबिया, ‘सेटन’ का अल्लाह के विरोधक शैतान का-विचार तुम्हारे मन में आकर तुम्हें डराता नहीं है कभी? राबिया ने जवाब दिया- ‘मेरे दिल में अल्लाह के प्यार के सिवा दूसरी किसी चीज के लिये जगह ही कहाँ है? तब शैतान की बात उठेगी ही कैसे मन में?’ उसकी झोपड़ी में किसी भी चीज का संग्रह नहीं था। पानी का एक छोटा मटका, प्रार्थना के लिये एक चटाई, वही उसका बिछौना था और ‘रोजा’ यानी ‘उपवास’ तो उसे रोज ही होता है। खजूर के पेड़ इतने निकट वर्षानुवर्ष होते हुए भी उसने उनका स्वाद कभी चखा नहीं था। ‘दि लेस यू हैव, दि मोर यू आर।’ संग्रह जितना कम, उतने आप अधिक हो जाते हैं, व्याप्त हो जाते हैं। यह सूत्र मानो राबिया के कारण जिन्दा हो गया। यह सर्वत्र हो जाना, सभी का होकर रहना यानी ‘अहं’ के मर्यादित खेल को विराम देना। सहजता से भोगासक्ति और युद्ध-प्रवृत्ति को विश्राम मिल जाता है। विश्व-मैत्री के लिये हृदय का आँगन खुल जाता है। प्रकृति के सभी आविष्कारों के लिये रह जाती है प्रेम की, प्रणाम की भाव-सम्पन्नता। राबिया के दिल में दूसरा भाव टिकना असम्भव हो चुका था। बाद के काल में राबिया का परिचय ‘इस्लाम की मीरा’ के रूप में हो गया था यह स्वाभाविक ही था।

महाराष्ट्र में तुकाराम की तड़पन भी राबिया के हृदय के समान ही थी। अपने गाँव से- देहू से तुकोबा। पंढ़रपुर जा रहे थे पैदल उनके ध्यान में आया कि वे चलकर नजदीक आये कि पेड़ पर बैठे पक्षी उड़कर दूर जाते हैं। तुकोबा को इसका बहुत दुख लगा। उन्होंने निश्चय किया कि जब तक पक्षी मेरे कन्धे पर, सिर पर नहीं बैठेंगे जैसे वे वृक्षों पर निश्चित, निर्भर होकर बैठते हैं, तब तक मैं यहाँ पेड़ के नीचे स्थिर खड़ा रह जाऊँगा। एक कदम भी नहीं आगे नहीं बढ़ूँगा और तुकोबा की उग्र तपस्या प्रारम्भ हो गई। वे घंटों तक खड़े रह गए, दिन-रात में कोई फर्क नहीं हुआ। आखिर पक्षी उन्हें देखकर सोचने लगे होंगे कि यह आदमी है या पेड़? कहीं भी इनके शरीर पर बैठें, बोलें, गावें, तो भी यह हिलता नहीं डुलता नहीं जब तुकोबा ने बिट्ठल नाम स्मरण करते-करते देख लिया कि अब ये पक्षी मुझसे निर्भय हो गए हैं, मुझसे दोस्ती हो गई गई। तब धीरे-धीरे वे कदम बढ़ाने लगे अब परिचय हो चुका था पक्षियों को! वे क्यों डरेंगे? आराम से बैठे ही रहे वे, भले तुकोबा ने मार्ग पर चलना शुरू क्यों न किया हो? पक्षियों से सधा हुआ यह सख्य भाव, एकात्मता का परिचायक था। तुकोबा आनन्द का और शान्ति का यह वरदान पाकर विभोर हो गए!

मुहम्मद साहब के समान ही नानक गुरु को भी समाज के गरीबों के शुद्ध हृदय का परिचय देने के लिये काम करना पड़ा। उन्हें एक श्रीमन्त-व्यक्ति ने भोजन का निमन्त्रण दिया। नानक गुरु उसके घर गए नहीं और एक गरीब का आमन्त्रण स्वीकार करके उसके घर वे चले गए। तब अमीर को बुरा लगा और उसने नानक गुरु से कहा कि आपने ऐसा क्यों किया? मेरे घर में भोजन करने क्यों नहीं आये? नानक देव ने उससे कहा, ‘कल तुम्हारे घर की रोटी लेकर आओ मेरे पास।’ और इधर गरीब से भी कहा- तुम भी ले आओ तुम्हारे घर की रोटी। दोनों आए अपने-अपने घर की रोटी लेकर। काफी लोग गुरु के पास इकट्ठे हुए उन सबके सामने गरीब की रोटी का टुकड़ा तोड़कर अपने हाथ से नानक गुरु ने उसे निचोड़ा तो उसमें से दूध निकल आया। लोग देखते रह गए फिर अमीर की रोटी तोड़कर गुरु ने उसे भी निचोड़ा तो उस में से खून टपका। सब लोग हैरान रह गए। तब गुरुनानक ने बताया- शुद्ध हृदय सबसे बड़ी कीमती चीज है। वही वाहेगुरु को पसन्द आती है। अत्याचार, ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध ये शोषण के साधन हैं। उस में से तो खून ही टपकेगा न? गरीब का अन्न पसीना बहाकर कमाया था, शुद्ध-पवित्र भावना थी उसमें।

 

 

सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम संख्या

अध्याय

1.

वायु, जल और भूमि प्रदूषण

2.

विकास की विकृत अवधारणा

3.

तृष्णा-त्याग, उन्नत जीवन की चाभी

4.

अमरत्व की आकांक्षा

5.

एकत्व ही अनेकत्व में अभिव्यक्त

6.

निष्ठापूर्वक निष्काम सेवा से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति

7.

एकात्मता की अनुभूति के लिये शिष्यत्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका

8.

सर्व-समावेश की निरहंकारी वृत्ति

9.

प्रकृति प्रेम से आत्मौपम्य का जीवन-दर्शन

10.

नई प्रकृति-प्रेमी तकनीक का विकास हो

11.

उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम

12.

अपना बलिदान देकर वृक्षों को बचाने वाले बिश्नोई

13.

प्रकृति विनाश के दुष्परिणाम और उसके उपाय

14.

मानव व प्रकृति का सामंजस्य यानी चिपको

15.

टिहरी - बड़े बाँध से विनाश (Title Change)

16.

विकास की दिशा डेथ-टेक्नोलॉजी से लाइफ टेक्नोलॉजी की तरफ हो

 

 

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