कुदरत की बातें कर रहीं हैं किताबें

Submitted by RuralWater on Sun, 01/07/2018 - 16:14
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दैनिक जागरण, 07 जनवरी 2018

दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेला में न सिर्फ मानव सम्बन्धों पर आधारित किताबें हैं, बल्कि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का आधार लिये किताबों की भी बहुतायत है। स्मिता बता रहीं हैं कि अब ऐसी किताबें पाठकों को खूब पसन्द आ रही हैं तभी तो इस बार पुस्तक मेले की थीम भी यही है...

मीलों तक फैले जंगलों और उनमें रहने वाले वन्य जीवों को सबसे अधिक नुकसान इंसानों ने पहुँचाया है। आजादी से पहले जंगल को बचाने के लिये लोगों ने जंगल सत्याग्रह चलाया और फिर आजादी के बाद सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में चिपको आन्दोलन शुरू किया गया। इन्हीं वन आन्दोलनों पर आधारित वाणी प्रकाशन से इतिहासकार-लेखक शेखर पाठक की एक नॉन-फिक्शन किताब ‘हरी-भरी उम्मीद’ मेले में आई है।

एक ऐसा महाआयोजन जहाँ जिस भी स्टॉल पर नजर दौड़ाएँगे, आपको प्रकृति, धरती, पर्यावरण और तेजी से चारों ओर हो रहे विकास कार्यों के दुष्परिणाम के रूप में जलवायु सम्बन्धी किताबें नजर आ जाएँगी। कुछ हाल में प्रकाशित किताबें हैं, तो कुछ यहीं से आगाज कर रही हैं। कुछ पुरानी किताबें अपने नए संस्करणों के साथ भी आईं हैं। बात हो रही है दिल्ली में कल से शुरू हुए विश्व पुस्तक मेले की, जहाँ हर तरफ पर्यावरण थीम की किताबें मौजूद हैं।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा कहते हैं, ‘पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग इस समय विश्व भर के लिये चिन्ता के विषय बने हुए हैं। लोगों को प्रकृति, पर्यावरण और जलवायु संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिये ही पुस्तक मेले की यह थीम रखी गई है। इस विषय पर अंग्रेजी में कई नॉन-फिक्शन किताबें और फिक्शन किताबें लिखी गई हैं मगर इन दिनों हिन्दी में भी इस विषय पर लगातार काम हो रहा है।’

प्रेम कहानी में ग्लोबल वार्मिंग


ग्लोबल वार्मिंग के बीच एक खूबसूरत प्रेम कहानी पर आधारित ‘रेखना मेरी जान’। रत्नेश्वर का यह उपन्यास कई महीने पहले बाजार में आ गया था। अमेजन पर अब तक इसकी लाखों प्रतियाँ बिक चुकी हैं। नॉवेल्टी एंड कम्पनी से प्रकाशित इस किताब को मेले में भी पाठक हाथों-हाथ ले रहे हैं। रत्नेश्वर इसकी वजह बताते हैं, हिन्दी साहित्य पिछले 4 दशकों से सम्बन्धों की कहानियों के भीतर ठहर सा गया है, जिससे पाठक ऊबने लगे थे। मानव सम्बन्धों के अलावा, हमारे इर्द-गिर्द कई गम्भीर कथा विषय बिखरे पड़े हैं। इनमें से सबसे प्रमुख है ग्लोबल वार्मिंग।

मानव सभ्यता यदि अभी सचेत नहीं हुई, तो वैज्ञानिकों के अनुसार 30-35 वर्षों बाद दुनिया के कई देश डूबने के कगार पर होंगे। समुद्र के बढ़े जलस्तर के कारण पहले बांग्लादेश, म्यांमार और इंग्लैंड डूबेगा फिर भारत की बारी आएगी। पाठक-आलोचक मुकेश कुमार सिन्हा अपनी फेसबुक वॉल पर कहते हैं, ‘यह उपन्यास अपने खास विषय और अलग लेखनशैली के कारण पाठकों की पसन्द बना हुआ है। विषय, कथ्य और शिल्प के कारण हिन्दी साहित्य में यह विशेष जगह बना सकता है।’ ‘रेखना मेरी जान’ के अलावा पुस्तक मेले में और भी कई किताबें हैं, जो न सिर्फ जलवायु परिवर्तन के प्रति चिन्ता जताती हैं, बल्कि पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरुकता भी पैदा करती हैं।

प्रकृति बचाने की अपील


मीलों तक फैले जंगलों और उनमें रहने वाले वन्य जीवों को सबसे अधिक नुकसान इंसानों ने पहुँचाया है। आजादी से पहले जंगल को बचाने के लिये लोगों ने जंगल सत्याग्रह चलाया और फिर आजादी के बाद सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में चिपको आन्दोलन शुरू किया गया। इन्हीं वन आन्दोलनों पर आधारित वाणी प्रकाशन से इतिहासकार-लेखक शेखर पाठक की एक नॉन-फिक्शन किताब ‘हरी-भरी उम्मीद’ मेले में आई है। शेखर कहते हैं, ‘हमारे जीवन के केन्द्र में है जंगल। उसी से हमें खाद्य पदार्थ, पानी, जड़ी-बूटी, कन्दमूल आदि मिलते हैं। फिर भी हम हरे-भरे जंगलों की अन्धाधुन्ध कटाई कर इमारतें और खेत बनाने में लगे हुए हैं। मेरी किताब न सिर्फ वन आन्दोलनों पर आधारित सात सौ पन्नों का शोधग्रंथ है, बल्कि इसके जरिए लोगों से जंगलों को बचाने की अपील की जा रही है।’

कुछ साल पहले ‘चिपको आन्दोलन’ की पृष्ठभूमि पर नवीन जोशी का लिखा उपन्यास ‘दावानल’, देवेन्द्र मेवाड़ी का संस्मरण ‘मेरी यादों का पहाड़’ और प्रवासी साहित्यकार अभिमन्यु अनत का उपन्यास ‘एक उम्मीद और’ भी बुक स्टॉलों पर प्रमुखता से दिख रहा है। ‘एक उम्मीद और’ में गर्भस्थ शिशु लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिये प्रेरित करता है। यह उपन्यास न सिर्फ सामाजिक एवं प्राकृतिक पर्यावरण के प्रदूषण पर सार्थक चिन्ता जताता है बल्कि उनसे निजात पाने के सार्थक संकेत भी देता है।

ट्रैवलिंग बना ट्रेंड


लेखक और ब्लॉगर उमेश पन्त ने लगातार 18 दिनों तक उत्तराखण्ड के धारचूला कस्बे से ऊपर के हिमालय क्षेत्र आदि कैलाश, ओम पर्वत की यात्राएँ कीं, जिसके आधार पर उन्होंने यात्रा वृतान्त ‘इनरलाइन पास’ लिखा। उमेश कहते हैं, ‘इन क्षेत्रों में नदी के बहाव वाले इलाकों में लोगों ने घर बना लिये हैं। जिस दिन नदी अपने बहाव वाले रास्तों पर वापस आएगी, उस दिन वह सब कुछ बहाकर अपने साथ ले जाएगी। पर्यावरण के प्रति हो रहे इस तरह के खिलवाड़ के प्रति लोगों को मैंने इस किताब में चेताया है।’

हिंदयुग्म से प्रकाशित इस किताब को प्रमुखता से स्टॉल पर लगाया गया है। अजय सोडानी की किताब ‘दर्रा-दर्रा हिमालय’ भी मेेले में खूब रंग जमा रही है। इस बार इसी किताब की शृंखला ‘दरकते हिमालय पर दर बदर’ मेले में आ रही है, जिसमें लेखक ने पौराणिक पात्रों की हिमालय के क्षेत्र में की गई यात्राओं के अलावा, पर्यावरण के प्रति भी गहरी चिन्ता जताई है।

पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर आधारित किताबों को पाठक खासकर युवा खब पसन्द कर रहे हैं। उमेश कहते हैं, ‘हाल में ट्रैवलिंग एक ट्रेंड के रूप में उभरा है। व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर युवा आस-पास की नदियों, पर्वतों और पहाड़ों को देखते हैं। यदि उन्हें कहीं भी इनका नुकसान दिखता है तो वे न सिर्फ चिन्तित होते हैं, बल्कि आलेख, यात्रा वृतान्त, उपन्यास आदि लिखकर दूसरों को भी पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाते हैं।’

अनुभव से बनतीं असरदार


पुस्तक मेले में लेखक भालचन्द्र जोशी का नया उपन्यास ‘प्रार्थना में पहाड़’ आया है। भालचन्द्र ने भले ही मध्य प्रदेश के मालवा अंचल के धार, झाबुआ और खरगोन के आदिवासियों के जीवन पर उपन्यास लिखा लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में पर्यावरण ही है। कहानी में शराब फैक्टरी के कचरे से नदी का पानी जहरीला हो जाता है, जिसे पीकर लोग मरने लगते हैं। भलचन्द्र कहते हैं, ‘हिन्दी में समय-समय पर पर्यावरण की किताबें तो लिखी गईं लेकिन वे पाठकों को आकर्षित नहीं कर पाईं। दरअसल, लेखक जब तक खुद अनुभव न कर ले या वैज्ञानिक शोधों से रूबरू न हो जाये, तब तक विश्वसनीय तथा असरदार उपन्यस लिखना मुश्किल है।’ भालचन्द्र खुद जंगलों, पहाड़ों और आदिवासियों के बीच रहे और असलियत का पता लगाया। इसी तरह रत्नेश्वर ने भी ‘रेखना मेरी जान’ अपने अनुभवों और वैज्ञानिक शोधों से रूबरू होने के बाद लिखी।

किताबें पुरानी बातें नई


कुछ साल पहले लिखी गई किताबें जैसे कि कथाकार संजीव की ‘रह गईं दिशाएँ इसी पार’, महुआ माजी की, ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’, मृदुला गर्ग की ‘कठगुलाब’, अलका सरावगी की ‘एक ब्रेक के बाद’, राजकिशोर की ‘सुनंदा की डायरी’, रणेंद्र की ‘ग्लोबल गाँव के देवता’, के वनजा की ‘साहित्य का पारिस्थितिक दर्शन’ आदि प्रकृति और पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक कर रही हैं।

इनके अलावा, अमेरिक लेखिका एदिता मोरिस के हिन्दी में अनूदित बहुचर्चित उपन्यास ‘हिरोशिमा के फूल’ तथा ‘वियतनाम को प्यार’ भी हैं जो लोगों को पर्यावरण से छेड़छाड़ के दुष्परिणामों की ओर इंगित कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शांताकुमार ने अपने उपन्यास ‘वृन्दा’ में बड़े ही खूबसूरत ढंग से एक आंचलिक प्रेमकथा के ताने-बाने में पर्यावरण की चिन्ता को गूँथा है। उपन्यासकार भगवतीशरण मिश्र ने ‘लक्ष्मण रेखा’ उपन्यास में पर्यावरण की समस्या की ओर ध्यान दिलाया है। पर्यावरणविद अनुपम मिश्र की ‘आज भी खरे हैं तालाब’ और ‘राजस्थान की रजत बूँदे’ भी पुस्तक मेले में दिखीं।

कविताओं में प्रकृति


प्रकृति और पर्यावरण पर नॉन फिक्शन के अलावा, फिक्शन और कई कविता संग्रह भी इस बार पुस्तक मेले के मुख्य आकर्षण हैं। कविताओं में भी यह मुद्दा बखूबी दिखाया जा रहा है...अदिति माहेश्वरी, डायरेक्टर, वाणी प्रकाशन

बैकग्राउंड में भी पर्यावरण


इस समय सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन गया है पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन। इसलिये लेखक इनके बारे में सीधी बात कहने के अलावा, कई किताबों के बैकग्राउंड में भी पर्यावरण को रख रहे हैं...प्रणव जौहरी, मार्केटिंग डायरेक्टर, राजपाल

रोचक तरीके से सन्देश


प्राचीनकाल से भारत वर्ष का चिन्तन प्रकृति, पर्यावरण और जलवायु संरक्षण का रहा है। हम प्रकृति को देवी, सूर्य को पिता और वृक्षों को देवता मानते आये हैं। दुनिया की भोगवादी प्रवृत्ति ने इस संकट को बढ़ाया है। वर्षों से भारत में प्रिवेंटिव एफर्ट यानी बीमारी का जड़ से इलाज करने पर काम किया जाता रहा है। हिन्दी की अलग-अलग भाषाओं में पर्यावरण पर बहुत सारी किताबें लिखी गईं है, जो पुस्तक मेले में प्रमुखता से लगाई गई हैं। लोगों को जागरूक करने के लिये संगोष्ठियाँ, सेमिनार, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि भी आयोजित किये जा रहे हैं। श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी के सबद में भी पर्यावरण संरक्षण की बातें कही गईं हैं। इसलिये गुरूवाणी का भी गायन किया जा रहा है। कुल मिलाकर लोगों को रोचक तरीके से सन्देश दिया जा रहा है...बलदेव भाई शर्मा, अध्यक्ष, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास

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