वेदों में पर्यावरण चिंतन, चिंता, चेतावनी

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पाञ्चजन्य, 1 जून 2019

वेदों में पर्यावरण चिंतन, चिंता, चेतावनी।वेदों में पर्यावरण चिंतन, चिंता, चेतावनी।

पर्यावरण का सीधा-सरल अर्थ है प्रकृति का आवरण। कहा गया है कि ‘परितः आवरणं पर्यावरणम्’ प्राणी जगत को चारों ओर से ढकने वाला प्रकृति तत्व, जिनका हम प्रत्यक्षतः एवं अप्रत्यक्षतः, जाने या अनजाने उपभोग करते हैं तथा जिनसे हमारी भौतिक, आत्मिक एवं मानसिक चेतना प्रवाहित एवं प्रभावित होती है, यह पर्यावरण भौतिक, जैविक एवं सांस्कृतिक तीन प्रकार का कहा गया है। स्थलीय, जलीय, मृदा, खनिज आदि भौतिक, पौधे, जन्तु, सूक्ष्मजीव एवं मानव आदि जैविक एवं आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि सांस्कृतिक तत्वों की परस्पर क्रियाशीलता से समग्र पर्यावरण की रचना और परिवर्तनशीलता निर्धारित होती है। प्रकृति के पंचमहाभूत- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर-भौतिक एवं जैविक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। वेदों में मूलतः इन पंचमहाभूतों को ही दैवीय शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है। मानव-कृत संस्कृति का निर्माण मानव मन, बुद्धि एवं अहं से होता है। इसीलिए गीता में भगवान कृष्ण ने प्रकृति के पाँच तत्वों के स्थान पर आठ तत्वों का उल्लेख किया है - ‘‘भूमिरापोनलो वायुः खं मनो बुद्धि रेवच। अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।’’ (श्रीमद्भागवद् गीता अ- 7/4)
 
वेदों में पर्यावरण से सम्बन्धित अधिकतम ऋचाएँ यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में प्राप्त होती हैं। ऋग्वेद में भी पर्यावरण से सम्बन्धित सूक्तों की व्याख्या उपलब्ध है। अथर्ववेद में सभी पंचमहाभूतों की प्राकृतिक विशेषताओं और उनकी क्रियाशीलता का विशद् वर्णन है। आधुनिक विज्ञान भी प्रकृति के उन रहस्यों तक बहुत बाद में पहुँच सका है जिसे वैदिक ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व अनुभूत कर लिया था। इतना ही नहीं, वेदों में प्राकृतिक तत्वों से अनावश्यक और अमर्यादित छेड़छाड़ करने के दुष्परिणामों की ओर भी संकेत किया गया है तथा मानव को सीख भी दी गई है कि पर्यावरण सन्तुलन को नष्ट करने के दुष्परिणाम समस्त सृष्टि के लिए हानिकारक होंगे।
 
यजुर्वेद में पृथ्वी को ऊर्जा (उर्वरता) देने वाली तप्तायनी तथा धन-सम्पदा देने वाली वित्तायनी कहकर प्रार्थना की गई है कि वह हमें साधनहीनता/दीनता की व्यथा और पीड़ा से बचाए ‘तप्तायनी मेसि वित्तायनी मेस्यनतान्मा नाथितादवतान्मा व्यथितात्।’ (यजुर्वेद 5/9)। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में क्षिति-पृथ्वी तत्व का मानव जीवन में क्या महत्व है तथा वह किस प्रकार अन्य चार प्रकृति तत्वों के संग, समायोजनपूर्वक क्रियाशील रहकर, उन समस्त जड़-चेतन को जीवनी शक्ति प्रदान करती है, जिनको वह धारण किए हुए है, की विशद व्याख्या उपलब्ध है। अथर्ववेद में पृथ्वी को, अपने में सम्पूर्ण सम्पदा प्रतिष्ठित कर, विश्व के समस्त जीवों का भरण-पोषण करने वाली कहा गया है। ‘विश्वम्भरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्यवक्षा जगतों निवेशनी’ - (अथर्ववेद 12/16) जब हम पृथ्वी की सम्पदा (अन्न, वनस्पति, औषधि, खनिज आदि) प्राप्त करने हेतु प्रवास करें तो प्रार्थना की गई है कि हमें कई गुना फल प्राप्त हो परन्तु चेतावनी भी दी गई है कि हमारे अनुसंधान और पृथ्वी को क्षत-विक्षत (खोदने) करने के कारण पृथ्वी के मर्मस्थलों को चोट न पहुँचे। अथर्ववेद में पृथ्वी से प्रार्थना की गई है- ‘वतते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदति रोहतु। मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम।।’ - (अथर्ववेद 12/1/35) इसके गम्भीर घातक परिणाम हो सकते हैं। आधुनिक उत्पादन और उपभोग एवं अधिकतम धनार्जन की तकनीक ने पृथ्वी के वनों-पर्वतों को नष्ट कर दिया है। खनिज पदार्थों को प्राप्त करने हेतु अमर्यादित विच्छेदन कर पृथ्वी के मर्मस्थलों पर चोट पहुँचाने के कारण पृथ्वी से जलप्लावन और अग्नि प्रज्ज्वलन, धरती के जगह-जगह फटने और दरारें पड़ने के समाचार हमें प्राप्त होते रहते हैं। खानों में खनन करते समय इसी प्रकार की दुर्घटनाओं ने न जाने कितने लोगों की जानें ही नहीं ली अपितु उन क्षेत्रों के सम्पूर्ण पर्यावरण का विनाश कर उसे बंजर ही बना दिया है। हाल ही में मेघालय की संकरी लगभग 1200 फुट गहरी खदान में अचानक पानी आ जाने की घटना विश्व में घटित इसी प्रकार की तमाम त्रासदियों में से एक है।

वेदों में सभी ऋषियों ने सम्पूर्ण ब्रह्माड में सूर्य की केन्द्रीय सत्ता को वैज्ञानिकता प्रदान की है जिसे आधुनिक विज्ञान अब क्रमशः समझ सकने में सक्षम हो पा रहा है। ऋग्वेद में कहा गया है- ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च दृ’ (ऋग्वेद 1.1 15.1) - अर्थात सूर्य समस्त सृष्टि की आत्मा/जन्मदाता है। सूर्य से पदार्थों को पूर्णता तथा ज्योतिष विज्ञान के अनुसार मानव के जन्म के समय सूर्य तथा उसके आश्रित ग्रह की स्थिति से मानव को समस्त गुण-सूत्र प्राप्त होते हैं। अथर्ववेद में सूर्यदेव को समस्त सृष्टि का प्रादुर्भावकर्ता, अवलंबनकर्ता एवं स्वामी माना गया है।

 अथर्ववेद के अनुसार पृथ्वी का हृदय केन्द्र-बिन्दु आकाश में माना गया है जहाँ से उसको शक्ति मिलती है। वे एक-दूसरे के पूरक हैं। व्योमरूपी आकाश द्यौ (द्युलोक-अतंरिक्ष से परे अपरिमित) को पिता तथा पृथ्वी को माता माना गया है। पृथ्वी को गगन चारों ओर से अपने आलिंगन में आवोष्टित किए हुए है। पृथिवीप्रो महिषो नाधमानस्य गातुरदब्ध्चक्षुः परि विश्रवं बभूव। (अथर्ववेद 13ध्3ध्44)- इसी कारण से जब हम अन्तरिक्ष में व्याप्त इस आवरण (ओजोन परत) को हानिकारक उत्सर्जित गैसों से छिन्न करते हैं तो पृथ्वी का हृदय उच्छेदित होता है।
 
वेदों में अग्नि (पावक) तत्व को सर्वाधिक शक्तिशाली एवं सर्वव्यापक माना गया है। उसे समस्त जड़-चेतन में ऊर्जा, चेतना तथा गति प्रदान करने वाला एवं नव सृजन का उत्प्रेरक माना गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि यस्ते अप्सु महिमा यो वनेषुप य औषधीषु पशुप्वप्स्वन्तः। अग्रे सर्वास्तन्वः संरभस्व ताभिर्न एहिद्रविणोदा अजस्त्र।। (अथर्ववेद 19ध्3ध्2)- हे अग्निदेव आपकी महत्ता जल में (बडवाग्रि रुप में) औषधियों व वनस्पतियों में (फलपाक रूप में), पशु व प्राणियों में (वैश्वानर रूप में) एवं अन्तरिक्षीय मेघों में (विद्युत रूप में) विद्यमान हैं। आप सभी रूप में पधारें एवं अक्षय द्रव्य (ऐश्वर्य) प्रदान करने वाले हों। यजुर्वेद के अनुसार यही अग्नि द्युलोक (अन्तरिक्ष में भी ऊपर परम प्रकाश लोक) में आदित्य (सूर्य) रूप में सर्वोच्च भाग पर विद्यमान होकर, जीवन का संचार करके धरती का पालन करते हुए, जल में जीवनी-शक्ति का संचार करती है। -अग्निर्मूर्धां दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपोरतां सि जिन्वति (3ध्12) पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति एवं समस्त ग्रह नक्षत्र मंडल सहित पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के जिस तथ्य को आधुनिक विज्ञान आज केवल लगभग 200 वर्ष पूर्व ही समझ पाया है, उस भौगोलिक और सौर मंडल के रहस्यपूर्ण तथ्य को हमारे वैदिक ऋषि हजारों वर्ष पूर्व अनुभूत कर चुके थे। अथर्ववेद में ऋषियों ने कहा है- ‘मल्वं विभ्रती गुरुभद् भद्रपापस्य निधनं तितिक्षुः। वरोहण पृथिवी संविदाना सूकराय कि जिहीते मृगाय।’। (अथर्ववेद 12ध्1/48)- अर्थात गुरुत्वाकर्षण शक्ति के धारण की क्षमता से युक्त, सभी प्रकार के जड़-चेतन को धारित करने वाली, जल देने के साथ मेघों से युक्त सूर्य की किरणों से अपनी मलीनता (अंधकार) का निधन (निवारण) करने वाली पृथ्वी सूर्य के चारो ओर भ्रमण करते हैं।
 
 
वेदों में सभी ऋषियों ने सम्पूर्ण ब्रह्माड में सूर्य की केन्द्रीय सत्ता को वैज्ञानिकता प्रदान की है जिसे आधुनिक विज्ञान अब क्रमशः समझ सकने में सक्षम हो पा रहा है। ऋग्वेद में कहा गया है- ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च दृ’ (ऋग्वेद 1.1 15.1) - अर्थात सूर्य समस्त सृष्टि की आत्मा/जन्मदाता है। सूर्य से पदार्थों को पूर्णता तथा ज्योतिष विज्ञान के अनुसार मानव के जन्म के समय सूर्य तथा उसके आश्रित ग्रह की स्थिति से मानव को समस्त गुण-सूत्र प्राप्त होते हैं। अथर्ववेद में सूर्यदेव को समस्त सृष्टि का प्रादुर्भावकर्ता, अवलंबनकर्ता एवं स्वामी माना गया है। ‘सवा अंतरिक्षादजायत तस्मादन्तरिक्ष जायत’ (अ.वे.-13/7/13) - अर्थात सूर्य अंतरिक्ष से उत्पन्न हुए एवं अंतरिक्ष उनसे उत्पन्न हुआ है। आगे कहा गया है - ‘तस्यामू सर्वानक्षत्रा वशे चन्द्रमसा सह’ - (अथर्ववेद 13/7/7) - अर्थात चन्द्रमा सहित समस्त दिन, रात्रि, अंतरिक्ष, वायुदेव, द्युलोक, दिशाओं, पृथ्वी, अग्नि, जल, ऋचाओं एवं यज्ञ से प्रकट हुए हैं। उपरोक्त सभी के अंश, गुण व अणु सूर्य में विद्यमान रहे हैं एवं रहेंगे। इसीलिए सूर्य से ये समस्त पदार्थ एवं पंचभूत उत्पन्न हुए हैं। सूर्य ही एक ऐसे देव हैं जिनसे आकाश (नक्षत्रलोक), जल एवं ऊर्जा एवं प्रकाश तथा कीर्ति एवं (यश-अपयश विधि हाथ दृसूर्य राशि के अधीन) समस्त अन्न एवं उपभोग सामग्री, वनस्पति एवं औषधि इत्यादि सृष्टि को प्राप्त हुआ है। ‘कीर्तिश्च यशश्चाम्भश्च नभश्च ब्राह्मणवर्चसं  चान्न चान्नाद्यं च। य एतं देवमेकवृतं वेद।’’ (अथर्ववेद 13/5/1 से 8)
 
निष्कर्ष रूप में, यह सम्पूर्ण पर्यावरण प्रकृति आवरण ही है जो विलक्षण दैवीय शक्तियों से व्याप्त है, जिससे सृष्टि के समस्त जंगम एवं स्थावर, प्राणी व वनस्पति को चेतना, ऊर्जा एवं पुष्टि प्राप्त होती है। ‘‘द्योश्च म इदं पृथिवीं चान्तरिक्षं चमेव्यचः। अग्निः सूर्य आपो मेघां विश्वेदेवाश्च सं ददुः।’’ (अथर्ववेद 12/1/53) - अर्थात द्युलोक, पृथ्वी, अंतरिक्ष, अग्नि, सूर्य, जल एवं विश्व के समस्त देवों (ईश्वरीय प्रकृति शक्तियों) ने सृष्टि को व्याप्त किया है। इसीलिए यजुर्वेद में कहा गया है कि पृथ्वी इन समस्त शक्तियों को ग्रहण करे एवं इन सभी शक्तियों के लिए भी सदैव कल्याणकारक रहे। पृथ्वी-पृथ्वीवासी-इन दैवीय शक्तियों को प्रदषित न करें। ‘‘सन्तेवायुर्मातरिश्वा दधातूत्तानाया हृदयं यद्विकस्तम्। यो देवानां चरसि प्राणथेन कस्मैदेव वषडस्तु तुभ्यम।।’’ (यजुर्वेद-11/39) - अर्थात उर्ध्वमुख यज्ञकुण्ड की भाँति पृथ्वी अपने विशाल हृदय को मातृवत प्राणशक्ति संचारक वायु, जल एवं वनस्पतियों से पूर्ण करें। वायुदेव दिव्य प्राणऊर्जा से संचारित होते हैं। अतः पृथ्वी (अपने दूषित उच्छवास-कार्बन उत्सर्जन) से उन्हें दूषित न करें। वर्तमान में अन्यथा की स्थिति के कारण ही वायु की प्राण पोषक शक्ति - ऑक्सीजन दूषित होकर सृष्टि के जीवन को दुष्प्रभावित कर रही है।
 
इस पर्यावरण के जनक इन पंचमहाभूतों से ही प्राणिमात्र की 5 ज्ञानेन्द्रियाँ प्रभावित एवं चेतन होती हैं। इन पंचमहाभूतों के गुण ही हमारी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से प्राण, मन, बुद्धि, कौशल, अहं अर्थात भौतिक, जैविक, आत्मिक एवं संस्कारिक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। आकाश का गुण शब्दः वायु का गुण शब्द एवं स्पर्श तेज (पावक-अग्नि) का गुण शब्द, स्पर्श एवं रूप, जल का गुण शब्द, स्पर्श, एवं रस (स्वाद) तथा पृथ्वी समस्त उपरोक्त चारों गुण सहित सुगंध गुण भी अर्थात समस्त गुणों को धारण करती है। इसी कारण पृथ्वी के प्राणी पंचमहाभूतों के 5 गुणों को धारित करते हैं एवं उनसे प्रभावित भी होते हैं। अतः आवश्यक है कि हम पृथ्वीवासी पर्यावरण को दूषित न करें, छिन्न न करें अन्यथा हमें उनसे दूषित अवगुण ही प्राप्त होंगे। यह वैदिक ऋषियों द्वारा प्रस्तुत एक ऐसा सत्य है जिसकी वर्तमान में अवहेलना कर हम पर्यावरण सन्तुलन को समाप्त करते जा रहे हैं।

ऋषियों ने न केवल पर्यावरण को प्रदूषित करने के मानव जीवन एवं सृष्टि पर पड़ने वाले हानिकारक विनाशक परिणामों की ओर संकेत किया, अपितु पर्यावरण की रक्षा एवं हम जो कुछ प्रकृति देवों से प्राप्त कर रहे हैं, उसे उन्हें लौटाकर, पर्यावरण को प्रदूषित करने की अपेक्षा, उसे संरक्षित एवं संवर्धित करने का भी आदेश दिया है। ऋषियों ने सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियों को शान्त करने व लोक कल्याणकारी बनाए रखने की प्रार्थना की है। अथर्ववेद में उल्लिखित शान्ति सूक्त का पर्यावरण रक्षण में अपरिमित महत्व है - ‘शान्ता द्यौः शान्ता पृथ्वी शान्तमिदमुर्वन्तुन्तरिक्षम्। शान्ता उदन्वतीरापः शान्ता नः सन्त्वोषधीः।।’’ (अथर्ववेद 19/9/1) शं नो मित्रः शं वरुणः शं विष्णुः शं प्रजापतिः। शं नो इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो भवत्वर्यमा।। अर्थात द्युलोक, पृथ्वी, विस्तृत अंतरिक्ष लोक, समुद्र जल, औषधियां ये सभी उत्पन्न होने वाले अनिष्टों का निवारण करके हमारे लिए सुख शान्तिदायक हों। दिन के अधिष्ठाता देव सूर्य (मित्र) रात्रि के अभिमानी देव वरुण, पालनकर्ता विष्णु, प्रजापालक प्रजापति वैभव के स्वामी इन्द्र, बृहस्पति आदि सभी देव शान्त हों एवं हमें शान्ति प्रदान करने वाले हों।

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