क्या सिर्फ फरक्का बैराज ही है दोषी

Submitted by UrbanWater on Fri, 04/14/2017 - 16:40

हिमालयी नदियों पर तटबन्ध और बैराजों की परिकल्पना करते वक्त यह भी ध्यान नहीं दिया गया कि हिमालय और हिन्द महासागर, पूरे दक्षिण एशिया की परिस्थितिकी के निर्धारक हैं। समुद्र से उठने वाले मानसून और नदियों के जरिए हिमालय से आने वाली गाद, तलछट और पानी के कारण ही दक्षिण एशिया को सर्वाधिक अन्न उत्पादक क्षमता वाला क्षेत्र होेने का गौरव प्राप्त है। नदी की गाद, तलछट और प्रवाह के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर हम इस गौरव को समाप्त करने का काम करेंगे। नदियों के पानी पर पहला हक समुद्र का है। फरक्का बैराज वर्ष 1975 में बनकर तैयार हुआ। मकसद था कि इसके जरिए 40 हजार क्यूसेक पानी का रुख बदल दिया जाये, ताकि कोलकाता बन्दरगाह बाढ़ से बच सके। यह अनुमान करते नदी में आने वाले तलछट का अनुमान नहीं किया गया। परिणामस्वरूप, आवश्यकतानुरूप मात्रा में पानी का रुख नहीं बदला जा सका। दुष्परिणाम आज सामने है। फरक्का बैराज का जलाशय तलछट से ऊपर तक भरा है। तलछट की ऊँचाई इतनी है कि बैराज के फाटक भी उसमें फँसकर बन्द खड़े हैं।

फरक्का बैराज के पीछे दूर तक निगाह डालिए तो नदी से ज्यादा, तलछट का बना टापू ही दिखता है। फरक्का से लेकर पटना तक ऐसे कई टापू अब गंगा में दिखाई देने लगे हैं। इन टापुओं के चलते गंगा अपने लिये नए रास्ते तलाशने को विवश है। इस विवशता में वह कई इलाकों को काटने को भी विवश है। पीछे से आनी वाली विशाल जलराशि अब जब पलटती है, तो बंगाल से लेकर बिहार तक मार करती है; साल में कई-कई बार विनाश लाती है। ऊँची भूमि भी अब डूब का शिकार होने को विवश है। इस कारण नष्ट होने वाली फसलों का रकबा अब हजारों वर्ग किलोमीटर में है।

मालदा-मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में हालात ये हैं कि कभी सैकड़ा बीघा खेत के मालिक रहे काश्तकार भी आज गर्दिश में हैं। नदी किस रात, किधर झपट्टा मारेगी? सुबह होने पर कौन का मकान लापता मिलेगा? यह कहना अब अनिश्चित होता जा रहा है। समुद्र से चलकर धारा के विपरीत ऊपर की ओर आने वाली ढाई हजार रुपए प्रति किलो मूल्य वाली कीमती हिल्सा मछली की बड़ी मात्रा को हम हर साल खो रहे हैं, सो अलग।

नदी किनारे की गरीब-गुरबा आबादी फरक्का को अपना दुर्भाग्य मानकर अब हर रोज कोसती है। प्रधानमंत्री जी! बताइए, एक बैराज से उपजी त्रासदी से त्रस्त आबादी गंगा जलमार्ग परियोजना के 16 नए बैराजों की खबर सुनकर डरती न तो और क्या करती? आप तो ट्विटर पर एक सन्देश पाकर मदद करने के लिये जाने जाते हैं। फरक्का हमें रोज धमकी दे रहा है। आप चुप क्यों हैं?

पारिस्थितिकी का बयान


दरअसल, हिमालयी नदियों पर तटबन्ध और बैराजों की परिकल्पना करते वक्त यह भी ध्यान नहीं दिया गया कि हिमालय और हिन्द महासागर, पूरे दक्षिण एशिया की परिस्थितिकी के निर्धारक हैं। समुद्र से उठने वाले मानसून और नदियों के जरिए हिमालय से आने वाली गाद, तलछट और पानी के कारण ही दक्षिण एशिया को सर्वाधिक अन्न उत्पादक क्षमता वाला क्षेत्र होेने का गौरव प्राप्त है। नदी की गाद, तलछट और प्रवाह के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर हम इस गौरव को समाप्त करने का काम करेंगे। नदियों के पानी पर पहला हक समुद्र का है। हम इस हक में भी बाधा उत्पन्न करेंगे। इससे मानसून प्रभावित होगा और खेती भी।

हमें याद रखने की जरूरत है कि किसी भी नदी का एक काम गाद और तलछट को लेकर समुद्र तक पहुँचाना भी है। ब्रह्मपुत्र, गंगा एक ऐसी नदी है, जो दुनिया की किसी भी नदी की तुलना में अपने साथ सर्वाधिक गाद और तलछट लेकर चलती है। उत्तर बिहार की घाघरा, गंडक और कोसी जैसी प्रबल प्रवाह व मिट्टी लेकर चलने वाली नदियाँ इसमें मिलती हैं। इसी से उत्तर बिहार का उपजाऊ मैदान बना है। डेल्टा के निर्माण में भी इसकी अहम भूमिका है। पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिला स्थित सुन्दरबन द्वीप समूह के अस्तित्व पर पहले ही संकट कम नहीं।

गाद और तलछट के मार्ग में रुकावट का हर ढाँचा अन्ततः मैदान के उपजाऊपन और डेल्टा के अस्तित्व पर संकट बढ़ाने वाला ही साबित होगा। यह दावा कहता है कि फरक्का बैराज दोषमुक्त नहीं है। अनुभव यही है। इसीलिये समीक्षा की माँग सही है। किन्तु तलछट और कटान के लिये सिर्फ फरक्का बैराज अथवा तटबन्धों को दोषी ठहराकर हम बच नहीं सकते। पूछिए कि क्यों? क्योंकि हिमालयी नदियों में तलछट और उनके द्वारा कटान कोई नई बात नहीं है। नई बात है कि नदियों में आये अतिरिक्त पानी और तलछट को लाभ में बदल देने वाली जल-प्रबन्धन प्रणालियों को हम लगभग खो चुके हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि दोष सिर्फ फरक्का बैराज के माथे मढ़कर गाद और कटान के दुष्प्रभावों से मुक्ति हो जाये। क्या यह उचित है?

फरक्का डुबोए, आप्लावन नहर बचाए


तथ्य यह है कि प. बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद को भागीरथी दो भागों में बाँटती है। मुर्शिदाबाद का पश्चिमी भाग पहले ही मयूराक्षी और द्वारका जैसी पहाड़ी नदियों के उत्पात का शिकार है। भागीरथी में बाढ़ आने पर पूर्वी इलाके में स्थित जलांगी, चुरनी, भैरब, इच्छामति और माथभंगा आदि नदियों का प्रवाह उलट जाता है।

प्रवाह उलटने के इस क्रम में बैराज की वजह से अब ज्यादा तेजी आई है। यह प्रवाह पहले से भी उलटता था। किन्तु पहले इस उलट प्रवाह को तालाबों-खेतों तक पहुँचाने के लिये पहले आप्लावन नहरों का निर्माण किया गया था।

आप्लावन नहरों की खूबी


इन आप्लावन नहरों के कन्धों पर सवार होकर स्थानीय नदियाँ पुराने नालों, नदियों के छोड़े मार्गों को साल भर के लिये जल से भर देती थी। अपने तलछट की परत से खेतों को सोना पैदा करने की शक्ति से भर देती थीं। इसी शक्ति के कारण 19वीं सदी के मध्य खेती की दृष्टि से बर्द्धमान, भारत का समृद्ध जिला था। विज्ञान पर्यावरण केन्द्र का एक अध्ययन बताता है कि ये आप्लावन नहरें सिर्फ पानी और उपजाऊ मिट्टी नहीं, खूब सारी मछलियाँ भी पहुँचाती थीं। ये मछलियाँ गरीबों का पेट तो भरती ही थीं, झील-पोखरों में पहुँचकर मच्छरों के अंडों को भी चट कर जाती थीं। इस कारण मुर्शिदाबाद जैसे तमाम इलाकों को मलेरिया के दंश से बचाए रखती थीं।

आप्लावन नहरों की खूबी यह थी कि ये गहरी कम, चौड़ी ज्यादा थीं। इस नाते बाढ़ का ऊपरी पानी ही लेकर चलती थीं। इस ऊपरी पानी में घुली मिट्टी तो होती थी, लेकिन मोटा रेत नहीं होता था। आप्लावन नहरें अक्सर एक-दूसरे के समानान्तर बनाई जाती थीं। आप्लावन नहरों की लम्बाई का हिसाब भी सिंचाई की आवश्यकता के हिसाब से तय होता था।

नहरों के बाँध काटकर सिंचाई होती थी। काटने के समय इंजीनियर और जानकार लोग मौजूद रहते थे। फिर इसे स्थानीय परिषद के हवाले कर दिया जाता है; जो कि स्थानीय लोगों की मदद से ऐसी व्यवस्था बनाते थे ताकि हर खेत को पानी मिल सके। नहरों से उतना ही पानी लिया जाता था, ताकि उनका प्रवाह संकीर्ण न हो। बाढ़ गुजर जाने के बाद नहर के कटानों को भर दिया जाता था।

आप्लावन नहरों की अनदेखी का दोषी कौन?


इतिहासकार विलकाॅक्स के हवाले से पेश अध्ययन के अनुसार आप्लावन नहरों की यह प्रणाली बाढ़ की रोकथाम, कटान के नियंत्रण, सिंचाई तथा खेतों को बिना कृत्रिम उर्वरक उपजाऊ रखने की सबसे उत्तम प्रणाली थी। इसी गुण के कारण यह प्रणाली हजारों साल चली।

18वीं सदी में अफगान-मराठा युद्ध और उसके बाद अंग्रेजी हुकूमत के दौर ने इस उत्तम प्रणाली की ओर से समाज और सरकार का ध्यान हटा दिया। कालान्तर में आई सरकारें बाँध, तटबन्ध और बैराजों की राजसी प्रणालियों की ओर ध्यान देने में जुट गईं। यह दौर आज भी जारी है। लिहाजा, पलटकर आया नदी जल अब साल में कई-कई बार विनाश लाता है। क्या इसका दोषी सिर्फ फरक्का बैराज ही है? सोचना चाहिए।

समग्र परिदृश्य को सामने रखकर यह भी सोचना चाहिए कि जल-प्रबन्धन की चुनौतियों से निपटने की समग्र दृष्टि व सृष्टि क्या हो?

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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