खेत तालाब - समाधान या एक नई समस्या

Submitted by RuralWater on Tue, 03/27/2018 - 14:25

जहाँ एक ओर खेत तालाबों के निर्माण को राज्य सरकार, केन्द्र सरकार और मीडिया सभी के द्वारा एक कौतुकास्पद कार्यनीति माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में इसका निर्माण चिन्ता का विषय बन गया है। इन तालाबों को भरने के लिये किसानों द्वारा भारी मात्रा में भूजल दोहन हो रहा है। लगातार सूखे और पानी की कमी ने महाराष्ट्र के ग्रामीण जीवन को, विशेषतः कृषि समुदाय को दुखी और तकलीफदेह बना दिया है। स्थिति इतनी भयानक हो गई है कि राज्य में पानी की कमी वाले प्रभावित क्षेत्रों में टैंकरों से पानी का वितरण बिना पुलिस सुरक्षा के सम्भव नहीं रहा। हालांकि इस तथ्य को भी ध्यान में रखना होगा कि पानी और सुरक्षित जल संसाधनों के वितरण के लिये सरकार ने राज्य के कई क्षेत्रों में भारतीय दंड संहिता की धारा 144 लागू की है (सुतार 2016, बनर्जी 2016)।

परिस्थिति की जटिलता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के इतिहास में पहली बार पानी की कमी से प्रभावित क्षेत्रों में विशेष ट्रेनों द्वारा पानी पहुँचाया जा रहा है। परिणामस्वरूप, दैनंदिन पारिवारिक जीवन में पानी के अभाव तथा आजीविका के पर्याप्त साधन उपलब्ध न होने की वजह से बड़े पैमाने पर लोग गाँवों से शहरों और कस्बों में पलायन कर रहे हैं। ये पलायन नहीं, अपितु परिस्थितियों के आगे हार मान लेना है जिसने पेयजल जैसी मूलभूत जरूरतों के अभाव में लोगों को अपना मूल आशियाना छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। इस सब के चलते सवाल यह उठता है कि राज्य के कुछ ग्रामीण भागों में पानी को लेकर ऐसी परिस्थिति कैसे और क्यों बन गई है?

पानी बचाने का तंत्र


हरित क्रान्ति के दौरान खेतों में व्यापक विद्युतीकरण की वजह से कुओं और भू-पृष्ठ पर मौजूद दूसरे जल भण्डारों से जल-निकासी में भारी वृद्धि हुई। फलस्वरूप राज्य के कई इलाकों में भूजल की मात्रा में गिरावट आई। उसी दौरान, किसान सिंचाई के लिये बोरवेल तकनीक का इस्तेमाल करने लगे जो बहुत सस्ती और आसानी से उपलब्ध थी। यही कारण था कि अपने-अपने खेतों में अधिक-से-अधिक बोरवेल लगवाने के लिये छोटे-बड़े सभी किसानों के बीच जैसे एक होड़ लग गई।

इन बोरवेलों ने जमीन की गहराई से पानी निकालने में किसानों की मदद की और खेतों के बड़े हिस्से में नकदी फसलों के विकास के लिये उन्हें सक्षम भी किया। परन्तु कुछ जगहों पर किसान बोरवेल करने के बाद भी सिंचाई के लिये जरा सा भी पानी निकालने में असफल भी रहे।

अतः उन्हें अपनी पूर्ण रूप से विकसित बागवानी में मुख्यतः बड़ी देखभाल और उम्मीद से उगाई जाने वाली मौसमी और अनार की फसलों में कटौती करनी पड़ी। नब्बे के दशक में, खेत तालाबों की तकनीक किसानों के लिये आशा की एक नई किरण बनकर सामने आई। वर्षा जल को इकट्ठा कर उसका संचय करने की कल्पना ने किसानों को एक नई उम्मीद दी जिससे पानी के अभाव की स्थिति में फसलों को सुरक्षित सिंचाई प्रदान की जा सके।

सरकारी योजनाएँ और नीतिगत पहल


पानी के अभाव वाले क्षेत्रों में भी साल भर पानी की उपलब्धता को सुनिश्चित करने वाली जल की इस तकनीक ने सिंचाई हेतु बड़ी संख्या में किसानों को आकर्षित किया। नकदी फसलों की सिंचाई में खेत तालाबों का प्रभावी उपयोग करते हुए अच्छा मुनाफ़ा कमाने वाले किसानों की कहानी मीडिया में आजकल आम है। मीडिया ने खेत तालाबों को हमेशा ही पानी की समस्या से दो हाथ करने वाली चमत्कारी कार्यनीति के रूप में दर्शाया है।

खेत तालाबों के फायदों को देखते हुए राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार ने इसके निर्माण को सब्सिडी के साथ बढ़ावा देने वाली विभिन्न योजनाएँ भी बड़े पैमाने पर लागू कीं। इन योजनाओं के अंतर्गत खेत तालाबों का निर्माण होते समय अंदर एक प्लास्टिक की परत लगाई जाती है।

सूखे की वर्तमान परिस्थिति में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने यह घोषणा भी की कि जो भी किसान खेत तालाब की माँग करता है उसे वह अवश्य मिलेगा। “मागेल त्याला शेत तळे”(अभय 2016) नाम से यह योजना काफी लोकप्रिय हो रही है। हर मुमकिन खेत में खेत तालाब बनाने का अपनी सरकार का इरादा भी उन्होंने ज़ाहिर किया है (टाइम्स ऑफ़ इंडिया 2015)। इसके अलावा केंद्र सरकार ने भी वर्ष 2016-17 के बजट में देश के पानी की कमी से प्रभावित क्षेत्रों में पाँच लाख खेत तालाब और कुओं के निर्माण का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है (डीसिफर आई.ए.एस 2016)। इस प्रकार राज्य में विशेष रूप से शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में खेत तालाबों के निर्माण की नीति और उसके लिये अनुकूल वातावरण तैयार होता हुआ दिख रहा है।

नियोजन से कार्यान्वयन तक


देखा जाये तो बुनियादी तौर पर खेत तालाब के प्रयोग और उसके अभ्यास से जुड़ी तस्वीर बिल्कुल ही निराशाजनक है। खेत तालाब की नीति तथा मुख्य उद्देश्य, और वास्तव में किसानों द्वारा इसका उपयोग आपस में बिल्कुल मेल नहीं खाते। हालांकि वर्षा-जल का संचय खेत तालाब के मुख्य उद्देश्यों में से एक है, प्रत्यक्ष रूप में ऐसा एक भी तालाब मिलना मुश्किल है जिससे वास्तव में वर्षा जल एकत्रित कर उसका संचय किया जाता हो।

अधिकांश किसान अपने खेत तालाबों को कुएँ और बोरवेल के जरिए निकाले गए भू-जल से भरते हैं। खेत तालाब के मुख्य उद्देश्य से ऐसी विसंगति चौकाने वाली है। खेत तालाब भू-जल निकास के माध्यम बन रहे हैं और अपने तालाबों को भरने हेतु किसानों में ज्यादा-से-ज्यादा भू-जल निकालने की मानो होड़ ही लग गई है। इससे भारी दोहन के चलते निरन्तर गिरता भू-जल का स्तर एक गम्भीर समस्या बनता जा रहा है।

खेत तालाबों का उद्देश्य मुख्यतः वर्षा-जल का मिट्टी से रिसकर भू-जल का पुनर्भरण करना था। मगर वास्तव में सभी कामकाजी खेत तालाबों में अंदर से हाई माईक्रोन प्लास्टिक लगा होता है जो संचित पानी को मिट्टी में रसने/झरने से रोकता है। यहाँ तक की प्लास्टिक पर सब्सिडी देकर राज्य सरकार भी तालाबों में प्लास्टिक के अस्तर के उपयोग को बढ़ावा दे रही है। इसलिये खेत तालाब से बारिश के पानी का रिसकर भू-जल रीचार्ज होने की सम्भावना कम ही है।

इन खेत तालाबों की मूल कल्पित संरचना के अनुसार इनमें वर्षा जल भरने के लिये इनलेट तथा अतिरिक्त पानी के निर्वहन के लिये आउटलेट वाल्वों का होना अनिवार्य है, मगर वास्तव में कुछ खेत तालाबों में इनका अस्तित्व ही नहीं हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि नीति के अनुसार खेत तालाबों का व्यापक रूप से प्रयोग तो हो रहा है, मगर प्रत्यक्ष रूप में ये तालाब केवल जमीन से निकाले गए भू-जल का बस एक बड़े कारक बनकर रह गए हैं।

खेत तालाबों को लेकर दूसरी महत्वपूर्ण चिन्ता है उनकी मंजूरी और वास्तविक निर्माण में उचित नियमन और योजना का अभाव। हर क्षेत्र में भिन्न-भिन्न कामों और संरचनाओं के लिये, पानी की आपूर्ति करने वाली भू-जल क्षमता को ध्यान में रखते हुए जलग्रहण क्षेत्र के स्तर पर, समग्र जल संसाधनों का गम्भीरता से नियोजन किया जाना चाहिए। आदर्श रूप से हर गाँव या वाटरशेड क्षेत्र की जल वहन क्षमता के आधार पर ही वहाँ बनने वाले कुल खेत तालाबों की संख्या का नियोजन होना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि इस योजना से जुड़ी नीतियों तथा उनके क्रियान्वयन में लगे पदाधिकारियों में ही इसे लेकर अब भी स्पष्टता की कमी है। राज्य में कई ऐसे गाँव भी हैं जहाँ प्रचुर मात्रा में खेत तालाब देखने को मिलते हैं।

जालना जिले के सूक्ष्म-वाटरशेड क्षेत्रों (1810 हेक्टेयर) में 325 से भी अधिक खेत तालाब हैं। अनियन्त्रित तालाबों की संख्या और साथ-साथ किसानों द्वारा खेत तालाब के अनुमोदित आकार का उल्लंघन भी गहरी चिन्ता का विषय है। हालाँकि सब्सिडी केवल विशिष्ट आकार के ही खेत तालाबों के लिये दी जाती है मगर लगभग सभी किसानों ने अपनी निजी लागत से अपने तालाबों के आकार और गहराई को व्यापक रूप से विस्तारित किया है ताकि अधिक पानी एकत्र किया जा सके। कई गाँवों में 40 या 50 फीट की औसतन गहराई के साथ आधे एकड़ से एक एकड़ आकार में बने खेत तालाब हैं।

चिन्ता का तीसरा प्रमुख मुद्दा है सतही जल का, खासकर के खेत तालाबों में संचित पानी का बढ़ता वाष्पीकरण। महाराष्ट्र के कई शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में गर्मियों में अधिकतम तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है जो वाष्पीकरण के अनुपात को बढ़ा देता है। तालाबों को भरने के लिये भारी मात्रा में भू-जल का दोहन, तेजी से होता खेत तालाबों से पानी के वाष्पीकरण का मुद्दा बहुत ही अधिक गम्भीर हो जाता है।

प्राकृतिक संसाधनों पर मानवीकृत आपदा


राज्य में पानी की कमी से प्रभावित क्षेत्रों में खेत तालाबों के कारण घरेलू उपयोग व पेयजल की जरूरतों के लिये पानी की कमी पैदा हो गई है। कई गाँवों में गर्मियों के दौरान भी कुछ खेत तालाबों में नकदी फसलों को सिंचाई के लिये पर्याप्त पानी (पंप से निकाला हुआ भूजल) संग्रहित होता है। तथापि यह वही गाँव हैं जो गम्भीर पेयजल समस्या से जूझ रहे हैं और पानी के लिये सार्वजनिक टैंकरों पर निर्भर हैं।

इस प्रणाली के चलते भू-जल तो कम हो ही रहा है और साथ ही आस-पास के कुएँ तथा बोरवेल भी सूख रहे हैं। जिन गाँवों में बड़ी संख्या में खेत तालाबों का निर्माण किया गया है, वहाँ अब भूजल बहुत ही नीचे चला गया है, जो निचले गाँवों के लिये पानी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। भारी मात्रा में भूजल दोहन ने नदी-नालों को संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है जिससे पहले ही घटते हुए पारिस्थितिकी तंत्र के लिये नया खतरा पैदा हो रहा है।

उपयुक्त उपाय


शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ रबी और गर्मियों के मौसम में बागानों को सींचकर फसलें उगाई जातीं हैं, खेत तालाबों की प्रणाली निश्चित रूप से उपयोगी है। लेकिन खेत तालाब का निर्माण और उसके उपयोग के तरीके, पानी की कमी की मौजूदा समस्या को और भी तीव्र बना रहे हैं। इस मसले पर प्रभावी और उपयुक्त रूप से समाधान खोजने के लिये, निम्नलिखित सात नियामक और नीतिगत उपायों पर गम्भीरता से विचार करना होगा :

खेत तालाबों के लिये भूजल निकास पर रोक लगाई जाये


पानी का संकट झेल रहे संवेदनशील क्षेत्र या भूजल अति दोहन वाले क्षेत्र जो चुने गए हैं ऐसे क्षेत्रों में खेत तालाबों में जल संचय हेतु भूजल निकासी पर कड़ा प्रतिबन्ध होना चाहिए। ऐसे क्षेत्रों में केवल वर्षा जल से तालाबों को भरने के कड़े नियम बनाने होंगे।

गाँव या जलग्रहण क्षेत्र में खेत तालाबों की सीमित संख्या


किसी भी गाँव या जलग्रहण क्षेत्र में जल संसाधन की निरन्तरता और उस क्षेत्र की जल वहन क्षमता का विचार करते हुए, कुल खेत-तालाबों की संख्या निश्चित की जानी चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस तरह की योजना बनाते समय, स्थानीय जल विज्ञान, क्षेत्र में भूजल की कमी और निचले गाँवों की जल निर्भरता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

खेत तालाबों के आकार पर नियंत्रण रखना


किसानों द्वारा खेत तालाबों के आकार और गहराई को अधिकृत मानदंडों से अधिक बढ़ाने पर भी नियंत्रण रखना जरूरी है। यह तभी हो सकता है जब राज्य सरकार केवल उन्हीं किसानों के खेत तालाबों की सब्सिडी मन्जूर करे, जो स्वीकृत डिजाइन (आकार और गहराई) का पालन करने की लिखित समझौते का पालन करें।

मराठवाड़ा के कई इलाकों में भूजल निकालकर तालाब भरा जाता है

सब्सिडी के प्रावधान में परिवर्तन आवश्यक


वर्तमान में सरकार द्वारा प्रस्तुत सब्सिडी एवं अन्य प्रचारक योजनाएँ बड़े किसानों और बागानदारों पर केंद्रित नजर आती हैं जबकि वास्तव में पूरी तरह से वर्षा जल पर निर्भर छोटे किसान इनका केंद्र बिंदु होने चाहिए।

प्लास्टिक की परत के विकल्प


हाई-माइक्रोन प्लास्टिक पेपर, जिसकी एक परत खेत तालाब के अंदर लगाई जाती है, वह काफी महंगा और पर्यावरण के लिये हानिकारक है। इसलिये इस प्लास्टिक की परत के लिये किफायती और पर्यावरण अनुकूल विकल्प का शोध आवश्यक है। इस दिशा में, वाटरशेड ऑर्गनाइजेशन ट्रस्ट (डब्ल्यू.ओ.टी.आर.) ने खेत तालाबों में मिट्टी और सीमेंट के बने मिश्रण को लगाने का एक प्रयोग किया है।

एक परियोजना के तहत मराठवाड़ा के एक गाँव में, एक खेत तालाब को 80% मिट्टी और 20% सीमेंट के मिश्रण में गुड़ मिलाकर लेपित किया गया। इस प्रयोग से तालाब का खर्च कुल मिलाकर 50% से कम हुआ, और लेपन के दो साल बाद भी इस मिश्रण की परत बिना किसी रिसन या रसाव के प्रभावी ढंग से काम कर रही है।

पेयजल की जरूरतों के लिये सार्वजनिक खेत तालाब का निर्माण


पर्याप्त सिंचाई के लिये एक कार्यनीति के रूप में खेत तालाब काफी उपयोगी साबित हुए हैं, तो पानी के अभाव के दौरान इसकी जल संचय की उपयोगिता को देखते हुए, इस कार्यनीति का इस्तेमाल साल भर सभी ग्रामवासियों तथा मवेशियों के पेयजल और दूसरी घरेलू जरूरतों के लिये भी किया जा सकता है।

इस सुझाव के पीछे मूल विचार यही है कि यदि कोई किसान व्यक्तिगत रूप से खेत तालाब द्वारा जल संचय का उपयोग साल भर सिंचाई के लिये कर सकता है, तो ऐसा ही जल संचय ग्रामवासियों की पेयजल और पानी की घरेलू आवश्यकताओं के लिये करना भी सम्भव और व्यवहार्य है।

मराठवाड़ा के एक गाँव में प्रयोग करते हुए WOTR ने एक ऐसे सार्वजनिक खेत तालाब का निर्माण किया जो पानी की कमी के दौरान, कम-से-कम तीन महीने तक पानी उपलब्ध कराने की क्षमता रखे। यह प्रयोग दूसरे छोटे गाँवों में पेयजल की जरूरतों को पूरा करने के लिये ऐसे ही खेत तालाबों का निर्माण करने का शुभ संकेत हैं। इस कल्पना पर अधिक विचार और बड़े पैमाने पर परीक्षण किया जाना चाहिए।

वाष्पीकरण के अनुपात को कम करने के उपाय


खेत तालाबों में एकत्रित पानी के वाष्पीकरण के अनुपात को कम करने की आवश्यकता है। इसके लिये कुछ तात्कालिक उपाय किये जा सकते हैं जैसे तालाबों की संरचनाओं में गहराई को बढ़ाते हुए इनकी सतह कम करना या संचित पानी में इवलॉक जैसे सुरक्षित और निरुपद्रवी घोल का इस्तेमाल करना या फिर सतह पर प्लास्टिक की बोतलों से बना तैरता हुआ आवरण बनाना। हालांकि इन खेत तालाबों की संख्या को सीमित रखना, उनके अधिकृत आकार को नियमित रखना, तथा यह सुनिश्चित करना कि खेत तालाबों में भूजल निकास नहीं हो रहा- यही अच्छे भविष्य के लिये दीर्घकालिक उपाय हो सकते हैं।

निष्कर्ष


महाराष्ट्र में विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों में वर्तमान सूखे की स्थिति निश्चित ही गम्भीर है। हालांकि भूजल का कम होना कई कारकों का परिणाम है और इस समस्या के कई बहुआयामी पहलू हैं, मगर जगह-जगह पर उभरने वाले यह खेत तालाब ही पानी की कमी का मुख्य कारण हैं। इसलिये, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए समझदारी इसी में है कि इस सामाजिक सुझावों को साथ लेकर चलें। साथ ही, जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल की आपूर्ति के लिये खेत तालाबों की कार्यनीति में नए प्रयोगों की आवश्यकता है, तथा जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौती का सामना करने के लिये दूसरे अनुकूल उपायों का खोजा जाना भी जरूरी है।

सन्दर्भ


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Decipher IAS (2016): “Budget 2016 At a Glance,” 2 March, http://decipherias.com/dailynews/ daily-current-affairs1st-march-2016-budget-ata-glance/.
Sutar, Kamlesh Damodar (2016): “Fearing Water Riots, Govt Imposes Section 144 in Maharashtra’s Latur,” India Today, 22 March, http://indiatoday.intoday.in/story/fearing-water-riotsgovt-imposes-section-144-in-maharashtras-latur/1/624939.html.
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