किसानों को चाहिए सम्मान और समुचित आय

Submitted by UrbanWater on Sat, 04/08/2017 - 16:06
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 8 अप्रैल 2017

किस किसान के किस खेत में कौन से तत्व या खनिज की कमी है, कौन-सी फसल बोने से पैदावार ज्यादा होगी, यह सब उसे बताया जाना चाहिए। इसके साथ ही कर्ज तथा बीमा। इसके बाद स्थान आता है फसल की बिक्री का। उत्तर प्रदेश सरकार ने एक साथ 80 लाख टन गेहूँ खरीदने का फैसला किया है। यह बहुत बड़ा कदम है। अन्य राज्यों के लिये दिशादर्शक भी। पिछले साल इसी समय करीब 7.97 लाख टन की खरीद हुई थी। मूल बात है किसानों के लागत मूल्य पर उचित मुनाफा मिलना ताकि उनका जीवनयापन हो सके एवं अगर उन्होंने कर्ज लिया है तो उसे वे समय पर लौटा सकें। इसमें दो राय नहीं कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने किसानों के लिये कर्जमाफी के साथ अनेक कदम उठाकर देश के सामने किसानों एवं खेती की समस्याएँ एवं सरकारी स्तर पर उसके निदान पर फिर से बहस को तेज कर दिया है। विचार करें तो किसानों की कुछ समस्याएँ ऐसी हैं, जिनका राजनीतिक इच्छाशक्ति और समझ से निदान किया जा सकता है। खेती के लिये लिया गया कर्ज इनमें से एक है।

किसानों का कर्ज माफ करना है, तो उसका कोई और उपयुक्त रास्ता निकाला जाना चाहिए। यह प्रश्न भी खड़ा होता है कि आखिर, किसानों को खेती के काम के लिये कितना कर्ज चाहिए? कर्ज चाहिए भी या नहीं? जिनको कर्ज की वाकई जरूरत है क्या वे बैंक तक पहुँचते हैं और उनके साथ बैंक सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करते हैं?

अनुभव तो यही है कि सामान्य किसान, जिसके पास वाकई खेती के लिये पैसे नहीं होते, आमतौर पर बैंकों के पास कर्ज के लिये जाता नहीं। बैंक से डरता है। बैंक उसके पास आते नहीं। तो किसानों में भी एक वर्ग ही बैंक तक कर्ज के लिये जाता है। वस्तुत: कर्ज माफी स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती। अगर किसान दुर्दशा के शिकार हैं, तो उनके लिये कुछ-न-कुछ कल्याण का कार्य करना होगा।

सर्वेक्षण कराकर यह भी देखना होगा कि वाकई लोगों को कर्ज की जरूरत है, या नहीं? और है तो कब? आमतौर पर देखा गया है कि बुआई हो गई, आधा समय बीत गया तब कर्ज मिलता है। इसे तुरन्त रोकना पड़ेगा। इसलिये कोई सरकार यह न समझे कि कर्जमाफी तक ही उसकी जिम्मेवारी पूरी हो गई।

कर्ज की हो समग्र व्यवस्था


वास्तव में कर्ज किसानों के लिये समग्र व्यवस्था के एक अंग के रूप में होना चाहिए। उदाहरण के लिये सॉयल हेल्थ कार्ड का मामला है। यह हर किसान तक पहुँचे इसके लिये जितना काम किया जा रहा है, उससे ज्यादा करने की आवश्यकता है। किस किसान के किस खेत में कौन से तत्व या खनिज की कमी है, कौन-सी फसल बोने से पैदावार ज्यादा होगी, यह सब उसे बताया जाना चाहिए। इसके साथ ही कर्ज तथा बीमा। इसके बाद स्थान आता है फसल की बिक्री का।

उत्तर प्रदेश सरकार ने एक साथ 80 लाख टन गेहूँ खरीदने का फैसला किया है। यह बहुत बड़ा कदम है। अन्य राज्यों के लिये दिशादर्शक भी। पिछले साल इसी समय करीब 7.97 लाख टन की खरीद हुई थी। मूल बात है किसानों के लागत मूल्य पर उचित मुनाफा मिलना ताकि उनका जीवनयापन हो सके एवं अगर उन्होंने कर्ज लिया है तो उसे वे समय पर लौटा सकें। उत्तर प्रदेश इस दिशा में पहल कर रहा है।

किसानों की आय बढ़े


मुख्य बात है किसानों की आय में वृद्धि हो। हाड़तोड़ मेहनत के बाद वो जो फसल पैदा करते हैं, वो कौड़ियों के भाव न बिकें। इसका तात्कालिक रास्ता यही है कि सरकारी मंडियाँ यानी एपीएमसी मंडियों की संख्या बढ़ाई जाये। फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य स्वयमेव उन्हें मिल जाये। किसानों या कृषि के संकट का एक बड़ा कारण ही उपयुक्त आय न होना है। अगर आय अच्छी हो तो फिर क्यों कोई कृषि से भागेगा किन्तु इसका सरकारी स्तर पर खरीद ही एकमात्र रास्ता नहीं हो सकता।

सरकारी खरीद की सीमाओं को हमें समझना होगा। इसे ज्यादा समय तक जारी रखने से राज्यों की अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है। राज्य और केन्द्र अपनी आवश्यकता के अनुसार खरीदें तथा ऐसे बाजार उपलब्ध हों जहाँ किसानों की फसल बिक सके। फसल केवल खरीफ और रबी ही नहीं हैं। मसालों की खेती है, सब्जी और फलों की पैदावार हैं। वो सब कोई सरकार पूरी तरह नहीं खरीद सकती। इसके लिये गैर-शोषक प्रोफेशनल बाजार होना चाहिए।

एक ओर प्याज और टमाटर के दाम आसमान छू रहे हैं, तो कहीं किसान उसे सड़कों पर फेंक देने के लिये विवश हैं। यह स्थिति समाप्त होनी चाहिए। वर्तमान केन्द्र सरकार परस्पर जुड़े हुए इलेक्ट्रॉनिक बाजार प्रणाली की योजना पर काम कर रही है। इस पर तेजी से काम किया जाना चाहिए।

सम्मान भी जरूरी


किसानों के लिये सबसे बढ़कर जरूरी है कि उन्हें अन्य कार्य, महत्त्वपूर्ण व्यापार, सरकारी पदों के समान सम्मान मिले यानी उनके काम को सम्मान का काम बना दिया जाये। किसान को खेती करने में गर्व महसूस हो कि वह देश में महत्त्वपूर्ण काम रहा है। आज की स्थिति यही है कि खेती में एक बड़ा वर्ग तभी तक है, जब तक उसे कोई दूसरा काम नहीं मिलता या फिर कोई दूसरा काम करते हुए खेती भी करता है। जितने सर्वेक्षण आये हैं, उनमें ज्यादातर लोगों ने खेती छोड़ने की मंशा प्रकट की है।

खेती से पलायन बड़ी समस्या है और इसका कारण यही है कि इसे सम्मान का काम नहीं रहने दिया गया जबकि इसे सबसे सम्मान का काम माना जाना चाहिए। अब जरूरी यही रह जाता है ईमानदारी से किसानों के कल्याण का काम करते हुए देश की मानसिकता बदली जाये। कोई सरकारी कार्यालय में कलम या कम्प्यूटर चलाता है, वह बड़ा आदमी हो गया और जो खेतों में मेहनत करता है, वह छोटा। इस विकृत सोच को खत्म किया जाये। सरकारें और हमारे आपके व्यवहार से यह हो सकता है।

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