उत्तरांचल में मात्स्यिकी विकास की सम्भावनाएँ (Fisheries development prospects in Uttaranchal)

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राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसन्धान केन्द्र

1. उत्तरांचल का भौगोलिक परिदृश्य


राज्य की 70 लाख आबादी में से लगभग 80 प्रतिशत मांसाहारी एवं मत्स्यहारी है। उपरोक्त जनसंख्या के लिये भारत में प्रति व्यक्ति मत्स्य उपलब्धता की समकक्ष दर पर भी न्यूनतम 35 हजार टन प्रतिवर्ष उत्पादन की आवश्यकता है जबकि वर्तमान में पर्वतीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन से सतत नियमित उत्पादन नगण्य है तथा आपूर्ति मैदानी भागों से आने वाली मछलियों से होती हैं। झीलों तथा जलाशयों के अतिरिक्त अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों से नियमित आपूर्ति नहीं होती है। उत्तरांचल राज्य का गठन इसके पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश राज्य के उत्तरी भाग में स्थित 13 जनपदों को सम्मिलित कर किया गया है। यह राज्य 28 अंश 47’ अंश 20’ उत्तरी अक्षांश एवं 77 अंश 35’-80 अंश 55’ पूर्वी देशान्तर के मध्य 53,204 वर्ग कि.मी. भौगोलिक क्षेत्र में एक सुस्पष्ट भौतिक इकाई के रूप में स्थित है। पूर्व से पश्चिम तक इसका अधिकतम विस्तार 320 कि.मी. तथा उत्तर से दक्षिण तक 250 कि.मी. है। इसके सम्पूर्ण क्षेत्रफल का 47,325 वर्ग कि.मी. भाग (88.9 प्रतिशत) पर्वतीय है। राज्य के दक्षिणी भाग में तराई तथा भावर की समस्त भूमि समुद्र तल से 198 मीटर की ऊँचाई पर तथा उत्तर की ओर हिमाच्छादित पर्वत शिखर स्थित है जिनमें से नन्दा देवी सबसे ऊँचा है इसकी समुद्र तल से ऊंचाई 7816 मी है। सम्पूर्ण उत्तरांचल राज्य विभिन्न भौगोलिक खण्डों को अपने में समेटे हुए हैं जो इस प्रकार है। ट्रान्स हिमालयन कटिबन्ध, हिमाद्रि कटिबन्ध, लघु हिमालयी कटिबन्ध, लघु हिमालयी नदी घाटियाँ, बाह्य हिमालयी तलहटी कटिबन्ध, भावर एवं तराई। इनमें लघु हिमालयी कटिबन्ध सम्पूर्ण राज्य के क्षेत्रफल का 56.21 प्रतिशत है।

2. जलवायु एवं वनस्पति


भूगर्भीय संरचना, धरातलीय विन्यास की विविधता, नदी घाटियों तथा पर्वत शृंखलाओं के विस्तार की दिशा, ढलान व प्राकृतिक वनस्पति की उपलब्धता के अनुरूप यहाँ की जलवायु में स्पष्ट विविधता पाई जाती है इसी कारण पर्वतीय क्षेत्र में अनेक सूक्ष्म जलवायु प्रक्षेत्र पाये जाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में समुद्र तल से प्रति 1000 मीटर ऊँचाई पर तापमान में लगभग 6 डिग्री सेल्शियस की गिरावट आ जाती है। इस तरह एक छोटे से भौगोलिक क्षेत्र में अनेक सूक्ष्म जलवायु प्रक्षेत्र बन सकते हैं। उत्तरांचल में उष्ण से लेकर ध्रुवीय समस्त प्रकार की जलवायु विभिन्न प्रक्षेत्रों में पाई जाती है। विविधतापूर्ण जलवायु के अनुरूप राज्य में अनेक प्रकार की वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। बाह्य हिमालय तलहटी कटिबन्ध में चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष जैसे साल, सागौन आदि एवं खैर, बाँस, शीशम आदि बहुतायत में मिलते हैं जबकि ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में बाज, देवदार, बुरांस, चीड़ आदि शंकुधारी वृक्ष पाये जाते हैं। स्थायी हिमवरण वाले पर्वत समूह वनस्पति शून्य हैं। उत्तरांचल में वर्षा का अधिक औसत 1000 से 2000 मि.मि. है।

3. जल संसाधन


उत्तरांचल राज्य प्राकृतिक जल संसाधनों से परिपूर्ण है। क्षेत्र में बड़ी नदियाँ व उनकी सहायक नदियाँ, झीलें एवं जलाशय आदि उपलब्ध हैं। हिमालय तथा उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में वर्ष भर बर्फ पड़ने से व हिमनदों के पिघलने से जल प्राप्त होता है तथा निम्न ऊँचाई के जलस्रोतों में वर्षा एवं शैल छिद्रों से भूमिगत रिसाव द्वारा जल प्राप्त होता है। उत्तरांचल राज्य में कुछ विश्व प्रसिद्ध हिमनदों सहित अनेक हिमनद स्थित हैं जो समुद्र तल से 3600 मी. या इससे अधिक ऊँचाई पर है। गंगोत्री, यमुनोत्री, पिंडारी, काफिनी, सुन्दरढूंगा, नाकूरी, मिलम, बालढूंगा, पोलिंग, बलाती आदि यहाँ के प्रमुख हिमनद हैं। यह प्रक्षेत्र अनेक नदियों का उद्गम स्थान है। राज्य के प्रमुख जल संसाधन निम्नवत हैं :

3.1 नदियाँ, सहायिकाएँ व नाले


राज्य भर में नदियों, उनकी सहायिकाओं तथा विभिन्न आकार के नालों का जाल बिछा हुआ है। यहाँ चार प्रमुख नदी तंत्र लगभग सम्पूर्ण राज्य को आच्छादित करते हैं। क्षेत्र में बहने वाली गंगा, यमुना तथा काली आदि बड़ी नदियों की कुल लम्बाई 1400 कि.मी. से अधिक है।

उत्तरांचल के प्रमुख नदी तंत्र


 

क्रम

नदी तंत्र

प्रमुख सहायिकाएँ

1.

यमुना

टौंस, यमुना, अगलर

2.

गंगा

भागीरथी, भीलंगाना, अलकनंदा, मंदाकिनी, नंदाकिनी, पिण्डर, नयार

3.

काली

धौली, काली, गोरी, सरयू, गोमती, पूर्वी रामगंगा

4.

राम गंगा-कोसी

पश्चिमी रामगंगा, कोसी, फेन्का, दाब्का, बौर नन्धौर

 

 
उपरोक्त में से प्रमुख बड़ी नदियों का उद्गम हिमाद्रि कटिबन्ध में स्थित हिमनदों से होता है तथा इनमें वर्ष भर पर्याप्त जल रहता है। अनेक छोटे बड़े नालों में शैल छिद्रों से रिसाव द्वारा जल प्राप्त होता है। उत्तरांचल की महत्त्वपूर्ण नदियों का संक्षिप्त विवरण तालिका 1 में दिया गया है।

 

तालिका 1. उत्तरांचल की प्रमुख नदियों का संक्षिप्त विवरण

विवरण

गंगा

अलकनन्दा

भीलंगाना

भागीरथी

पिण्डर

काली

सरयू

कोसी

गौला

लधिया

लम्बाई (कि.मी.)

312

‘अ’

‘अ’

220

120

150

78

75

जलागम क्षेत्र (वर्ग कि.मी.)

955000

‘अ’

‘अ’

‘अ’

‘अ’

10,870

2470

1475

912

246

जलीय तापमान (से.)

11.6-18.1

9.8-19.6

5.8-19.0

6.0-21.0

18.0-21.0

12.0-22.5

10.0-29.0

8.5-29.6

11.5-35.8

11.3-29.6

घुलित आॅक्सीजन (मि.ग्रा./लीटर)

8.7-9.5

7.0-10.0

6.8-14.8

7.0-11.5

10.0-14.0

6.5-10.5

9.7-11.5

7.8-13.8

7.8-13.8

7.2-11.2

मुक्त कार्बनडाई आॅक्साइड (मि.ग्रा./लीटर)

1.0-1.7

1.0-3.6

0.1-3.6

0.2-3.4

2.6-6.0

0.0-1.6

0.0-0.21

0.03-0.07

0.03-0.07

0.0-2.0

पी.एच.

7.4-8.0

7.2-8.1

6.3-8.3

7.0-7.9

7.9-8.1

7.0-8.5

7.8-8.5

6.5-7.8

6.5-7.8

8.0-8.6

 

 
‘अ’ -अनुपलब्ध

3.2 झीलें


राज्य में अनेक प्राकृतिक झीलें स्थित हैं जिनमें से अधिकतर नैनीताल जनपद में हैं जो विदेशों सहित देश के विभिन्न भागों से पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र हैं। राज्य भर में स्थित झीलों का कुल क्षेत्रफल लगभग 300 हेक्टेयर है। नैनीताल, सातताल, भीमताल, नौकुचियाताल, खुर्पाताल, श्यामलाताल, देवड़ीताल आदि यहाँ की प्रमुख झीले हैं। राज्य के उच्च हिमालयी क्षेत्र स्थित झीलों में रूपकुण्ड, हेमकुण्ड, सतोपन्थ, अरवाताल, देवरियाताल, सहस्त्रताल, सप्तऋषिताल मुख्य है। झीलों के लिये विख्यात नैनीताल जनपद की अनेक झीलें अब अपना अस्तित्व खो चुकी है। सूखाताल, सड़ियाताल, चोड़ीखेत, भंगतूडा इनके कुछ उदाहरण है। उत्तरांचल की प्रमुख झीलों का संक्षिप्त विवरण तालिका 2 में दर्शाया गया है।

3.3 जलाशय


सिंचाई, विद्युत उत्पादन आदि बहुउद्देशीय परियोजनाओं द्वारा राज्य में कुछ जलाशयों का निर्माण हुआ है। इनमें से अधिकतर जलाशय बाह्य हिमालयी तलहटी कटिबन्ध के अन्तर्गत है। नानकसागर, बैंगुल, तुमड़िया, शारदा सागर, धौरा, हरिपुरा आदि क्षेत्र के प्रमुख जलाशय है। वर्तमान में राज्य में निर्मित जलाशयों का कुल क्षेत्रफल 13,300 हे. है। टिहरी में निर्माणाधीन विशालकाय बाँध के अन्तर्गत बनने वाले जलाशय का अनुमानित क्षेत्रफल 42.0 वर्ग कि.मी. है। इन परियोजनाओं के अतिरिक्त पंचेश्वर, ठूलीगाड आदि प्रस्तावित परियोजनाएँ हैं जिनके अन्तर्गत भी जलाशयों का निर्माण होना है। उत्तरांचल में स्थित प्रमुख जलाशयों का संक्षिप्त विवरण तालिका 3 में दिया गया है।

3.4 तालाब एवं डिग्गियाँ


राज्य के तराई प्रक्षेत्र में कुछ प्राकृतिक एवं कृत्रिम तालाब उपलब्ध हैं लेकिन विशिष्ट भौगोलिक एवृ मृदीय कारणों से पर्वतीय क्षेत्र में बड़े प्राकृतिक तालाब नहीं है। पर्वतीय क्षेत्रों में सिंचाई के प्रयोजन से बने स्थानों पर विभिन्न प्रकार की सीमेंट निर्मित टकिया या डिग्गियाँ बनाई गई हैं जिनका यदा-कदा मत्स्य पालन हेतु प्रयोग किया जाता है।

 

तालिका 2. उत्तरांचल की प्रमुख झीलों का संक्षिप्त विवरण

विवरण

देवरियाताल

(चमोली)

नैनीताल

(नैनीताल)

भीमताल

(नैनीताल)

सातताल

(नैनीताल)

नौकुचियाताल

(नैनीताल)

खुर्पाताल

(नैनीताल)

श्यामलाताल

(चम्मावत)

समुद्रतल से ऊंचाई (मी.)

2250

1938

1440

1286

1220

1670

1510

अधिकतम लम्बाई (मी.)

681

1457

1974

875

1050

400

750

अधिकतम चौड़ाई

‘अ’

467

532

‘अ’

880

250

210

अधिकतम गहराई (मी.)

‘अ’

25.7

24.7

18.0

41.25

15

10.0

क्षेत्रफल (हे.)

2.3

45.0

72.9

37.0

44.0

13.0

4.0

जलीय तापमान (डिग्री से.)

6.3-19.3

7.0-23.5

10.0-26.0

6.2-30.0

7.3-29.0

11.5-27.5

9.6-28.4

घुलित ऑक्सीजन (मिग्रा./ली.)

5.4-9.0

4.8-14.1

9.7-13.4

6.2-8.6

9.0-11.4

8.5-15.9

7.2-11.2

जलागम क्षेत्र (वर्ग कि.मी.)

‘अ’

5.50

11.20

5.0

2.60

‘अ’

1.20

 

 
‘अ’- अनुपलब्ध

 

तालिका 3. उत्तरांचल में स्थित प्रमुख जलाशयों का संक्षिप्त विवरण

विवरण

बैगुल

तुमड़िया

धौरा

नानकसागर

समुद्र तल से ऊँचाई (मी)

200

‘अ’

200

200

क्षेत्रफल (हे.)

2200

2681

1200

4662

जलागम क्षेत्र (वर्ग कि.मी.)

118

703

‘अ’

5.40

जलीय तापमान (डिग्री से.)

‘अ’

25.0-39.0

18.0-35.0

17.0-33.0

पी.एच.

‘अ’ 7.8-11.4

7.8-8.6

7.4-8.3

 

घुलित आॅक्सीजन (मि.ग्रा./लीटर)

‘अ’

‘अ’

7.2-11.2

7.5-15.2

 

 
‘अ’ अनुपलब्ध

4. मत्स्य जैव विविधता


भौगोलिक संरचना एवं जलवायु की विविधता पर्वतीय क्षेत्र में अनेक सूक्ष्म आवास प्रक्षेत्रों को जन्म देती है जिस कारण क्षेत्र में प्रचुर पादप एवं जन्तु विविधता दिखाई देती है। उपरोक्त विभिन्नता के कारण ही इस राज्य में अनेक मत्स्य प्रजातियाँ पाई जाती हैं। अभी तक हुए विभिन्न मात्स्यिकी सर्वेक्षणों एवं अनुसन्धानों के आधार पर राज्य के पर्वतीय जलस्रोतों से 83 मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता का पता चलता है जिसमें से 70 प्रजातियाँ पूर्णतः स्थानीय एवं पर्वतीय हैं तथा शेष मैदानी भागों अथवा विदेशों से मत्स्य पालन के प्रयोजनार्थ लाई हुई हैं। उत्तरांचल की प्रमुख मत्स्य प्रजातियाँ निम्नवत हैं-

 

4.1 स्थानीय प्रजातियाँ

माहसीर वर्ग

सुनहरी माहसीर या हिमालयी माहसीर (टौर प्यूटिटोरा) उच्च पृष्ठ माहसीर (टौर टौर)

बर्फानी ट्राउट वर्ग

असेला ट्राउट (साइजोथोरैक्स रिचार्डसोनी) कुमाऊँ ट्राउट (साइजोथौरेक्स कुमाऊँनेन्सिस)

कार्प वर्ग

कलौंछ (लेबियो डीरो) व (लेबियो डायोकिलस) लटिया (क्रोसोकिलस लेटियस) गोटाइला (गारा गोटाइला) छगुनी (चगुनियस चगुनियो)

बेरिल वर्ग

भारतीय ट्राउट (रायमस बोला) हैमिल्टन बेरिल (बेरिलियस बेंडेलिसिस) बरना बेरिल (बेरिलियस बारना) परसी (बेरिलियस बेरिला)

विडाल वर्ग

पत्थर चट्टा (ग्लिप्टोथोरैक्स पेक्टिनोप्टेरस) तदैव (स्यडोकिनिस सल्केटस)

गडेरा वर्ग

नीमेकिलस बोटिया, निमेकिलस भिवानी, नीमेकिलस रूपिकोला, निमेकिलस मल्टीफेसियेटस, बोटिया अल्मोडी

बाम वर्ग

मेस्टेसिम्बेलस आरमेटस जेनेन्टोडोन कैन्सिला

सोया

चन्ना ओरियन्टेलिस

अन्य

पथूरा (ब्वानिया आस्ट्रेलिस) बिल्ली (एम्बलीसेप्स मैन्गोइस)

 

 

4.2 मत्स्य पालन हेतु उपयोगी मैदानी प्रजातियाँ


 

रोहू

लेबियो रोहिता

कतला

कतला कतला

नैन

सिराइनस मृगाला

 

 

4.3 विदेशी प्रजातियाँ


 

कामन कार्प

साइप्रिनस कार्पिओ

ग्रास कार्प

टेनोफेरिंगोडोन इडैला

सिल्वर कार्प

हाइपोफथेलमिक्थीस मोलिट्रिक्स

इन्द्रधनुषी ट्राउट

आन्कोरिन्कस माइकिस

भूरी ट्राउट

साल्मो ट्रूटा फेरिया

सुनहरी कार्प

कैरेसियस आरेटस, कैरेसियस कैरेसियस

लारवा भक्षी

गम्बूसिया एफिनिस

 

 
उपरोक्त पर्वतीय प्रजातियों के अतिरिक्त राज्य के मैदानी भागों में अन्य प्रजातियाँ भी पाई जाती है जिनमें लेबियो, सौल, मागूर, सिंघी, गूँछ, चीतल आदि मुख्य हैं।

5. राज्य में मात्स्यिकी का वर्तमान स्वरूप


उत्तरांचल में मत्स्य पालन का पूर्व इतिहास नहीं रहा है। इस क्षेत्र में केवल प्राकृतिक जलस्रोतों के निकट रहने वाले कुछ लोग परम्परागत विधियों द्वारा मछली पकड़ते रहे हैं। इस प्रकार पकड़ी गई मछलियाँ केवल अपने एवं पड़ोसियों के उपयोग हेतु होती थीं। इसमें विपणन का कोई प्रावधान नहीं था। मात्स्यिकी के वर्तमान स्वरूप में मत्स्य पालन तथा प्राकृतिक जलस्रोतों में निम्नवत विभाजित किया जा सकता है:

5.1 मत्स्य पालन


राज्य में मत्स्य पालन के शुभारम्भ का श्रेय टिहरी के शासकों को जाता है जिन्होंने वर्ष 1910 में कल्दयानी, उत्तरकाशी ट्राउट फार्म का निर्माण किया था तथा इसी वर्ष भूरी ट्राउट के 10,000 जीवित अंडे कश्मीर से मँगाकर निषेचित करने का प्रयास किया गया। वर्ष 1910 में ही समान मात्र में जीवित ट्राउट अंडे भवाली अण्डजननशाला में भी लाये गए थे। इस तरह राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन के प्रयास आरम्भ हुए लगभग नौ दशक व्यतीत हो चुके हैं किन्तु फिर भी क्षेत्र में मत्स्य पालन का उचित विकास एवं प्रसार अभी तक वांछित स्तर तक नहीं हो पाया है। प्राकृतिक तालाबों का अभाव, तालाब निर्माण योग्य भूमि की कमी, निर्माण में अधिक लागत, अत्यधिक जल रिसाव, उचित बीज का अभाव, स्थान विशेष के अनुरूप पालन तकनीक सम्बन्धित वैज्ञानिक जानकारी का अभाव तथा कम उत्पादकता अल्प विकास के प्रमुख कारण हैं। इन्हीं कारणों से यह व्यवसाय समस्त पर्वतीय क्षेत्रों में अभी शैशव अवस्था में ही है।

5.1.1 राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसन्धान केन्द्र की उपलब्धियाँ


पर्वतीय क्षेत्रों में मात्स्यिकी विकास के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद द्वारा इस संस्थान की स्थापना वर्ष 1987 में की गई थी। संस्थान का मुख्यालय भीमताल, जिला-नैनीताल में स्थित है तथा छीड़ापानी, जिला-चम्पावत में एक प्रायोगिक मत्स्य फार्म का निर्माण किया गया है।

संस्थान द्वारा छीड़ापानी मत्स्य फार्म चम्पावत (समुद्रतल से ऊँचाई 1620 मी.) पर चीनी कार्प मछलियों (ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प व कामन कार्प) के पालन सम्बन्धित विभिन्न प्रयोग किये गए हैं। शीत ऋतु (दिसम्बर-फरवरी) में पानी का तापमान 10 डिग्री सें. से नीचे रहने के कारण मछलियों में उक्त अवधि में वृद्धि नहीं हो पाती है। फार्म पर मत्स्य पालन 30×5×1.25 मी. आकार के सीमेंट निर्मित पक्के तालाबों में किया जा रहा है।

कामन कार्प एकल पालन


मार्च से नवम्बर तक तापमान की दृष्टि से अनुकूल अवधि के अन्तर्गत उपरोक्त तालाबों में समयबद्ध ढंग से गोबर, उर्वरक, चूना व प्रतिपूरक आहार का प्रयोग करने पर अधिकतम उत्पादन 37.40 किग्रा. प्रति नाली (1870 कि.ग्रा./हे.) तक प्राप्त किया गया। कामन कार्प पालने के लिये बीज सचयन की उपयुक्त दर एक मछली प्रति वर्ग मीटर रखी गई थी।

चीनी एवं कामन कार्प बहुप्रजाति पालन


चीनी कार्प (ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प व कामन कार्प) प्रजाति की मछलियों को एक साथ बहुप्रजाति विधि से पालने पर उत्पादन में लगभग दो गुना वृद्धि प्राप्त की गई। इस विधि के अन्तर्गत बीज संचयन की दर 1.8 बीज प्रति वर्ग मीटर अथवा 360 बीज प्रति नाली उपयुक्त पाई गई। इस प्रकार उपरोक्त अनुकूल अवधि में बहुप्रजाति मत्स्य पालन द्वारा अधिकतम 74.16 कि.ग्रा./) नाली (3708 कि.ग्रा./हे.) तक उत्पादन लिया गया। इस विधि के अन्तर्गत भी गोबर, उर्वरक, चूना तथा प्रतिपूरक आहार समयबद्ध ढंग से दिये गए।

उपरोक्त प्रयोगों में प्रतिपूरक आहार के रूप में सरसों या मूँगफली की खली (30 प्रतिशत), गेहूँ का चोकर (20 प्रतिशत), चावल की भूसी (30 प्रतिशत), सोयाबीन का आटा व मत्स्य चूर्ण (0-10 प्रतिशत) तथा सूक्ष्म मात्रा में विटामिन-खनिज तत्व मिश्रण को मछली के भार के 3 प्रतिशत की दर से पानी में भिगोकर व गोले बनाकर तालाब की तलहटी में डाला गया तथा कुल प्रतिपूरक आहार को दिन में दो बार दिया गया।

कार्प बीज उत्पादन


संस्थान के छीड़ापानी, चम्पावत स्थित प्रायोगिक मत्स्य फार्म में स्थानीय कृषकों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रतिवर्ष लगभग 10-20 हजार कामन कार्प मछलियों का बीज पैदा किया जा रहा है। इसके साथ ही चीनी कार्प (ग्रास कार्प एवं सिल्वर कार्प) मछलियों के बीज हेतु उपयुक्त प्रजनक तैयार किये गए हैं तथा इन मछलियों से बीज पैदा करने के लिये सघन वैज्ञानिक प्रयास किये जा रहे हैं।

असेला बीज उत्पादन


संस्थान के छीड़ापानी चम्पावत स्थित प्रायोगिक मत्स्य फार्म में एक प्रमुख पर्वतीय मत्स्य प्रजाति-असेला के कृत्रिम प्रजनन द्वारा असेला बीज उत्पादन में सफलता प्राप्त की गई है तथा अब मत्स्य फार्म में ही प्रजनक तैयार कर प्रायोगिक स्तर पर कृत्रिम विधि द्वारा बीज पैदा किया जा रहा है।

माहसीर बीज उत्पादन


संस्थान के भीमताल स्थित हैचरी में सुनहरी माहसीर मछली का बीज पैदा किया जा रहा है। यहाँ पर स्थापित अण्डजननशाला में एक समय में 2.5 लाख अण्डे निषेचित करने की क्षमता है। इस अण्डजननशाला में उत्पादित माहसीर बीज को प्रतिवर्ष स्थानीय झीलों तथा नदियों में संचय कर दिया जाता है। इस अण्डजननशाला में विगत एक दशक के अन्तर्गत लगभग चार लाख माहसीर बीज का उत्पादन किया गया है।

विदेशी ट्राउट


छीड़ापानी प्रायोगिक फार्म में बहुमूल्य विदेशी प्रजाति-इन्द्रधनुषी ट्राउट का सफलतापूर्वक पालन किया जा रहा है। निरन्तर प्रवाहयुक्त जल व्यवस्था वाले सीमेंट के तालाबों में कृत्रिम भोजन द्वारा ट्राउट मछली की दो वर्ष पश्चात अधिकतम 1000 ग्राम/मछली वृद्धि दर प्राप्त की गई है। ट्राउट बीज उत्पादन करने हेतु छीड़ापानी फार्म में प्रयास किये जा रहे हैं तथा फरवरी 2001 से इन्द्रधनुषी ट्राउट की स्थानीय स्तर पर बिक्री भी आरम्भ हो चुकी है।

5.1.2 अन्य विभागीय फार्मों की गतिविधियाँ


1. रक्षा कृषि अनुसन्धान द्वारा पंडा पिथौरागढ़ में एक मत्स्य फार्म स्थापित किया गया है। यहाँ पर चीनी एवं कामन कार्प मछलियों के बहुप्रजाति पालन पर कार्य किया जा रहा है।
2. मत्स्य विभाग, उत्तरांचल द्वारा संचालित बैरागना (चमोली), तलवाड़ी (चमोली) तथा कल्दयानी (उत्तरकाशी) में ट्राउट फार्म स्थित है जिनमें ट्राउट पालन किया जा रहा है।
3. राज्य के अन्तर्गत स्थित राष्ट्रीय महत्त्व के गोविन्द बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय, पन्तनगर (उधम सिंह नगर) द्वारा मात्स्यिकी के क्षेत्र में काफी कार्य किया जा रहा है। विश्वविद्यालय के मात्स्यिकी विभाग द्वारा मत्स्य बीज उत्पादन आदि तथा पालन पोषण पर कार्य प्रगति पर है तथा यहाँ पर मत्स्य विज्ञान में स्नातक, स्नातकोत्तर तथा पी.एच.डी तक शिक्षा प्रदान की जाती है।
4. राज्य की सीमा के अन्तर्गत आने वाले विश्वविद्यालयों कुमाऊँ, गढ़वाल व गुरूकुल कांगड़ी तथा अन्य स्नातकोत्तर महाविद्यालयों के जीव विज्ञान विभागों द्वारा भी स्थानीय जलीय व मात्सियकी पर्यावरण तंत्रों का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है।

उत्तरांचल में स्थित विभिन्न मत्स्य प्रक्षेत्रों का संक्षिप्त विवरण तालिका-4 में दिया गया है।

 

तालिका -4 उत्तरांचल में स्थित विभिन्न मत्स्य प्रक्षेत्रों का संक्षिप्त विवरण

क्र.सं.

फार्म

संगठन का नाम

कुल क्षेत्रफल (हे.)

पाली जा रही अथवा प्रजनित प्रजातियों का विवरण

1.

छीड़ापानी, चम्पावत

राष्ट्रीय शीतजल मात्सियकी अनुसन्धान केन्द्र (भीमताल

3.12

इन्द्रधनुषी ट्राउट, असेला ट्राउट, ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प व कामन कार्प

2.

भीमताल

तदैव

-

सुनहरी माहसीर

3.

पंडा, पिथौरागढ़

रक्षा कृषि अनुसन्धानशाला

-

ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प, कामन कार्प, सुनहरी कार्प

4.

नैनी सैनी, पिथौरागढ़

मत्स्य विभाग

-

कामन कार्प

5.

भवाली, नैनीताल

मत्स्य विभाग

0.5

सुनहरी कार्प

6.

डाक पत्थर, देहरादून

मत्स्य विभाग

1.0

सुनहरी माहसीर

7.

कल्दियानी, उत्तरकाशी

मत्स्य विभाग

1.0

भूरी ट्राउट

8.

बैरांगना, चमोली

मत्स्य विभाग

1.0

इन्द्रधनुषी ट्राउट

 

 

5.1.3 मत्स्य पालकों की उपलब्धियाँ


यद्यपि हमारे देश के कुछ भागो में ईसा पूर्व से मत्स्य पालन गतिविधियों के संचालन के प्रमाण मिलते हैं जिसके फलस्वरूप देश में मत्स्य उत्पादन उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। विश्व खाद्य संगठन के एक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 1996 में भारत का कुल मत्स्य उत्पादन 52.60 लाख टन था जिसमें से 17.68 लाख टन (33.61 प्रतिशत) मत्स्य पालन द्वारा उत्पादित था किन्तु अनेक विषम परिस्थितियों के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में अभी तक मत्स्य पालन का उचित विकास नहीं हो पाया है फिर भी विगत एक दशक से राज्य के कुछ उत्साही विकासशील कृषक मत्स्य पालन अपनाने लगे हैं। वर्ष 1999-2000 में राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसन्धान केन्द्र द्वारा तकनीकी हस्तान्तरण परियोजना के अन्तर्गत राज्य के भीमताल (जनपद नैनीताल) तथा पाटी (जनपद चम्पावत) विकास खण्डों में लगभग दो दर्जन भर मत्स्य पालकों को तकनीकी सहयोग प्रदान किया गया। इस समय राज्य भर में अनेक मत्स्य पालकों का उदय हो चुका है। कुछ मत्स्य पालकों द्वारा मार्च से अक्टूबर तक तीन प्रजाति पालन द्वारा 4000 कि.ग्रा./हे. (80 कि.ग्रा./नाली) तक उत्पादन प्राप्त किया गया है। उपरोक्त कृषकों द्वारा उचित समय पर प्रतिपूरक आहार, गोबर, उर्वरक तथा चूने का नियमित प्रयोग किया जाता है।

5.2 प्राकृतिक जलस्रोतों में मात्स्यिकी का वर्तमान परिदृश्य


राज्य के प्राकृतिक जल संसाधनों में उपलब्ध मत्स्य सम्पदा का आवास क्षेत्रों में प्रतिकूल परिवर्तनों तथा अन्धाधुन्ध व अवैज्ञानिक दोहन के कारण निरन्तर ह्रास हो रहा है इसके कारण यहाँ की बड़ी नदियों तथा झीलों में पाई जाने वाली बड़े आकार की सुनहरी माहसीर तथा अन्य प्रजातियाँ अब अपना स्वरूप खो चुकी है। अन्यथा 20वीं शताब्दी के मध्य तक इनमें से 23 से 28 किग्रा. तक भार की सुनहरी माहसीर पकड़े जाने के पुष्ट प्रमाण मिलते हैं अब इन जलस्रोतों से 5-10 कि.ग्रा. तक आकार की सुनहरी माहसीर भी दुर्लभ होती जा रही है। क्षेत्र की प्रमुख प्रजातियों के साथ विध्वंसक दोहन के कारण छोटी-छोटी, कम महत्त्वपूर्ण प्रजातियाँ भी नष्ट होती जा रही हैं। क्षेत्र में मात्स्यिकी विनाश के प्रमुख कारण निम्न हैं-

5.2.1 आवासों में प्रतिकूल परिवर्तन


जल संसाधनों के पर्यावरण में प्रतिकूल परिवर्तनों के कई कारक हैं। पर्वतीय ढलानों में वनों का कटाव, सड़क एवं भवन निर्माण गतिविधियाँ, अवैज्ञानिक कृषि, बाँधों का निर्माण आदि इसके प्रमुख कारण हैं। प्राकृतिक जलस्रोतों का सिंचाई अथवा पेयजल या उद्योगों हेतु अत्यधिक निकासी स्रोतों को दुष्प्रभावित करने का एक अन्य प्रमुख कारण है। एक सर्वेक्षण के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में एक कि.मी. सड़क का निर्माण करने पर 40-80 हजार घन मीटर भूमि का अपरदन होता है तथा कुमाऊँ मण्डल में भूमि कटाव की अनुमानित दर 1 मि.मी. प्रतिवर्ष आँकी गई है। इस प्रकार अपरदित मिट्टी कंकड, पत्थर आदि जलस्रोतों की तलहटी में एकत्रित हो जाते हैं जिससे झीलों तथा जलाशयों में जल संग्रहण सीमा कम हो जाती है। नैनीताल झील में इस तरह विगत 5 दशकों में 6 मी. मिट्टी कंकड़ एकत्र हो चुके हैं। इसके कारण जलस्रोतों में उपलब्ध मछलियों के आवास, भोजन तथा प्रजनन स्थलों में विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।

5.2.2 जल प्रदूषण


घरेलू शौचालय, स्नानघरों तथा पशुशालाओं से निकला हुआ गन्दा जल पर्वतीय क्षेत्र में छोटे जलस्रोतों को प्रदूषित करने के लिये पर्याप्त होता है तथा कुछ बड़ी आबादी से निकले हुए अपशिष्ट पदार्थ बड़े नालों को प्रदूषित करते हैं। यह प्रदूषण स्थानीय प्राकृतिक स्रोतों के भौतिक-रासायनिक तथा जैविक संरचना में प्रतिकूल परिवर्तन कर देते हैं जिस कारण स्थानीय मत्स्य प्रजातियाँ नष्ट हो जाती हैं। इन्हीं प्रकार के अपशिष्टों के निरन्तर प्रवाह के कारण नैनीताल झील पूर्णतः प्रदूषित हो चुकी है तथा उसमें पाई जाने वली सुनहरी माहसीर तथा असेला पूर्णतः लुप्त हो चुकी है। क्षेत्र की बड़ी नदियाँ जैसे गंगा, यमुना काली आदि जलीय प्रदूषण से अभी तक अप्रभावित हैं।

5.2.3 अत्यधिक मत्स्य दोहन


वर्तमान समय में आबादी के निकट बहने वाले जलस्रोतों तथा झीलों में उलपब्ध सम्पदा का अन्धाधुन्ध दोहन हो रहा है। मछली पकड़ने के उपकरणों तथ विधियों में कोई प्रभावी नियंत्रण न होने के कारण सभी आकार तथा प्रकार की मछलियों का विनाश हो रहा है। परम्परागत मछली पकड़ने की विधियों के साथ-साथ अब विध्वंसक-डाइनामाइट, ब्लीचिंग पाउडर, विषैले पादपों तथा रसायनों का भी मछली मारने में दुरुपयोग किया जा रहा है। इस प्रकार मछलियों की प्राकृतिक प्रजनन क्षमता से अधिक इनका दोहन किया जा रहा है जिससे इनके लुप्त होने की प्रबल आशंका है।

6. राज्य में मात्स्यिकी विकास की सम्भावित दिशाएँ


उत्तरांचल में मात्स्यिकी विकास के लिये मत्स्य पालन के विकास एवं विस्तार के साथ-साथ बहुमूल्य मत्स्य प्रजातियों के संरक्षण व संवर्द्धन की भी अत्यन्त आवश्यकता है।

6.1 मत्स्य पालन विकास एवं विस्तार


राज्य की 70 लाख आबादी में से लगभग 80 प्रतिशत मांसाहारी एवं मत्स्यहारी है। उपरोक्त जनसंख्या के लिये भारत में प्रति व्यक्ति मत्स्य उपलब्धता की समकक्ष दर पर भी न्यूनतम 35 हजार टन प्रतिवर्ष उत्पादन की आवश्यकता है जबकि वर्तमान में पर्वतीय क्षेत्रों में मत्स्य पालन से सतत नियमित उत्पादन नगण्य है तथा आपूर्ति मैदानी भागों से आने वाली मछलियों से होती हैं। झीलों तथा जलाशयों के अतिरिक्त अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों से नियमित आपूर्ति नहीं होती है। इस प्रकार राज्य में उपलब्ध जल एवं भूमि का मत्स्य पालन हेतु उपयोग किये जाने की आवश्यकता है जिससे एक सुपाच्य, स्वादिष्ट जन्तु प्रोटीन की उपलब्धता के साथ-साथ आर्थिक रूप से कमजोर नवोदित राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने में सहायता मिल सकती है मत्स्य पालन विकास के लिये निम्न सम्भावित दिशाओं में प्रयास करने की आवश्यकता है।

6.1.1 त्रिस्तरीय मत्स्य पालन


राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में उपलब्ध जल संसाधनों एवं उपयुक्त भूमि के त्रिस्तरीय मत्स्य पालन कार्यक्रम के अन्तर्गत सदुपयोग किये जाने की अपार सम्भावनाएँ हैं। इसके लिये सूक्ष्म जलवायु आधारित विभिन्न आवास क्षेत्रों को तीन भिन्न-भिन्न मत्स्य पालन तकनीकों के माध्यम से उपयोग में लाना है। स्थान विशेष के लिये उपयुक्त तकनीक का चयन मुख्यतः समुद्र तल से उस स्थान की ऊँचाई के आधार पर किया जा सकता है जो निम्न प्रकार हैं:

कार्प मछली पालन


राज्य के समुद्र तल से 1000 मी. ऊँचाई तक के स्थल जो मुख्यतः बाह्य हिमालयी तलहटी कटिबन्ध के अन्तर्गत आते हैं भारतीय तथा चीनी मछलियों के बहुप्रजाति पालन हेतु पूर्णतः उपयुक्त हैं। इसके लिये जल स्रोतों के निकट चिकनी मिट्टी युक्त समतल भूखण्ड अथवा दलदली भूमि कच्चे तालाबों के निर्माण हेतु उचित होती है क्योंकि इस प्रकार की भूमि में जल रिसाव न्यूनतम होता है। उपलब्ध भूखण्ड के अनुसार 100 वर्ग मी. तथा इससे अधिक आकार के तालाब न्यूनतम लागत पर बनाए जा सकते हैं। इन तालाबों में भारतीय कार्प (रोहू, कतला, नैन) तथा चीनी कार्प (ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प व कामन कार्प) का छः प्रजाति मिश्रित पालन किया जा सकता है। समयबद्ध ढंग से उचित बीज, प्रतिपूरक आहार, गोबर, उर्वरक व चूना प्रयोग करने से इन तालाबों से प्रतिवर्ष 4000-6000 कि.ग्रा./हे. उत्पादन किया जा सकता है।

विदेशी कार्प मछली पालन


समुद्र तल से 1000 मी. से 1500 मी. के मध्य स्थित लघु हिमालयी नदी घाटियों में उपयुक्त भूमि पर कच्चे तालाबों क निर्माण कर चीनी कार्प प्रजातियों क पालन किया जा सकता है। इसके लिये उपयुक्त प्रजातियाँ-ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प तथा कामन कार्प हैं। इस प्रक्षेत्र में दिसम्बर से मार्च के मध्य जल का तापमान प्रायः 10 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहता है इस तापमान पर भारतीय कार्प प्रजातियाँ जीवित नहीं रह पाती तथा चीनी कार्प प्रजातियों में भी वृद्धि दर नगण्य अथवा नकारात्मक होता है। इस कारण इस भूभाग में अप्रैल से नवम्बर माह के मध्य मत्स्य पालन करना लाभदायक होता है। समुचित बीज संग्रहण कर समयबद्ध ढंग से प्रतिपूरक आहार, गोबर, उर्वरक व चूने का प्रयोग करने पर उपरोक्त अवधि में न्यूनतम लागत पर 3000-5000 कि.ग्रा./हे की दर से मत्स्य उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

विदेशी ट्राउट पालन


उचित गुणवत्ता युक्त पर्याप्त जल उपलब्ध होने पर 1500 मी. से अधिक ऊँचाई वाले स्थानों (उच्च नदी घाटी कटिबन्ध) में बहुमूल्य विदेशी इन्द्रधनुषी तथा भूरी ट्राउट मछलियों का समुचित कृत्रिम पौष्टिक आहार द्वारा पालन किया जा सकता है। ट्राउट पालन हेतु प्रदूषण व गाद रहित स्वच्छ जल की आवश्यकता हेाती है और जल का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे तथा घुलनशील ऑक्सीजन 8-10 मि.ग्रा./ली. तक रहना आवश्यक है। ट्राउट पालन हेतु उपयुक्त जल स्रोतों के निकट समतल भूखण्ड पर कंक्रीट के लम्बे तथ संकरे तालाबों को निर्माण कर पानी की समुचित प्रवाहयुक्त व्यवस्था आवश्यक है।

अन्य प्रजातियों का पालन


यद्यपि पर्वतीय क्षेत्रों में माहसीर, असेला आदि महत्त्वपूर्ण प्रजातियाँ पाई जाती है इनमें से सुनहरी माहसीर तो विशाल आकार तक ग्रहण करती है लेकिन इनकी वार्षिक वृद्धि बहुत कम होने के कारण यह स्थानीय प्रजातियाँ व्यावसायिक पालन हेतु उपयोगी नहीं है। भविष्य में आनुवंशिक अभियांत्रिकी एवं अन्य तकनीकों द्वारा सुधार हो जाने के पश्चात यह प्रजातियाँ भी लाभदायक मत्स्य पालन हेतु उपयोगी हो सकती है।

6.1.2 झीलों तथा जलाशयों में उचित मात्स्यिकी प्रबन्धन


वर्तमान में झीलों तथा जलाशयों के रूप में उपलब्ध विशाल जलराशि से मत्स्य उत्पादन की दर बहुत कम है। इन संसाधनों में उत्पादकता पर आधारित समुचित प्रजातियों के संग्रहण तथा उसी अनुपात में दोहन किये जाने की आवश्यकता है। उत्पादन में वृद्धि के लिये विभिन्न प्रकार के पिजड़ों में मत्स्य पालन व्यावसायिक स्तर पर किया जा सकता है। पोखरा (नेपाल) में मत्स्य पालन हेतु पिजड़ों का उपयोग बहुत लाभदयक सिद्ध हुआ है जिसमें जलस्रोतों की उत्पादकता पर आधारित अथवा प्रतिपूरक आहार देकर मत्स्य पालन किया जा सकता है। जलीय पर्यावरण सन्तुलन को ध्यान रखते हुए स्थानीय स्तर पर न्यूनतम मूल्य में उपलब्ध सामग्री से निर्मित पिजड़ों का प्रयोग करने से अधिक मत्स्य उत्पादन की सम्भावनाएँ है।

6.1.3 पर्यटन विकास हेतु आखेट योग्य प्रजातियों का संरक्षण एवं संवर्द्धन


राज्य के कुछ जलस्रोतों में विश्व प्रसिद्ध मत्स्य प्रजातियाँ पाई जाती है। सुनहरी माहसीर, उच्च पृष्ठ माहसीर, विदेशी ट्राउट के आखेट हेतु प्रतिवर्ष विश्व भर के मत्स्य आखेटक इस क्षेत्र में आते हैं। राज्य के कुछ उपयुक्त जलाशयों अथवा अन्य जलस्रोतों में उपरोक्त प्रजातियों का प्रजनन संग्रहण व संरक्षण कर पर्यटन का विकास व विस्तार किया जा सकता है।

6.2 प्राकृतिक जल स्रोतों में मात्स्यिकी संरक्षण


राज्य में उपलब्ध अनेक महत्त्वपूर्ण मत्स्य प्रजातियों का निरन्तर विनाश हो रहा है जबकि समस्त पर्यावरणीय तंत्रों का सन्तुलन मानव जीवन के अस्तित्व के लिये अति आवश्यक है तथा उपलब्ध आनुवंशिक विविधता का भविष्य के विकास कार्यक्रमों हेतु बहुत महत्त्व है इसलिये उपरोक्त मत्स्य संसाधनों के संरक्षण हेतु अतिशीघ्र प्रभावी कदम उठाए जाने आवश्यक हैं जो निम्नवत है-

1. राज्य के कई जलस्रोतों में जलागम क्षेत्रों की अनेक गतिविधियों के कारण प्रतिकूल भौतिक, रासायनिक एवं जैविक परिवर्तन हुए हैं जिस कारण महत्त्वपूर्ण मत्स्य प्रजातियों के भोजन, प्रजनन तथा आवास स्थल कुप्रभावित हुए हैं अतः मात्सियकी व जलीय संसाधनों के संरक्षण हेतु जलागम क्षेत्रों में एकीकृत वैज्ञानिक जलागम प्रबन्धन कार्यक्रमों की नितान्त आवश्यकता है।

2. शहरों, कस्बों, गाँवों तथा सड़क मार्गों के निकट स्थित नदियों, नालों, झीलों, जलाशयों आदि में प्रदूषण के कारण भी मत्स्य आवास स्थल का स्वरूप प्रभावित हो रहा है जिसे नियंत्रित किया जाना आवश्यक है।

3. बढ़ती जनसंख्या के निकट स्थित जलस्रोत अत्यधिक मत्स्य दोहन के कारण नष्ट होते जा रहे हैं तथा इन जल संसाधनों में मछलियों के प्राकृतिक प्रजनन से अधिक तेज गति से दोहन हो रहा है जिस कारण इनमें उपलब्ध मत्स्य प्रजातियों का अस्तित्व संकट में है। प्रभावी कदमों के द्वारा इस स्थिति को नियंत्रित किया जाना आवश्यक है।

4. परम्परागत विधियों द्वारा मछली पकड़ने से जलीय संसाधनों में उपलब्ध प्रजातियों में अधिक प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है जबकि प्रयोग में लाये जा रहे जालों तथा फन्दों का आकार छोटे आकार की मछलियों को पकड़ने योग्य न हो। लेकिन वर्तमान में प्रयुक्त किये जा रहे जालों में इस प्रकार के प्रावधानों का पालन नहीं किया जा रहा तथा इनके अतिरिक्त अत्यन्त घातक विधियों- जैसे डायनामाइट, विषैले पादपों तथा रसायनों आदि का मछली पकड़ने में दुरुपयोग किया जा रहा है। उपरोक्त विधियाँ मात्स्यिकी संसाधनों के साथ स्थानीय पारिस्थतिकीय तंत्र के विनाश में सक्षम हैं। इसलिये मास्त्यिकी संसाधनों के संरक्षण हेतु वर्ष 1897 से अस्तित्व में आये हुए भारतीय मत्स्य अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू करने की आवश्यकता है। इस अधिनियम के अन्तर्गत उपरोक्त विध्वंसक विधियों के द्वारा मछली पकड़ने वालों के विरूद्ध उचित दण्ड विधान का प्रावधान है।

5. मत्स्य संरक्षण के लिये प्रजनन काल में मछलियों का पकड़ने से रोका जाना अति आवश्यक है।

6. राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसन्धान केन्द्र द्वारा सुनहरी माहसीर तथा असेला मछलियों के कृत्रिम प्रजनन द्वारा बीज उत्पादन की तकनीक विकसित की गई है अतः राज्य के अन्य उपयुक्त स्थानों में इन तकनीकों पर आधारित अण्डजननशालाएँ स्थापित कर इन मछलियों का बीज उत्पादन किया जा सकता है जिसे स्थानीय जल स्रोतों में संग्रहित कर लुप्तप्राय मछलियों की प्राकृतिक संख्या में वृद्धि की जा सकती है।

7. बैजनाथ (जनपद बागेश्वर) में गोमती नदी के एक भाग को संरक्षित किया गया है जिसमें सैंकड़ों सुनहरी माहसीर मछलियाँ सदैव अठखेलियाँ करती दिखाई देती है। इसी प्रकार कुछ अन्य नदियों के चयनित भागों को संरक्षित करने में मत्स्य जैवविविधता का संवर्द्धन व संरक्षण किया जा सकता है।

8. जलागम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को समन्वित मत्स्य पालन के लिये प्रेरित किये जाने की आवश्यकता है जिससे प्राकृतिक जलस्रोतों में मात्स्यिकी विनाश का दबाव कम किया जा सके।

9. महत्त्वपूर्ण एवं संकटग्रस्त मत्स्य प्रजातियों के साथ-साथ समस्त मत्स्य जैवविविधता के संरक्षण एवं संवर्द्धन की आवश्यकता को जन जागरण अभियान के द्वारा जन-जन तक पहुंचाने की अत्यन्त आवश्यकता है जिसके परिणामस्वरूप मत्स्य सम्पदा के अन्धाधुन्ध दोहन पर नियंत्रण हो सके।

उपसंहार


उत्तरांचल राज्य में उपरोक्त सम्भावित दिशाओं के अनुसार मात्स्यिकी विकास एवं विस्तार की अपार सम्भावनाएँ हैं जिनसे:

1. राज्य में उपलब्ध प्रचुर जलीय संसाधनों, मत्स्य जैवविविधता एवं उपयुक्त भूमि का सदुपयोग हो सकता है।
2. मत्स्य उत्पादन में वृद्धि होने पर स्थानीय जनता को मछली के रूप में एक सुपाच्य पौष्टिक, उच्च गुणवत्ता युक्त जन्तु प्रोटीन की उपलब्धता में वृद्ध हो सकती है।
3. मत्स्य पालन के विस्तार से राज्य में रोजगार के अतिरिक्त अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
4. कृषकों के लिये मत्स्य पालन के रूप में आय का एक अतिरिक्त स्रोत प्राप्त हो सकता है।
5. आखेट योग्य मत्स्य प्रजातियों के संरक्षण व संवर्द्धन एवं मत्स्य अभयारण्यों की स्थापना करके अधिक-से-अधिक पर्यटकों को आकर्षित किया जा सकता है जिससे पर्यटन क्षेत्र को लाभ होगा।
6. राज्य के अनेक जलस्रोतों में कुछ बहुमूल्य आकर्षक मत्स्य प्रजातियाँ भी पाई जाती है। जिनकी शहरी क्षेत्रों में ऐक्वेरियम सज्जा के लिये अच्छी माँग है अतः गुलाबी बार्ब, सुनहरी बार्ब, टिक्टो बार्ब, बेरिल, जेब्रा डेनियो, चीतल आदि के अतिरिक्त विदेशी प्रजातियों के प्रजनन, पालन एवं विपणन का कार्य किये जाने की भी क्षेत्र में असीम सम्भावनाएँ हैं।
7. राज्य में समग्र मास्त्यिकी विकास के लिये उधम सिंह नगर, हरिद्वार तथा कुछ अन्य जनपदों के मैदानी भागों में उपलब्ध तालाबों का मत्स्य पालन हेतु उपयोग किया जाना चाहिए तथा मैदानी भागों में चल रही मत्स्य पालन गतिविधियों का इन क्षेत्रों में विस्तार होना चाहिए।

चूँकि इस क्षेत्र में अभी तक मात्स्यिकी विकास की देश में किये गए प्रयास पर्याप्त नहीं हैं इसलिये राज्य में सन्तुलित, पर्यावरण-मित्र सतत मास्त्यिकी विकास के लिये सघन, समन्वित प्रभावी कदमों की आवश्यकता है जिसके लिये राज्य के सम्बन्धित क्षेत्र के समस्त घटकों जैसे- मत्स्य विभाग, वैज्ञानिक संगठन, गैर सरकारी संगठन, विश्वविद्यालय, योजनाकार, प्रशासक, प्रचार माध्यम, मत्स्य व्यवसाय से जुड़े व्यक्ति, मत्स्य आखेटक तथा जन प्रतिनिधियों द्वारा सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है।

वर्तमान समय में राज्य में मत्स्य पालन के विकास एवं विस्तार हेतु पर्वतीय कृषक विकास अभिकरणों की स्थापना की गई है जिनके मुख्यालय काठगोदाम, जनपद नैनीताल, (कुमाऊँ) तथा देहरादून, जनपद देहरादून (गढ़वाल) में स्थित है। कार्यक्रमों के सुचारू रूप से संचालन हेतु लगभग प्रत्येक जनपद में वरिष्ठ निरीक्षक अथवा मत्स्य निरीक्षक नियुक्त हैं। पर्वतीय मत्स्य कृषक विकास अभिकरणों के माध्यम द्वारा मत्स्य तालाब के निर्माण हेतु अनुदान युक्त ऋण सुविधा स्थानीय बैंकों के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है। विभाग द्वारा मत्स्य बीज आपूर्ति तथा मत्स्य पालन तकनीकों की जानकारी भी दी जाती है।

प्रर्वतीय क्षेत्रों में मात्स्यिकी विकास, संरक्षण व संवर्द्धन के लिये राष्ट्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसन्धान केन्द्र सदैव प्रयासरत है। इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी अथवा उच्च गुणवत्ता युक्त मत्स्य बीज व अन्य तकनीकी जानकारी के लिये संस्थान के मुख्यालय भीमताल अथवा चम्पावत कार्यालय में सम्पर्क किया जा सकता है।

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