बिहार सरकार ने ली पानी की सुध

Submitted by RuralWater on Tue, 10/18/2016 - 15:58

बिहार में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन तीनों की समस्या है। बिहार की सरकार ने इन तीनों समस्याओं के उन्मूलन की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है। देखना है कि यह कदम अपनी मंजिल तक पहुँचता है या फिर सिर्फ राजनीतिक वादा बनकर रह जाता है।

लम्बे समय से बिहार में सामाजिक कार्यकर्ता बिहार में पानी की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठा रहे थे। अब पानी की गुणवत्ता के मुद्दे पर बिहार सरकार जागरूक हुई है, उसके नए फैसले से ऐसा लगता है।

अब बिहार के सभी जिलों में मुख्यमंत्री ग्रामीण पेयजल निश्चय योजना के अन्तर्गत पेयजल की गुणवत्ता की समस्या के निराकरण के लिये जल जाँच प्रयोगशाला स्टैंडर्ड बनाया जाएगा। जल जाँच प्रयोगशाला को राष्ट्रीय स्तर की संस्था एनएबीएल से मान्यता दिलाए जाने की योजना है।

इस संस्था द्वारा लोग अपने निजी जल स्रोतों के पानी की भी जाँच करा पाएँगेे। इसके लिये प्रयोगशाला में शुल्क आधारित व्यवस्था विकसित की जाएगी। जिन जिलों या प्रखण्डों से फ्लोराइड की शिकायत आ रही है, वैसे जिला, प्रखण्ड अथवा पंचायत में समुदाय संचालित पानी की गुणवत्ता के जाँच के लिये जाँच केन्द्र बनाया जाएगा।

पानी की गुणवत्ता की जाँच की रिपोर्ट को आम आदमी को उपलब्ध कराने के लिये अन्य संचार माध्यमों के अलावा इंटरनेट आधारित एमआइएस का विकास किया जाएगा।

पानी की जाँच से जुड़े कर्मचारियों अथवा दवा विक्रेता, अथवा प्रयोगशाला में काम करने वाले कर्मचारी, सहायक आदि कुशल तरीके से जाँच को अंजाम दे पाएँ इसके लिये उनके नियमित प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाएगी। जिसमें उन्हें पानी की गुणवत्ता को जाँचने से सम्बन्धित तमाम नई तकनीक की जानकारी मिल सके। जिससे पानी की गुणवत्ता की सही सही जाँच प्रदेश में हो सके।

हाल में ही इस तरह की एक कार्यशाला का आयोजन बिहार में हुआ। जिसमें कार्यशाला में आये लोगों को पानी की गुणवत्ता की जाँच के लिये नई तकनीक की जानकारी दी गई।

बिहार में राष्ट्रीय स्तर की संस्था एनएबीएल से मान्यता प्राप्त एक राज्य स्तरीय रेफरल लैब पटना में है। लेकिन इसका अधिक लाभ बिहार को मिलता नहीं दिखता। बिहार के कई गाँवों और प्रखण्डों में पानी में फ्लोराइड की बढ़ी मात्रा की वजह से विकलांगता एक सामान्य बीमारी बन गई है।

सीतामढ़ी में जल जनित रोगों का शिकार एक पूरा क्षेत्र काला पानी के नाम से जाना जाता है। ऐसे में पानी को लेकर सरकार की खुली निन्द स्वागत योग्य है। स्वागत इसलिये भी क्योंकि योजना के रोडमैप के अनुसार इसकी पहुँच गाँवों तक होगी। मुख्यमंत्री ग्रामीण पेयजल निश्चय योजना के अन्तर्गत गाँवों में लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिये पानी की नियमित जाँच होगी।

पानी की जाँच जिला स्थित जाँच प्रयोगशालाओं में की जाएगी। इस तरह की जाँच को साल में दो बार किया जाना प्रस्तावित है। सार्वजनिक जगहों पर पानी की जाँच मानसून प्रारम्भ होने के समय पर किये जाने का प्रस्ताव है और मानसून खत्म होने पर पानी की जाँच होगी।

पानी की जाँच से यह पता लगाया जाना है कि जिस पानी को पीने में इस्तेमाल किया जा रहा है, वह पीने के योग्य है भी कि नहीं। यदि पानी पीने योग्य नहीं है तो इसकी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। जिससे उसका इस्तेमाल करने वाले सतर्क हो सकें। साथ ही स्थानीय प्रशासन स्थानीय स्तर पर पानी की गुणवत्ता को सुधारने की दिशा में प्रयत्न कर सके। चलंत जल प्रयोगशाला को बिहार के अलग-अलग अंचलों तक ले जाने की दिशा में भी विचार किया जा रहा है। चलंत जल प्रयोगशाला अति पिछड़े गाँवों तक जाकर वहाँ के पानी की जाँच करके रिपोर्ट देगी। यह सारी योजना आकर्षक है लेकिन इसका क्रियान्वयन आसान नहीं होगा।

बहरहाल, बिहार में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन तीनों की समस्या है। बिहार की सरकार ने इन तीनों समस्याओं के उन्मूलन की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है। देखना है कि यह कदम अपनी मंजिल तक पहुँचता है या फिर सिर्फ राजनीतिक वादा बनकर रह जाता है।

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