हजारों हेक्टेयर की जल जमाव वाली जमीन को बनाया उपजाऊ

Submitted by RuralWater on Fri, 02/03/2017 - 13:20

मखाने की खेती की विशेषता यह है कि इसकी लागत बहुत कम है। इसकी खेती के लिये तालाब होना चाहिए जिसमें 2 से ढाई फीट तक पानी रहे। पहले साल भर में एक बार ही इसकी खेती होती थी। लेकिन अब कुछ नई तकनीकों और नए बीजों के आने से मधुबनी-दरभंगा में कुछ लोग साल में दो बार भी इसकी उपज ले रहे हैं। मखाने की खेती दिसम्बर से जुलाई तक ही होती है। खुशी की बात यह है कि विश्व का 80 से 90 प्रतिशत तक मखाने का उत्पादन बिहार में ही होता है। विदेशी मुद्रा कमाने वाला यह एक अच्छा उत्पाद है। बिहार में मखाना की खेती ने न सिर्फ सीमांचल के किसानों की तकदीर बदल दी है बल्कि हजारों हेक्टेयर की जलजमाव वाली जमीन को भी उपजाऊ बना दिया है। अब तो जिले के निचले स्तर की भूमि मखाना के रूप में सोना उगल रही है। विगत डेढ़ दशक में पूर्णिया, कटिहार और अररिया जिले में मखाना की खेती शुरू की गई है। किसानों के लिये यह खेती लकी साबित हुआ है। मखाना खेती का स्वरूप मखाना खेती शुरू होने से तैयार होने तक की प्रक्रिया भी अनोखी है। नीचे जमीन में पानी रहने के बाद मखाना का बीज बोया जाता है।

वर्ष 1770 में जब पूर्णिया को जिला का दर्जा मिला तो उस समय कोसी नदी का मुख्य प्रवाह क्षेत्र पूर्णिया जिला क्षेत्र में था और प्रवाह क्षेत्र बदलते रहने से कोसी नदी की विशेषता के कारण पूरे क्षेत्र का भौगोलिक परिदृश्यों की विशेषता यह है कि यहाँ की जमीन ऊँची-नीची है। नीची जमीन होने के कारण नदियों का मुहाना बदलता रहता है कोसी के द्वारा उद्गम स्थल से लाई गई मिट्टी एवं नदी की धारा बदलने से क्षारण के रूप में नीचे जमीन सामने आती है। खासकर इन्हीं नीची जमीन में मखाना की खेती शुरू हुई थी।

साल भर जलजमाव वाली जमीन में मखाना की खेती होने लगी। खास कर कोसी नदी के क्षारण का यह क्षेत्र वर्तमान पूर्णिया जिला के सभी ब्लॉकों में मौजूद है।

दरंभगा जिला से बंगाल के मालदा जिले तक खेती


मखाना का पौधा पानी के लेवल के साथ ही बढ़ता है। और मखाना के पत्ते पानी के ऊपर फैले रहते हैं और पानी के घटने की प्रक्रिया शुरू होते ही लगभग फसल होकर पानी से लबालब भरे खेत की जमीन पर पसर जाता है। जिसे कुशल और प्रशिक्षित मजदूर द्वारा विशेष प्रक्रिया अपना कर पानी के नीचे ही बुहारन लगा कर फसल एकत्र किया जाता है और पानी से बाहर निकाला जाता है।

मखाना की खेती की शुरुआत बिहार के दरभंगा जिला से हुई वहाँ से सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज होते हुए पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के हरिचन्द्रपुर तक फैल गया है। पिछले एक दशक से पूर्णिया जिले में मखाना की खेती व्यापक रूप से हो रही है। सालों भर जलजमाव वाली जमीन मखाना की खेती के लिये उपयुक्त साबित हो रही है।

अधिकांश जमीन वाले अपने जमीन को मखाना की खेती के लिये लीज पर दे रहे हैं। बेकार पड़ी जमीन से वार्षिक आय अच्छी हो रही है। बढ़ती आबादी के बीच तालाबों की घट रही संख्या मखाना उत्पादन को प्रभावित नहीं करेगी। अनुमण्डल के प्रसिद्ध किसान झंझारपुर बाजार निवासी बेनाम प्रसाद ने इसे सिद्ध कर दिया है। हालांकि बेनाम प्रसाद ने जो तकनीक अपनाई है, वह पुरानी है लेकिन अगर इस तकनीक का उपयोग किसान करने लगे तो मखाना उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि होगी।

मखाना उपजाने के लिये आप अपने सामान्य खेत का इस्तेमाल कर सकते हैं। शर्त है कि मखाना की खेती के अवधि के दौरान उक्त खेत में 6 से 9 इंच तक पानी जमा रहे। इसी तकनीक को अपनाकर तथा मखाना कृषि अनुसन्धान केन्द्र दरभंगा के विशेषज्ञों की राय लेकर अपने पाँच कट्ठा खेती योग्य भूमि में इस बार मखाना की खेती की है।

मखाना अनुसन्धान विभाग दरभंगा के कृषि वैज्ञानिक भी उसके खेत पर गए और मखाना की प्रायोगिक खेती देखी। टीम में शामिल वैज्ञानिकों का कहना था कि इस विधि की खेती परम्परागत खेती से पचास फीसदी अधिक फसल देती है और एक हेक्टेयर में 28 से 30 क्विंटल का पैदावार साढ़े चार माह में लिया जा सकता है।

दरभंगा से पहुँचते हैं मजदूर


मखाना की खेती से तैयार कच्चा माल को स्थानीय भाषा में गोरिया कहा जाता है। इस गोरिया से लावा निकालने के लिये बिहार के दरभंगा जिला से प्रशिक्षित मजदूरों को मँगाया जाता है। कच्चा माल गोरिया जुलाई में निकालने के पश्चात दरभंगा जिला के बेनीपुर, रूपौल , बिरैली प्रखण्ड से हजारों की संख्या में प्रशिक्षित मजदूर आते हैं।

उन मजदूरों में महिला व बच्चे भी शामिल रहते हैं। ये लोग पूरे परिवार के साथ यहाँ आकर मखाना तैयार करते हैं। उन लोगों के रहने के लिये छोटे-छोटे बाँस की टाटी से घर तैयार किया जाता है। जुलाई से लावा निकलना शुरू हो जाता है और यह काम दिसम्बर तक चलता है। फिर वे मजदूर वापस दरभंगा चले जाते हैं। प्रशिक्षित मजदूरों के साथ व्यापारियों का समूह भी पहुँचता है और कच्चा माल गोरिया तैयार माल लावा खरीद कर ले जाते हैं। तीन किलो कच्चा गोरिया में एक किलो मखाना होता है। गोरिया का दर प्रति क्विंटल लगभग 3500 से 6500 के बीच रहता है।

मखाना की खेती का उत्पादन


मखाना की खेती का उत्पादन प्रति एकड़ 10 से 12 क्विंटल में प्रति एकड़ खर्च 20 से 25 हजार रुपए होता है जबकि आय 60 से 80 हजार रुपए होता है। यह खेती न्यूनतम चार फीट पानी में होता है। इसमें प्रति एकड़ खाद की खपत 15 से 40 किलोग्राम होता है। खेती का उपयुक्त समय मार्च से लेकर अगस्त तक होता है। पूर्णिया जिले में जानकीनगर, सरसी, श्रीनगर, बैलौरी, लालबालू, कसबा, जलालगढ़ सिटी आदि क्षेत्रों में होता है। इतना ही नहीं मखाना तैयार होने के बाद उसे 200 ग्राम 500 ग्राम और आठ से दस किलो के पैकेट में पैकिंग कर बाहर शहरों व महानगरों में भेजा जाता है।

मखाने की खेती की विशेषता यह है कि इसकी लागत बहुत कम है। इसकी खेती के लिये तालाब होना चाहिए जिसमें 2 से ढाई फीट तक पानी रहे। पहले साल भर में एक बार ही इसकी खेती होती थी। लेकिन अब कुछ नई तकनीकों और नए बीजों के आने से मधुबनी-दरभंगा में कुछ लोग साल में दो बार भी इसकी उपज ले रहे हैं। मखाने की खेती दिसम्बर से जुलाई तक ही होती है। खुशी की बात यह है कि विश्व का 80 से 90 प्रतिशत तक मखाने का उत्पादन बिहार में ही होता है। विदेशी मुद्रा कमाने वाला यह एक अच्छा उत्पाद है।

मधुबनी और दरभंगा जिले में हैं, जो मखाने की खेती की ओर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि छह साल पहले जहाँ लगभग 1,000 किसान मखाने की खेती में लगे थे, वहीं आज मखाना उत्पादकों की संख्या साढ़े आठ हजार से ऊपर हो गई है। इससे मखाने का उत्पादन भी बढ़ा है। पहले जहाँ सिर्फ 5-6 हजार टन मखाने का उत्पादन होता था वहीं आज बिहार में 30 हजार टन से ऊपर मखाने का उत्पादन होने लगा है। यहाँ कुछ वर्षों में केवल उत्पादन ही नहीं बढ़ा है, बल्कि उत्पादकता भी 250 किलोग्राम प्रति एकड़ की जगह अब 400 किलोग्राम प्रति एकड हो गई है।

कई शहरों से भी व्यापारी तैयार मखाना के लिये आते हैं। पूर्णिया जिले से मखाना कानपुर, दिल्ली, आगरा, ग्वालियर, मुम्बई के मंडियों में भेजा जाता है। यहाँ का मखाना अमृतसर से पाकिस्तान भी भेजा जाता है। मखाना की खपत प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। मखाना में प्रोटीन, मिनरल और कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

जिले में इस अनुपयुक्त जमीन पर मखाना उत्पादन के लिये किसानों को प्रोत्साहित करने की योजना है, जिससे उनकी समस्या का समाधान सम्भव होगा और वे आर्थिक रूप से समृद्ध होंगे। मखाना उत्पादन के साथ ही इस प्रस्तावित जगह में मछली उत्पादन भी किया जा सकता है। मखाना उत्पादन से जल कृषक को प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 55 हजार रुपए की लागत आती है। इसे बेचने से 45 से 50 हजार रुपए का मुनाफा होता है। इसके अलावा लावा बेचने पर 95 हजार से एक लाख रुपए प्रति हेक्टेयर का शुद्ध लाभ होता है। मखाना की खेती में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एक बार उत्पादन के बाद वहाँ दोबारा बीज डालने की जरूरत नहीं होती है।

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