क्या भाजपा ने गंगा को चुनावी अछूत मान लिया है

Submitted by RuralWater on Sun, 02/19/2017 - 10:55
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धर्म, जाति, समुदाय अथवा भाषा के आधार पर वोट माँगने पर अब सुप्रीम कोर्ट का रोक है। आखिर, अखिलेश और मोदी सरकार ने विज्ञापन देकर अपनी उपलब्धियाँ गिनाई ही हैं। अतः सरकार द्वारा गंगा सम्बन्ध में किये कार्य न गिनाने के पीछे भाजपा यह बहाना भी नहीं बना सकती। असलियत यही है कि गंगा के नाम पर मोदी शासन में जो कुछ हुआ, उसे उपलब्धि तो कतई नहीं कहा जा सकता। यह बात स्वयं प्रधानमंत्री श्री मोदी और गंगा मंत्री उमाजी भी जानती हैं। वर्तमान चुनाव में गंगा का नाम लेने से बचने का मूल कारण यही है।लोकसभा चुनाव - 2014 में नरेन्द्र भाई मोदी ने गंगा को माँ बताया था। आज माँ गंगा की कोई चर्चा नहीं है; न मोदी जी के भाषण में, न उमा भारती जी की उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने की उड़ान में। इस बार मोदी जी ने अपने को उत्तर प्रदेश का गोद लिया बेटा कहा है। लोग अभी से चिन्तित हो उठे हैं कि 2019 में कहीं उत्तर प्रदेश भी मोदी जी के चुनावी भाषण से गायब न हो जाये। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के नाम का ऐसा हश्र हमने देखा ही।

गंगा जी पर चुप्पी


चिन्ता होनी स्वाभाविक है। ‘मैं आया नहीं हूँ, मुझे माँ गंगा ने बुलाया है...’ - याद कीजिए कि 2014 के चुनाव में इस पंक्ति को कितनी जोर से प्रचारित किया गया था। इस चुनाव में प्रघानमंत्री श्री मोदी और जल मंत्री सुश्री उमा जी ही नहीं, पूरी भाजपा ही गंगा का नाम लेने से ऐसे बच रही है; जैसे गंगा कोई चुनावी अछूत हो। जिसे माँ कहा, उसका नाम लेने से भी डर?

लगता है कि गंगा का नाम लेने से भारतीय जनता पार्टी को किसी बड़े नुकसान का डर हो। ध्यान रहे कि उमा जी का एक परिचय एक गंगा भक्त साध्वी के रूप में भी रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले वह गंगा किनारे-किनारे कितना घूमी थीं। अब? अब, जब पत्रकारों ने बहुत मजबूर किया तो उमा जी के बमुश्किल तीन बयान पढ़ने को मिले। पहले में उन्होंने कहा - ‘प्रधानमंत्री जी, गंगा पर राजनीति नहीं चाहते। इसलिये गंगा हमारे लिये चुनावी मुद्दा नहीं है।’ दो अन्य बयानों में उन्होंने गंगा पर अपेक्षित कार्य न हो पाने के लिये क्रमशः उत्तराखण्ड और उत्तर प्रदेश सरकार को दोषी ठहराया; कहा कि उन्होंने सहयोग नहीं किया।

उपलब्धि नहीं, सिर्फ कारोबार


हो सकता है कि यह सत्य हो, लेकिन यह भी झूठ नहीं कि मोदी जी की सरकार ने ढाई साल में कहने को तो बहुत कुछ किया। सूची बनाइए कि मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनते ही ‘नमामि गंगे’ कहा; जल मंत्रालय के साथ ‘गंगा पुनर्जीवन’ शब्द जोड़ा; एक गेरुआ वस्त्रधारिणी को गंगा की मंत्री बनाया। पाँच साल के लिये 20 हजार करोड़ रुपए का बजट तय किया। अनिवासी भारतीयों से आह्वान किया। नमामि गंगे कोष बनाया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की स्थापना की। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का पुनर्गठन किया। बनारस के असी घाट पर उन्होने स्वयं श्रमदान किया। गंगा अभिभूत हो गई कि चलो, अब उसके भी अच्छे दिन आएँगे; उसके भी गले में लगे फाँसी के फंदे हटेंगे; उसे उसका नैसर्गिक प्रवाह हासिल होगा; खुलकर बहने की आजादी मिलेगी; मल से मलीन होने से जान छूटेगी, किन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ।

उपलब्धियाँ गिनाना, सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का उल्लंघन भी नहीं, जिसके अनुसार धर्म, जाति, समुदाय अथवा भाषा के आधार पर वोट माँगने पर अब रोक है। आखिर, अखिलेश और मोदी सरकार ने विज्ञापन देकर अपनी उपलब्धियाँ गिनाई ही हैं। अतः सरकार द्वारा गंगा सम्बन्ध में किये कार्य न गिनाने के पीछे भाजपा यह बहाना भी नहीं बना सकती। असलियत यही है कि गंगा के नाम पर मोदी शासन में जो कुछ हुआ, उसे उपलब्धि तो कतई नहीं कहा जा सकता। यह बात स्वयं प्रधानमंत्री श्री मोदी और गंगा मंत्री उमाजी भी जानती हैं। वर्तमान चुनाव में गंगा का नाम लेने से बचने का मूल कारण यही है।

(विस्तार से जानकारी के लिये आप हिन्दी इण्डिया वाटर पोर्टल पर पूर्व में प्रकाशित लेख पढ़ सकते हैं। शीर्षक है - ‘ये तो गंगा के व्यापारी निकले’)

सच है कि ढाई साल में गंगा नदी स्वच्छ नहीं हो सकती। लेकिन यह भी सच है कि उस दिशा में आगे बढ़ने की ईमानदारी तो दिखाई ही जा सकती थी; यह नहीं हुआ। जो हुआ, उसे मैं गंगा के नाम पर व्यापार का नाम दूँ, तो कुछ गलत न होगा। इससे अधिक व्यापार और क्या होगा कि दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद जी ने ऐसा ऐलान किया कि उससे गंगाजल बेचकर कमाने वालों की राह और आसान हो गई। परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जी ने जलपरिवहन के लिये गंगा को नए बैराजों से बाँधने की घोषणा करने से परहेज नहीं किया। मल शोधन संयंत्रों के नाम पर उमाजी खुद कम्पनियों का धंधा बढ़ाने पर लगी हैं; जबकि वह स्वयं जानती हैं कि अविरलता सुनिश्चित किये बगैर गंगा की बारामासी निर्मलता सम्भव नहीं है।

अविरलता सुनिश्चित करनी हो, तो बाँध और बैराजों को लेकर गंगा के अनुकूल नीतिगत निर्णय जरूरी है। किन्तु कभी धारीदेवी के मन्दिर को बाँध के जलाश्य में डूबने से बचाने के लिये हुँकार भरती दिखी उमा जी ने गंगा, जल और नदी विकास मंत्री होते ही बाँधों को लेकर पूरी तरह चुप्पी साध ली है। छोटी नदियों के पुनर्जीवन पर कोई ठोस काम दिखाई नहीं दे रहा, तो अविरलता हो कैसे? निर्मलता के संकेत इससे भी बुरे हैं।

सीबीआई जाँच का आदेश - गंगा परियोजना के बुरे दिन


सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित पंचाट द्वारा बार-बार तलब किये जाने से यह संकेत भी जा रहा है कि गंगा से सम्बन्धित विभाग और मंत्रालय, अदालतों के समक्ष सही आँकडे़ं नहीं पेश कर रहे अथवा कुछ छिपा रहे हैं। नामी वकील श्री एम सी मेहता को भारत में पर्यावरण की अदालती पैरोकारी के जनक कहा जाता है। गंगा को लेकर उनका अदालती सफर बहुत लम्बा और संघर्षपूर्ण है। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय हरित पंचाट के ताजा आदेश से पानी, पर्यावरण कार्यकर्ता और गंगाप्रेमी नहीं, आमजन भी सकते में हैं।

हरित पंचाट की प्रधान पीठ ने गढ़मुक्तेश्वर में गंगा सफाई से जुड़ी एक छोटी सी परियोजना की सीबीआई जाँच का आदेश दे दिया है। पंचाट ने संकेत दिये हैं कि वह सीबीआई का ज्यादा वक्त बर्बाद नहीं करना चाहता। किन्तु यदि जाँच में गड़बड़ी के सबूत सामने आये, तो हरित पंचाट हरिद्वार से लेकर उन्नाव तक गंगा से जुड़ी सभी परियोजनाओं की जाँच कराने को मजबूर भी हो सकता है।

गंगा कार्य योजना की शुरुआत से लेकर मार्च, 2017 तक गंगा के नाम पर हुए खर्च का ब्यौरा खंगालना शुरू कर दिया, तो कोई ताज्जुब नहीं कि गंगा, भष्टाचार के नए अड्डे के रूप में सामने आये। गंगा सफाई के नाम पर यदि कुछ सबसे बुरा होगा, तो यह होगा। एक बार फिर विश्वास की मौत होगी। इस बार यह मौत एक हिन्दूवादी, राष्ट्रवादी, संस्कृति पोषक का दावा करने वाले राजनीतिक दल, भारत के प्रधानमंत्री और एक हिन्दू साध्वी के प्रति विश्वास की होगी।

केन-बेतवा पर मुखर


गौर कीजिए कि नदी के नाम पर उमा जी ने इस बार केन-बेतवा का नाम लेना मुनासिब समझा। चुनाव से पूर्व ही उन्होंने इस दावे का जमकर समर्थन व प्रचार किया कि केन-बेतवा नदी जोड़ से बुन्देलखण्ड के कई लाख लोगों का भला होने जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञ, उमाजी के इस दावे को झूठा और बेबुनियाद बता रहे हैं। फिर भी उमा जी अपने दावे और केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना को आगे बढ़ाने पर इतनी अड़ी दिखाई दीं कि इसके लिये उन्होंने अनशन तक की धमकी दे डाली।

वह जानती हैं कि केन-बेतवा नदी जोड़ इस कार्यकाल में पूरा होने नहीं जा रहा है। सम्भव है कि अन्य भारतीय राजनेताओं की तरह वह भी यही धारणा रखती हों कि कुछ भी कह लो, भारत की जनता को विस्मृति रोग है; वह नया मुद्दा सामने आने पर पुराने को भूल भी जाती है। कदाचित याद भी रह जाये, तो उदार होने के नाते माफ भी कर देती है।

हो सकता है कि भारतीय राजनेताओं की यह धारणा सही भी हो। किन्तु उन्हें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि झूठ के पैर नहीं होता; वह ज्यादा समय टिक नहीं सकता। भरोसे का टूटना तो सबसे बुरा होता ही है। लोक और तंत्र दोनों इस पर विचार करें; वरना काहे का लोकतंत्र? काहे को गंगा को माँ कहकर ‘मां’ शब्द का भी अपमान करना??

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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