गंगा पर चिन्तन के सौ साल

Submitted by RuralWater on Mon, 01/16/2017 - 12:07
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दैनिक जागरण, 16 जनवरी, 2017

गंगा प्रदूषण रोकने के लिये दंडात्मक प्रावधान समय की आवश्यकता है। साथ ही सभी योजनाओं की जन-निगरानी (पब्लिक ऑडिट) भी आवश्यक है। गंगा के अस्तित्व से जुड़े 1916 के समझौते के इतिहास का यह पन्ना, जितना प्रेरक है, उतना ही पीड़ादायक भी। गंगा एक्शन प्लान 1985-86 से नमामि गंगे-2016 तक कोई 40 हजार करोड़ रुपए बहाकर भी सरकारी प्रयासों से गंगा की अविरलता तथा निर्मलता का लक्ष्य नहीं प्राप्त हो सका। गंगा भारतीय संस्कृति और संस्कारों से जुड़ी नदी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मानव का इससे सीधा सम्बन्ध है। निर्मल और अविरल गंगा धारा के संकल्प के साथ महत्त्वाकांक्षी योजना ‘नमामि गंगे’ भले ही दो साल पहले शुरू हुई पर इस नदी के लिये चिन्ता और चिन्तन की शुरुआत ठीक एक सौ साल पहले 1916 में हुई थी। गंगा को लेकर देशव्यापी ऐसा दबाव था कि ब्रिटिश हुक्मरान भारतीय जनमानस की भावनाओं की अनदेखी न कर सके।

गंगा की धारा को बाँध बनाकर उद्गम स्थल से मैदानी क्षेत्र में प्रवेश के बीच ही बाँधने की अंग्रेजों की योजना पर रोक लगाने की मुहिम ने उन्हें ऐसा न करने के लिये विवश कर दिया। 1916 में ऐतिहासिक समझौता अस्तित्व में आया। आज हम इस समझौते की शताब्दी की दहलीज पर हैं। मौजूदा केन्द्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में 1916 के उसी समझौते को आधार माना गया है।

लेकिन दुख का विषय है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 363 के अन्तर्गत संरक्षित और आज भी प्रभावी इस समझौते को दरकिनार करते हुए स्वतंत्र भारत की सरकार ने गंगा पर टिहरी बाँध जैसे कई बाँधों में गंगा की धारा को कैद कर दिया। सरकार का भी मानना है कि गोमुख से निकली गंगा की धाराओं अलकनन्दा, मन्दाकिनी, भागीरथी पर बने और प्रस्तावित बाँधों के कारण उसकी धारा को निरन्तर बाधित करने से इस समझौते की अवमानना हुई है।

अंग्रेज हुक्मरानों की गंगा के उद्गम स्थल गंगोत्री से ठीक नीचे भीमगौड़ा (हरिद्वार) में पहाड़ों की धारा को बाँधने की योजना थी। ब्रिटिश सरकार ने गंगा के सवाल पर उभरे व्यापक जन असन्तोष को देखते हुए 18-19 दिसम्बर, 1916 को दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया। इस मुद्दे पर ऐसी जनजागृति हुई कि गंगा प्रेमी हरिद्वार में उमड़ पड़े।

अंग्रेज शासकों, विशेषज्ञ इंजीनियर और अफसरों की उपस्थिति में भीमगौड़ा में हुए समझौते में गंगा की धारा को रोककर उसके उद्गम स्थल गंगोत्री से ठीक नीचे, पहाड़ों में ही हरिद्वार से पहले भीमगौड़ा तथा आस-पास कई बाँध बनाने की योजना त्यागकर प्रत्येक दशा में 1,000 क्यूसेक जल का प्रवाह गंगा में बनाए रखने के लिये अंग्रेज सरकार को सहमति देनी पड़ी।

गंगा आन्दोलन के सूत्रधार महामना मदनमोहन मालवीय थे। वैसे वह जनजागरण आदि उद्देश्यों से 1905 में ही हरिद्वार में गंगा महासभा की स्थापना कर चुके थे। इस सम्मेलन में लेफ्टिनेंट गवर्नर सर मेस्टन खुद शामिल हुए। जयपुर, बीकानेर, काशी, अलवर, कुवेसर, सुरौली, दरभंगा और कासिमपुर आदि बड़ी रियासतों के साथ ही छोटी रियासतों के राजा-महाराजा उपस्थित थे। दो दिनों के लम्बे विचार विमर्श के बाद अस्तित्व में आये समझौते में जल एवं सिंचाई विशेषज्ञों, अधिकारियों खुद लॉर्ड वायसराय और मालवीय जी ने एकमत होकर तय किया कि गेट या बाँध बनाकर गंगा की अविरल धारा से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।

बताते हैं कि मालवीय ने दो अवसरों पर अपनी अद्भुत वाग्मिता का परिचय दिया था, जिसके विलक्षण प्रभाव का इतिहास साक्षी है। एक मौका था, स्वतंत्रता आन्दोलन में चौरीचौरा (गोरखपुर) कांड के डेढ़ सौ अभियुक्तों के लिये बचाव पक्ष की ओर से न्यायालय में की गई लम्बी बहस। दूसरा मौका हरिद्वार के गंगा सम्मेलन में दिया गया उनका ओजस्वी भाषण, जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेज लेफ्टिनेंट गवर्नर सर मेस्टन और ब्रिटिश प्रशासन के वरिष्ठतम अधिकारियों, भाग ले रहे राजा महाराजाओं, सभी ने मालवीय जी को नमन किया और ब्रिटिश शासन गंगा को न बाँधने के लिये समझौते के लिये विवश हुआ।

ब्रिटिश शासन को दिये गए जनता के स्मरण पत्र का पूर्ण सम्मान करते हुए गंगा की धारा के अनवरत प्रवाह में कोई हस्तक्षेप न करने का सरकार ने वचन दिया। सम्मेलन के अन्त में जनता, शासकों, महाराजाओं और राजकुमारों की ओर से दरभंगा और अलवर के महाराजा तथा लाला सुखबीर सिंह ने धन्यवाद देते हुए गंगा के प्रश्न का वैधानिक हल ढूँढ़ने के लिये लेफ्टिनेंट गवर्नर और अधिकारियों से कहा, हमारी माता गंगा की पवित्रता पूरे संसार में जानी जाती है।

हम सभी का कर्तव्य था कि ऐसे समाधान पर पहुँचा जाये जो सम्पूर्ण देश की भावनाओं और आवश्यकताओं का समाधान करे। जब जनता को माँ गंगा की अविरल धारा उसके घाटों पर प्रवाहित मिलेगी, तभी जनता के मन को सन्तुष्टि मिलेगी। जनता की समस्याओं का समाधान जनता की संवेदनाओं और धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में वाराणसी से चुनाव जीतने के बाद काशी के गंगा तट पर कहा था, ‘मैं आया नहीं हूँ, मुझे गंगा माँ ने बुलाया है।’ उनका यह कथन देश की महत्त्वाकांक्षी ‘नमामि गंगे’ वृहद योजना के रूप में सामने आया है। मान्यता है, गंगा पवित्र है… माँ है। गंगाजल में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और घुलित ऑक्सीजन (डीओ) का मान्य वैज्ञानिक स्तर क्रमशः तीन एवं पाँच मिली ग्राम प्रति लीटर और जीवाणुभोजी (बैक्टीरियोफेज) का मानक प्रतिशत बनाए रखना ‘नमामि गंगे’ अभियान के सामने एक बड़ी चुनौती है।

गठित विशेषज्ञ दल ने प्रस्तावित 24 परियोजनाओं पर और उच्च न्यायालय ने छह जल विद्युत परियोजनाओं पर सवाल खड़े किये हैं। लेकिन अब तक इस सम्बन्ध में कोई कार्यवाही न होना गंगा प्रेमियों के लिये गम्भीर चिन्ता का विषय बना है। नए कानून के लिये मालवीय के पौत्र न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय की अध्यक्षता में गठित समिति गंगा प्रदूषण रोकने के लिये कानूनी पहलुओं पर विचार कर कानून का ढाँचा बनाने के अन्तिम चरण में है।

गंगा प्रदूषण रोकने के लिये दंडात्मक प्रावधान समय की आवश्यकता है। साथ ही सभी योजनाओं की जन-निगरानी (पब्लिक ऑडिट) भी आवश्यक है। गंगा के अस्तित्व से जुड़े 1916 के समझौते के इतिहास का यह पन्ना, जितना प्रेरक है, उतना ही पीड़ादायक भी। गंगा एक्शन प्लान 1985-86 (प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय) से नमामि गंगे-2016 तक कोई 40 हजार करोड़ रुपए बहाकर भी सरकारी प्रयासों से गंगा की अविरलता तथा निर्मलता का लक्ष्य नहीं प्राप्त हो सका।

1916 में जनान्दोलन और सहभागिता का जैसा वातावरण मालवीय के नेतृत्व में बना, गंगा के लिये आज वैसे ही राष्ट्रव्यापी जनान्दोलन और जनसहभागिता की प्रेरणा हम इस समझौते से ले सकते हैं। केवल सरकार के बल पर गंगा निर्मलीकरण की सफलता की आशा करने से कहीं ज्यादा गंगा के मुद्दे पर युवा पीढ़ी को साथ लेकर सकारात्मक जनान्दोलन और जनजागृति का वातावरण तैयार करना एक बड़ी चुनौती है।

(लेखक राजभाषा समिति, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सदस्य हैं)

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