गौना ताल - प्रलय का शिलालेख

Submitted by RuralWater on Sun, 01/15/2017 - 15:54
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आज की तरह ही सन 1893 तक यहाँ गौना ताल नहीं था। उन दिनों भी यहाँ यह विशाल घाटी ही थी। सन 93 में घाटी के संकरे मुँह पर ऊपर से एक विशाल चट्टान गिर कर अड़ गई थी। घाटी की पिछली तरफ से आने वाली बिरही और उसकी सहायक नदियों का पानी मुँह पर अड़ी चट्टान के कारण धीरे-धीरे गहरी घाटी में फैलने लगा। अंग्रेजों का जमाना था, प्रशासनिक क्षमता में वे सन 1970 के प्रशासन से ज्यादा कुशल साबित हुए। उस समय जन्म ले रहे गौना ताल के ऊपर बसे एक गाँव में तारघर स्थापित किया और उसके माध्यम से ताल के जल स्तर की प्रगति पर नजर रखे रहे। सन 77 की जुलाई का तीसरा हफ्ता। चमोली जिले (उत्तर प्रदेश) की बिरही घाटी में आज एक अजीब-सी खामोशी है। यों तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा है और इस कारण अलकनंदा की सहायक नदी बिरही का जलस्तर भी बढ़ता जा रहा है। उफनती पहाड़ी नदी की तेज आवाज पूरी घाटी में टकरा कर गूँज भी रही है। फिर भी चमोली-बद्रीनाथ मोटर सड़क से बाईं तरफ लगभग 22 किलोमीटर दूर 6500 फुट की ऊँचाई पर बनी इस घाटी के 13 गाँवों के लोगों को आज सब कुछ शान्त-सा लग रहा है।

आज से सिर्फ सात बरस पहले ये लोग प्रलय की गर्जना सुन चुके थे, देख चुके थे। इनके घर, खेत व ढोर उस प्रलय में बह चुके थे। उस प्रलय की तुलना में आज बिरही नदी का शोर इन्हें डरा नहीं रहा था। कोई एक मील चौड़ी और पाँच मील लम्बी इस घाटी में चारों तरफ बड़ी-बड़ी शिलाएँ, पत्थर, रेत और मलबा भरा हुआ है, इस सब के बीच से किसी तरह रास्ता बनाकर बह रही बिरही नदी सचमुच बड़ी गहरी लगती है।

लेकिन सन 70 की जुलाई का तीसरा हफ्ता ऐसा नहीं था। तब यहाँ यह घाटी नहीं थी, इसी जगह पर पाँच मील लम्बा, एक मील चौड़ा और कोई तीन सौ फुट गहरा एक विशाल ताल था-गौना ताल। ताल के एक कोने पर गौना गाँव था और दूसरे कोने पर दुरमी गाँव, इसलिये कुछ लोग इसे दुरमी ताल भी कहते थे। पर बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिये यह बिरही ताल था, क्योंकि चमोली-बद्रीनाथ मोटर-मार्ग पर बने बिरही गाँव से ही इस ताल तक आने का पैदल रास्ता शुरू होता था।

ताल के ऊपरी हिस्से में त्रिशूल पर्वत की शाखा कुँवारी पर्वत से निकलने वाली बिरही समेत अन्य छोटी-बड़ी चार नदियों के पानी से ताल में पानी भरता रहता था। ताल के मुँह से निकलने वाले अतिरिक्त पानी की धारा फिर से बिरही नदी कहलाती थी। जो लगभग 18 किलोमीटर के बाद अलकनन्दा में मिल जाती थी। सन 70 की जुलाई के तीसरे हफ्ते ने इस सारे दृश्य को एक ही क्षण में बदलकर रख दिया।

दुरमी गाँव के प्रधानजी उस दिन को याद करते हैं, “तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा था। पानी तो इन दिनों में हमेशा ही गिरता है, पर उस दिन की हवा कुछ और थी। ताल के पिछले हिस्से से बड़े-बड़े पेड़ बह-बह कर ताल के चारों ओर चक्कर काटने लगे थे, ताल में उठ रही लहरें उन्हें तिनकों की तरह यहाँ-से-वहाँ, वहाँ-से-यहाँ फेंक रही थीं। देखते-देखते सारा ताल पेड़ों से ढँक गया। अँधेरा हो चुका था, हम लोग अपने-अपने घरों में बन्द हो गए। घबरा रहे थे कि आज कुछ अनहोनी होकर रहेगी।” खबर भी करते तो किसे करते? जिला प्रशासन उनसे 22 किलोमीटर दूर था। घने अन्धेरे ने इन गाँव वालों को उस अनहोनी का चश्मदीद गवाह न बनने दिया। पर इनके कान तो सब सुन रहे थे। प्रधानजी बताते हैं।

“रात भर भयानक आवाजें आती रहीं फिर एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई और फिर सब कुछ ठण्डा पड़ गया।” ताल के किनारे की ऊँची चोटियों पर बसने वाले इन लोगों ने सुबह के उजाले में पाया कि गौना ताल फूट चुका है, चारों तरफ बड़ी-बड़ी चट्टानें हजारों पेड़ों का मलबा और रेत-ही-रेत पड़ी है।

ताल की पिछली तरफ से आने वाली नदियों के ऊपरी हिस्सों में जगह-जगह भूस्खलन हुआ था, उसके साथ सैकड़ों पेड़ उखड़-उखड़ कर नीचे चले आये थे। इस सारे मलबे को, टूटकर आने वाली बड़ी-बड़ी चट्टानों को गौना ताल अपनी 300 फुट की गहराई में समाता गया, सतह ऊँची होती गई और फिर लगातार ऊपर उठ रहे पानी ने ताल के मुँह पर रखी एक विशाल चट्टान को उखाड़ फेंका और देखते-ही-देखते सारा ताल खाली हो गया। घटना स्थल से लगभग तीन सौ किलोमीटर नीचे हरिद्वार तक इसका असर पड़ा था।

गौना ताल ने एक बहुत बड़े प्रलय को अपनी गहराई में समो कर उसका छोटा सा अंश ही बाहर फेंका था। उसने सन 70 में अपने आपको मिटाकर उत्तराखण्ड, तराई और दूर मैदान तक एक बड़े हिस्से को बचा लिया था। वह सारा मलबा उसके विशाल विस्तार और गहराई में न समाया होता तो सन 70 की बाढ़ की तबाही के आँकड़े कुछ और ही होते। लगता है गौना ताल का जन्म बीसवीं सदी के सभ्यों की मूर्खताओं से आने वाले विनाश को थाम लेने के लिये ही हुआ था।

ठीक आज की तरह ही सन 1893 तक यहाँ गौना ताल नहीं था। उन दिनों भी यहाँ यह विशाल घाटी ही थी। सन 93 में घाटी के संकरे मुँह पर ऊपर से एक विशाल चट्टान गिर कर अड़ गई थी। घाटी की पिछली तरफ से आने वाली बिरही और उसकी सहायक नदियों का पानी मुँह पर अड़ी चट्टान के कारण धीरे-धीरे गहरी घाटी में फैलने लगा। अंग्रेजों का जमाना था, प्रशासनिक क्षमता में वे सन 1970 के प्रशासन से ज्यादा कुशल साबित हुए।

उस समय जन्म ले रहे गौना ताल के ऊपर बसे एक गाँव में तारघर स्थापित किया और उसके माध्यम से ताल के जल स्तर की प्रगति पर नजर रखे रहे। एक साल तक वे नदियाँ ताल में पानी भरती रहीं। जलस्तर लगभग 100 गज ऊँचा उठ गया। तारघर ने खतरे का तार नीचे भेज दिया। बिरही और अलकनंदा के किनारे नीचे दूर तक खतरे की घंटी बज गई। ताल सन 1894 में फूट पड़ा, पर सन 1970 की तरह एकाएक नहीं।

किनारे के गाँव खाली करवा लिये गए थे, प्रलय को झेलने की तैयार थी। फूटने के बाद 400 गज का जलस्तर 300 फुट मात्र रह गया था। ताल सिर्फ फूटा था, पर मिटा नहीं था। गोरे साहबों का सम्पर्क न सिर्फ ताल से बल्कि उसके आस-पास की चोटियों पर बसे गाँवों से भी बना रहा। उन दिनों एक अंग्रेज अधिकारी महीने में एक बार इस दुर्गम इलाके में आकर स्थानीय समस्याओं और झगड़ों को निपटाने के लिये एक कोर्ट लगाता था। विशाल ताल साहसी पर्यटकों को भी न्यौता देता था। ताल में नावें चलती थीं।

आजादी के बाद भी नावें चलती रहीं। सन 60 के बाद ताल से 22 किलोमीटर की दूरी में गुजरने वाली हरिद्वार बद्रीनाथ मोटर-सड़क बन जाने से पर्यटकों की संख्या भी बढ़ गई। ताल में नाव की जगह मोटर बोट ने ले ली। ताल में पानी भरने वाली नदियों के जलागम क्षेत्र कुंआरी पर्वत के जंगल भी सन ‘60 से 70’ के बीच में कटते रहे। ताल से प्रशासन का सम्पर्क सिर्फ पर्यटन के विकास के नाम पर कायम रहा- वह ताल के इर्द-गिर्द बसे 13 गाँवों को धीरे-धीरे भूलता गया।

मुख्य मोटर सड़क से ताल तक पहुँचने के लिये (गाँवों तक नहीं) 22 किलोमीटर लम्बी एक सड़क भी बनाई जाने लगी। सड़क अभी 12 किलोमीटर ही बन पाई थी कि सन 70 की जुलाई का वह तीसरा हफ्ता आ गया। ताल फूट जाने के बाद सड़क पूरी करने की जरूरत ही नहीं समझी गई। सन 1894 में गौना ताल के फटने की चेतावनी तार से भेजी थी, पर सन 1970 में ताल फटने की ही खबर लग पाई।

बहरहाल, अब यहाँ गौनाताल नहीं है। पर उसमें पड़ी बड़ी-बड़ी चट्टानों पर पर्यावरण का एक स्थायी शिलालेख खुदा हुआ है। इस क्षेत्र में चारों तरफ बिखरी चट्टानें हमें बताना चाहती हैं कि जंगलों खासकर नदियों के जलागम क्षेत्र में खड़े जंगलों का हमारे पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है। पर हम ‘शिलालेख’ को पढ़ने के लिये तैयार नहीं हैं। लेकिन उत्तराखण्ड का ‘चिपको’ आन्दोलन न केवल इस ‘शिलालेख’ को पढ़ चुका है, वह अपनी सीमित शक्ति और अति सीमित साधनों से इसकी हिदायतों पर अमल भी कर रहा है।

जुलाई के तीसरे हफ्ते में आन्दोलन के कार्यकर्ताओं की एक टुकड़ी लगातार बारिश के बीच गौना ताल तक पहुँची और उसने ताल के मलबे के बीच से बह रही बिरही नदी के किनारे-किनारे मजनूं नामक एक पेड़ की कोई तीन हजार कलमें रोपीं… मजनूं (विलों) के पेड़ में नदी के किनारों को बाँधकर रखने का विशेष गुण है। इस इलाके में मजनूं का पेड़ पहली बार ही लगाया गया है। आन्दोलन के कार्यकर्ताओं का पर्यावरण-प्रेम इस विलक्षण पौधे को कश्मीर की घाटी से खोजकर लाया था।

कश्मीर में इस पेड़ के गुणों से परिचित होने के बाद आन्दोलन के कार्यकर्ता इसका एक पौधा चमोली जिले में लाये थे। चूँकि इसकी कलमें लगती हैं, इसलिये उस एक पेड़ की टहनियों से कई कलमें बना ली गईं और उन्हें गौना ताल के इलाके में रोपा गया। रोपण के लिये की गई यात्रा, तीन दिन तक रोपण करने वाली टुकड़ी के खाने-पीने आदि का सारा खर्च ‘चिपको’ आन्दोलन को जन्म देने वाली संस्था दशौली ग्राम स्वराज्य संघ ने उठाया।

बरसात के इन कठिन दिनों में की गई इस यात्रा का उद्देश्य था- ताल के आस-पास बसे उन गाँवों की सुध लेना जो बाढ़ के दिनों में प्रशासन से पूरी तरह कट जाते हैं।

गाड़ी, सैंजी, निजमुला, अडुंग, बेरा, गौना, धारकुमार, पगना, दुरमी, ऋैजी, मनोरा, पाणा और ईरानी नामक इन तेरह गाँवों में यदि इन दिनों जीवन ‘सामान्य’ दीखता है तो उसका एक ही कारण है- इनकी सहनशक्ति। निजमुला गाँव में राशन की एक दुकान थी, जो मुख्य गाँव के अलावा गौना, अडुंग और धारकुमार की आबादी के लिये सस्ता गल्ला बेचती थी। इसी तरह पगना, ईरानी, दुरमी, पाणा, मनोरा और झैंली गाँव के लिये बेरा में राशन मिलता था। पर इस साल दोनों दुकानें बन्द हो गई हैं।

दुकानदारों का कहना है कि उन्हें घाटा हो रहा था। ऊँचाई के इन गाँवों तक गल्ला खच्चरों की पीठ पर लादकर आता था। शासन प्रति क्विंटल दस रुपए की ढुलाई मंजूर करता है। पर बरसात के दिनों में खतरा बढ़ जाने के कारण खच्चर वाले प्रति क्विंटल तीस रुपए ढुलाई वसूल करते हैं। इसलिये दुकानदारों ने ये दुकानें बन्द कर दी हैं।

अब इन गाँव के लोगों को राशन लेने मुख्य सड़क पर बसे बिरही गाँव तक आना पड़ता है। इन तेरह गाँवों से बिरही गाँव की दूरी पाँच किलोमीटर से तीस किलोमीटर तक है। इसमें भी सात हजार फुट ऊँचा जंगल चढ़ना और उतरना पड़ता है। बरसात के दिनों में जंगल के इन पैदल रास्तों में भारी मात्रा में जोंक पैदा होती है। नंगे पैर वालों की तो बात ही अलग, जूते मोजे पहनकर जंगल पार करने वालों के पैर भी जोंक चिपक जाने से लहू-लुहान हो जाते हैं।

ऐसे रास्तों से होकर बिरही जाने वाला आदमी एक बार में 10-15 किलो से ज्यादा वजन का राशन नहीं ले जा पाता। कुछ गाँवों से बिरही तक आने-जाने में तीन दिन लग जाते हैं। तीन दिन की ऐसी कठोर यात्रा के बाद भी वह पन्द्रह-बीस दिनों से ज्यादा का राशन नहीं ले जा सकता।

जिन परिवारों में कोई जवान नहीं है, उन परिवारों पर क्या बीतती होगी? पागा और ईरानी गाँव की हालत और भी खराब है। ये इस तरफ के अन्तिम गाँव हैं। बीच में बिरही नदी पड़ती है इसे पार करने के लिये यहाँ एक पैदल-पुल था, पर 70 की बाढ़ में यह भी बह गया। नया पुल स्वीकृत हुए पाँच साल हो चुके हैं लेकिन अभी तक काम शुरू नहीं हो पाया है। इन दोनों गाँव के लोग बरसात के दिनों में बिरही तक नदी पार करके नहीं आ सकते। उन्हें पीछे के रास्ते से जोशीमठ तहसील के तपोवन गाँव तक जाना पड़ता है। वहाँ तक आने-जाने का मतलब है छह से तेरह हजार फुट की ऊँचाई पर लगभग 70 किलोमीटर की पैदल यात्रा।

गाड़ी गाँव में रहने वाले आजाद हिन्द फौज के एक भूतपूर्व सैनिक ने पिछले महीने सीधे प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पूछा है, ‘क्या आप हम तेरह गाँवों के लोगों को भी अपनी प्रजा मानते हैं? यदि हाँ, तो हमारे लिये बाढ़ के इन दिनों में खाने-पीने का इन्तजाम करवाइए। हम मुफ्त में नहीं लेकिन उचित दाम और उचित दूरी पर राशन माँग रहे हैं। यदि आप राशन नहीं दिलवा सकते तो क्या हम पड़ोसी देश चीन के साथ राशन की बात कर लें?’

भूतपूर्व सैनिक के गुस्से में दम है। बिरही की बाढ़ को उतरने में अभी एक महीना तक लग सकता है। इन चार हफ्तों में यहाँ के प्रशासन को किसी भी कीमत पर सस्ता गल्ला बाँटने की कोई स्थायी व्यवस्था कर देनी चाहिए और अगले बरस ऐसे असंख्य गाँवों में बाढ़ आने से पहले ही ठीक मात्रा में राशन पहुँचाने की स्थायी व्यवस्था बना लेनी चाहिए। बाढ़ तो हर बरस आएगी- जब तक हम गौना ताल के मलबे पर लिखे शिलालेख को पढ़ नहीं पाएँगे, पढ़कर समझ नहीं पाएँगे।

साफ माथे का समाज

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भाषा और पर्यावरण

2

अकाल अच्छे विचारों का

3

'बनाजी' का गांव (Heading Change)

4

तैरने वाला समाज डूब रहा है

5

नर्मदा घाटीः सचमुच कुछ घटिया विचार

6

भूकम्प की तर्जनी और कुम्हड़बतिया

7

पर्यावरण : खाने का और दिखाने का और

8

बीजों के सौदागर                                                              

9

बारानी को भी ये दासी बना देंगे

10

सरकारी विभागों में भटक कर ‘पुर गये तालाब’

11

गोपालपुरा: न बंधुआ बसे, न पेड़ बचे

12

गौना ताल: प्रलय का शिलालेख

13

साध्य, साधन और साधना

14

माटी, जल और ताप की तपस्या

15

सन 2000 में तीन शून्य भी हो सकते हैं

16

साफ माथे का समाज

17

थाली का बैंगन

18

भगदड़ में पड़ी सभ्यता

19

राजरोगियों की खतरनाक रजामंदी

20

असभ्यता की दुर्गंध में एक सुगंध

21

नए थाने खोलने से अपराध नहीं रुकते : अनुपम मिश्र

22

मन्ना: वे गीत फरोश भी थे

23

श्रद्धा-भाव की जरूरत

 


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अनुपम मिश्रबहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि सीएसई की स्थापना में अनुपम मिश्र का बहुत योगदान रहा है. इसी तरह नर्मदा पर सबसे पहली आवाज अनुपम मिश्र ने ही उठायी थी.

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