एकात्मता की अनुभूति के लिये शिष्यत्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका

Submitted by RuralWater on Sun, 05/06/2018 - 15:08
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Source
सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म, 2006

पर्वत और वृक्ष ये पृथ्वी के ही विशेष आविष्कार हैं। इन्हें अवधूत ने किसलिये गुरु बनाया? वे कहते हैं इन दोनों का जन्म ही परोपकार के लिये हुआ है। स्वयं अपना तनिक भी विचार किये बिना ये दोनों किसी भी तरह का भेदभाव न रखते हुए सेवाव्रत चलाते हैं। साधु पुरुष को इनकी मात्र उपकार के लिये जीने की शिक्षा स्वीकारनी चाहिए। जो भी कोई इनके सान्निध्य में आते हैं उन सभी का मनुष्य से लेकर कीट-पतंग तक सभी जीव-जन्तुओं का हित साधना यही इनके जीवन का हेतु होता है। श्रीमद्भागवत ने तो अवधूत दत्तात्रेय ने कुल चौबीस गुरु किये ऐसा इतिहास बताया है। अखिल विश्व में प्रकट हुई असंख्य विभूतियों से चिदात्मा की सर्वव्यापकता, अनन्त गुणवत्ता और अपार करुणामयता मनुष्य को सीखने का मौका उपलब्ध रहता है। इसका वर्णन इतना रसमय हुआ है कि अपने देश के आध्यात्मिक साहित्य में यह निवेदन अपना खास स्थान रखता है ऐसा कह सकते हैं।

गुरु दत्तात्रेय के चौबीस गुरुओं में से हम कुछ थोड़े ही देख लेंगे। इतने से ही शिष्यत्व का रहस्य ध्यान में आ सकता है। गुरु महान होगा तो उत्तम बात है। लेकिन वह छोटा मनुष्य हो या मनुष्य भी नहीं पशु-पक्षी कीट-पतंग या कुछ भी चीज हो कंकण जैसी-तो भी एकात्मता की अनुभूति के लिये शिष्यत्व की भूमिका महत्त्वपूर्ण रहती है- यह बात पकड़ में आ जाएगी। इसी के लिये राजा ययाति को दत्तात्रेय अवधूत अपना उदाहरण देकर सिखा रहे हैं।

अवधूत गुरु की प्रथम गुरु है पृथ्वी। मैंने पृथ्वी से धैर्य की, क्षमा की, करुणा की शिक्षा ग्रहण की है, ऐसा वे यदू को बताते हैं। लोग पृथ्वी पर कितने आघात करते हैं, कैसे-कैसे उत्पात करते हैं, परन्तु वह ना किसी से बदला लेती है, ना आक्रोश करके अश्रुपात करती है। धरित्री पर अनेक प्रकार के लोग जान-बूझकर अथवा अज्ञानवश दैव के चंगुल में फँसकर आक्रमण करते हैं, अत्याचार करते हैं, परन्तु अपने मार्ग पर से कभी च्युत न होने का क्षिति (धरती) का व्रत बिना रुके चलता ही रहता है। बुद्धिमान और धैर्यवान मनुष्य को इस व्रत का अनुसरण करना चाहिए। उसकी क्षमाशीलता देखकर प्रबुद्ध लोगों ने उसका नाम ही ‘क्षमा’ रखा!

पर्वत और वृक्ष ये पृथ्वी के ही विशेष आविष्कार हैं। इन्हें अवधूत ने किसलिये गुरु बनाया? वे कहते हैं इन दोनों का जन्म ही परोपकार के लिये हुआ है। स्वयं अपना तनिक भी विचार किये बिना ये दोनों किसी भी तरह का भेदभाव न रखते हुए सेवाव्रत चलाते हैं। साधु पुरुष को इनकी मात्र उपकार के लिये जीने की शिक्षा स्वीकारनी चाहिए। जो भी कोई इनके सान्निध्य में आते हैं उन सभी का मनुष्य से लेकर कीट-पतंग तक सभी जीव-जन्तुओं का हित साधना यही इनके जीवन का हेतु होता है।

मानवों में गुरु करने योग्य अवधूत को कौन मिले? विलक्षण बात यह है कि कोई गुण-सम्पन्न साधु या साध्वी के दर्शन उन्हें प्रेरणा देने के लिये मिले नहीं। पिङ्गला नाम की एक गणिका मिथिला नगरी में रहती थी। उसका विरक्ति का मर्म अवधूत दत्तात्रेय के चित्त को स्पर्श कर गया! अमीरों के लिये उसका शरीर एक भोग वस्तु था। अपनी भोग वृत्ति की तृप्ति करने के लिये पिङ्गला ने शरीर का विक्रय करना पसन्द किया था।

एक दिन ऐसा आया कि उसके पास कोई भी अमीर व्यक्ति पहुँचा नहीं। वह राह देखकर थक गई। द्वार से भीतर, भीतर से द्वार ऐसे अनेक चक्कर उसने लगाये परन्तु कोई भी नहीं फटका उसके पास। आखिर मध्य रात्रि हो गई। पिङ्गला की नींद उड़ गई। तब उसके हृदय का भगवान जागृत हो गया। भोग-जीवन की क्षण-भंगुर अवस्था उसे चुभने लगी। उसने अपने से कहा- मेरे समान मूर्ख मैं ही हूँ! हृदयस्थ परमेश्वर को-परम पुरुष को भुलाकर उसे अनदेखा करके मैं मरण-धर्मी पुरुष की बाट जोह रही हूँ! कैसा मेरा पुण्य खड़ा हो गया और परमेश्वर ने मुझे सच्चे अर्थ में जागृत कर दिया। भोग और उसके लिये आवश्यक होने वाला पैसा इनका तिरस्कार उसके मन में उत्पन्न हुआ। यह वैराग्य विकसित हुए बिना सच्चा सुख, शाश्वत शान्ति और तृप्ति के भाव कैसे उत्पन्न होंगे? हृदयस्थ परमेश्वर की आराधना करके निश्चिन्त होकर गरीबी में जीने का निर्णय पिङ्गला ने किया और वह सुख से सो गई।

हृदयस्थ आत्मस्वरूप का ख्याल आने पर पिङ्गला की अध्यात्म में गति हो गई थी। किसी जन्म की उसकी साधना रही होगी। इसलिये उसने वैराग्यपूर्ण तपःपूत जीवन की साधना करने का निश्चय किया। सच्चे सुख का भण्डार जिसमें समाया है ऐसा हृदयस्थ परमात्मा ही उसका सखा-साथी बन गया। इतनी गहरी समझ उसमें खिल गई और वह शान्तिपूर्वक सो गई। अवधूत दत्तात्रेय यदू राजा से कहते हैं : (इन्द्रिय भोगों की) आशा ही सबसे बड़ा दुःख है। यह आशा समाप्त हो गई कि पिंगला के समान सुख-निद्रा ले सकते हैं। “आशा परमं दुःखं, नैराश्यं परमं सुखम्।”

आर्थिक विकास के मृगजल के पीछे भागकर दुनिया के दरिद्र देश ऐश्वर्य के स्वप्न देख रहे हैं और अधिक ही दुःखी हो गए हैं। उन्हें पिङ्गला कुछ पाठ पढ़ा सकती है तो ठीक होगा। उससे कष्ट सहते हुए स्वावलम्बन का जीवन जीने का मंत्र तो सीख ही सकते हैं।

विनोबा की माँ ने उनसे उनके बचपन में एक बात पते की कही थी- “विन्या थोड्यान्त गोडी, फारात, लबाड़ी!” “बेटे, थोड़े में मिठास होती है, अधिक में झूठ की कड़वाहट रहती है।” इस जीवन-दर्शन पर अर्थशास्त्र खड़ा होगा तो दुनिया निश्चित रूप से सुखी हो जाएगी।

तो, अब किसको गुरु बनाने का सोच रहे हैं दत्तात्रेय! एक कुमारी कन्या के हाथों में पहनी शंख की बनी चूड़ियों को। उसकी शादी तय हुई थी। उसके ससुराल के लोग उसके घर पहुँचे तब माता-पिता घर पर नहीं थे। लड़की को ही उनका आतिथ्य करना पड़ा। उन सबको भोजन कराने के लिये चावल नहीं थे। तब घर के पिछवाड़े में वह धान कूटने लगी। तब उसकी चूड़ियाँ छन-छन आवाज करने लगीं। बाहर बैठे मेहमानों को यह आवाज सुनकर अवश्य ही लगता कि कन्या का मायका दरिद्र है। उसने हाथ की सुन्दर शंख की चूड़ियों में से बहुत सारी उतार दी, केवल दो-दो चूड़ियाँ ही हाथ में रहने दी। किन्तु ये दो-दो चूड़ियाँ भी कुछ आवाज करती ही रहीं। आखिर उसने मात्र एक-एक चूड़ी ही रख ली हाथ में-फिर आवाज बन्द हो गई और उसने अपना काम जल्दी पूरा किया।

अवधूत ठहरे चतुर शिष्य! उन्होंने उस कन्या की कुशलता देख ली। मन में कहने लगे-एकदम ठीक किया उसने। साथ में अनेक होते हैं तब ‘तू-तू मैं-मैं’ होता रहता है। मतभेद-मनभेद होकर झगड़े तक बात बढ़ती रहती है। और दो ही साथी प्रवास में हो तो भी कुछ वार्तालाप होता ही है। इसलिये जीवन-साधक को अकेले ही रहकर साधना करनी चाहिए। उसको अकेले ही विचरण करने की हिम्मत दिखानी चाहिए।

वासे बहूनां कलहः भवेत् वार्ता द्वयोरपि।
एक एव चरत्तस्मात् कुमार्या इव कङकणः।।


अन्तरात्मा की शान्ति पाने के लिये बाह्य वातावरण में भी शान्ति की आराधना करनी पड़ती है। ‘न्वाइज पॉल्यूशन’ के आज के युग में भी कुमारी की चूड़ियों की सिखाई बात उपयोगी सिद्ध होती है। एकान्त सेवन से भोगों का आकर्षण कम हो जाता है यह भी तो साधकों का अनुभव है ही!

अवधूत दत्तात्रेय जैसे जागृत शिष्य कल्याण-मार्ग पर अग्रसर होने के लिये कौन-कौन से सद्गुण आवश्यक हैं इसका विचार कर लेते हैं। तब उन गुणों के विकास के लिये विश्व, सृष्टि और मानव-समाज की सभी अभिव्यक्तियों से कुछ-न-कुछ शिक्षा पा लेते हैं। इससे शिष्यत्व की नम्रता खिलती है और साथ ही नाम-रूप के सारे संसार के लिये पावित्र्य की, पूज्यता की भावना निर्माण हो जाती है। उस पर आक्रमण करने की वृत्ति उठती ही नहीं। आवश्यक है दत्तात्रेय की वृत्ति, दृष्टि और तैयारी!

 

सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम संख्या

अध्याय

1.

वायु, जल और भूमि प्रदूषण

2.

विकास की विकृत अवधारणा

3.

तृष्णा-त्याग, उन्नत जीवन की चाभी

4.

अमरत्व की आकांक्षा

5.

एकत्व ही अनेकत्व में अभिव्यक्त

6.

निष्ठापूर्वक निष्काम सेवा से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति

7.

एकात्मता की अनुभूति के लिये शिष्यत्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका

8.

सर्व-समावेश की निरहंकारी वृत्ति

9.

प्रकृति प्रेम से आत्मौपम्य का जीवन-दर्शन

10.

नई प्रकृति-प्रेमी तकनीक का विकास हो

11.

उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम

12.

अपना बलिदान देकर वृक्षों को बचाने वाले बिश्नोई

13.

प्रकृति विनाश के दुष्परिणाम और उसके उपाय

14.

मानव व प्रकृति का सामंजस्य यानी चिपको

15.

टिहरी - बड़े बाँध से विनाश (Title Change)

16.

विकास की दिशा डेथ-टेक्नोलॉजी से लाइफ टेक्नोलॉजी की तरफ हो

 

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