भूजल स्तर के प्रभाव से दम तोड़ती कुआँ प्रणाली

Submitted by UrbanWater on Fri, 07/28/2017 - 11:51

पानी दोहन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो इस प्रणाली के दम तोड़ने से भले ही कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन ऐसे में कहीं-न-कहीं हमारी व्यवस्थाओं को लेकर चिन्ता खड़ी हो गई है। दूसरी ओर अभी भी ऐसी स्थिति है। जबकि हम ऐसे स्थायी अवलोकन कुओं को जीवित कर सकें। जिनके माध्यम से वर्षों से हमें पानी नापने के बारे में जानकारी मिलती थी। अलबत्ता अब पीजोमीटर और उससे भी अपडेटेड मशीनें आने लगी हैं जो कि ना केवल हर 8 घंटे में जलस्तर का पता बता देती है बल्कि वे सेटेलाइट से जुड़कर मुख्यालय पर भी सीधे जानकारी भेज सकती है।मध्य प्रदेश में तेजी से भूजल स्तर में गिरावट का दौर जारी है। बारिश के दिनों में जरूर भूजल स्तर में सुधार हो जाएगा लेकिन उसके ठीक बाद फिर स्थिति चिन्ताजनक हो जाती है। मध्य प्रदेश के कई ऐसे जिले और विकासखण्ड हैं जो ग्रे श्रेणी में आते हैं। सबसे बड़ी समस्या सामने आ रही है की भूजल स्तर नापने की प्राचीन प्रणाली अब धीरे-धीरे दम तोड़ते नजर आ रही है। स्थायी अवलोकन कुआँ यानी परमानेंट आब्जर्वेशन वेल के माध्यम से अब भूजल स्तर नापना मुनासिब नहीं रह गया है। इसकी वजह है कि जिन कुओं के माध्यम से भूजल स्तर साल में तीन बार नापा जाता था उनमें अब पानी ही नहीं रहता है।

मध्य प्रदेश में जल संसाधन विभाग के अन्तर्गत कार्य करने वाली भूजल सर्वेक्षण इकाई पिछले कई दशकों से भूजल स्तर नापने के लिये परम्परागत तरीका का इस्तेमाल करते आ रही है। हालांकि कुछ समय से पीजोमीटर का भी इस्तेमाल होने लगा है। यह आधुनिक तरीका है, आगामी दिनों में इसी तरीके पर पूरी तरह से निर्भर होना पड़ेगा। इसकी वजह है कि तेजी से भूजल स्तर को लेकर चिन्ताजनक हालात बने हैं।

अवलोकन कर चयन किया जाता था


बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि उनके जिले में भूजल स्तर नापने के लिये स्थायी अवलोकन कुआँ यानी ऑब्जरवेशन वेल का उपयोग किया जाता है। तहसील और विकासखण्ड वार कुओं का चयन किया जाता है। इसके पीछे एक प्रक्रिया को लागू किया जाता था। ऐसे में जिन कुओं में साल भर पानी बना रहता था उनको विभाग द्वारा चिन्हित किया जाता था। इसमें निजी क्षेत्र से लेकर सरकारी या अन्य किसी भी क्षेत्र के कुएँ शामिल हो सकते थे। इस तरह की पद्धति से मध्य प्रदेश में सन 1970 से यह कार्य किया जा रहा है। अब जबकि कई दशकों बाद आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया की तर्ज पर पानी का दोहन किया जा रहा है तो हालात बदल चुके हैं।

अधिक दोहन के कारण बनी परेशानी


मध्य प्रदेश के अधिकांश जिलों में पानी का दोहन बहुत अधिक हो रहा है नदी वाले क्षेत्रों को छोड़ दिया जाये तो शेष सभी भागों में पीने के पानी नलकूप आधारित ही बनी हुई है। अलबत्ता तालाबों और अन्य पर भी योजनाएँ निर्भर हैं लेकिन समस्या यह है कि इन तालाबों और अन्य जलस्रोतों का भी लगातार दोहन होता रहता है। परिणामस्वरूप भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आती है।

जानकारों का मानना है कि बरसों में जो पानी धरती से रिसकर गहराई में यानी पाताल में पानी पहुँचा है, उस पानी का अभी दोहन किया जाता है। इस बात का प्रमाण है कि हम लोग कई स्थानों पर 1000 फुट नीचे तक जाकर पानी के लिये नलकूप खनन करने की स्थिति में आ गए हैं। निश्चित रूप से मशीनों के चलते ऐसा कर पाना सम्भव हुआ है लेकिन मशीनों के कारण दोहन का प्रतिशत बहुत अधिक बढ़ता जा रहा है। जहाँ के किसान और लोग आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं, वे इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि भूजल का अतिदोहन भविष्य के लिये एक खतरनाक संकेत है।

वर्तमान में वे अपनी आर्थिक क्षमताओं का उपयोग करते हुए अधिक-से-अधिक गहराई वाले नलकूप का खनन करवाने लगते हैं। परिणामस्वरूप वे तत्काल कुछ राहत जरूर ले लेते हैं और लाभ भी ले लेते हैं, लेकिन बाद में स्थिति बनती है कि भूजल स्तर को लेकर बेहद अफसोसजनक हालात बन जाते हैं। मध्य प्रदेश के कई स्थानों पर भूजल स्तर के कमजोर होने के कारण वे ग्रे जिले या ग्रे विकासखण्ड की स्थिति में आ गए हैं। ऐसे हालात बनने में एक परम्परागत प्रणाली भी दम तोड़ते नजर आ रही है।

हर कुएँ पर जाकर नापा जाता था जलस्तर


दरअसल स्थायी अवलोकन कुआँ यानी परमानेंट ऑब्जर्वेशन वेल के माध्यम से जो भूजल स्तर नापा जाता था उसके मामले में एक बड़ी व्यवस्था का पालन होता था। प्रत्येक जिले में ऐसे कुआँ पर भूजल सर्वेक्षण इकाई के कर्मचारी और तकनीकी इंजीनियर पहुँचते थे। इन कुओं का जलस्तर नापा जाता था, वर्ष में तीन बार मुख्य रूप से इन कुओं की जानकारी ली जाती थी। इसमें बताया जाता है कि मानसून के पूर्व, मानसून के बाद और भीषण गर्मी के दौरान तीन बार यह जलस्तर लिया जाता था। जिससे कि हर परिस्थिति में हालात मालूम हो पाते थे। इससे पानी का स्तर क्या है, यह पता चल जाया करता था।

बारिश में भी कुओं के खाली रहने से बारीकी से जानकारी मिल जाया करती थी। इसी के माध्यम से सरकार की अपनी नीतियाँ तय होती थीं। सरकार जलस्तर को लेकर अपने नीति और निर्देश तैयार करती थी। उन्हीं के माध्यम से पेयजल परिरक्षण अधिनियम के तहत कार्यवाहियाँ की जाती थीं। अब ऐसी स्थिति हो गई है कि इनको पानी ही नहीं मिल पाता। यदाकदा कुछ स्थानों पर बारिश में पानी देखने को मिल जाता है।

क्यों विफल हो रही है प्रणाली


दरअसल यह प्रणाली इसलिये विफल होते जा रही है क्योंकि कूपों में पानी की मात्रा ना के बराबर रहती है। भीषण गर्मी में ये कूप सूखे रहते हैं। जबकि बारिश और बारिश के कुछ समय बाद भी इन में पानी बहुत कम रहता है। कुछ कूप तो भूजल स्तर में गिरावट के कारण मृतप्राय हो गए हैं।

ऐसे में मृत पाये कुओं से जलस्तर ले पाना सम्भव नहीं है। इन स्थितियों में अब पूर्ण रूप से पीजोमीटर के माध्यम से जलस्तर नापा जाता है। एक अध्ययन के माध्यम से बात पता चली है कि इन कुओं में पानी कम होना, एक लम्बे समय के लिये चिन्ता का कारण है। भले ही हम वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से लेकर अन्य कई व्यवस्थाओं की बात करते हैं, लेकिन यदि यह कुएँ अब भूजल स्तर बताने में नाकामयाब हो गए हैं तो उसके पीछे मानव की गलती है। जिसमें मुख्य रूप से बेहताशा पानी का दोहन किया जाना है।

यदि पानी दोहन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो इस प्रणाली के दम तोड़ने से भले ही कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा लेकिन ऐसे में कहीं-न-कहीं हमारी व्यवस्थाओं को लेकर चिन्ता खड़ी हो गई है। दूसरी ओर अभी भी ऐसी स्थिति है। जबकि हम ऐसे स्थायी अवलोकन कुओं को जीवित कर सकें। जिनके माध्यम से वर्षों से हमें पानी नापने के बारे में जानकारी मिलती थी। अलबत्ता अब पीजोमीटर और उससे भी अपडेटेड मशीनें आने लगी हैं जो कि ना केवल हर 8 घंटे में जलस्तर का पता बता देती है बल्कि वे सेटेलाइट से जुड़कर मुख्यालय पर भी सीधे जानकारी भेज सकती है।

हमें वर्तमान में तकनीकी सुविधाएँ भले ही उपलब्ध हैं लेकिन इस तकनीक में कहीं-न-कहीं पुरानी प्रणाली का दम तोड़ना अच्छा संकेत नहीं है। जिस मध्य प्रदेश और मालवा क्षेत्र में पानी हर स्थान पर मिल जाएगा तथा उन स्थानों पर कुओं में पानी नहीं होना एक ऐसी दिशा की ओर इशारा कर रहा है जहाँ शायद रेगिस्तान की ओर अग्रसर हो रहे हो। इसलिये पानी के दोहन को लेकर अभी से चिन्ता करनी होगी।

सम्बन्धित विभाग के जिम्मेदारों का कहना है कि अभी भी कुछ स्थानों पर हुए इस प्रणाली को अपनाया जाता है, लेकिन उनके द्वारा स्वीकार किया जाता है कि जो उपयोग स्थायी अवलोकन कुआँ पहले पानी के स्तर को नापने में सही जानकारी दे पाता था, वह अब नहीं हो पा रहा है। इसकी वजह है कि कई कुएँ तो अब बन्द कर दिये गए हैं तो वहीं कुछ की स्थिति और भी चिन्ताजनक हैै। ऐसे में अब पूर्ण रूप से तकनीकी व्यवस्था पर निर्भर होना पड़ेगा लेकिन हमें कई मीटर तक पानी नीचे से लेने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि बारिश के मौसम में धरती की गहराई से लिया गया पानी को उसे लौटाने की भी जिम्मेदारी हमें निभानी होगी। यदि यह जिम्मेदारी नहीं निभाई गई तो आने वाली पीढ़ियों पर भी संकट के बादल मँडराते रहेंगे।

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