खतरे में ग्लेशियरों का अस्तित्व

Submitted by UrbanWater on Tue, 04/04/2017 - 15:48

हिमालय के बहुतेरे ग्लेशियर हर साल दस से बारह मीटर तक पीछे खिसक रहे हैं। जंगलों में लगने वाली आग से निकला धुआँ और कार्बन से ग्लेशियरों पर एक महीन सी काली परत पड़ रही है। यह कार्बन हिमालय से निकलने वाली नदियों के पानी के साथ बहकर लोगों तक पहुँच रहा है जो मानव स्वास्थ्य के लिये बहुत बड़ा खतरा है। गर्म हवाओं के कारण इस क्षेत्र की जैवविविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यह बेचैन कर देने वाली स्थिति है। आज ग्लोबल वार्मिंग समूची दुनिया के लिये गम्भीर चुनौती है। समूची दुनिया के देश अब इसकी गम्भीरता को समझ चुके हैं कि यदि अब इस मामले में देर कर दी तो आने वाले दिनों में मानव जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। जहाँ तक ग्लेशियरों का सवाल है, समूची दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग के चलते ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं।

दुनिया की सबसे ऊँची पर्वत शृंखला माउंट एवरेस्ट जिसे तिब्बत में माउंट कुमोलांग्मा कहा जाता है, बीते 5 दशकों से लगातार गर्म हो रही है। इससे इसके आस-पास के हिमखण्ड काफी तेजी से पिघल रहे हैं। चीन के चाइनीज एकेडेमी ऑफ साइंसेज, हुनान यूनीवर्सिटी ऑफ साइंस एंड माउंट कुमोलांग्मा स्नो लियोपार्ड कंजरवेशन सेंटर के शोध ने खुलासा किया है कि 8,844 मीटर ऊँची इस चोटी में हिमखण्ड काफी तेजी से पिघल रहे हैं। असलियत में वह चाहे हिमालय के ग्लेशियर हों या तिब्बत के या फिर वह आर्कटिक ही क्यों न हो, वहाँ पर बर्फ के पिघलने की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है।

असलियत यह है कि हिमालय के कुल 9600 के करीब ग्लेशियरों में से तकरीब 75 फीसदी ग्लेशियर पिघल रहे हैं। यदि यही सिलसिला जारी रहा तो बर्फ से ढँकी यह पर्वत शृंखला आने वाले कुछ सालों में बर्फ विहीन हो जाएगी। इसरो ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि हमेशा बर्फ से ढँका रहने वाला हिमालय अब बर्फ विहीन होता जा रहा है।

सेटेलाइट चित्रों के आधार पर इसकी पुष्टि हो चुकी है कि बीते 15-20 सालों में 3.75 किलोमीटर की बर्फ पिघल चुकी है। इसका सबसे बड़ा कारण समूचे हिमालयी क्षेत्र में तापमान में तेजी से हो रहा बदलाव है। इसका नतीजा है कि ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार में बढ़ोतरी है जिससे वह सिकुड़ रहे हैं। हिमालय क्षेत्र में गंगोत्री और यमुनोत्री ये दो ग्लेशियर प्रमुख हैं। गंगोत्री ग्लेशियर लगभग 300 छोटे-बड़े ग्लेशियरों से मिलकर बना है। गंगोत्री ग्लेशियर की लम्बाई जहाँ 30 किलोमीटर है, वहीं यमुनोत्री की लगभग 5 किलोमीटर है।

असल में हिमालय के बहुतेरे ग्लेशियर हर साल दस से बारह मीटर तक पीछे खिसक रहे हैं। जंगलों में लगने वाली आग से निकला धुआँ और कार्बन से ग्लेशियरों पर एक महीन सी काली परत पड़ रही है। यह कार्बन हिमालय से निकलने वाली नदियों के पानी के साथ बहकर लोगों तक पहुँच रहा है जो मानव स्वास्थ्य के लिये बहुत बड़ा खतरा है। गर्म हवाओं के कारण इस क्षेत्र की जैवविविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यह बेचैन कर देने वाली स्थिति है।

गौरतलब है कि 75 फीसदी ग्लेशियर पिघलकर झरने और झीलों का रूप अख्तियार कर चुके हैं। सिर्फ आठ फीसदी ही ग्लेशियर स्थिर हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो अभी भी कुछ ग्लेशियर बहुत ही अच्छी हालत में हैं। अच्छी बात यह है कि यह ग्लेशियर कभी भी गायब नहीं होंगे। इसरो का यह अध्ययन हिमालय के ग्लेशियर तेजी से गायब हो रहे हैं, इस मिथ को धता बताने के लिये किया गया था। लेकिन इसके नतीजे काफी परेशान करने वाले निकले।

इसरो के इस अभियान को विज्ञान, पर्यावरण और वन मंत्रालय ने मंजूरी दी थी ताकि संयुक्त राष्ट्र की अन्तरराष्ट्रीय रपट का मुँहतोड़ जवाब दिया जा सके। यह इसलिये किया गया था कि संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरण रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियर गायब होने की बात कही गई थी। अध्ययन के अनुसार यह ग्लेशियर सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र के मुहाने पर स्थित हैं। इसके अलावा इनमें से कई ग्लेशियर चीन, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान में भी हैं।

आईपीसीसी ने भी आज से तकरीब आठ-दस साल पहले जारी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2035 तक हिमालय के सभी ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग के चलते खत्म हो जाएँगे। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले 200 सालों में ग्लोबल वार्मिंग के चलते आइसलैण्ड के सभी ग्लेशियर खत्म हो जाएँगे। वैज्ञानिकों के अनुसार आइसलैण्ड के तीन सबसे बड़े ग्लेशियर यथा- होफ्जुकुल, लोंगोंकुल और वैटनोजोकुल खतरे में हैं। यह ग्लेशियर समुद्रतल से 1400 मीटर की ऊँचाई पर हैं।

इसके अलावा दक्षिण-पश्चिम चीन के किंवंघई-तिब्बत पठार क्षेत्र के ग्लेशियर भी ग्लोबल वार्मिंग के चलते तेजी से पिघल रहे हैं। तिब्बत के इस क्षेत्र से कई नदियाँ चीन और भारतीय उपमहाद्वीप में निकलती हैं। चीन के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि तिब्बत के ग्लेशियरों के पिघलने की दर इतनी तेज है जितनी पहले कभी नहीं थी। शोध के परिणामों से इस बात की पुष्टि होती है कि 2400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ग्लेशियरों का एक बड़ा हिस्सा पिघल चुका है।

विशेषज्ञ साल 2005 से ही लगातार इस क्षेत्र में शोध करते आ रहे हैं। उन्होंने यह शोध चीन के क्विंघई प्रांत की यांग्त्सी, एलो और लांसांग नदियों के पानी, भूगर्भ, ग्लेशियरों और दलदलीय भूमि पर किया। इस शोध में तिब्बत से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र और सतलुज पर पड़ने वाले सम्भावित प्रभावों का जिक्र नहीं किया गया है।

गौरतलब है कि धरती पर ताजे पानी के सबसे बड़े स्रोत ग्लेशियर जलवायु परिवर्तन के विश्वसनीय सूचक हैं। प्रान्त के सर्वेक्षण और मैपिंग ब्यूरो के इंजीनियर चेंग हेनिंग के अनुसार यांग्त्सी स्रोत के पाँच फीसदी ग्लेशियर पिछले तीन दशक में पिघल चुके हैं। असल में ग्लेशियरों के पिघलने और जलवायु परिवर्तन में सीधा सम्बन्ध है।

पिछले पचास सालों में तीन मौसम केन्द्रों से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार यह साबित हो गया है कि प्रान्त की इन तीनों नदियों के औसत तापमान में लगातार इजाफा हो रहा हैं। वैज्ञानिकों ने इस बात पर जोर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के अलावा मानवीय गतिविधियाँ और जरूरत से ज्यादा दोहन भी ग्लेशियरों के पिघलने का एक बड़ा कारण है।

ग्लेशियरों के पिघलने से आर्कटिक क्षेत्र की भविष्य में वैश्विक कार्बन सिंक के रूप में काम करने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ेगा। ग्लेशियरों के पिघलने से आर्कटिक कार्बन को सोखना बहुत कम कर देगा। यह स्थिति समूची दुनिया के लिये बहुत घातक होगी। गौरतलब है कि अकेले आर्कटिक महासागर और उसकी पूरी भूमि ही पूरी दुनिया का 25 फीसदी कार्बन सोख लेते हैं।

हालात इतने खराब हो चुके हैं कि यदि इसी रफ्तार से बर्फ पिघलती रही तो आने वाले 40 सालों में आर्कटिक बर्फ रहित हो जाएगा। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह प्रवृति चिन्ता का विषय हैं। आर्कटिक के इस व्यवहार से ग्लोबल वार्मिंग में और बढ़ोत्तरी की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता। यह जान लेना जरूरी है कि आर्कटिक महासागर और भूमि मिलकर विश्व का तकरीब 25 फीसदी कार्बन सोख लेते हैं। ग्लेशियर और हिमखण्ड पिघलने का तात्पर्य यह हुआ कि कम असरदार कार्बन सिंक होगा। इससे ग्लोबल वार्मिंग तेजी से बढ़ सकती है। सामान्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि आर्कटिक बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने की अपनी क्षमता को खो देगा।

यह कार्बन डाइऑक्साइड हवा या यूँ कहें कि वातावरण में ही रह जाएगी और अन्ततः ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने के कारण के रूप में काम करेगी। दरअसल वैज्ञानिक न केवल बर्फ के पिघलने से चिन्तित हैं बल्कि वह इससे समुद्र के स्तर में होने वाले इजाफे को लेकर भी चिन्तित हैं। उनका मानना है कि आने वाले 30-40 सालों में समूचा आर्कटिक क्षेत्र बर्फ से मुक्त हो जाएगा। उनके अनुसार बीते पाँच-सात सालों में इस क्षेत्र में तेजी से बर्फ पिघली है। बर्फ के पिघलने के साथ ही वैश्विक कार्बन चक्र में भी बदलाव आएगा।

बीते दिनों उत्तराखण्ड की नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा-यमुना को मानव का दर्जा देने के बाद अब गंगोत्री और यमुनोत्री ग्लेशियरों को मानव का दर्जा देने की घोषणा की है। उसने ग्लेशियरों को दिये गए जीवित व्यक्ति के अधिकार का उपयोग करने के लिये राज्य के मुख्य सचिव, नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के निदेशक, नमामि गंगे के कानूनी सलाहकार, चंडीगढ़ ज्यूडीशियल अकादमी के निदेशक, राज्य के महाधिवक्ता और पर्यावरणविद एम.सी. मेहता को मिलाकर छह सदस्यीय समिति गठित की है।

आशा की जाती है कि इससे इन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियाँ सीमित होंगी। इसका परिणाम इन ग्लेशियरों के पिघलने की गति में कमी के रूप में सामने आएगा। यह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन सबसे बड़ा मुद्दा तो तापमान में हो रही वृद्धि पर अंकुश लगाने का है। इसके बिना सारे प्रयास बेमानी होंगे।

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एक परिचय:


. 21 जनवरी 1952 को एटा, उ.प्र. में शिक्षक माता-पिता के यहाँ जन्म।

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