हिण्डन नदी - एक जीवित नदी की दर्दनाक मौत

Submitted by UrbanWater on Fri, 09/29/2017 - 16:25

हिण्डन नदी का उद्गम स्थल है शिवालिक पहाड़ीहिण्डन नदी का उद्गम स्थल है शिवालिक पहाड़ीगंगा-यमुना के दोआब में सहारनपुर जनपद से प्रारम्भ होकर मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ, बागपत व गाजियाबाद से होते हुए अन्त में जब हिण्डन नदी गौतमबुद्धनगर जनपद के तिलवाड़ा गाँव से पश्चिम व मोमनाथल गाँव से पूर्व में यमुना में मिलती है तो इसमें बहते हुए काले रंग के बदबूदार पानी को देखकर कोई कह नहीं सकता है कि यह एक जीवित नदी है। यही नहीं अगर किसी अंजान व्यक्ति को इस स्थान पर लाकर पूछा जाये कि यह कौन सी धारा है तो वह शर्तिया ही इसे गन्दा नाला कहकर सम्बोधित करेगा। इसके विपरीत जब यह नदी अपने मायके अर्थात उद्गम स्थल सहारनपुर जनपद में शिवालिक की पहाड़ियों के ढलान कालूवाला पास से चलकर नीचे आती है तो यहाँ के साफ-शुद्ध पानी को देखकर हर कोई जरूर कहेगा कि यह तो अमृत जल है।

हिण्डन नदी जब प्रकृति के बीच से साफ-शुद्ध पानी लेकर चलती है तो आखिर कैसे वह पानी इंसानों की बस्तियों से गुजरते ही मैला-कुचैला और बदबूदार हो जाता है? इस स्थिति को देखते हुए यह स्थापित सत्य है कि हिण्डन नदी का गुनहगार कोई और नहीं बल्कि हम स्वयं हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुर का टांडा से निकलने वाली धारा को ही हिण्डन नदी माना जाता रहा है। सेटेलाइट मैपिंग व ब्रिटिश गजेटियर के आधार पर देखें तो हिण्डन का उद्गम मुजफ्फराबाद जनपद में शिवालिक हिल्स बताया जाता है। ब्रिटिश गजेटियर व सेटेलाइट मैपिंग को आधार मानते हुए ही मेरी हिण्डन-मेरी पहल का एक दल मार्च, 2017 में हिण्डन के वास्तविक उद्गम की खोज के लिये निकला।

हिण्डन उद्गम तक पहुँचने के लिये मोहण्ड व शाहजहाँपुर वन क्षेत्र से निकलकर नदी के निकट बसे अन्तिम गाँव कालूवाला टोंगिया तक वाहन से पहुँचना सम्भव है। यहाँ से हिण्डन नदी के तल में करीब आठ किलोमीटर दूर पैदल चलकर बरसनी फॉल तक पहुँचा जा सकता है। नदी का यह तल करीब 100 मीटर चौड़ा है। बरसनी फॉल पर पानी करीब 100 फीट ऊपर से नीचे लगातार झरने के रूप में गिरता रहता है।

इस धारा को बरसनी नदी के नाम से भी जानते हैं। इसमें मिलने वाली अन्य धाराओं में पहाड़ों पर होने वाली बरसात का पानी व पहाड़ों पर लगे वृक्षों की जड़ों से निकलने वाला पानी आता है। यहाँ नदी के तल के नीचे भी नदी बहती है। क्योंकि यहाँ बसे वन गूर्जर एक से दो फीट का गड्ढा खोदकर पीने के लिये पानी निकाल लेते हैं। पहाड़ के ऊपर से निकले वाली यह धारा जहाँ तक पुर का टांडा वाली धारा में आकर मिलती है वहाँ तक नदी बहुत चौड़ी है तथा उसमें साफ-शुद्ध पानी भी है।

हिण्डन नदी सहारनपुर जनपद से प्रारम्भ होकर गौतमबुद्धनगर जनपद में जाकर यमुना में समाहित हो जाती है। काली पश्चिम, कृष्णी, धमोला, पांवधोई, नागदेव, चाचाराव, सपोलिया, अंधाकुंडी व स्रोती जैसी अन्य छोटी धाराएँ मिलकर हिण्डन को नदी बनाती हैं। उद्गम से यमुना में समाहित होने तक हिण्डन की कुल लम्बाई करीब 355 किलोमीटर है।

हिण्डन नदी का उद्गम सहारनपुर जनपद के पुर का टांडा गाँव को माना जाता रहा है। पुर का टांडा के जंगल से बरसात के समय पानी एकत्र होकर बहने वाला पानी नदी की एक धारा बनाता था। यह धारा सहारनपुर जनपद के ही कमालपुर गाँव के जंगल में जाकर कालूवाला की पहाड़ियों से साफ-शुद्ध पानी लेकर आने वाली कालूवाला खोल अर्थात हिण्डन में मिल जाती है। इस स्थान पर करीब 90 प्रतिशत पानी कालूवाला खोल की धारा से आता है जबकि करीब 10 प्रतिशत पानी ही पुर का टांडा से निकलने वाली धारा से आता है।

कालूवाला नदी जोकि हिण्डन नदी है, वह शिवालिक की पहाड़ियों अर्थात कालूवाला पास से प्रारम्भ होती है। यह बरसाती नदी है। इसमें छोटी अन्य सहायक धाराएँ भी आकर मिलती हैं। सहारनपुर में उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड की सीमा को बाँटने वाली शिवालिक वन मण्डल की पहाड़ियों के दक्षिण की ओर ढलान पर कालूवाला पास व कोठरी मिलान से जो धारा बहकर चलती है उसको बरसनी नदी के नाम से जाना जाता है। बरसनी में कुछ छोटी धाराओं के स्रोत, छज्जेवाली, पीरवाली, सपोलिया, कोठरी व अंधाकुंडी एक निश्चित दूरी पर आकर मिलते रहते हैं। इस स्थान पर शिवालिक आरक्षित वन मण्डल भी है जिसमें कि मोहण्ड, शाहजहाँपुर व शाकुम्भरी वन क्षेत्र आता है।

शिवालिक पहाड़ियों की चोटी से उत्तर प्रदेश की ओर ढलान से लेकर आरक्षित वन क्षेत्र समाप्त होने तक की दूरी करीब 15 किलोमीटर है। इस 15 किलोमीटर की दूरी में हिण्डन नदी के दोनों ओर पहाड़ व घना जंगल है। इन पहाड़ों पर होने वाली वर्षा का पानी भी हिण्डन की मुख्य धारा में आता है। इसके अतिरिक्त वृक्षों की जड़ों से रिसने वाला पानी भी मुख्य धारा में मिलता रहता है। बरसात के समय इनमें भरपूर पानी आता है, जोकि नीचे तक बहते हुए जाता है। इन सभी धाराओं के मिलने से जो नदी बनती है वही हिण्डन है, जोकि पुर का टांडा गाँव से बहने वाली धारा को अपने आप में कमालपुर गाँव के निकट मिला लेती है।

बरसनी धारा को बरसनी नदी के नाम से भी जाना जाता हैऊपरी क्षेत्र में बसे गाँव के निवासी व वन गुर्जर हालांकि हिण्डन को वहाँ कालूवाला खोल, बरसनी व गुलेरिया आदि नामों से भी पुकारते हैं लेकिन वे यह भी बताते हैं कि ये हमारे बोलने के नाम हैं लेकिन यह हिण्डन नदी है। हम अगर गंगा नदी के सम्बन्ध में देखें तो भगीरथी व अलकनन्दा मिलकर ही गंगा बनाती हैं, इसी प्रकार कालूवाला धारा व पुर का टांडा से निकलने वाली धारा ही हिण्डन बनाती है।

शिवालिक पहाड़ियों से ही हिण्डन के साथ-साथ हिण्डन की पश्चिम दिशा से एक अन्य धारा निकलती है जिसे नागदेव नदी के नाम से जाना जाता है, यह नागदेव नदी करीब 45 किलोमीटर की दूरी तय करने के पश्चात सहारनपुर में ही घोघ्रेकी गाँव के जंगल में आकर हिण्डन नदी में मिल जाती है।

हिण्डन की बड़ी सहायक नदियों में काली पश्चिम जोकि हिण्डन नदी की पूर्वी दिशा से सहारनपुर जनपद के ही गंगाली गाँव से प्रारम्भ होकर मुजफ्फरनगर से होते हुए करीब 145 किलोमीटर का सफर तय करके मेरठ जनपद के गाँव पिठलोकर के जंगल में जाकर हिण्डन नदी में समाहित होती है। काली पश्चिम में चुड़ियाला से प्रारम्भ होने वाली शीला नदी देवबन्द के पास मतोली गाँव के निकट आकर काली नदी पश्चिम में पहले ही समा चुकी होती है।

हिण्डन में मिलने से पहले काली पश्चिम नदी में मुजफ्फरनगर शहर से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर अपर गंगा नहर खतौली से एक नाले के माध्यम से करीब 1000 क्यूसेक पानी अम्बरपुर गाँव के जंगल में डाला जाता रहा है। वर्तमान में यह पानी तकनीकी समस्या के चलते नहीं डाला जा रहा है। इससे पहले सहारनपुर जनपद अपर गंगा नहर के भनेड़ा स्केप से करीब 100 क्यूसेक पानी काली पश्चिम नदी में डालना प्रारम्भ किया है।

यह नदी देश की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में से एक है क्योंकि इसमें मुजफ्फरनगर जनपद के छोटे-बड़े करीब 80 उद्योगों का गैर-शोधित तरल कचरा तथा मुजफ्फरनगर शहर का गैर-शोधित घरेलू तरल कचरा सीधे बहता है। हिण्डन व काली पश्चिम के मिलने के स्थान पर काली पश्चिम में करीब 80 प्रतिशत और हिण्डन में मात्र 20 प्रतिशत पानी होता है।

हिण्डन नदी की पूर्वी दिशा से सहारनपुर जनपद के ही दरारी गाँव से निकलने वाली कृष्णी नदी शामली व बागपत जनपदों से होते हुए करीब 153 किलोमीटर का सफर तय करके बागपत जनपद के ही बरनावा कस्बे के जंगल में जाकर हिण्डन नदी में विलीन हो जाती है। यह नदी भी भयंकर प्रदूषण का दंश झेलती है। कृष्णी नदी में ननौता, सिक्का, थानाभवन, चरथावल, शामली व बागपत के उद्योगों का गैर-शोधित तरल कचरा तथा गैर-शोधित घरेलू तरल कचरा मिलता है जिसको अन्त में हिण्डन में उड़ेल दिया जाता है।

सहारनपुर जनपद में ही हिण्डन की पश्चिमी दिशा से संसारपुर गाँव से प्रारम्भ होकर करीब 25 किलोमीटर का सफर करके धमोला नदी सहारनपुर जनपद के ही ऐतिहासिक शरकथाल गाँव के जंगल में जाकर हिण्डन में मिलती है। शरकथाल गाँव सढ़ौली हरिया गाँव का एक मजरा है और यह ऐतिहासिक भी है।

धमोला नदी में उसकी एक सहायक नदी पांवधोई सहारनपुर के ही शकलापुरी गाँव के निकट से बहती है, यहाँ ऐतिहासिक महादेव मन्दिर भी स्थित है। यहाँ से ऊपरी भाग में महरबानी गाँव के निकट से आने वाले दो बरसाती नाले खुर्द व गुना कट भी पांवधोई में आकर मिल जाते हैं। शंकलापुरी से करीब 7 किलोमीटर की दूरी तय करके सहारनपुर शहर के अन्दर जाकर धमोला नदी में मिल जाती है। पांवधोई के उद्गम में साफ पानी है क्योंकि यह नदी चौये के पानी से बहती है, लेकिन इस साफ पानी में धमोला तक आते-आते सहारनपुर शहर का गैर-शोधित तरल कचरा मिल चुका होता है। धमोला नदी सहारनपुर शहर का तमाम सीवर का पानी तथा उसमें डाली गई गन्दगी को ढोकर लाती है और उस सब कचरे को हिण्डन नदी में उड़ेल देती है।

हिण्डन में मिलने वाली उसकी सहायक नदियाँ या सहायक छोटी धाराएँ उसको नदी का रूप देती हैं। इस नदी में प्रदूषण का बड़े स्तर पर प्रारम्भ सीधे तौर पर सहारनपुर जनपद के ही परागपुर गाँव के जंगल में स्टार पेपर मिल के गैर-शोधित तरल कचरा लेकर आने वाले नाले के मिलने से हो जाता है। यहाँ से हिण्डन में गन्दगी का प्रवेश होना प्रारम्भ होता है। इससे पहले नागदेव नदी के माध्यम से कुछ छोटे उद्योग अपना गैर-शोधित तरल कचरा नौगजा पीर के पास डालते हैं, लेकिन वह तरल कचरा हिण्डन तक बहुत कम मात्रा में आ पाता है। सहारनपुर की पहाड़ियों से जो हिण्डन नदी साफ पानी लेकर चलती है वह सहारनपुर ही उसके पानी को अपनी सीमा से बाहर निकलने से पहले ही जहरीले तत्वों व बदबू से भर देता है।

सहारनपुर जनपद से आगे यह नदी मुजफ्फरनगर व शामली जनपदों की सीमा में प्रवेश करती है। हिण्डन नदी को सीमा रेखा मानकर ही मुजफ्फरनगर व शामली जनपदों की सीमाएँ तय की गई हैं। हिण्डन के पूर्व में मुजफ्फरनगर और पश्चिम में शामली जनपद है। इन दोनों जनपदों में सीधे तौर पर कृषि बहिस्राव व बुढ़ाना कस्बे का तरल व ठोस कचरा भी हिण्डन में मिलता रहता है, लेकिन जैसे ही हिण्डन मेरठ की सीमा में प्रवेश करती है तो मेरठ जनपद में मेरठ-मुजफ्फरनगर सीमा पर बसे गाँव पिठलोकर के जंगल में हिण्डन नदी के पूर्व से बहकर आने वाली काली पश्चिम नदी में मिल जाती है।

मुजफ्फरनगर-शामली की सीमा से आगे बढ़ते हुए हिण्डन नदी मेरठ व बागपत जनपदों में प्रवेश कर जाती है। इन दोनों जनपदों का भी हिण्डन नदी को सीमा रेखा मानकर ही बँटवारा किया गया है। हिण्डन के पूर्व में मेरठ जनपद है जबकि पश्चिम में बागपत जनपद। यहाँ से हिण्डन करीब दस किलोमीटर आगे बढ़ती है तो हिण्डन के पश्चिम से बहकर आने वाली कृष्णी नदी बरनावा गाँव के निकट हिण्डन में मिल जाती है। बरनावा से पहले हिण्डन नदी के पूर्व में स्थित मेरठ जनपद के सरधना कस्बे से आने वाला एक गन्दा नाला भी मेरठ जनपद के ही कलीना गाँव के जंगल में हिण्डन में मिल चुका होता है।

यहाँ से हिण्डन नदी आगे बढ़ती है तो हिण्डन नदी के पूर्व में मेरठ जनपद में अपर गंगा नहर के जानी एस्केप से करीब 1500 क्यूसेक पानी हिण्डन में डाल दिया जाता है। जानी एस्केप की करीब 2000 क्यूसेक पानी डालने की क्षमता है। यह पानी मेरठ-बागपत मार्ग से दो किलोमीटर पहले मोहम्मदपुर धूमी गाँव के जंगल में डाला जाता है। यहाँ से आगे नदी में पानी का बहाव बढ़ जाता है और कुछ साफ भी हो जाता है।

यह पानी हिण्डन में इसलिये डाला जाता है जिससे कि मोहननगर से एक नहर के माध्यम से निकालकर यह पानी आगरा नहर में भेजा जा सके। यहाँ से आगे बढ़ते हुए हिण्डन कुछ अन्य उद्योगों, कस्बों व गाँवों का गैर-शोधित तरल व ठोस कचरा अपने आप में समाहित करके गाजियाबाद की सीमा में प्रवेश कर जाती है। गाजियाबाद जनपद में हिण्डन की चुनौतियाँ अधिक बढ़ जाती हैं, यहाँ जहाँ शहर का सीवेज व ठोस कचरा तथा उद्योगों का तरल कचरा नदी को बद-से-बदतर स्थिति में ले जाता है वहीं नदी के बेसिन पर किया गया अतिक्रमण एक गम्भीर समस्या पैदा करता है।

हिण्डन नदी के पानी को गाजियाबाद के मोहननगर कस्बे में एक बैराज बनाकर रोक दिया जाता है, यहाँ से नदी के कुल पानी का करीब 30 फीसदी पानी ही आगे जाने दिया जाता है। बचा हुआ पानी हिण्डन के पश्चिम से एक नहर के माध्यम से यमुना नदी में कालिंदी कुंज बैराज भेज दिया जाता है।

हिण्डन और यमुना का संगम स्थलमोहननगर से निकलने वाली यह नहर कालिंदीकुंज में यमुना नदी में पूर्व की दिशा से जाकर मिलती है, जितना पानी हिण्डन नहर के माध्यम से यमुना नदी में डाला जाता है, उतना ही पानी कालिंदी कुंज में ही यमुना नदी की पश्चिमी दिशा से निकलने वाली आगरा नहर में भेज दिया जाता है। जो पानी मेरठ जनपद में हिण्डन नदी में जानी एस्केप से डाला गया होता है व इस प्रकार से मोहननगर से होते हुए कालिंदी कुंज के रास्ते आगरा को जाने वाली नहर तक पहुँचता है।

मोहननगर बैराज पर भी हिण्डन में गाजियाबाद के सीवर व उद्योगों के नाले लगातार मिलते रहते हैं। बैराज से आगे बढ़ते हुए हिण्डन गौतमबुद्धनगर में प्रवेश करती है तो वहाँ गाजियाबाद से भी विकराल समस्या हिण्डन को झेलनी पड़ती है। यहाँ पर उद्योगों का तरल कचरा, सीवेज व अतिक्रमण जैसी गम्भीर समस्याएँ हिण्डन की हत्या की साजिश में अन्तिम किरदार निभाती हैं। जैसे-तैसे हिण्डन यमुना नदी के निकट तक पहुँचती है। यमुना में मिलने से दो किलोमीटर पहले अपर गंगा नहर से करीब 400 क्यूसेक पानी हिण्डन की पूर्वी दिशा की ओर से हिण्डन नदी में डाल दिया जाता है, लेकिन हिण्डन नदी पर जहरीली गन्दगी का बोझ इतना अधिक होता है कि वह उसमें बहुत अधिक असर नहीं डाल पाता है।

हिण्डन व उसकी सहायक नदियों में बहते अत्यधिक प्रदूषित पानी के कारण नदी किनारे बसे गाँव-कस्बों का भूजल भी जहरीला हो चुका है। सैंकड़ों गाँवों में जल जनित गम्भीर बीमारियाँ पनप रही हैं। सैंकड़ों लोग जल-जनित जानलेवा बीमारियों के कारण असमय काल के मुँह में समा चुके हैं। कुछ किसान हिण्डन व उसकी सहायक नदियों में बहने वाले जहरीले पानी से जाने-अनजाने अपनी फसलों की सिंचाई भी करते हैं, जिस कारण से जहाँ उनके खेतों की कृषि मिट्टी में परसिसटेंट ऑरगेनिक पाल्यूटेंटस जैसे तत्व पाये गए हैं वहीं उस मिट्टी में पैदा हुई सब्जियाँ व अन्य फसलों में भी कीटनाशकों के तत्व मिले हैं। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण के आदेश के पश्चात हिण्डन व उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे गाँवों से सैंकड़ों की संख्या में हैण्डपम्प उखाड़े जा चुके हैं।

जिन नदियों के किनारे सभ्यताएँ बसती थीं वहाँ भयंकर जल प्रदूषण की त्रासदी के कारण बस्तियाँ उजड़ने की कगार पर हैं। नदी में प्रदूषण का प्रतिशत इतना है कि नदी के पानी को छूना तो दूर उसके पास खड़ा होना भी दूभर हो चला है। बुजुर्गों के अनुसार जिस नदी के पानी की तली में पड़ा हुआ सिक्का दिखता था उस पानी को हाथ में लेने पर अब हाथ की रेखाएँ भी नहीं दिखती हैं।

अन्त में हिण्डन नदी मोमनाथल गाँव के पूर्व तथा तिलवाड़ा गांव के पश्चिम के जंगल में सहारनपुर की शिवालिक से चलने वाली जीवित हिण्डन गुमसुम रहकर यमुना नदी में समाहित हो जाती है। एक जीवित नदी का दुखदः अन्त देखकर यमुना भी नम आँखों से हिण्डन का स्वागत करती है और दोनों नदियाँ एक होकर आगे बढ़ जाती हैं।

हिण्डन व उसकी सहायक नदियों का विवरण


 

क्रम

नदी का उद्गम

उद्गम स्थल

विलीन स्थल

लम्बाई

1.

हिण्डन नदी

शिवालिक की पहाड़ियाँ, (कालूवाला पास) जनपद-सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

गाँव- तिलवाड़ा/मोमनाथल गाँव, जनपद-गौतमबुद्धनगर (उत्तर प्रदेश)

355

2.

कृष्णी नदी

दरारी गाँव, सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश)

गाँव-बरनावा, जनपद-बागपत (उत्तर प्रदेश)

153

3.

काली नदी (पश्चिम)

गंगाली गाँव, जनपद-सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

गाँव-अटाली/पिठलोकर गाँव जनपद-मेरठ (उत्तर प्रदेश)

145

4.

शीला नदी

कस्बा-भगवानपुर, जनपद-हरिद्वार (उत्तराखण्ड)

गाँव-मतौली, जनपद-सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

61

5.

धमोला नदी

संसारपुर गाँव, सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश)

शरकथाल/सढ़ौली हरिया गाँव, जनपद-सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

52

6.

पांवधोई नदी

गाँव-शंकलापुरी, जनपद-सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

सहारनपुर शहर, सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश)

7

7.

नागदेव नदी

कोठारी गाँव, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

घोंघ्रेकी गाँव, सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश)

45

8.

चाचा रौ

कालूवाला गाँव, सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश)

कमालपुर गाँव, सहारनपुर जनपद (उत्तर प्रदेश)

18

 



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