अकेली महिलाओं को चाहिए आवास गारंटी

Submitted by UrbanWater on Tue, 10/24/2017 - 11:30
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योजना, सितम्बर 2017

केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग की एक नीति के अनुसार अकेली महिला कर्मचारी को वे घर आवंटित करने में पहल करते हैं। आर्मी वेलफेयर हाउसिंग ऑर्गेनाइजेशन की नीति के अनुसार वे अपने हाउसिंग सोसाइटी में भारतीय सेना की युद्ध विधवाओं को घर खरीदने में प्राथमिकता प्रदान करते हैं। प्रधानमंत्री ग्रामीण योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग जिनकी आय 3 लाख रुपए सालाना से कम है, वे इस योजना का लाभ उठा सकते हैं पर आवेदन परिवार की महिला के नाम से किया जाएगा।

यूनाइटेड नेशन के अनुसार महिलाएँ दुनिया की आबादी का आधा हिस्सा हैं और दो तिहाई कार्यबल का हिस्सा, पर बदले में इनको विश्व आमदनी का दसवाँ हिस्सा मिलता है और विश्व सम्पत्ति का सौ में से एक हिस्सा मिलता है। यह आँकड़ा विश्व पटल पर महिलाओं को जमीनी हकीकत को दर्शाता है।

अकेली महिलाओं की रिहायशी समस्या को लेकर सरकार की नीतियाँ क्या हैं, यह एक ज्वलन्त प्रश्न है। पर क्या सरकार इस विषय पर कुछ सोच या कर रही है? महिला और बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार की आवास नीति और योजना में महिलाओं के प्रति थोड़ी संवेदना दिखाई पड़ती है। मंत्रालय सुरक्षित, पर्याप्त और सस्ते घर शहरी और ग्रामीण इलाकों में उपलब्ध कराने के लिये अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर रहा है। मंत्रालय की वेबसाइट अकेली, बेघर, प्रवासी, घर की मुखिया, कामकाजी महिला, प्रशिक्षु, छात्रा आदि के लिये रिहायशी नीति की वकालत करती है। मंत्रालय केन्द्रीय और राज्य स्तर की आवास नीति के सार्वभौमीकरण की बात करता है। यह सब अभी नीति के स्तर पर है, क्रियान्वयन के स्तर पर इसमें वक्त लगेगा।

निजी आवास बनाने वाली कम्पनियाँ क्या इस ओर ध्यान दे रही हैं। क्या वे आने वाले आवासीय प्रोजेक्ट में अकेली महिलाओं की जरूरतों पर ध्यान दे रही हैं, क्या इस पर क्रियान्वयन किया जाएगा। यह सब एक महत्त्वपूर्ण पहलू है क्योंकि सरकार के अलावा निजी सेक्टर भी जनता की आवासीय जरूरतों को पूरा करता है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात है क्या वास्तुकार अपनी डिजाइन में अकेली महिलाओं की जरूरतों के बारे में जागरूक रहेंगे।

प्राथमिकता की जरूरत क्यों?


2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में अकेली महिलाओं की आबादी 5,07,09,941 है। अकेली महिला का मतलब विधवा, परित्यक्ता, कभी जिसका विवाह न हुआ हो, तलाकशुदा, पृथक रहने वाली स्त्री सभी सम्मिलित हैं। इनमें सारी महिलाएँ कम आय वाले स्तर से नहीं आती हैं। कुछ उच्च वर्ग से आती हैं तो कुछ मध्यम आय वर्ग से आती हैं पर कम आय वर्ग में इन महिलाओं की तादाद बहुत है। हालांकि ये सभी शहर में नहीं रहती हैं। बहुत सी आबादी गाँव और कस्बाई इलाके में भी रहती हैं। पर हर जगह अकेली महिला को न पिता के घर पर सम्मानपूर्वक रहने दिया जाता है न ही ससुराल में। अकेली महिला के लिये रिहायश एक समस्या है।

कम आय वाली अकेली महिलाओं के लिये काम करने वाली संस्था नेशनल फोरम फॉर सिंगल वीमेन राइट ने एक सर्वे करवाया जिसमें यह तथ्य निकलकर सामने आया कि विधवा के ससुराल की सम्पत्ति में अधिकार को ज्यादा सामाजिक मान्यता प्राप्त है। कभी न शादी करने वाली महिला के उसके पिता की सम्पत्ति में अधिकार की तुलना में यह बात कही गई। तलाकशुदा, अलग रहने वाली महिलाओं को हर रोज कई तरह की असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। इस सिलसिले में हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, झारखण्ड, बिहार और महाराष्ट्र में सर्वे कराया गया। सर्वे के मुताबिक 36 प्रतिशत अकेली महिलाएँ जिस घर में रह रही हैं वे न तो उनके नाम पर हैं न ही उन्होंने उसे किराए पर लिया है। घर के लोगों से लेकर पड़ोसी और समाज के सभी लोगों से अकेली महिला को दिक्कत का सामना करना पड़ता है। असुरक्षा के अलावा उन्हें नागरिक सुविधा तक की कमी से जूझना पड़ता है। 386 में से 40.4 प्रतिशत अकेली महिलाएँ जमीन की मालकिन हैं, पर 60 प्रतिशत विधवा महिलाओं के पास जमीन पर मालिकाना हक है।

भारत में अकेली महिलाओं की आबादी कुल महिला की आबादी का 8.6 प्रतिशत है। मर्दों (1,38,92,420) की तुलना में अकेली महिलाओं (4,65,43,802) की संख्या कहीं ज्यादा है। जहाँ महिलाओं की आबादी में इजाफा 18.3 प्रतिशत है वहीं अकेली महिलाओं की आबादी में बढ़ोत्तरी 29.6 प्रतिशत की दर से हो रहा है। 35 वर्ष से अधिक उम्र की अकेली महिलाओं की बढ़ती आबादी इस ओर भी इशारा कर रही है कि हमारा सामाजिक ढाँचा भी बड़ी तेजी से बदल रहा है। 35 वर्ष से अधिक उम्र वाली अकेली महिलाओं की संख्या तेजी से यानि 66 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। यह इस बात की ओर भी इशारा करता है कि आजकल महिलाएँ देर तक अविवाहित रहना पसन्द कर रही हैं। यह घातक स्थिति है क्योंकि जो आवास से सम्बन्धित पॉलिसी बना रहे हैं वे पुरुषों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बना रहे हैं। घटती पूँजी में महिलाओं के लिये अपना आवास होना एक सपना होता जा रहा है। जानकारी इकट्ठा करने में भी समस्या आती है क्योंकि समाज में अभी भी अकेली और अविवाहित महिला के बारे में सही जानकारी देने से लोग घबराते हैं।

पिछले दो दशक से भारत में भूमि और आवास पर महिलाओं का अधिकार एक गम्भीर चिन्तन का मुद्दा रहा है। विश्व स्तर पर भी यह समस्या चिन्तनीय है। हर समाज में महिलाएँ अपने घरेलू, कृषि और अन्य कार्यों का कोई मूल्य नहीं लेती हैं और न ही उसके इस कार्य की कोई सराहना होती है इसलिये यह और भी आवश्यक हो जाता है कि भूमि और सम्पत्ति पर उसके अधिकार को महत्त्व दिया जाये। पर दिन-प्रतिदिन यह और भी विकट होता जा रहा है।

महिलाओं के मानवाधिकार मुद्दे की तरह महिलाओं के भूमि और आवास अधिकार कई तरह के भेदभाव का शिकार होते हैं जैसे पैतृक सम्पत्ति हस्तान्तरण स्वरूप, वसीयतनामा, द्वारा बेटी और बहू और घर की अन्य महिला को सम्पत्ति से बेदखल करना। आवास पर अधिकार की समस्या महिलाओं के सामने सबसे ज्यादा है।

अपर्याप्त स्वामित्व के दुष्परिणाम


चूँकि महिलाओं के नाम पर कम जमीन-जायदाद होने से उनका सामाजिक सुरक्षा स्तर भी बहुत खराब होता है जो उनके आत्मविश्वास पर भी बुरा असर डालता है। कई ऐसी युवा लड़कियाँ हैं जो महानगर, बी-टाउन में जाकर अकेली रह रही हैं। पढ़ाई और नौकरी की खातिर उन्हें रहने की समस्याओं से रोजाना दो-चार होना पड़ता है। घर ढूँढने के चक्कर में कई लड़कियों को कभी-कभी मुसीबत का सामना करना पड़ जाता है. जैसे अभी हाल में दिल्ली में एक लड़की को उसका ब्रोकर मिस कॉल देने लगा और उसका पड़ोसी जरूरत से ज्यादा घुलने-मिलने की कोशिश करने लगा। अकेली महिला को पड़ोसी या समाज एक मुसीबत की तरह देखते हैं या एक मौके की तरह। अकेली रहने वाली लड़कियों को प्रायः अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है। उन्हें सोच-समझकर लोगों से मिलना-जुलना पड़ता है। पुलिस भी उनकी कोई मदद नहीं कर सकती जब तक कि कोई घटना न घट जाये।

सरकार के पास जरूरत के मुताबिक वर्किंग वीमेन हॉस्टल काफी कम हैं। यही हाल छात्राओं का है। न ही निजी हॉस्टल की दुकान चलने वाले लोगों पर इनकी कोई पाबन्दी है या कोई दिशा-निर्देश है। कई मकान मालिक लड़कियों की सिक्योरिटी राशि मार लेते हैं। ऐसे में ये लड़कियाँ शिकायत के लिये कहा जाएँ इनको पता नहीं होता। सरकार ने इनके लिये सुलह-सफाई की कोई जगह नहीं तय की है।

भारत का संविधान कानून के समक्ष सभी को समान अधिकार प्रदान करता है। इसमें सम्पत्ति का अधिकार यानि घर का अधिकार भी आता है। इसी रास्ते पर चलते हुए 2001 में महाराष्ट्र सरकार ने महिला नीति को स्वीकृति दी जिसका विषय महिलाओं का भूमि पर अधिकार था। 2003 में महाराष्ट्र सरकार ने इसी विषय पर एक प्रस्ताव पास किया। नब्बे के दशक के बीच में आन्ध्र प्रदेश की सरकार ने सम्पत्ति और भूमि पर महिलाओं के अधिकार की घोषणा की। ऐसा करने वाली भारत की वह पहली राज्य सरकार थी।

एक जानकारी के अनुसार 1980 में बिहार के बोध गया जिले के कई ग्रामीण इलाकों में जमीन और आवास महिलाओं के कब्जे में आने से उन पर होने वाली घरेलू हिंसा कम हुई। साथ ही, नशे के हालात में पुरुषों द्वारा उन पर मार-पिटाई की घटना में कमी आई है। एक लम्बे जन-संघर्ष के बाद बिहार के कुशा-बीजा गाँव के कुछ महिलाएँ अपने नाम पर जमीन करवाने में सफल रहीं। कुशा में भूमि बेटियों के नाम की गई तो समस्तीपुर में पैतृक भूमि का अधिग्रहण बहुओं के नाम रहा।

एक अध्ययन के मुताबिक जब भी महिलाओं के विकास की बात की जाती है, सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएँ महिलाओं के रोजगार उत्पत्ति पर जोर देती हैं पर कोई उनके भूमि, दुकान और मकान पर अधिकार की बात नहीं करता।

1980 के दशक में भारतीय महिला कल्याण संस्था द्वारा जब महिलाओं के भूमि और आवास के अधिकारों के लिये आवाज उठाई गई तब उन्हें राष्ट्रीय आन्दोलन से दरकिनार कर दिया गया, वहीं 2003 में महाराष्ट्र सरकार ने एक सरकारी प्रस्ताव पास किया जिसको आधार बनाकर पुणे की एक गैर सरकारी संस्था मासूम ने एक आन्दोलन चलाया जिसके तहत एक साल के भीतर महाराष्ट्र के पुरन्धर ताल्लुक के अस्सी गाँव में 95 प्रतिशत लोगों ने संयुक्त नाम (स्त्री-पुरुष) पर जमीन का रजिस्ट्रेशन किया। पर जैसे ही महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखण्ड, बिहार में जमीन का रजिस्ट्रेशन महिलाओं के नाम पर बढ़ा, तब अकेली महिलाओं द्वारा घर संचालित घरों, परित्यक्ता, तलाकशुदा और अलग रहने वाली महिलाओं को डायन कहकर उनके खिलाफ साजिश की गई, जो उसकी सम्पत्ति पर अपना स्वार्थ रखने वालों द्वारा रची गई थी। एक अध्ययन के मुताबिक पीड़ित महिलाओं को नौकरी, उनके बच्चों को स्कूल में प्रवेश आदि तो आसानी से मिल जाता है, पर रहने के लिये अच्छा आवास बड़ी मुश्किल से मिलता है।

मजलिस की ट्रस्टी नीरा जो खुद एक आर्किटेक्ट हैं, का मानना है कि आवास बनाने के मामले में हम महिलाओं से सम्बन्धित मुद्दों पर ध्यान नहीं देते हैं। हम यह नहीं सोचते कि क्या महिलाएँ स्थान का उपयोग गैर पारम्परिक तरीके या अन्य तरीके से करती हैं या करना पसन्द करती हैं। वे आगे कहती हैं, “क्या हम नीति बनाने वालों को महिलाओं से जुड़े विषयों पर संवेदनशील बना सकते हैं ताकि जब वे नीति बनाएँ तो उनकी बातों का भी ध्यान रखा जाये। महिलाओं के लिये घर सिर्फ घर नहीं होता यह रोजगार का स्थान भी हो सकता है। मिलने-जुलने का स्थान, बच्चों के खेलने और रहने का स्थान, सामाजिक अस्थिरता और यौन हिंसा से बचने की जगह भी घर या आवासीय परिसर ही होता है।”

भारत के शान्त इलाकों में 10 प्रतिशत महिलाएँ परिवार की मुखिया हैं तो वहीं अशान्त क्षेत्रों में 30 प्रतिशत महिलाएँ घर की मुखिया हैं। विश्व स्तर पर करीब-करीब एक तिहाई महिलाएँ घर की मुखिया हैं। पिछले बीस वर्षों में भारत में उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में कई महिलाओं ने आवेदन डालकर माँग की है कि बहुओं को ससुराल में और बेटी को अपने पिता या पैतृक घर में रहने का अधिकार दिया जाये।

हमें यह भी देखना है कि घर का मूल्य ऐसा हो कि महिलाएँ इसे खरीद सकें। राज्य सरकार को इस विषय पर ध्यान देना होगा। चूँकि आवास बनाने और वितरण में पुरुषों का वर्चस्व है, इस कारण आवास से जुड़े हर स्तर पर काम कर रहीं महिलाएँ चाहे वो इंजीनियर, आर्किटेक्ट, गृह साज-सज्जा से जुड़ी इंटीरियर डिजाइनर या महिला हाउस ब्रोकर हों, सभी महिलाओं को पुरुष मानसिकता के अधीन काम करना पड़ता है।

समाधान के कदम


अब सकारात्मक पक्ष देखें तो इस दिशा में केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग ने कुछ पहल की है। उनकी एक नीति के अनुसार अकेली महिला कर्मचारी को वे घर आवंटित करने में पहल करते हैं। आर्मी वेलफेयर हाउसिंग ऑर्गेनाइजेशन की नीति के अनुसार वे अपने हाउसिंग सोसाइटी में भारतीय सेना की युद्ध विधवाओं को घर खरीदने में प्राथमिकता प्रदान करते हैं।

प्रधानमंत्री ग्रामीण योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग जिनकी आय 3 लाख रुपए सालाना से कम है, वे इस योजना का लाभ उठा सकते हैं पर आवेदन परिवार की महिला के नाम से किया जाएगा।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लोन राशि में वृद्धि से मासिक किश्तों में भी काफी कमी आएगी। केन्द्र सरकार 6 लाख रुपए तक के लोन पर 6.5 प्रतिशत सब्सिडी के बजाय अब 4 प्रतिशत सब्सिडी प्रदान करेगी और 12 लाख रुपए तक के होम लोन पर 3 प्रतिशत सब्सिडी दे रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत होम लोन 20 वर्ष की अधिकतम अवधि के लिये लिया जा सकता है। सरकार ने इस योजना के अन्तर्गत दो नए मध्यम आय वर्ग के समूहों को भी शामिल किया है।

इस समय, होम लोन लगभग 9 प्रतिशत की ब्याज दरों पर बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कम्पनियों से उपलब्ध हैं। 4 प्रतिशत की ब्याज छूट के बाद, प्रभावशाली ब्याज दर 5 प्रतिशत हो जाती है जिससे किस्त (ईएमआई) में काफी कमी हो जाती हैं।

शहरों में युवा और अकेली कामकाजी लड़कियों और महिलाओं को निजी बिल्डर अपने पसन्दीदा क्लाइंट मान रहे हैं। ज्यादा सैलरी पर काम कर रहीं महिलाओं के पास निवेश के लिये पर्याप्त पैसे होते हैं। अकेली महिला चाहे जिस उम्र की हो, सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। वृद्ध महिला के लिये हॉस्पिटल और मेडिसिन की सुविधा ज्यादा जरूरी है। युवा महिलाओं के लिये फिटनेस, खेल-कूद, मनोरंजन और शॉपिंग की सुविधा मायने रखती हैं। अकेली माओं के बच्चों के लिये पार्क, स्कूल, हॉस्पिटल और अन्य सुविधा मायने रखते हैं।

अभी भी भारत में अन्य विकसित देशों के मुकाबले अकेली महिला के रिहायशी मुद्दे पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। इसके लिये केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, गैर सरकारी संस्थान, निजी संस्थानों और समाज को जागरूक होना पड़ेगा और मिल-जुल काम करना पड़ेगा। जहाँ यह बात हुई है परिवर्तन के नए आयाम सामने आये हैं।

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