टिहरी - बड़े बाँध से विनाश

Submitted by editorial on Tue, 10/23/2018 - 14:50
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Source
सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म, 2006

 

चीन का उदाहरण सबसे अधिक आनन्ददायक है गोबी का मरुस्थल अपने देश में फैल न जाए इसके लिये छः सौ अस्सी मील की वृक्ष पट्टी चीन के वन-रक्षकों ने निर्माण की और अपनी इतिहास-प्रसिद्ध दो हजार मील लम्बी चूना-पत्थर की दीवार के दोनों तरफ वृक्ष लगाकर उसका रूपान्तर वृक्ष-दीवार में कर दिखाने का पराक्रम किया है। वृक्ष विहीन पेकिंग में तो वृक्षों का रोपण एक ही रात में करके उसे वन-नगरी बना दिया।

वन-विनाश में से भूमि-क्षरण, भू-स्खलन, इनमें से कृत्रिम तालाब में रेत और मिट्टी भरकर उसका आयुष्य मर्यादित होना यही निश्चित है। जल-स्रोतों की अनियमितता वन-विनाश का और एक भयानक परिणाम है। इससे भी बाँध की आयु घटती है। प्राकृतिक उत्पात के भूकम्प के क्षेत्र होने से तालाब की और बाँध के क्षेत्र की असुरक्षा बढ़ी है। कृत्रिम तालाब के जल के गुण-धर्म बदल जाते है।

गंगा-जल का पुराण-प्रसिद्ध महात्म्य टिहरी के आगे के क्षेत्रों में ऋषिकेश-हरिद्वार और गंगा-सागर तक के सम्पूर्ण इलाके में समाप्त हो जाएगा। अच्छे गुण-धर्म तो गए ही और कुंठित जल में रोग जन्तु पनपकर अनेक संक्रमण-रोगों को जन्म देते हैं- यह और एक संकट। लक्ष्यावधि लोगों की पुरानी संस्कृति, भाषा, जीवन-पद्धति विस्थापनों के कारण तितर-बितर हो गई यह शायद सबसे बड़ा हादसा है बाँध का।

भूकम्प के कारण इटली के बाँध के तालाब में आस-पास के पहाड़ टूटकर गिर जाने से उछले पानी के प्रचंड प्रवाह में सैकड़ों लोग बह गए यह इतिहास ताजा है। उत्तरकाशी जिसमें 1991 में आए भूकम्पीय झटके से टिहरी बाँध के क्षेत्र में आई दरार को कहीं प्रसिद्धि नहीं दी गई। ऐसी अनेक प्रकार की विकृतियाँ निर्माण में होती रही हैं- बड़े बाँधों के सन्दर्भ में, इसलिये अमेरिका में बड़े बाँधों को पूर्ण विराम दिया गया। लोक-विरोध का वह परिणाम निकला। टिहरी बाँध का पुख्ता विरोध लोक-आन्दोलन के कारण हो चुका।

उपवास, रैली, विचार-वान, वैज्ञानिक सामान्य-जन सभी का बाँध विरोध - यह सब होने पर भी कोई परिणाम नहीं। योजना पर 360 फीट ऊँचाई के बदले बाँध कम ऊँचाई के बनाओ ऐसा विकल्प भी सुझाया गया। परन्तु बड़े बाँधों के लाभ अनेक उत्पादन शक्तियों को अधिक प्रमाण में मिलते है। उसका क्या होगा? टिहरी बाँध के सन्दर्भ में यह भी कहा जाता रहा है कि इसका इतिहास-भ्रष्टाचार का ही इतिहास है। निहित-स्वार्थ के लिये कितनी ही अकार्यक्षम योजनाएँ अकारण चलती रहती हैं। यह भी अनुभव है।

एक बड़े बाँध के बदले अनेक छोटे बाँध बनेंगे तो क्षेत्रीय-असन्तुलन टल सकता है, जमीन जंगल-प्राणी जगत, जल और विस्थापित इनकी दुर्दशा टलेगी-यह स्पष्ट है। किन्तु प्रचण्डता की चाह मात्र तथाकथित विकास के लिये रखते चलना यह कितना दुर्दैव खेल है। लाभ भी कम होने लगा, फिर भी विस्थापितों की समस्याएँ बनी ही रही हैं। विस्थापितों पर होने वाले अन्यायों को अन्याय नहीं माना जाता। देश के विकास के लिये सामान्य स्त्री-पुरुष-बालक-बूढ़े-इन सभी की सुख-शान्ति की बली बाँधों की वेदी पर दी जाती है। डूबे क्षेत्र के विस्थापितों का जीवन भी डूब जाता है।

इस देश में गाँधी जी का जीवन और कार्य हो चुका है, इसलिये यहाँ के लोक-आन्दोलन आतंक नहीं मचाते। वे विवेक से,शान्ति से चलाए जाते हैं अधिकतर। हिंसक आन्दोलनों की परिणति यादवी में ही हो जाती। लेकिन विवेक, शान्तिमय आन्दोलनों की अनय भूमिका का लोकतंत्र में अपमान ही होता आया है। इससे निर्माण हुई अशान्ति समाज का सन्तुलन बिगाड़ देती है।

टिहरी के पास प्रताप नगर के ऊँचाई वाले क्षेत्र में पीने के पानी की योजना 20-50 वर्षों से प्रस्तावित स्थिती में ही रही। आखिर इसे निरस्त कर दिया गया कुछ वर्ष पहले। क्यों किया निरस्त उसे? कहा गया कि इन कुछ ही गाँवों की पानी की योजना से बाँध के तालाब में पानी कम पड़ेगा! अन्याय का विरोध अन्दर-ही-अन्दर सुलगता रहेगा। तो उस क्षेत्र का विकास खारिज हो जाएगा। यही नतीजा निकलता है अशान्त लोक-मानस का।

इन बाँधों के समान ही वन-विनाश का और एक कारण भी महत्त्वपूर्ण है। ‘टूरिज्म’ के नाम से इस कारण को गौरवान्वित किया जाता है। देश-भर में जब श्रद्धा और पवित्र भावना के कारण यात्राओं का महात्म्य था तब एक, कहावत प्रचलित थी- ‘यात्रा में सहना होता है, कहना नहीं होता।’ इसके विपरीत ‘टूरिज्म’ का विकास व्यापार की दृष्टि से होता है, इसलिये सुख-सहूलियत की भरपूरता होने का प्रचार आवश्यक होता है।

गंगोत्री के परिसर में घूमते समय उत्तुंग बर्फीले शिखरों के, नीले आसमान के और गंगा के नृत्य के दर्शन विलोभनीय और महत्त्वपूर्ण बनने के बदले आवास-निवास की सुव्यवस्था, खाने-पीने की बहुलता, टूरिज्म के कारण महत्त्वपूर्ण बन जाती है। हेतु-परिवर्तन के कारण दृष्टि-परिवर्तन सहज घटित होता है। इससे अब पच्चीस-तीस वर्ष पहले की गंगोत्री-गोमुख के निकट की वृक्ष-सम्पदा और एकान्त साधना का क्षेत्र अब भीड़ का, आरामदायी निवास-स्थानों का, शहरीकरण का केन्द्र बन गया है।

अन्य सभी तीर्थ-क्षेत्रों की ऐसी ही अवस्था हो गई है यह बात भी सच है। लेकिन हिमालय के वन-विनाशक की कहानी अधिक ही करुण है। सर्वव्याप्ति की आन्तरिक साधना के लिये मौन-एकान्त साधना के लिये निमन्त्रण देने वाली हिमालय-भागीरथी-अलकनन्दा इत्यादि नदियों के पंच प्रयोगों का अद्भुत वातावरण वृक्ष-विनाश के कारण भू-क्षरण, भू-स्खलन और भीड़ भड़क्के के कारण रुक्ष लग रहा है। थके-माँदे वृद्ध के जैसा हिमालय दिखने लगा है। ‘स्थावराणां हिमालयः’ के दर्शन अब दुर्लभ हैं, क्योंकि अस्थिरता इस नगाधिराज्य को व्याप्त कर रही है।

इस पर भी उपाय अवश्य कर सकते हैं यह विश्वास चित्त में निर्माण करने वाला एक व्यक्तित्व अभी-अभी दुनिया में जी गया है। विश्व-भर में अपने वृक्ष-प्रेम के कारण प्रसिद्ध हुए रिचर्ड सेंट बावे बेकर का जीवन-चरित्र किसी को भी प्रेरणा दे सकता है। यह महा मानव दुनिया में कहीं भी वृक्ष-सम्पदा की हानि हो गई हो, रेतीला मीलों-मील फैला सहारा के जैसा प्रदेश हो या चीन की दीवार जैसा रुक्ष क्षेत्र हो, वहाँ-वहाँ दौड़कर जाता रहा, उपाय सुझाता रहा और हरे-भरे वृक्षों की सृष्टि निर्माण करता जाता था। दुनिया में एक सौ आठ स्थानों पर उनके द्वारा स्थापित की हुई ‘वृक्ष-मानव’ संस्था की शाखाएँ यह काम करती आई हैं।

‘चिपको’ आन्दोलन के आकर्षण के कारण यह सन्त भारत में भी दो बार आए। ‘चिपको’ को स्त्रियों का नेतृत्व प्राप्त है इस बात का उन्हें बड़ा कौतुक लगता था और देश में चर्चा चली विकास-योजनाओं का स्वरूप उन्हें दुःखद लगता रहा। कारण सृष्टि और लोक-जीवन एवं मानस का सन्तुलन ढहा देने वाला विकास सर्वोपरि इष्ट रह नहीं सकता यह उनका अनुभव था। पाँच-छः वर्ष पहले उनका शरीर शान्त हुआ। करीब नब्बे साल की उमर में। वृक्षों पर अमर्याद प्रेम करने वाले इस विभूति ने आत्मचरित्र लिखा है- ‘My Life My Trees’ (मेरा जीवन मेरे वृक्ष) और उन्होंने वृक्षों के लिये एक प्रार्थना लिखी है- प्रेअर फॅार दि ट्रीज’। उसका हिन्दी भावानुवाद यहाँ प्रस्तुत हैः

वृक्षों के लिये प्रार्थना

हे प्रभु, आपके इन वृक्षों के वरदान के लिये
हम आपके ऋणी हैं।
आपके वृक्षों के रूप में
आप हमारे अधिक निकट आते हैं।
इनके कारण हमें
सौन्दर्य, प्रज्ञा और प्रेम की प्राप्ति होती है।
श्वास लेने के लिये प्राणवायु,
प्यास बुझाने के लिये जल,
भूख के समय अन्न,
और सभी प्रकार का बल
इन्हीं की वजह से हमें मिलता रहता है।
हे प्रभु,आप हमारे लिये सहायक बन जाइए,
जिससे जीवन के चरणों पर
हम हममें जो सर्वोत्कृष्ट होगा वह सब-कुछ अर्पण कर देंगे।
और यह विश्व हमारे निवास के कारण
कुछ अधिक ही सुन्दर और सुयोग्य बना देंगे।
आप हमारे वृक्षारोपण को वृद्धिगत कीजिए,
और पृथ्वी पर आपका प्रेम का और प्रबोध का
साम्राज्य स्थापित कीजिए।
तथास्तु।
-रिचर्ड सेन्ट बार्बे बेकर (वृक्ष-मानव)

अभी ऊपर उल्लेखित किये अपने आत्मचरित्र में यह वृक्ष-मानव कहता हैः

‘अब जाकर कहीं अखिल दुनिया में वृक्ष-भावना का जन्म होता मैं देख रहा हूँ। चीन का उदाहरण सबसे अधिक आनन्ददायक है गोबी का मरुस्थल अपने देश में फैल न जाए इसके लिये छः सौ अस्सी मील की वृक्ष पट्टी चीन के वन-रक्षकों ने निर्माण की और अपनी इतिहास-प्रसिद्ध दो हजार मील लम्बी चूना-पत्थर की दीवार के दोनों तरफ वृक्ष लगाकर उसका रूपान्तर वृक्ष-दीवार में कर दिखाने का पराक्रम किया है। वृक्ष विहीन पेकिंग में तो वृक्षों का रोपण एक ही रात में करके उसे वन-नगरी बना दिया !’

इस वृक्ष सन्त ने वृक्ष-मानव ने विश्व-जीवन को अभय देने के लिये सर्वत्र वृक्ष-चेतना प्रसृत की। यह चेतना इस अपने खण्ड प्राय देश को भी जागृत कर सकेगी क्या! हिमालय में और सारे देश में जहाँ-जहाँ भू-क्षरण और भू-स्खलन के कारण दरिद्रता आई है, वहाँ-वहाँ रोपण और वर्धन करके मिश्रित वनों का साम्राज्य निर्माण करना आवश्यक है। यह पराक्रम नई पीढ़ी कर दिखाएगी तो वन-संस्कृति का नाम सार्थक होगा।

रिचर्ड सेन्ट बार्बे बेकर जी को अर्पण किये पर्यावरण विषयक-काव्य-ग्रन्थ में श्री हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय जी ने ‘वृक्ष’ पर कविता प्रसिद्ध की है। यह कविता बताती है कौन इस तरह का वृक्षारोपण करके वन-महोत्सव मनाएँगे। पूरे देश-भर के तरुण लड़के-लड़कियाँ यह पुरुषार्थ कर दिखाएँगे इस आशा से यहाँ इस कविता का हिन्दी तर्जुमा सादर पेश किया हैः

वृक्ष
जब कभी वृक्ष धरती पर गिरा दिया गया
तब तब प्रभु की काया दुभंग हो जाती है।
मानव की नजर से पार परे,बहुत दूर उसका रक्त गिरता है,
जिसके दर्शन उस दृष्टि को शायद ही होते हैं।
अरे! प्रभु के वृक्षों को धराशायी करने वाली कुल्हाड़ी के डंडे को
जन्म दिया जाता है, तो
वृक्षों को घोर वेदना देकर ही!
क्षमा कीजिए, हे वृक्षों! उनके क्रूर कर्म को क्षमा कीजिए,
जिन्होंने निर्दय बनकर आपके प्राण ले लिये
आपके प्राण बचाने ही होंगे,
और वे निश्चित ही बचाए जाएँगे।
उन्हीं से, जिनके हृदय करुणावान और सच्चे होंगे,
ऐसे मानवों के हाथों से।

-हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय

‘इकोलाॅजी’- ‘पर्यावरण शास्त्र’- मासिक के पूर्व-प्रमुख सम्पादक एडवर्ड गोल्डस्मिथ ने भी महान विश्वधर्मों के उदाहरण देकर उनका दिखाया मार्ग दि वे-फिर से स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया है। इसी नाम के अपने ग्रन्थ में ए. गोल्डस्मिथ कहते हैं कि इन प्राचीनों ने सुझाया एकमात्र मार्ग ही धरती का जीवन सुरक्षित कर सकता है प्रदूषण और हर दिन नष्ट होने वाली सैकड़ों जातियों की अनुपस्थिति के कारण और वृक्ष-विनाश से भी धरती का ‘मैग्नेटिक फील्ड’ बदल रहा है। आज की मानव-जाति की जीवन पद्धति ऐसे ही आगे चलती रहेगी तो निकट भविष्य में आबो-हवा पर क्या परिणाम होंगे कह नहीं सकते। अधिकतर तो किसी भी जीव-जन्तु के जीने के लायक वातावरण शेष नहीं बचेगा।

दुनिया भर में जहाँ कहीं भी रहने वाले आदिवासी प्राचीन काल से जिस वैश्विक-दर्शन के आधार से जीते आ रहै हैं उसे एडवर्ड गोल्डस्मिथ ‘पर्यावरणीय जीवन-दर्शन’ (इकोलॉजिकल वर्ल्ड्स हब) कहते हैं। इसी ‘दर्शन’ को स्वीकार करना-प्रकृति के साथ एकरूप होकर जीना-यही तारण का मार्ग उन्हें दिखता है। इसे समझने के लिये वे अनेक आदिवासी-बस्तियों में रहने गए। उनका जीवन उन्हीं जैसे रहकर प्रत्यक्ष जीते रहे और सीखते रहे।

आदिवासियों की जीवन-पद्धति के समान ही ऋषि-मुनियों की आश्रमीय जीवन-पद्धति थीः कम-से-कम आवश्यकताएँ, सहज, संयम, परिश्रम करके रोटी कमाना और वृक्षों के,पशु-पक्षियों के सान्निध्य में, धरती के साथ, आकाश के साथ निकट का नाता जोड़कर समाधान का, शान्ति का, जीवन जीना। वृक्ष-वनों के कारण मिट्टी की उर्वराशक्ति टिकती है, बढ़ती है, पानी और शुद्ध वायु का भंडार ही खुलता है। सभी के साथ जीने के कारण सर्वमय होना आसान होता है। सर्वव्याप्ति का यह आयाम ध्यान के साथ अधिक गहरा होता रहता है। यह जीवन का तरीका बैर-त्यागी प्रेम स्वरूप कैसा होता है, यह हमने यहाँ के निवेदन में देख लिया है। आदिवासियों के पास तत्व ज्ञान की परिभाषा नहीं होगी परन्तु प्रत्यक्ष जीवन में जीवन्त अध्यात्म होता है। यह गोल्डस्मिथ का अनुभव है।

‘चिपको’ के आकर्षण से ही एडवर्ड गोल्डस्मिथ भारत में अनेक बार आये। दिल्ली में रहकर गाँधी जी के जीवन-दर्शन का उन्होंने अध्ययन किया। जयप्रकाश जी के साथ चर्चा करके शान्तिमय लोक-आन्दोलन का स्वरूप समझ लिया।
 

 

सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम संख्या

अध्याय

1.

वायु, जल और भूमि प्रदूषण

2.

विकास की विकृत अवधारणा

3.

तृष्णा-त्याग, उन्नत जीवन की चाभी

4.

अमरत्व की आकांक्षा

5.

एकत्व ही अनेकत्व में अभिव्यक्त

6.

निष्ठापूर्वक निष्काम सेवा से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति

7.

एकात्मता की अनुभूति के लिये शिष्यत्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका

8.

सर्व-समावेश की निरहंकारी वृत्ति

9.

प्रकृति प्रेम से आत्मौपम्य का जीवन-दर्शन

10.

नई प्रकृति-प्रेमी तकनीक का विकास हो

11.

उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम

12.

अपना बलिदान देकर वृक्षों को बचाने वाले बिश्नोई

13.

प्रकृति विनाश के दुष्परिणाम और उसके उपाय

14.

मानव व प्रकृति का सामंजस्य यानी चिपको

15.

टिहरी - बड़े बाँध से विनाश (Title Change)

16.

विकास की दिशा डेथ-टेक्नोलॉजी से लाइफ टेक्नोलॉजी की तरफ हो

 

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