वैज्ञानिक फसलोत्पादन में मटका खाद की उपयोगिता एवं महत्व (Importance of Mutka Composed in Scientific Crop Production)

Submitted by Hindi on Sat, 06/25/2016 - 10:02
Source
अनुसंधान विज्ञान शोध पत्रिका, अक्टूबर, 2013

.भारत वर्ष एक कृषि प्रधान देश है। प्रथम हरित-क्रान्ति के पश्चात फसलों के उत्पादन में जो महत्त्वपूर्ण वृद्धि देखने को मिली है, इसमें प्रमाणीकृत बीजों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। अच्छी गुणवत्ता का बीज किसी भी फसलोत्पादन के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। खराब गुणवत्ता के बीज का प्रयोग करने के पश्चात उत्पादन के कारकों जैसे खाद, पानी, कीटनाशी रसायनों कृत्य क्रियायें आदि का कितना भी प्रयोग क्यों न किया जाए परंतु उत्पादन कम ही प्राप्त होता है। वर्तमान में वैज्ञानिक बीज उत्पादन में रासायनिक उर्वरक के अंधाधुन्ध प्रयोग एवं जैविक खादों को कम प्रयोग करने से हमारी मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण हो गई है। वैज्ञानिक प्रयोगों एवं अनुसंधानों से यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि हमारी मिट्टी में दिन-प्रतिदिन उर्वरा शक्ति का हरास हो रहा है, जिसका प्रमुख कारण अधिक एवं असंतुलित मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग है। मृदा के रासायनिक गुणों में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उनसे फसलों का उत्पादन कम हो रहा है। इसकी पूर्ति के लिये किसानों द्वारा फसलों में अधिक मात्रा में यूरिया का प्रयोग किया जा रहा है। खाद उत्पादन की बढ़ती हुई मांग, उत्पादन में होने वाली कमी, मृदा के रासायनिक गुणों में होने वाले परिवर्तन, हमें खाद उत्पादन में पीछे धकेल रहे हैं। वर्तमान समय में वैज्ञानिकों द्वारा परम्परागत खेती पर विशेष जोर दिया जा रहा है। साथ ही जैविक खादों के अधिक से अधिक प्रयोग की संस्तुति की जा रही है। इनमें मटका खाद एक सर्वोत्तम जैविक खाद एवं कीटनाशक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

मटका खाद क्या है?


कृषि में प्रयोग की जाने वाली यह खाद, गाय के मूत्र, गाय के ताजे गोबर, नीम की पत्तियों तथा गुड़ डालकर तैयार की जाती है। जिसमें बहुत से लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु स्वत: ही पैदा हो जाते हैं। एक 100 लीटर क्षमता की टंकी में 15 लीटर गाय का मूत्र, 15 लीटर पानी, 15 किग्रा. गाय का ताजा गोबर, 15 किग्रा. नीम की पिसी हुई पत्तियाँ तथा 2 किग्रा. गुड़ डालकर अच्छी तरह घोलते हैं, फिर उस घोल को मटकों में भर देते हैं तथा धूप में रख देते हैं, गर्मियों में कम से कम 7 दिन तथा सर्दियों में कम से कम 15 दिन रखने से मटकों के अंदर भरा तरल सड़कर खाद बन जाता है। इसमें बहुत से लाभदायक सूक्ष्म जीवाणु स्वत: ही पैदा हो जाते हैं।

औषधीय महत्व


गाय के मूत्र में समस्त सूक्ष्म तत्व पाये जाते हैं तथा नीम की पत्तियां कीटों के अंड तथा लार्वा बढ़ने नहीं देता, अप्रिय कीटों के विकास को रोकता है। यह प्रभावी कीटनाशक है इसलिये कई अन्य मृदा में रहने वाले जीवों को भी नष्ट करता है तथा कीटों को अंडे देने से भी रोकता है। इन्हीं सब गुणों के कारण नीम बहुत से कीटों पर अंकुश लगाता है, एफिड्स ब्राउन राइस जांट होपर, कटवार्म, कोलोराडो बीटल, मैक्सिकन बीज बीटल, डोर्जर लोक्स्ट लीफ मिनर, ग्रीन राइस लीफ होपर, पोटैटो जासिड़, फ्रूटफ्लाई डायमंड वैकमोथफ गुड़ सूक्ष्म जीवाणुओं का भोजन है तथा उन्हें बढ़ाता है। गाय का गोबर खाद का कार्य करता है। अत: मटका खाद का प्रयोग खाद के रूप में, कीट नियंत्रण के रूप में, व्याधि नियंत्रण के रूप में तथा हारमोन्स के रूप में किया जा सकता है। 60 लीटर खाद एक एकड़ फसल में प्रयोग की जाती है।

प्रयोग विधि


मटका खाद को निम्नलिखित रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
(अ) खाद्य के रूप में
(ब) कीट/व्याधि नियंत्रण के लिये
(स) खड़ी फसल के हारमोन्स के रूप में

(अ) खाद के रूप में


खाद के रूप में अंतिम जुताई से पहले एक एकड़ क्षेत्रफल के लिये 62 किग्रा. खाद में चार गुना लगभग 250 लीटर पानी मिलाकर कूंची या डिब्बे से छिड़क दें, तत्पश्चात 24 घण्टे उपरांत बुवाई की जा सकती है।

लाभ


खाद में उपस्थित नीम के कीटनाशी/मृदा जन्म रोग नाशी गुणों के कारण यह अंडे तथा लार्वा बढ़ने नहीं देता इन्हें नष्ट कर देता है। उदाहरणार्थ- कटवर्म मैक्सिकन बीज बीतल, माईट, कैबेज वर्म आदि।

(ब) कीट/व्याधि नियंत्रण के लिये


कीट अथवा व्याधि नियंत्रण के रूप में इसका प्रयोग कीट/व्याधि लगने से पूर्व किया जाना अत्यन्त आवश्यक है, एक एकड़ फसल पर प्रयोग हेतु 62 किग्रा. मटका खाद में 250 लीटर पानी मिलाकर मिश्रण को भली प्रकार से मिश्रित करके बारीक कपड़े से छानकर 25 से 50 ग्राम साबुन या पाउडर मिलाकर स्प्रे मशीन द्वारा पश्चात जो अपशिष्ट पदार्थ बचता है। उसे खड़ी फसल में छिड़क देना चाहिए।

लाभ


यह अपने औषिधीय गुणों के कारण फसल पर लगने वाले एवं कीटों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करता है। इसका प्रयोग प्रथम स्प्रे के बाद अगले 15 दिन से 20 दिन बाद पुन: प्रयोग करें तो अधिक लाभ प्राप्त होता है। उदाहरणार्थ - राइस प्लांट होर, ग्रीन राइस लीफ होपर, व्हाइट फ्लाई, मेडिटेरेनियन, फ्रूट फ्लाई, डायमंड बैकमोथ इत्यादि।

(स) खड़ी फसल पर हारमोन्स के रूप में


सामान्य परिस्थितियों में एक एकड़ फसल पर प्रयोग हेतु 62 किग्रा. खाद में 250 लीटर पानी मिलाकर बारीक कपड़े से छानकार 2 प्रतिशत यूरिया के घोल के साथ छिड़काव करने पर पत्तियों एवं पौधे के विकास में अत्यधिक लाभप्रद होता है।

लाभ


यदि मटका खाद्य के घोल में 2 प्रतिशत यूरिया घोल को मिलाकर प्रयोग करने पर पौधों में होने वाले झुलसा एवं आर्द्रपतन रोगों पर अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है। यदि इस मिश्रण को प्रथम प्रयोग के उपरांत 15 से 20 दिनों बाद पुन: प्रयोग करने पर झुलसा एवं आर्द्रपतन आदि रोगों का प्रभावी ढंग से नियंत्रण हो जाता है।

महत्व


मटका खाद वैज्ञानिक उत्पादन में एक फसलोत्पादन प्रभावी खाद, कीट नियंत्रक, रोग नियंत्रक एवं हारमोन्स के रूप में प्रयोग किये जाने वाली एक सम्पूर्ण औषधि है। अत: वैज्ञानिकों द्वारा मटका खाद की उपयोगिता तथा प्रयोग पर विशेष बल दिया जा रहा है। तथा साथ ही यह सबसे सस्ती एवं आसानी से तैयार किये जाने वाली खाद है। जिसमें किसनों को अधिक प्रशिक्षण एवं तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है एवं मृदा की घटती एवं असंतुलित उर्वरक क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है।

संदर्भ
1. चड्ढा, संजय; अश्लेशा, रामेश्वर; सैनी, जे. पी. तथा पॉल, वाई. एस. (2012) वेदिक केशीः सस्टेनेबल लाइवलीहु़ड ऑप्शन फॉर स्मॉल एण्ड मार्जिनल फॉर्मर्स, इंडियन ज. ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज, खण्ड 11, अंक 3, मु. पृ. 480-486।
2. एग्रोनिमस, इकोनॉमिक सर्वे ऑफ हिमाचल प्रदेश (डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक्स एण्ड स्टेटिस्टिक्स, हिमाचल प्रदेश सरकार, शिमला), वर्ष 2011।
3. चौधरी, पी. एस. (2005) वर्मीकल्चर एण्ड वर्मीकम्पोस्टिंग एज बायोटेक्नोलॉजी फॉर कंजर्वेशन ऑफ आर्गेनिक वेस्ट इन टू एनिमल प्रोटीनस एण्ड ऑर्गेनिक फर्टिलाइजर, एशियन ज. माइक्रोबायो., बायोटेक्नोला. इनवायरन. साइं. खण्ड 7, मु. पृ. 359-370।
4. नटराजन, के. (2002) पांचगाव्या-अ मैनुअल, अदर इंडिया प्रेस, मपूसा, गोआ, भारत, पृ. 33।
5. चड्ढा, संजय (2011) ऑर्गेनिक नर्सरी प्रोडक्शन ऑफ वेजीटेबल क्रॉप्स, डेवलपमेंट ऑफ ऑर्गेनिक एग्रीकल्चर, सीओए सीएसकेएचपीकेवी पालमपुर।

महीपत सिंह एवं प्रवीन कुमार सिंह, बीज प्रौद्योगिकी विभाग, कृषि विज्ञान संस्थान, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी (यूपी)-284128, भारत, maahiseeds@gmail.com

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