ये दुनिया सिर्फ हमारी नहीं, वन्यजीवों की भी है

Submitted by RuralWater on Sun, 03/04/2018 - 18:40

रहता वन में और हमारे,
संग-साथ भी रहता है।
यह गजराज तस्करों के,
जालिम-जुल्मों को सहता है।।

समझदार है, सीधा भी है,
काम हमारे आता है।
सरकस के कोड़े खाकर,
नूतन करतब दिखलाता है।।

मूक प्राणियों पर हमको तो,
तरस बहुत ही आता है।
इनकी देख दुर्दशा अपना,
सीना फटता जाता है।।

वन्य जीव जितने भी हैं,
सबका अस्तित्व बचाना है,
जंगल के जीवों के ऊपर,
दया हमें दिखलाना है।

वृक्ष अमूल्य धरोहर हैं,
इनकी रक्षा करना होगा।
जीवन जीने की खातिर,
वन को जीवित रखना होगा।।

तनिक-क्षणिक लालच को,
अपने मन से दूर भगाना है।
धरती का सौन्दर्य धरा पर,
हमको वापस लाना है।।


बाघों पर संकटरूपचंद्र शास्त्री मयंक की लिखी यह कविता वैसे तो बच्चों के लिये है। लेकिन, इसमें बेहद हल्के-फुल्के अन्दाज में वन्यजीवों को बचाने की जो गम्भीर बात कही गई है। वह काबिल-ए-तारीफ है।

आज वन्य जीवों के अस्तित्व पर जिस तरह खतरा मँडरा रहा है, उसमें इस तरह की कविताओं को जन-जन तक पहुँचाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

3 मार्च को हर साल विश्व वन्यजीव दिवस का पालन किया जाता है। इस तरह के दिवसों के पालन का मुख्य उद्देश्य इनको लेकर लोगों को जागरूक करना है।

विश्व वन्यजीव दिवस मनाने की परम्परा बहुत पुरानी नहीं है। साल 2014 से 3 मार्च का पालन विश्व वन्यजीव दिवस के रूप में किया जाता है।

बताया जाता है कि 20 दिसम्बर 2013 को यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली के 68वें सत्र में हर साल 3 मार्च को वन्यजीव दिवस के रूप में पालन करने का निर्णय लिया गया था।

इस साल वन्यजीव दिवस का थीम है बाघों का संरक्षण।

वन्यजीव का मतलब मौटे तौर पर उन जीवों से निकाला जाता है, जो वन में रहते हैं। लेकिन इसका इतना ही मायना नहीं है। वन्यजीव का व्यापक अर्थ है।

विकिपीडिया के अनुसार जंगली जीव हर उस वृक्ष, पौधे, जानवर और अन्य जीव को कहते हैं जिसे मानवों द्वारा पालतू न बनाया गया हो। जंगली जीव दुनिया के सभी परितंत्रों में पाये जाते हैं, जिनमें रेगिस्तान, वन, घासभूमि, मैदान, पर्वत और शहरी क्षेत्र सभी शामिल हैं।

कैम्ब्रिज की डिक्शनरी में वन्य जीव की परिभाषा है –

वे जीव व पेड़-पौधे जो स्वतंत्र मनुष्य के हस्तक्षेप के बिना यानी स्वतंत्र रूप से व प्राकृतिक हालातों में विकसित होते हैं, उन्हें वन्य जीव कहा जाता है।

मेरियम-वेबस्टर डिक्शनरी के अनुसार, वे सभी चीजें खासकर पशु, पक्षी व मछलियाँ जो न तो मानव और न ही पालतु हैं, वे वन्य जीव कहलाते हैं।

इन सभी परिभाषाओं से पता चलता है कि वन्यजीवों (वाइल्ड लाइफ) का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है, ठीक उसी तरह जिस तरह मानव का स्वतंत्र अस्तित्व है। यानी कि जिस तरह मनुष्य अपने तरीके से स्वाधीन होकर जीने का अधिकारी है, उसी तरह वन्यजीव भी बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के अपने क्षेत्र में अपनी शर्तों पर और अपने तरीके से जीने को आजाद हैं।

यह नियम प्रकृति ने बनाया है, कि मानव अपनी दुनिया में बाहर हस्तक्षेप स्वीकार न करे और वन्य-जीव भी अपनी दुनिया में बाहर हस्तक्षेप न होने दें। लेकिन, सवाल यह है कि क्या आज प्रकृति के इस नियम का पालन हो रहा है? क्या वन्यजीव आजादी से अपने क्षेत्रों में जी रहे हैं?

आज मनुष्य का हर क्षेत्र में हस्तक्षेप तेज हो गया है। वह अपने अधिकार क्षेत्र का हनन करते हुए वन्यजीवों के क्षेत्रों में प्रवेश कर रहा है और न केवल प्रवेश कर रहा है बल्कि वन्यजीवों के लिये मौजूद पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुँचा रहा है।

असल में ऐसा सोचने व करने के पीछे यही तर्क है कि मनुष्य के पास तर्क शक्ति है। निर्माण विध्वंस का हुनर है इसलिये वह श्रेष्ठ है और दुनिया के लिये उसकी उपयोगिता सबसे ज्यादा है। लेकिन गहराई से सोचा जाये, तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।

इस दुनिया की बेहतरी के लिये मनुष्य का होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी वन्यजीवों का होना भी है।

‘मदर टू गॉड : एन एक्स्ट्राऑर्डिनरी जर्नी इन टू द अनचार्टेड ट्रिव्यूटरीज ऑफ वेस्टर्न अमेजन’ के लेखक व प्रकृति प्रेमी पॉल रोसोली अपने एक लेख की शुरुआत ही कुछ ऐसे करते हैं, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य के अस्तित्व के लिये वन्यजीवों का होना अनिवार्य है।

वह लिखते हैं, ‘पशुओं व पेड़-पौधों के बिना हमारा अस्तित्व सम्भव नहीं है। ऑक्सीजन, साफ पानी व मिट्टी हमारे शुरुआत के टूल्स हैं जबकि भोजन तथा कपड़े वनस्पतियों व जीव-जन्तुओं से मिले। यहाँ तक कि हमें जो जीवाश्म ईंधन उपलब्ध है वह सदियों पहले के पारिस्थितिकी तंत्र का नतीजा है। लेकिन, हम यह स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि हमारा अस्तित्व वन्यजीवों पर निर्भर है।’

उन्होंने अपने लेख में बताया है कि किस तरह नदियाँ, सागर, पेड़-पौधे व जीव-जन्तु हमें जरूरी चीजें मुहैया करा रहे हैं। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि विज्ञान के तमाम खोज किस तरह वन्यजीवों से प्रेरणा लेकर की गई और कई तरह की कई जरूरी औषधियाँ वन्यजीवों की मदद से ही तैयार की गईं।

ट्रेन दुर्घटना में हाथी की मौतइतने फायदों के बावजूद आज वन्यजीव मुश्किल में हैं। लेख के अनुसार 1970 में इस धरती पर जितने वन्यजीव थे, अभी उसका महज 50 प्रतिशत हिस्सा बचा हुआ है।

ये तो बात हुई पूरी दुनिया के वन्यजीवों की, लेकिन भारत की तस्वीर भी इस मामले में दागदार ही है।

लिविंग प्लानेट रिपोर्ट 2016 के मुताबिक भारत के आधे से अधिक वन्य जीव विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गए हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत का एक चौथाई क्षेत्र रेगिस्तान बनने की राह पर है और वनों के कटाव के कारण एक तिहाई जमीन की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा।

भारत में आये दिन वन्यजीवों की हत्या कर तस्करी के मामले सामने आते रहते हैं। इसके अलावा सरकार की योजनाओं के चलते भी वन्यजीवों को नुकसान होता है। केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना इसका जीता-जागता उदाहरण है। इस प्रोजेक्ट के कारण मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व का 4000 हजार हेक्टेयर क्षेत्र डूब जाएगा। यही नहीं, इससे गिद्धों को भी विस्थापित होना पड़ेगा।

इण्डिया स्पेंड के एक लेख में कहा गया है कि पिछले 30 सालों में 23716 औद्योगिक परियोजना के चलते वृहत क्षेत्र के वनों को नष्ट कर दिया गया। लेख के अनुसार खनन, रक्षा परियोजना व हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के चलते करीब 14000 वर्ग किलोमीटर वनों को खत्म कर दिया गया। वहीं, 15000 वर्ग किलोमीटर वन अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए।

उक्त लेख में यह भी कहा गया है कि हर साल नॉन-फॉरेस्ट्री गतिविधियों के लिये 25000 हेक्टेयर वन क्षेत्र का इस्तेमाल किया जा रहा है।

लेख में आगे बताया गया है कि देश के पाँच राज्यों पंजाब, हरियाणा, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश व अरुणाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा वन क्षेत्रों को नष्ट किया गया है।

इन आँकड़ों से पता चल जाता है कि सरकार वन व वन्यजीवों को लेकर कितनी गम्भीर है।

दूसरी ओर, हाल ही में विश्व भर के 112 टाइगर रिजर्व क्षेत्र का सर्वेक्षण किया गया जिनमें भारत के टाइगर रिजर्व भी शामिल थे। सर्वेक्षण में पता चला कि 1 प्रतिशत संरक्षित क्षेत्र ही बाघों के रहने के अनुकूल हैं। सर्वेक्षण भारत के टाइगर रिजर्वों पर भी चिन्ता जाहिर की गई है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि वन्यजीवों के संरक्षण के लिये कोई कोशिश नहीं हुई। कोशिश तो हुई, लेकिन इसको लेकर गम्भीरता से काम नहीं किया गया है।

वन्यजीवों की सुरक्षा के लिये केन्द्र सरकार ने सन 1972 में वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट बनाया था। इस एक्ट में अपराध साबित होने पर अपराधियों पर 25 हजार रुपए जुर्माना और तीन साल की सजा का प्रावधान है। लेकिन, जहाँ हत्या व बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं, वहाँ वन्यजीव के प्रति अपराधों को कितनी गम्भीरता से लिया जाता है, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

इस तरह के अपराधों को गम्भीरता से नहीं लिये जाने के कारण ही हाल के वर्षों में वन्यजीवों के प्रति आपराधिक घटनाओं में इजाफा हुआ है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़े भी इसकी गवाही देते हैं।

हिरणएनसीआरबी की रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2015 की तुलना में वर्ष 2016 में वन्यजीवों पर अत्याचार के मामलों में इजाफा हुआ है। वर्ष 2015 में वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत 829 मामले दर्ज किये गए थे जो वर्ष 2016 में बढ़कर 852 पर पहुँच गए, लेकिन इन मामलों की त्वरित सुनवाई कर दोषियों को सजा दिलवाने की रफ्तार काफी धीमी है।

दूसरी तरफ, वन्यजीवों के क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप के साथ ही जलवायु परिवर्तन के कारण जंगलों में रहने वाले पशुओं को भोजन मिलने में कठिनाई हो रहा है जिससे स्थितियाँ और बिगड़ रही हैं।

इन दो कारणों से वन्यजीवों व मानव में टकराव हो रहा है। हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल के सुन्दरबन क्षेत्र में मछुआरों पर आदमखोर बाघ के हमले की घटनाओं में इजाफा हुआ है।

वर्ष 2016 में आई ‘इम्पैक्ट ऑफ सी लेवल राइज ऑन मैंग्रोव वेजिटेशन ऑफ सुन्दरबन टाइगर रिजर्व’ रिपोर्ट में बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण सुंदरी का वन घटेगा, जिससे रॉयल बंगाल टाइगर को भोजन मिलने में दिक्कत आएगी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बाघों को भोजन मिलने में दिक्कत होगी, तो वे रिहायशी इलाकों में प्रवेश करेंगे जिससे मानव-बाघ के बीच टकराव बढ़ेगा। जलवायु परिवर्तन के कारण बाघों के क्षेत्र डूब रहे हैं, जिस कारण भी बाघ गाँवों की तरफ बढ़ रहे हैं।

इन सभी पहलुओं को देखते हुए यह साफ हो जाता है कि वन्यजीव खतरे में हैं। उन्हें इन खतरों से उबारने के लिये सरकार से लेकर आम लोगों को आगे आना होगा। यही नहीं, लोगों को जागरूक करना होगा कि वन्यजीव इस दुनिया के लिये अनिवार्य उपादान हैं और मानव अस्तित्व के लिये उनका जीवित रहना आवश्यक है।

सरकार को ऐसा मॉडल तैयार करना होगा जिसमें वन्यजीव व जैवविविधता को किसी तरह का नुकसान पहुँचाए बिना विकास सम्भव हो सके।

ऐसा विकास भला किस काम का, जो अबोलों की एक आबाद दुनिया को उजाड़ कर दूसरी दुनिया बसाई जाये।


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