कावेरी युद्ध के मुहाने पर खड़ा देश

Submitted by RuralWater on Mon, 10/31/2016 - 10:00

तमिलनाडु को पीने के पानी के साथ सिंचाई के लिये भी पानी चाहिए हालांकि वह पहली चक्रीय फसल ले चुका है, लेकिन तमिलनाडु संसाधनों को पूरी तरह निचोड़ने में ही यकीन करता है। हाल ही में चेन्नई में आई अड्यार नदी की बाढ़ ने राज्य के पानी के प्रति खुंखार रवैए को उजागर किया था। कर्नाटक पानी दे नहीं सकता क्योंकि उसकी अपनी जरूरतों की पूर्ति नहीं हो पा रही। कावेरी अब छोटी पड़ने लगी है समाज की जरूरतों के आगे। पुदुचेरी और केरल को भी कावेरी में अपना हिस्सा चाहिए जो इस पर कभी विचार नहीं करते कि समुद्र के बैकवाटर को रोककर पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के फेर में उन्होंने कितने हजार हेक्टेयर भूमि को दलदली बना दिया है। इस देश में एक नहीं कई कावेरी हैं और हम कावेरी युद्ध के तय अपराधी हैं। नदी के पानी को लेकर हत्याओं का सिलसिला कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच ही नहीं हैं। महानदी को लेकर छत्तीसगढ़ और ओड़िशा के बीच हालात बिगड़ते जा रहे हैं और इन सबसे बढ़कर मध्य प्रदेश और गुजरात नर्मदा के पानी को लाल करने की तैयारी किये बैठे हैं, गनीमत तभी तक है जब दोनों राज्यों में एक ही पार्टी की सरकार है, दोनों ही सरकारें नर्मदा पर लगातार झूठे आँकड़े पेश कर रही हैं। सरकारी नीतियों के चलते तट पर रहने वाला समाज सूखा और दलदल झेलने को मजबूर है।

कावेरी पर बात इसलिये हो रही है कि विवाद पुराना है और प्रभावित राज्यों सहित केन्द्र और सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर असमंजस में हैं। केन्द्र विवाद सुलझाने का इच्छुक नहीं है और सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसलों की समीक्षा कर रहा है। मामला 15 या 12 हजार क्यूसेक पानी का नहीं है, वास्तव में ये विकल्पहीनता की स्थिती है जो टालते रहने वाले समाज के सामने अन्तिम तारीख की तरह आकर खड़ी हो गई है।

तमिलनाडु को पीने के पानी के साथ सिंचाई के लिये भी पानी चाहिए हालांकि वह पहली चक्रीय फसल ले चुका है, लेकिन तमिलनाडु संसाधनों को पूरी तरह निचोड़ने में ही यकीन करता है। हाल ही में चेन्नई में आई अड्यार नदी की बाढ़ ने राज्य के पानी के प्रति खुंखार रवैए को उजागर किया था। कर्नाटक पानी दे नहीं सकता क्योंकि उसकी अपनी जरूरतों की पूर्ति नहीं हो पा रही।

कावेरी अब छोटी पड़ने लगी है समाज की जरूरतों के आगे। पुदुचेरी और केरल को भी कावेरी में अपना हिस्सा चाहिए जो इस पर कभी विचार नहीं करते कि समुद्र के बैकवाटर को रोककर पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के फेर में उन्होंने कितने हजार हेक्टेयर भूमि को दलदली बना दिया है।

इसी तरह ओड़िशा सरकार ने छत्तीसगढ़ पर आरोप लगाया है कि वो महानदी में बाँधों का निर्माण कर रहा है जिससे उसके किसानों को पानी नहीं मिल पाएगा। सैकड़ों सालों से महानदी दोनों राज्यों के लोगों और मोगली के जंगलों को पाल पोस रही है। इसके किनारे मौजूद तालाब सूखा दिये गए और जरुरतों को पूरा करने के लिये लगातार उसे बाँधा जा रहा है।

आदि मानव की नदी, नर्मदा की स्थिति तो ज्वालामुखी के समान है, वह जब भी फूटेगा एक बड़ी आबादी में हाहाकार मच जाएगा। नर्मदा जल को गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान ने आपस में बाँट रखा है और नर्मदा पर निर्भरता बेशर्मी की हद तक बढ़ती जा रही है। मध्य प्रदेश और गुजरात में बने बाँधों के चलते हजारों हेक्टेयर उर्वरा भूमि दलदल में तब्दील हो गई है।

इनके अलावा और भी कई जगहें हैं जहाँ कावेरी जैसी हालात होते जा रहे हैं दिल्ली और हरियाणा के बीच यमुना दोहन को लेकर होड़ मची है। दोनों राज्यों ने तय कर रखा है कि कृष्ण की भूमि तक एक बूँद भी यमुना का पानी ना पहुँचे। पिछली बार हुए यमुना आन्दोलन में मथुरा-वृन्दावन के हजारों किसानों ने दिल्ली को जाम करके रख दिया था। यह आन्दोलन फिर उबल रहा है। दूसरी तरफ पंजाब ने सतलज-यमुना लिंक नहर बनाने से इनकार कर दिया और नहर के लिये ली गई किसानों की जमीनें वापस करने की तैयारी भी शुरू कर दी है।

इस नहर का नब्बे फीसद काम पूरा हो चुका है लेकिन अब पंजाब किसी भी कीमत पर हरियाणा को पानी देने को तैयार नहीं है। इस नहर की शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के समय हुई थी लेकिन पानी के बेतहाशा दोहन ने पंजाब को समझौते से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। पंजाब, हरियाणा को पानी देने को तैयार नहीं और हरियाणा दिल्ली को पानी नहीं देना चाहता, दिल्ली के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कि अपने सीवेज को रिसाइकल कर सके, दिल्ली का सीवेज यमुना के रूप में मथुरा वृंदावन और आगरा पहुँचता है जिससे इस क्षेत्र में भारी नाराजगी है।

ऐसा एक भी राज्य नहीं है जो पानी लेकर अपने पड़ोसी से तनाव ना झेल रहा हो। पानी को लेकर सिर फुटौव्वल से लेकर हत्याएँ तक हो रही हैं। घर में आग लग रही हैं और हम पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिये सिंधु जल समझौते को रद्द करने की धमकी दे रहे हैं।

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