देह के बाद अनुपम

Submitted by RuralWater on Fri, 03/03/2017 - 12:01


अनुपम मिश्रअनुपम मिश्रजब देह थी, तब अनुपम नहीं; अब देह नहीं, पर अनुपम हैं। आप इसे मेरा निकटदृष्टि दोष कहें या दूरदृष्टि दोष; जब तक अनुपम जी की देह थी, तब तक मैं उनमें अन्य कुछ अनुपम न देख सका, सिवाय नए मुहावरे गढ़ने वाली उनकी शब्दावली, गूढ़ से गूढ़ विषय को कहानी की तरह पेश करने की उनकी महारत और चीजों को सहेजकर सुरुचिपूर्ण ढंग से रखने की उनकी कला के।

डाक के लिफाफों से निकाली बेकार गाँधी टिकटों को एक साथ चिपकाकर कलाकृति का आकार देने की उनकी कला ने उनके जीते-जी ही मुझसे आकर्षित किया। दूसरों को असहज बना दे, ऐसे अति विनम्र अनुपम व्यवहार को भी मैंने उनकी देह में ही देखा।

कुर्सियाँ खाली हों, तो भी गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान के अपने कार्यक्रमों में हाथ बाँधे एक कोने खडे़ रहना; कुर्सी पर बैठे हों, तो आगन्तुक को देखते ही कुर्सी खाली कर देना। किसी के साथ खडे़-खड़े ही लम्बी बात कर लेना और फुरसत में हों, तो भी किसी के मुँह से बात निकलते ही उस पर लगाम लगा देना।

श्रद्धावश पर्यावरण पुस्तक भेंट करने आये एक प्रकाशक को अनुपम जी ने यह कहकर तुरन्त लौटाया कि उन्हें पुस्तक देने से उसका कोई मुनाफा नहीं होने वाला। अरवरी गाँव समाज के संवाद पर आधारित 'अरवरी संसद' किताब छपकर आई, तो उन्होंने कहा - ''इसे रंगीन छापने की क्या जरूरत थी?'' उन्होंने इसे पैसे की अनावश्यक बर्बादी माना। वहीं गँवई कार्यकर्ताओं की बाबत तरुण भारत संघ के राजेन्द्र भाई को यह भी कहते सुना - ''पैसा आये, तो कभी कार्यकर्ताओं को घूमाने ले जाओ। खूब बढ़िया खिलाओ-पिलाओ। दावत करो।'' कार्यकर्ताओं पर किये खर्च को वह पैसे की बर्बादी नहीं मानते थे।

देह के बाद सिखाते अनुपम


कभी यह सब उनकी स्पष्टवादिता लगता था, कभी साफ दृष्टि, कभी सहजता और कभी विनम्रता। पत्रकार भाई श्री अरविंद मोहन ने ठीक लिखा है, कभी-कभी सम्पर्क में आने वाले को यह उनका बनावटीपन भी लग सकता था।

'नमस्कार' और 'कैसे हो?' - जब तक देह थी, अनुपम जी ने इससे आगे मुझसे कभी नहीं बात की। न मालूम क्यों, उनके सामने मैंने भी अपने को हमेशा असहज ही पाया। अब देह नहीं, तो अनुपम जी से लगातार संवाद हो रहा है। हालांकि सहज होने में लगभग ढाई महीने लग गए, लेकिन उनके सम्मुख अब मैं लगातार सहज हो रहा हूँ। अब अनुपम जी मुझे लगातार सिखा रहे हैं, व्यवहार भी और भाषा भी। उनकी देह के जाने के बाद पुष्पांजलियों और श्रद्धांजलियों ने सिखाया। देह से पूर्व और पश्चात अनुपम जी के प्रति जगत का व्यवहार भी किसी पाठशाला से कम नहीं।

भाषा का गाँधी मार्ग


अनुपम जी को लेकर गाँधी मार्ग के प्रबन्धक श्री मनोज कुमार झा का ताजा संस्मरण आया है। बकौल अनुपम - ''हिंसा, भाषा की भी होती है। भाषा, भ्रष्ट भी होती है।......गांधी मार्ग की भाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें न बेवजह का जोश दिखे और न ही नाहक का रोष।'' इससे पता चला कि भाषा का भी अपना एक गाँधी मार्ग है। जाहिर है कि हिंसामुक्त-सदाचारी भाषा गाँधीवादी लेखन का प्राथमिक कसौटी है।

स्वयं को गाँधीवादी लेखक से पहले किसी को भी अपने लेखन को भाषा की इस कसौटी पर कसकर देखना चाहिए। मैं और मेरा लेखन, इस कसौटी पर एकदम खोटे सिक्के के माफिक हैं। सम्भवतः यही वजह रही कि अनुपम जी ने न कभी मेरी किसी रचना की आलोचना की, न ही सराहा और न ही किसी पत्र का कभी उत्तर दिया।

भाषा का मन्ना मार्ग


जब तक देह रही, अनुपम जी हिन्दी इण्डिया वाटर पोर्टल के खासम-खास तक सीमित रहे। देह जाने के बाद अब उनका लगातार विस्तार हो रहा है। हिन्दी इण्डिया वाटर पोर्टल पर और अनुपम साहित्य देखने को मिल रहा है। अनुपम जी की प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 17 है। अच्छा है कि वे एक-एक कर हिन्दी इण्डिया वाटर पोर्टल पर आ रही हैं। ‘मन्ना: वे गीत फरोश भी थे’ - साफ माथे का समाज से लिया यह लेख पढ़ रहा हूँ, तो कह सकता हूँ कि अनुपम जी ने अनुपम लेखन और व्यवहार के गुणसूत्र पिता भवानी भाई और उनकी कविताओं से ही पाये थे।

''जिस तरह तू बोलता है, उस तरह तू लिख
और उसके बाद मुझसे बड़ा तू दिख।''

''कलम अपनी साध,
और मन की बात बिल्कुल ठीक कह एकाध।''

''यह कि तेरी भर न हो, तो कह,
और बहते बने सादे ढंग से तो बह।''


मन्ना यानी पिता भवानीशंकर मिश्र को याद करते हुए अनुपम जी ने उक्त पंक्तियों का विशेष उल्लेख किया है। उक्त पंक्तियों के जरिए भाषा और व्यवहार तक के चुनाव का जो परामर्श भवानी भाई ने दिया, अब लगता है कि अनुपम जी ने उनका अक्षरशः पालन किया। अनुपम जी ने पर्यावरण जैसे वैज्ञानिक पर अपने व्याख्यान भी ऐसी शैली में दिये, मानों जैसे कोई कविता कह रहे हों; जैसे बह रहे हों। इसीलिये वह अपने साथ दूसरों को बहाने में सफल रहे।

लेखन का समाज मार्ग


बाजार से कागज खरीद कर लाने की बजाय, पीठ कोरे पन्नों पर लिखना; खूब अच्छी अंग्रेजी आते हुए भी उनके दस्तखत, खत-किताब सब कुछ बिना किसी नारेबाजी के, आन्दोलन के हिन्दी में करना ये सब के सब संस्कार अनुपम जी को मन्ना से ही मिले। अनुपम जी खुद लिखते हैं कि कविता छोटी है कि बड़ी है, टिकेगी या पिटेगी; मन्ना को इसमें बहुत फँसते हमने नहीं देखा। अनुपम जी का लिखा देखें, तो कह सकते हैं कि उनका लेखन भी टिकने या पिटने के चक्कर में कभी नहीं फँसा। उन्होंने जो लिखा, उसमें आइने की तरह समाज को आगे रखा। यदि मन्ना के गीत ग्राहक की मर्जी से बँधे नहीं थे, तो ग्राहक की मर्जी से बँधना तो अनुपम जी का भी स्वभाव नहीं था। कई वजाहत में शायद यह एक वजह थी कि अनुपम जी जो लिख पाये, वह दूसरों के लिये अनुपम हो गया।

''मूर्ति तो समाज में साहित्यकार की ही खड़ी होती है, आलोचक की नहीं।’''

अनुपम जी द्वारा भवानी भाई की किसी कविता का पेश यह भाव एक ऐसा निष्कर्ष है, जो पत्रकार और साहित्यकार के बीच के भेद और उनके लिखे के समाज पर प्रभाव का आकलन सामने रख देता है। इस आकलन को सही अथवा गलत मानने के लिये हम स्वतंत्र हैं और उसके आधार पर अपने कौशल और प्राथमिकता सामने रखकर यह तय करने के लिये भी कि हमें लेखन की किस विधा में अपनी कितनी ऊर्जा लगानी है।

राजरोग का विकास मार्ग


देह बिन अनुपम अब मुझे एक और भूमिका में दिखाई दे रहे हैं; एक दूरदृष्टा रणनीतिकार की भूमिका में। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी, तो केन-बेतवा नदी जोड़ बनने की सम्भावना पूरी मानी जा रही है। पानी कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि अब क्या करें? विकास के नाम पर समाज और प्रकृति विपरीत शासकीय पक्षधरता से क्षुब्ध कई नामी संगठन इस विकल्प पर भी बार-बार विचार करते दिखाई दे रहे हैं कि वे खुद एक राजनीतिक दल बनाएँ; ताकि देश की त्रिस्तरीय जनप्रतिनिधिसभाओं में ज्यादा-से-ज्यादा जगह घेरकर समाज व प्रकृति अनुकल कार्यों के अनुकूल नीति व निर्णय करा सकें।

अनुपम जी आगाह करते हैं - ''अच्छे लोग भी जब राज के करीब पहुँचते हैं, तो उन्हें विकास का रोग लग जाता है; भूमण्डलीकरण का रोग लग जाता है। उन्हें भी लगता है कि सारी नदियाँ जोड़ दें, सारे पहाड़ों को समतल कर दें, तो बुलडोजर चलाकर उनमें खेती कर लेंगे।...... इसका सबसे अच्छा उदाहरण रामकृष्ण हेगडे़ का है। कर्नाटक में 37 साल पहले बेड़धी नदी पर एक बाँध बनाया जा रहा था। किसानों को इस बाँध के बनने से उनकी खेती का चक्र नष्ट हो जाने की आशंका हुई। उन्होंने इसका विरोध किया। कर्नाटक के किसानों ने संगठन बनाकर सरकार से कहा कि उन्हें इस बाँध की जरूरत नहीं है। सम्पन्नतम खेती वे बिना बाँध के ही कर रहे हैं और इस बाँध के बनने से उनका सारा चक्र नष्ट हो जाएगा। रामकृष्ण हेगडे़, उस आन्दोलन के अगुवा बने। पाँच साल तक वह इस आन्दोलन के एकछत्र नेता रहे। बाद में वह राज्य के मुख्यमंत्री बने। बाँध बनने के बाद हेगडे़ खुद बेड़धी बाँध के पक्ष में हो गए। उन्हें भी राजरोग हो गया।''

राजरोग का चिकित्सा मार्ग


मैंने पूछा कि ऐसे में एक कार्यकर्ता की भूमिका क्या हो? अनुपम जी ने नदी जोड़ को राजरोगियों की खतरनाक रजामन्दी कहा। आवाज दी कि इस रजामन्दी के बीच हमारी आवाज दृढ़ता और संयम से उठनी चाहिए। जो बात कहनी है, वह दृढ़ता से कहनी पडे़गी। प्रेम से कहने के लिये हमें तरीका निकालना पडे़गा।

''देखो भाई, प्रकृति के खिलाफ हो रहे अक्षम्य अपराधों को न तो क्षमा किया जा सकता है और न ही इसकी कोई सजा भी दी जा सकती है। नदी जोड़ना, विकास की कड़ी में सबसे भयंकर दर्जे पर किया जाने वाला काम होगा। इसे बिना कटुता जितने अच्छे ढंग से समझ सकते हैं, समझना चाहिए। नहीं तो कहना चाहिए कि भाई अपने पैर पर तुम कुल्हाड़ी मारना चाहते हो, तो मारो; लेकिन यह निश्चित ही पैर-कुल्हाड़ी है। ऐसा कहने वालों के नाम एक शिलालेख में लिखकर दर्ज कर देना चाहिए। और कुछ विरोध नहीं हो सके, तो किसी बड़े पर्वत की चोटी पर यह शिलालेख लगा दें कि भैया आने वाले दो सौ सालों तक के लिये अमर रहेंगे ये नाम। इनका कुछ नहीं किया जा सका।''

अनुपम जी ने यह भी कहा - ''हमें अब सरकार का पक्ष समझने की कोई जरूरत नहीं है। उसे समझने लगे, तो ऐसी भूमिका हमें थका देगी। हम कोई पक्ष नहीं जानना चाहते। हम कहना चाहते हैं कि यह पक्षपात है देश के साथ, देश के भूगोल के साथ, इतिहास के साथ; इसे रोकें।''

नदी जोड़ पर सरकार का पक्ष समझने की भूमिका ने हमें अब सचमुच थका दिया है। लिखते, कहते, प्रेम की भाषा में प्रतिरोध करते हुए भी डेढ़ दशक बीत गया। अनुपम जी, अब क्या करें?

बकौल अनुपम, जब राज हाथ से जाता है, तो यह रोग अपने आप चला जाता है। हेगडे़ के पाला बदलने के बावजूद किसान आन्दोलन चलता रहा। हेगड़े का राज चला गया। राजरोग भी चला गया। आन्दोलन के कारण वह बाँध आज भी नहीं बन सका है। राजरोग से निपटने का आखिरी तरीका यही है।

अच्छे विचारों की हिमायत का सन्देश


भारतीय ज्ञानपीठ ने हाल ही में अनुपम जी के व्याख्यानों को प्रकाशित किया है। पुस्तक का शीर्षक है - 'अच्छे विचारों का अकाल'। व्याख्यानों के चयन और प्रस्तुति का दायित्व निभा राकी गर्ग ने बता दिया है कि अच्छे विचारों के हिमायती सदैव रहते हैं, देह से पूर्व भी, पश्चात भी। अकाल से भयंकर होता है, अकाल में अकेले पड़ जाना। अतः देह के बाद अनुपम मिश्र जी के इस सन्देश को कोई सुने, न सुने; यदि अच्छा लगे तो हम सुने; कहना शुरू करें; कहते रहें; कहने वालों का शिलालेख बनाते रहें; इससे अकाल में भी साझा बना रहेगा।

अकाल में भी अच्छे विचारों का अकाल नहीं पडे़गा, तो एक दिन ऐसा जरूर आएगा, जब ऐसे राजरोगियों का राज जाएगा। जाहिर है कि तब राजरोग खुद-ब-खुद चला जाएगा। किन्तु यह सब कहते-करते हम यह न भूलें कि कोई भी पतन, गड्ढा इतना गहरा नहीं होता, जिसमें गिरे हुए को स्नेह की उँगली से उठाया न जा सके। हालांकि व्यवहार की इस सीढ़ी को लगाने की सामर्थ्य सहज सम्भव नहीं, लेकिन किसी भी गाँधी स्वभाव की बुनियादी शर्त तो आखिरकार यही है।

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

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स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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