सुखद जीवन की प्रेरणा

Submitted by UrbanWater on Mon, 07/24/2017 - 12:54
Source
एन एट मिलियन ईयर ओल्ड मिस्टीरियस डेट विथ मानसून, 2016

मानसून - सूखद जीवन की प्रेरणामानसून - सूखद जीवन की प्रेरणासाहित्य ने प्राचीन काल से ही मानसून के जीवनदायी स्वरूप को अभिव्यक्त किया है।

एक बहुश्रुत वैदिक श्लोक है,-

‘‘वर्षा समय पर हों, अन्न की बोझ से धरती झुक जाये,
यह देश सभी कष्टों से मुक्त हो, विद्वान निर्भय हो, विपन्न सम्पन्न हो जाएँ और सभी सौ वर्ष जीवित रहें,
निसन्तानों को बच्चे हों और बच्चों वाले को पोते-पोतियाँ हों,
ईश्वर! सभी को कुशल-क्षेम का जीवन प्रदान करे।’’


यह वर्षा को धरती की उर्वरता-शक्ति के रूप में सम्बोधित करता है, साथ ही मानव कल्याण और दीर्घजीवन और पीढ़ियों के स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करने वाला बताया है। मानसून को भारत की प्राण अर्थात जीवनशक्ति माना जाता है। कला-इतिहासकार वज्राचार्य के अनुसार, मानसून के साथ यह सम्बन्ध तीनों धर्मों -हिन्दु, बौद्ध और जैन में मूर्तिकला, साहित्य, चित्रकला, संगीत और नृत्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है। इन धर्मों के अनगिनत स्मारकों में सम्पूर्ण पुरुष देह और कामुकता से भरपूर स्त्रियाँ, तन्दुरुस्त जानवर और आभूषणों से लदे पक्षियों के चित्र उकेरे हुए हैं।

बरहुत, अमरावती, साँची, अजंता और एलोरा के मूर्तिशिल्प या भित्तिचित्रों के साथ-साथ विभिन्न कालखण्ड के असंख्य मन्दिरों में अप्सराओं, दिव्य प्राणियों और देवताओं की कलाकृतियाँ प्रचूर अलंकरण के साथ अंकित हैं। बुद्ध और सभी जैन तीर्थंकरों की आकृतियाँ भी जो सिर मुंडाए भिक्षुक जीवन व्यतित करते थे-को भी कभी कृषकाय नहीं दिखाया गया है। इसी तरह मूर्तिशिल्पों या चित्रों में वर्णित जानवर-वास्तविक या पौराणिक-तन्दुरुस्त होते थे। अनेक मूर्तिशिल्प जानवरों के साथ-साथ फलों और फूलों की प्रचूरता को दिखाते हैं। भारतीय स्मारकों में विरले ही कृषकाय जानवर या मनुष्य की आकृति मिलती है। वज्राचार्य के अनुसार, इन कलाकृतियों से अप्रत्यक्ष रूप से मानसून की उदारता प्रकट होती है।

बेरहुत, अमरावती और साँची के स्मारकों में सुसज्जित मेंढक (रिगवेद और अथर्ववेद के कुछ श्लोकों में मेंढक का उल्लेख आया है।) की आकृति, मकर (पौराणिक मगरमच्छ), मयूर, हंस और गाय के साथ-साथ पुरुष और स्त्री जो सम्पन्न दिखते हैं, मानसून के प्रति दृढ़ समर्पण के द्योतक हैं। प्राचीन साहित्य और मूर्तिशिल्प में अश्वथ (पीपल) वट, (बरगद) वृक्षों का अनेक सन्दर्भ मिलता है जिन्हें वर्षा का प्रतीक माना जाता है। संगीत और नृत्य का भरपूर हिस्सा रोमांस और वर्षा के विषय में है। वर्षा और प्रेम को समर्पित एक प्रसिद्ध प्राचीन रचना है गीत गोविंद जिसे जयदेव में 12वीं शताब्दी के आखिरी हिस्से में लिखा था।

इस गीत ने न केवल ओडीसी, कथक, भरतनाट्यम नृत्य शैलियों को प्रेरित किया है बल्कि समूचे भारत के लोक नृत्यों को भी प्रभावित किया है। राधा और कृष्ण का आसमान के नीचे या बादलों से भरे बिजली चमकते आकाश के नीचे, ने समूचे भारत के हजारों नर्तकों को अनुप्राणित करता है। रागमाला और रासमाला में संग्रहित कुछ सर्वाधिक प्रसिद्ध मिनिएचर पेंटिंग्स वर्षा के विषय में हैं। मानसून के बिना खेतों में अन्न की फसलें नहीं बोई जा सकतीं। आधुनिक भारत में वेधशालाएँ ग्रीष्म के समाप्त होते ही मानसून के आगमन के बारे में पूर्वानुमान करने में लग जाती हैं और मानसून फसलों के लिये पर्याप्त होगा या नहीं, इसकी अटकलें अखबारों में प्रमुखता से प्रकाशित होने लगती हैं।

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