समन्वित कृषि प्रणाली से होंगे किसान समृद्ध

Submitted by RuralWater on Tue, 02/27/2018 - 18:40
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कुरुक्षेत्र, फरवरी 2018

समन्वित कृषि प्रणाली के बारे में समग्र और अभिनव दृष्टिकोण से किसानों, खासतौर पर छोटे काश्तकारों को अपने घर और बाजार के लिये कई तरह की वस्तुओं के उत्पादन का पर्याप्त अवसर तो प्राप्त होता ही है, कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ाने, परिवार के लिये सन्तुलित पौष्टिक आहार जुटाने, पूरे साल आमदनी व रोजगार का इन्तजाम करने तथा मौसम और बाजार सम्बन्धी जोखिम कम करने में भी मदद मिलती है। इससे खेती में काम आने वाली वस्तुओं के लिये किसानों की बाजार पर निर्भरता भी कम होती है। भारत में खाद्य और पौष्टिक आहार सुरक्षा सुनिश्चित करने की कुंजी छोटे किसानों (2 हेक्टेयर से कम) के पास है और ग्रामीण क्षेत्रों में खुशहाली लाने के लिये खेती की टिकाऊ प्रणालियों के साथ उन्हें सही दिशा में विकसित होने का मौका देना भी अत्यन्त आवश्यक है।

कम आमदनी इन फार्मों की विशेषता है (अखिल भारतीय-स्तर पर जुलाई 2012 से जून 2014 तक कृषक परिवार की औसत मासिक आमदनी 6426 रुपए होने का अनुमान लगाया गया था।) इससे खेती के विकास पर पुनर्निवेश कम हो रहा है, मौसमी रोजगार घटा है, बीज, उर्वरक, कीटनाशक जैसी बाजार से खरीदी जाने वाली वस्तुओं, भारी मशीनरी जैसे मैकेनिकल हार्वेस्टर्स आदि पर निर्भरता बढ़ी है और किसानों को कम भंडारण क्षमता और बाजार मूल्यों की वजह से अपनी उपज को औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर होना पड़ता है।

इस तरह के फार्म मौसम सम्बन्धी विषमताओं जैसे बाढ़, सूखा और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से भी काफी कमजोर होते हैं और बड़े आकार के फार्मों के मुकाबले इन छोटे फार्मों में काम करना ज्यादा जोखिम भरा है। किसानों की इन श्रेणियों की स्थिति में सुधार के लिये यह जरूरी है कि उनकी आमदनी बढ़ाई जाये और इस तरह के भूमिहीन, सीमान्त और छोटे किसान परिवारों के लिये रोजगार के अवसरों में भी बढ़ोत्तरी हो। पशुपालन, बागवानी (सब्जी/फल/औषधीय और सुगन्धित पादप), मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पाद, मछली पालन जैसे द्वितीयक और तृतीयक उद्यमों के माध्यम से यह कार्य किया जा सकता है।

समन्वित कृषि प्रणालीगत दृष्टिकोण से तात्पर्य


“यह दृष्टिकोण न्यूनतम प्रतिस्पर्धा और अधिकतम पूरकता के सिद्धान्त पर आधारित है और इसमें कृषि-अर्थशास्त्रीय प्रबन्धन के परिष्कृत नियमों का उपयोग करते हुए किसानों की आमदनी, पारिवारिक पोषण के स्तर और पारिस्थितिकीय प्रणाली सम्बन्धी सेवाओं का टिकाऊ और पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल विकास करने का लक्ष्य रखा जाता है।” जैव विविधता का संरक्षण, फसल/खेती की प्रणाली में विविधता और अधिकतम मात्रा में पुनर्चक्रण कृषि के प्रणालीगत दृष्टिकोण का आधार है।

समन्वित कृषि प्रणाली के अनिवार्य घटक


मिट्टी की जीवन्तता को बनाए रखना और प्राकृतिक संसाधनों के कारगर प्रबन्धन से खेत को टिकाऊ आधार प्रदान करना। इसके अन्तर्गत जो बातें शामिल हैं, वे इस प्रकार हैं :

1. मिट्टी को उपजाऊ बनाना : रसायनों का आवश्यकतानुसार उपयोग, फसली अपशिष्ट का पलवार के रूप में उपयोग करना, जैविक और जैव उर्वरकों का उपयोग करना, फसलों को अदला-बदली करके बोना और उनमें विविधता, जमीन की जरूरत से ज्यादा जुताई न करना और मिट्टी को हरित आवरण यानी जैव पलवार से ढँककर रखना।

2. तापमान का प्रबन्धन : जमीन को आच्छादित यानी ढँककर रखना, पेड़-पौधे और बाग लगाना और तटबन्धों पर झाड़ियाँ उगाना।

3. मिट्टी और वर्षाजल का संरक्षण : रिसाव टैंक बनाना, ढलान वाली भूमि में कंटूर बाँध बनाना और सीढ़ीदार खेत बनाकर खेती करना, खेतों में तालाबों का निर्माण, बाँध की मेड़ों पर कम ऊँचाई वाले झाड़ीदार पौधे लगाना।

3. सौर ऊर्जा का उपयोग : विभिन्न प्रकार की फसल प्रणालियों और अन्य पेड़-पौधे उगाकर पूरे साल जमीन को हरा-भरा बनाए रखना।

4. कृषि आधान में आत्मनिर्भरता : अपने लिये बीजों का अधिक-से-अधिक उत्पादन करना, अपने खेतों के लिये खुद कम्पोस्ट खाद बनाना, वर्मी कम्पोस्ट, वर्मीवॉश, तरल खाद और वनस्पतियों का रस बनाना।

5. विभिन्न जैव रूपों का संरक्षण : विभिन्न प्रकार के जैव-रूपों के लिये पर्यावास का विकास, स्वीकृत रसायनों का कम-से-कम उपयोग और पर्याप्त विविधता का निर्माण।

6. मवेशियों के साथ तालमेल : मवेशी कृषि प्रबन्धन के महत्त्वपूर्ण घटक हैं और उनके न सिर्फ कई तरह के उत्पाद मिलते हैं बल्कि वे जमीन को उपजाऊ बनाने के लिये पर्याप्त मात्रा में गोबर और मूत्र भी उपलब्ध कराते हैं।

7. फिर से इस्तेमाल की जा सकने वाली ऊर्जा का उपयोग : सौर ऊर्जा, बायोगैस और पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल यंत्रों और उपकरणों का उपयोग।

8. पुनर्चक्रण : खेती से प्राप्त होने वाले अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण कर अन्य कार्यों में इस्तेमाल करना।

9. परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना : परिवार की भोजन, चारे, आहार, रेशे, ईंधन और उर्वरक जैसी बुनियादी जरूरतों को खेत-खलिहानों से ही टिकाऊ आधार पर अधिकतम सीमा तक पूरा करने के लिये विभिन्न घटकों में समन्वय और सृजन।

10. सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पूरे साल आमदनी : बिक्री को ध्यान में रखकर पर्याप्त उत्पादन करना और कृषि से सम्बन्धित मधुमक्खी पालन, मशरूम की खेती, खेत-खलिहान में ही प्रसंस्करण व मूल्य संवर्धन, दर्जीगिरी, कालीन बनाना आदि गतिविधियाँ संचालित करके परिवार के लिये पूरे साल आमदनी का इन्तजाम करना ताकि परिवार की सामाजिक जरूरतें जैसे, शिक्षा, स्वास्थ्य और विभिन्न सामाजिक गतिविधियाँ सम्पन्न हो सकें।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने समन्वित कृषि प्रणाली को स्वाभाविक और उद्देश्यपूर्ण तरीके से समन्वित प्रणाली बताया है। स्वाभाविक रूप से समन्वित प्रणालियाँ वे हैं जिनका उपयोग किसान ऐसी जगह करते हैं जहाँ प्रणालियों के घटकों/उद्यमों के बीच अक्सर कोई सम्बन्ध नहीं होता। इस तरह की सोद्देश्य समन्वित प्रणालियों से कई उद्देश्य पूरे किये जाते हैं। उत्पादन बढ़ाने, मुनाफा कमाने, पुनर्चक्रण से लागत में कमी लाने, पारिवारिक आहार की आवश्यकता पूरी करने, निरन्तरता बनाए रखने, पारिस्थितिकीय सुरक्षा, रोजगार के अवसर पैदा करने, आर्थिक दक्षता बढ़ाने और सामाजिक समानता लाने के लिये इनका उपयोग किया जाता है।

कृषि प्रणाली के बारे में समग्र और अभिनव दृष्टिकोण


कृषि प्रणालियों में दो दृष्टिकोण -समग्र और अभिनव अपनाए जाते हैं। समग्र दृष्टिकोण में सहभागितापूर्ण ग्रामीण मूल्यांकन और अन्य तकनीकों का उपयोग करते हुए बाधाओं की पहचान की जाती है और उन्हें दूर करने के प्रयास किये जाते हैं। इसमें उत्पादकता व आमदनी में सुधार, लागत घटाने और पर्यावरण सम्बन्धी लाभ प्राप्त करने के लिये कृषि प्रणाली के मौजूदा घटकों के प्रति ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाता है। अभिनव दृष्टिकोण के तहत मौजूदा घटकों में विविधता लाने, प्रणाली के साथ-साथ वर्तमान प्रणाली में समग्र सुधार किया जाता है। इसके लिये प्रणाली में नए घटकों/उद्यमों/मॉड्यूल को लिया जाता है।

इसमें विविधता लाने का उद्देश्य आमदनी में टिकाऊ बढ़ोत्तरी के वैकल्पिक तरीके उपलब्ध कराना है ताकि लाभप्रदता बढ़ने के साथ-साथ प्रणाली से अधिक उत्पादन प्राप्त हो। खेती करने वाले परिवारों में वांछित बदलाव लाने के लिये फसल प्रणाली में विविधता लाने (किसानों के संसाधनों, उनकी सोच, तत्परता, बाजार और प्रणाली के अन्य घटकों के कुशलतम उपयोग) के साथ-साथ पशुपालन में विविधता (स्थानीय जरूरतों के अनुसार कम लागत वाला पशुपालन जैसे मुर्गी, बत्तख, सूअर और बकरी पालने), उत्पादों में विविधीकरण (उत्पाद और प्रक्रिया दोनों में भौतिक बदलाव) और क्षमता निर्माण को लागू करने सम्बन्धी ऐसे बदलाव (कृषक परिवारों को कृषि प्रणालियों, फसल कटाई के बाद मूल्य संवर्धन आदि के बारे में प्रशिक्षण) लाये जा सकते हैं, जिनकी अपेक्षा की गई है।

कृषि प्रणाली में विविधता लाने की आवश्यकता


छोटी काश्तों में समय और स्थान के अनुसार विस्तार करना सम्भव है। इसके लिये उपयुक्त कृषि प्रणाली घटकों को अपनाकर स्थान और समय की आवश्यकता को सीमित किया जा सकता है जिससे ग्रामीण आबादी के लिये खाद्य और पौष्टिक आहार के विविध विकल्प सुनिश्चित करने के साथ-साथ बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव, मौसम की विषमता, बाजार से प्राप्त होने वाले घटकों में निर्भरता कम करने, समय-समय पर आमदनी जुटाने और किसानों को रोजगार उपलब्ध कराने में भी मदद मिल सकती है।

विभिन्न जोंस में सीमान्त किसान परिवारों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस तरह के दो घटकों वाले परिवारों की जोत के औसत आकार और परिवार के आकार में समानता पाई गई है (दो घटकों वाले परिवार में 0.82 हेक्टेयर जमीन और 5 सदस्य और दो से अधिक घटकों वाले परिवार के लिये 0.84 हेक्टेयर जमीन तथा 5 सदस्य)। यानी दो से अधिक घटकों वाले परिवारों के लिये आमदनी का औसत-स्तर काफी ज्यादा (1.61 लाख रुपए) है जिसके घटक हैं (फसल + डेयरी + बकरी; फसल + डेयरी + बकरी + मुर्गी; फसल + डेयरी + बकरी + मुर्गी + मछली आदि) जबकि दो घटकों वाले परिवारों के लिये यह केवल 0.57 लाख रुपए है जिसमें केवल फसल, केवल डेयरी, फसल + डेयरी, फसल + बकरी आदि है। एक और दो घटकों वाले 59 प्रतिशत सीमान्त परिवारों की प्रति व्यक्ति आमदनी बढ़ाने के लिये उनकी कृषि प्रणालियों यानी केवल फसल, केवल डेयरी फसल + डेयरी, फसल + सुअर, फसल + पोल्ट्री, फसल + मछली पालन, फसल + बागवानी, फसल + बकरी, डेयरी + बकरी में विविधता लाने की बड़ी आवश्यकता है।

समन्वित कृषि प्रणाली दृष्टिकोण के कई फायदे


उत्पादकता में सुधारकृषि प्रणाली में फसल और इससे सम्बन्धित उद्यमों में सघनता से उपज और आर्थिक/इकाई समय का इजाफा होता है। भारत में किये गए कई अध्ययनों से पता चला है कि समन्वित कृषि दृष्टिकोण अपनाने से छोटे और सीमान्त किसानों की आजीविका में महत्त्वपूर्ण सुधार हुआ है। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में कराए गए अध्ययनों से पता चला कि खेती के साथ मछलीपालन + मुर्गीपालन और पशुपालन करने से केवल फसल उगाने के मुकाबले कहीं अधिक उत्पादकता देखी गई। केवल मवेशियों से ही 25 टन खाद मिली, हर गाय से प्रत्येक ब्यांत 5250 लीटर दूध मिला, हर मुर्गी ने 150 अंडे दिये और मछली के तालाब के लिये खाद भी उपलब्ध कराई जिससे प्रणाली की उत्पादकता में और इजाफा हुआ। हालांकि 0.036 हेक्टेयर के तालाब से साल में केवल 60 किग्रा मछली मिली लेकिन इससे परिवार की प्रोटीन की आवश्यकता को पूरा करने में बड़ी मदद मिली।

आमदनी में इजाफा समन्वित कृषि प्रणाली खेतों के स्तर पर अपशिष्ट पदार्थों का परिष्कार करके उसे दूसरे घटक को बिना किसी लागत या बहुत कम लागत पर उपलब्ध कराने का समग्र अवसर प्रदान करती है। इस तरह एक उद्यम से दूसरे उद्यम के स्तर पर उत्पादन लागत में कमी लाने में मदद मिलती है। इससे निवेश किये गए प्रत्येक रुपए से काफी अधिक मुनाफा मिलता है। अपशिष्ट पदार्थों के पुनर्चक्रण से आधानों के लिये बाजार पर निर्भरता कम होती है। केरल की परिस्थितियों में 0.2 हेक्टेयर जमीन के लिये तैयार किये गए मॉडल में फसल प्रणाली (80 प्रतिशत जमीन) + डेयरी (1 गाय + 1 भैंस) + बत्तख (150) + मछली पालन (20 प्रतिशत क्षेत्र) + वर्मी कम्पोस्ट (एक प्रतिशत क्षेत्र) से 0.60 लाख रुपए की शुद्ध प्राप्ति हुई।

कृषि के साथ रोजगार के अवसर


खेती के साथ अन्य गतिविधियों को अपनाने से मजदूरी की माँग उत्पन्न होती है जिससे पूरे साल परिवार के सदस्यों को काम मिलता है और उन्हें खाली नहीं बैठे रहना पड़ता। खेती के साथ-साथ मछली पालन, मुर्गीपालन और पशुपालन जैसी गतिविधियों को अपनाकर सालाना 221 श्रमदिवसों का रोजगार प्रति हेक्टेयर उपलब्ध हो जाता है जबकि केवल खेती करने से 58 श्रम दिवसों का ही रोजगार साल के दौरान एक हेक्टेयर जमीन से मिल पाता है। वर्तमान कृषि प्रणाली में विविधता लाकर अगर मुर्गीपलन और मछली पालन को भी अपना लिया जाये तो दोनों में सालाना 15-15 श्रम दिवसों के बराबर रोजगार जुटाया जा सकता है। पुष्प उत्पादन, मधुमक्खी पालन और प्रसंस्करण से भी परिवार को अतिरिक्त रोजगार प्राप्त होता है।

भोजन और पौष्टिक आहार की घरेलू आवश्यकता पूरा करना तथा बाजार पर निर्भरता घटाना


मौजूदा औसत मासिक खपत का खर्च प्रति परिवार 5108 रुपए (0.01 हेक्टेयर से कम) से 6457 रुपए (1.01-0.01 हेक्टेयर से कम) है।

प्रत्येक कृषक परिवार को छह बातों में आत्मनिर्भर होना चाहिए जिनमें शामिल हैं- खाद्यान्न, चारा, आहार, ईंधन, रेशा और उर्वरक। विविधतापूर्ण कृषि प्रणाली में फसल + मवेशी + मछली पालन + बागवानी + मेड़ पर वृक्षारोपण शामिल रहते हैं। इनमें भारतीय चिकित्सा अनुसन्धान परिषद के मानदण्डों के अनुसार पौष्टिक आहार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये खेतों से ही पर्याप्त मात्रा में अनाज, दलहनों, तिलहनों, सब्जियों, फलों, दूध और मछली का उत्पादन होता है। इसके अलावा, इस तरह के मॉडल मवेशियों के लिये पूरे साल पर्याप्त मात्रा में हरे चारे की उपलब्धता भी सुनिश्चित करते हैं ताकि उनका स्वास्थ्य भी अच्छा रहे। विभिन्न वस्तुओं के खेतों में ही उत्पादन से बाजार पर निर्भरता तो कम होती ही है, पौष्टिक आहार की जरूरत पूरा करने में भी मदद मिलती है जिससे परिवार को अतिरिक्त बचत होती है।

पुनर्चक्रण के जरिए जमीन की उर्वरता में सुधार


अपशिष्ट पदार्थों का पुनर्चक्रण कृषि प्रणालियों का अभिन्न अंग है। यह खेती से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों के टिकाऊ निपटान का सबसे उपयोगी तरीका है। इसे अपनाकर कृषि आधानों की दक्षता बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। इससे पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम के साथ-साथ बहुत से माइक्रोन्यूट्रिएंट्स भी खेतों में ही पुनर्चक्रण के माध्यम से उत्पन्न किये जा सकते हैं।

संसाधनों का विविध उपयोग


कृषि प्रणाली की उत्पादकता और लाभप्रदता बढ़ाने के लिये भूमि और जल जैसे संसाधनों का विविधतापूर्ण उपयोग बेहद जरूरी है। विभिन्न उपयोगों की दृष्टि से पानी सबसे अच्छा उदाहरण है जिसे घरों में (नहाने-धोने) से लेकर खेतों में सिंचाई, डेयरी, पोल्ट्री, बत्तख पालन और मछली पालन जैसी विभिन्न गतिविधियों में कई तरह से इस्तेमाल किया जाता है। छोटे और मझोले आकार के जलाशयों के पानी को आस-पास के इलाकों में कई तरह से काम में लाया जा सकता है जिससे छोटे काश्तकारों की आमदनी बढ़ाने, उनके पौष्टिक आहार के स्तर में सुधार और रोजगार के अवसर बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

छोटे और सीमान्त कृषकों के खेती के अपशिष्ट पदार्थों के फिर से इस्तेमाल की व्यवस्था करने से उर्वरकों का उपयोग कम करने में भी मदद मिलेगी जिसका सकारात्मक असर पड़ेगा। उदाहरण के लिये अंडे देने वाली एक खाकी कैम्बेल बत्तख से 60 किलोग्राम से अधिक खाद मिलती है। उसकी बीट में कार्बन, नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे जमीन के लिये आवश्यक पोषक तत्व होते हैं जो जलीय परिवेश में मछलियों के प्राकृतिक आहार को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, इन बत्तखों को खिलाया जाने वाला 10 से 20 प्रतिशत दाना (रोजाना 23 से 30 ग्राम) सामान्य परिस्थितियों में बेकार चला जाता है। कृषि प्रणाली अपनाने पर बत्तखों के बाड़े की सफाई से निकला अपशिष्ट मछलियों के काम आ जाता है जिसमें दाना मौजूद रहता है।

जोखिमों में कमी


समन्वित कृषि प्रणाली दृष्टिकोण अपनाने से खेती के जोखिमों को कम करने, खासतौर पर बाजार में मंदी और प्राकृतिक आपदाओं से उत्पन्न खतरों से बचाव में भी मदद मिलती है। एक ही बार में कई घटकों के होने से एक या दो फसलों के खराब हो जाने का परिवार की आर्थिक स्थिति पर कोई खास असर नहीं पड़ता। इसके अलावा, इससे मौसम सम्बन्धी जोखिमों से भी बचाव होता है। उदाहरण के लिये अक्टूबर 2013 में फेलिन नाम के भीषण चक्रवाती तूफान ने उड़ीसा में तबाही मचाई। इससे भारी वर्षा हुई और तूफानी हवाएँ चलीं। तटवर्ती जिले केंद्रापाड़ा पर भी इसका असर पड़ा।

आमतौर पर इस जिले में अक्टूबर महीने में 183.7 मिमी वर्षा होती है, मगर केवल 13 अक्टूबर 2013 को 95.67 मिमी पानी बरसा। इसके बाद 25 अक्टूबर 2013 को फिर से 163.67 मिमी और 27 अक्टूबर, 2013 को 51.44 मिमी वर्षा हुई। निचले इलाकों में धान की खड़ी फसल तबाह हो गई। समन्वित कृषि प्रणाली दृष्टिकोण अपनाने वाले परिवारों यानी जो खेती के साथ दूसरी गतिविधियों जैसे पशुपालन, पटसन उत्पादन और मछली पालन भी करते थे, उन्हें 8 से 28 प्रतिशत तक का नुकसान हुआ जबकि जो परिवार पूरी तरह खेती पर निर्भर थे, उनका सब कुछ तबाह हो गया।

उत्पादन प्रणाली पर आधारित आईएफएस दृष्टिकोण


जैविक खेती से सम्बन्धित समन्वित कृषि प्रणाली और नेटवर्क परियोजना के अन्तर्गत अनुसन्धान कार्यक्रमों में ऑन-स्टेशन और ऑन-फॉर्म आधारित समन्वित कृषि प्रणाली दृष्टिकोण अपनाया जाता है। विभिन्न राज्यों के ऑन-स्टेशन (अनुसन्धान फार्म) और ऑन-फॉर्म (किसान की भागीदारी वाले) मॉडलों से पता चलता है कि आईएफएस दृष्टिकोण अपनाकर सीमान्त और छोटे किसान परिवारों के लिये टिकाऊ आजीविका की व्यवस्था करके अधिकार सम्पन्न बनाया जा सकता है।

पौष्टिक आहार और पूरे साल आमदनी के लिये पारिवारिक खेती मॉडल


दक्षिणी बिहार में गंगा मैदान के मध्य कछारी क्षेत्र में पाँच सदस्यों वाले परिवार के लिये एक हेक्टेयर जमीन पर आधारित मॉडल तैयार किया गया। यह विविधतापूर्ण फसल प्रणाली पर आधारित खेती (0.78 हेक्टेयर) + बागवानी (0.14 हेक्टेयर) + डेयरी (2 गाय) + बकरी (11) + मछली (0.1 हेक्टेयर) + बत्तख (25) + मेड़ों पर पेड़ (225 बबूल और 50 मोरिंगा पेड़ों) पर आधारित था। इससे परिवार को प्रति हेक्टेयर 13,160 रुपए (सितम्बर) से लेकर 51,950 रुपए (अप्रैल) मासिक की आमदनी हुई (चित्र-1) इसमें विविधतापूर्ण फसल प्रणाली (चावल, गेहूँ, मूँग यानी अनाज + दलहन); चावल, मक्का, आलू, लोबिया (चारा); चावल, सरसों, मक्का (अनाज) + लोबिया (चारा), सोरगम + राइसबीन - बरसीम/जौ-मक्का+लोबिया (चारा) और मौसमी सब्जियाँ (बैंगन, टमाटर, गोभी, बंदगोभी, मटर, भिंडी, लैटिस) को 0.78 हेक्टेयर में उगाकर परिवार की अनाज, दलहन, तिलहन, फल (अमरूद और पपीता), सब्जियों और मवेशियों की हरे तथा सूखे चारे की सालाना आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है।

यह मॉडल दूध, अंडे और मछली की वार्षिक आवश्यकता यानी 550 लीटर दूध, 900 अंडे और 120 किग्रा मछली की आवश्यकता पूरा करने के लिये भी पर्याप्त है। परिवार और घरेलू मवेशियों की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ इस मॉडल से बाजार में बेचने के लिये 4810 किग्रा अनाज, 986 किग्रा सब्जियाँ और 35 किग्रा फल; 4243 लीटर दूध, 950 अंडे और 124 किग्रा मछली का उत्पादन किया जा सकता है और पूरे साल पारिवारिक आमदनी का इन्तजाम किया जा सकता है। इस मॉडल में परिवार के लिये 4 टन प्रति वर्ष जलावन भी पैदा की जा सकती है। इसके अलावा इससे 4 टन समृद्ध वर्मी कम्पोस्ट और 2.3 टन खाद बनाकर जमीन की उर्वराशक्ति को सुधारा जा सकता है। इस तरह साल में कुल 3.14 लाख रुपए की प्राप्ति हुई जो इस क्षेत्र में प्रचलित फसल+डेयरी वाले वर्तमान मॉडल की प्राप्ति से 3.2 गुना अधिक है।

जनजातीय इलाकों में उत्पादकता और आजीविका में सुधार के लिये जैविक खेती प्रणाली


कुछ खास इलाकों, खासतौर पर कम मात्रा में पौष्टिक आहार लेने वाले जनजातीय इलाकों में जैविक खेती को बढ़ावा देने से जमीन और फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ लोगों की आजीविका के अवसरों को बढ़ाने में बड़ी मदद मिल सकती है। उमियाम में फसलों की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये जैविक खेती की नेटवर्क परियोजना (एनपीओएफ) के तहत 0.43 हेक्टेयर के जैविक खेती प्रणाली मॉडल का विकास किया गया है। इसमें चावल और मक्का जैसे अनाज, सोयाबीन, मसूर और मटर जैसी दलहन और तिलहनों और फ्रांस बीन, टमाटर, गाजर, भिंडी, बैंगन, पत्तागोभी, आलू, ब्रोकली, फूलगोभी, मिर्च, धनिया के साथ-साथ असमिया नींबू और पपीते जैसी सब्जियों, फलों और चारे को शामिल किया गया है। इसके अलावा डेयरी (1 गाय + 1 बछड़ा) और डेढ़ मीटर गहराई वाले 0.04 हेक्टेयर के खेती के तालाब को भी इसमें शामिल किया गया है जिसका उपयोग सिंचाई और मछलीपालन के लिये किया जाता है।

भूमि विन्यास-आधारित कृषि प्रणालियाँ


अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में ऊँचाई और गर्त वाले इलाकों पर आधारित प्रणाली को ब्रॉड बैंड एवं फरो (नाली और क्यारी) के नाम से भी पुकारा जाता है। ये तटवर्ती इलाकों में समुद्र का जलस्तर बढ़ने से पानी में डूब जाने की आशंका वाले खेतों में चावल की खेती पर आधारित प्रणाली है। यह धान की फसल के साथ ही खेतों में सब्जियाँ उगाने, मछली पालने और चारा उगाने की तकनीक है। इसमें खेतों में क्यारियाँ और नालियाँ बना ली जाती हैं।

बरसात के मौसम में पानी के भराव वाली गहराई वाली नालियों में धान उगाया जाता है जबकि पानी की सतह से उठी हुई क्यारियों में मौसमी सब्जियाँ और चारा उगाया जाता है। लम्बे समय तक टिके रहने, आसानी से अपनाए जा सकने और जमीन के कुशल उपयोग जैसी अपनी विशेषताओं के कारण इस तकनीक की कई खूबियाँ हैं खासतौर पर तटवर्ती इलाकों में। इस तरह की प्रणाली में कई चीजों के उत्पादन की सम्भावना रहती है। इस तरह के मॉडल पश्चिम बंगाल में भी आजमाए गए हैं और सफल पाये गए हैं।

किसानों की भागीदारी पर आधारित सुधार और शोधन


सीमान्त परिवारों की आमदनी बढ़ाने के लिये कृषि प्रणालियों के बारे में अभिनव दृष्टिकोण से संकेत मिलता है कि अगर मौजूदा प्रणाली में भेड़-बकरी तथा मुर्गियों आदि को शामिल कर दिया जाये तो इससे आमदनी और रोजगार में बढ़ोत्तरी हो जाती है। अतिरिक्त आय और रोजगार सृजन से सीमान्त किसानों की आजीविका के स्तर को बढ़ाने में मदद मिलती है।

प्रणालियों का तुलनात्मक कार्य निष्पादन


अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में एकल फसल का प्रणालियों के साथ तुलनात्मक कार्य निष्पादन चित्र-2 में दिया गया है जिससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि समन्वित कृषि प्रणाली और जमीन में बदलाव पर आधारित उपाय (ब्रॉड बेड और फरो प्रणाली) शुद्ध प्राप्ति और बी:सी अनुपात की दृष्टि से कहीं बेहतर हैं।

आगे की राह


मौजूदा कृषि प्रणालियों में फसलों व उनके तौर-तरीकों में विविधता, पशुधन घटकों में सुधार, बागवानी, किचन गार्डनिंग, प्राथमिक और द्वितीयक प्रसंस्करण और मेंड़ों पर वृक्षारोपण करना ऐसे जरूरी उपाय शामिल हैं जिनसे भारत के छोटी काश्त वाले किसानों की खेती से होने वाली आय को सुधारा जा सकता है। इससे किसान परिवारों की सन्तुलित आहार, उनके भोजन में पौष्टिक तत्वों तथा पानी के पुनर्चक्रण को पूरा करने के साथ-साथ परिवार के लिये कृषि कार्यों में रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।

वर्तमान कृषि प्रणालियों में विविधता से इसके फायदों का स्पष्ट पता चलता है। ऐसा देखा गया है कि प्रणालीगत सुधारों से उत्पादकता और लाभप्रदता में दो गुना वृद्धि होती है। इतना ही नहीं, इससे संसाधनों की 40 से 50 प्रतिशत तक बचत की जा सकती है और किसानों के लिये साल भर आमदनी सुनिश्चित की जा सकती है। विज्ञान पर आधारित उच्चीकृत समन्वित कृषि प्रणाली अपनाने के लिये निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं :

1. बाजारोन्मुख विविधीकरण, आजीविका बढ़ाने और इसके लिये वैकल्पिक फसल उगाने, बेहतर किस्म के मवेशी पालने और प्राथमिक कच्चे माल के मूल्य संवर्धन पर विशेष रूप से जोर दिया जाना चाहिए।

2. फसल, बागवानी, पशुधन और मत्स्य पालन कार्यक्रमों के समन्वय पर आधारित राष्ट्रीय समन्वित कृषि प्रणाली शुरू की जानी चाहिए ताकि समन्वित कृषि प्रणाली दृष्टिकोण को बढ़ावा मिले।

3. समन्वित कृषि प्रणाली की अवधारणा का खेती की प्रणालियों के परिप्रेक्ष्य में अग्रिम-स्तर पर प्रदर्शन करने से किसान परिवारों की स्थिति में समग्र रूप से सुधार होगा।

4. मृदा स्वास्थ्य कार्ड से कृषि और कृषि प्रणाली स्वास्थ्य कार्ड के स्तर पर जाने की आवश्यकता है ताकि मिट्टी, पौधे, पशुधन और पारिवारिक-स्तर पर मनुष्यों पर ध्यान केन्द्रित किया जा सके।

5. सम्बद्ध पक्षों (किसानों और विस्तार कार्यकर्ताओं) की क्षमता, खासतौर पर उनके कौशल के विकास की आवश्यकता है जिसमें भौतिक और टेक्नोलॉजी का भी योगदान रहना चाहिए।

6. फसल और चारे वाली फसलों की अदला-बदली करके बुआई : इसके अन्तर्गत फसलों, चारे और उच्च मूल्य वाली फसलें, जैसे सब्जियाँ, फलदार वृक्ष, औषधीय व सुगन्धित पौधों वाली फसलें और फलों के बाग शामिल हैं।

7. किसानों की पसन्द के अनुसार स्थान विशेष के लिये खास मवेशी पालना, खासतौर पर बकरी, भेड़, सुअर जैसे छोटे पशु पाले जाने चाहिए और इसमें टेक्नोलॉजी की मदद भी ली जानी चाहिए।

8. उत्पादों में विविधता लाकर (प्रक्रिया और उत्पादों में भौतिक परिवर्तन की दृष्टि से) किसानों की आमदनी/मासिक आय में सुधार किया जाना चाहिए।

9. मौजूदा प्रणाली के तहत ऐसी गतिविधियों को भी अपनाया जाना चाहिए जिसमें कम जमीन की आवश्यकता हो, जैसे मशरूम की खेती, मधुमक्खी पालन आदि।

लेखक परिचय


एन. रविशंकर, ए. एस. पंवार
(श्री रविशंकर भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के भारतीय कृषि प्रणाली अनुसन्धान संस्थान, मोदीपुरम, मेरठ में प्रधान वैज्ञानिक और कार्यक्रम सुविधा प्रदाता हैं; श्री पंवार संस्थान के निदेशक हैं।)

ईमेल : n.ravisankar@icar.gov.in
ईमेल : director.iifsr@icar.gov.in


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