सब आकाश पर निर्भर

Submitted by UrbanWater on Mon, 07/24/2017 - 15:40
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एन एट मिलियन ईयर ओल्ड मिस्टीरियस डेट विथ मानसून, 2016

मौसम का पूर्वानुमान करने में प्राचीन काल से बादलों का उपयोग होता रहा है। इस पद्धति में शोधकर्ताओं की दिलचस्पी फिर से जगी है।

मानसून - सब आकाश पर निर्भरमानसून - सब आकाश पर निर्भरआदित्यात जयति वृष्टि (सूर्य वर्षा को जन्म देता है), यह पंक्ति बृहदसंहिता की है जिसकी रचना छठी शताब्दी के खगोलशास्त्री व गणितज्ञ वराहमिहिर ने उज्जैन में की थी। यह पंक्ति बादलों की सृष्टि और वर्षा के बारे में गहरी समझ को प्रकट करती है।

बादल हमेशा से मौसम के प्रमुख सूचक रहे हैं। उपग्रहों द्वारा धरती के मानचित्रण के बहुत पहले प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध सूचनाओं और स्थानीय ज्ञान के आधार पर मौसम पूर्वानुमान किये जाते थे। इसे प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त उदाहरण मौजूद हैं। उपनिषद जिनकी रचना 700 ई.पू. से 300 ई.पू. के बीच हुई, में मेघों की रचना के बारे में विमर्श है। 10/11वीं शताब्दी में सौराष्ट्र क्षेत्र के विद्वान भादली ने दस मौसम विज्ञानी सूचकों के बारे में गीतों की रचना की जिसमें वर्षा के ‘अलौकिक आरम्भ’, बादल, हवाएँ, बिजली चकमना, आकाश के रंग, गड़गडाहट, वज्रपात, ओस, बर्फ, इन्द्रधनुष और सूर्य व चंद्र के चारों ओर स्वर्ण-वर्तुल इत्यादि के वर्णन हैं।

मौसम पूर्वानुमान की परम्परागत पद्धति जो मौसम विज्ञान, जीव विज्ञान और खगोलशास्त्रीय सूचकों पर आधारित होती थी, ने एक बार फिर जलवायु वैज्ञानिकों, प्रोफेसरों और कृषि विज्ञानियों का ध्यान आकर्षित किया है। और इन सूचकों के बारे में साहित्य लिखे जा रहे हैं। उदाहरण के लिये इण्डियन जर्नल आॅफ ट्रेडिशनल नाॅलेज में 2011 में प्रकाशित एक आलेख में वर्षा के 25 जैव-सूचकों की सूची दी गई है।

अमलतास (कासिया फिस्टूला) के पेड़ में फूल निकलना मानसून के आगमन के ठीक 45 दिन पहले होता है। चिड़ियों का असामान्य चहकना और बालू में लोटपोट करना वर्षा के आगमन के तुरन्त पहले होता है और दलदली इलाके में देशी मेंढकों की टर्र-टर्र करना और अपने अंडों को छिपाना वर्षा के तुरन्त पहले के लक्षण है जिन्हें इस आलेख में दिया गया है।

जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एवं कृषि विस्तार विभाग के अध्यक्ष पुरुषोत्तम रणछोड़भाई कनानी कहते हैं कि राज्य के 50 से 60 प्रतिशत किसान अभी भी मौसम पूर्वानुमान की परम्परागत पद्धति खासकर भादली-कथन पर निर्भर करते हैं। 1994 से जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय एक वार्षिक सेमीनार का आयोजन कर रहा है जिसमें राज्य के किसान एकत्र होते हैं और आँकड़ों एवं परम्परागत पद्धति के आधार पर आगामी वर्ष की वर्षा के पूर्वानुमानों को आपस में साझा करते हैं। उन्होंने कहा कि हम उन किसानों को पुरस्कार देते हैं जिनका पूर्वानुमान 60 से 80 प्रतिशत सही साबित होता है।

मूल सूचक


वर्षा के परम्परागत सूचक के रूप में बादल सर्वाधिक लोकप्रिय सूचक हैं। सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट फाॅर ड्राईलैंड एग्रीकल्चर (सीआरआईडीए ) द्वारा 2008 में प्रकाशित पुस्तक ‘आन्ध्र प्रदेश में देशज वर्षा पूर्वानुमान’ में वर्षा के 14 भौतिक और जैववैज्ञानिक सूचकों का दस्तावेजीकरण किया गया है। उनमें बादल पहला है और पाया गया कि राज्य के 16.7 प्रतिशत किसान वर्षा का पूर्वानुमान करने में बादलों का उपयोग करते हैं।

इसी तरह आनंद कृषि विश्वविद्यालय, गुजरात द्वारा 2009 में तैयार आलेख में शोधकर्ताओं ने वर्षा के 16 लक्षणों -बरसाती बादल, सूर्योदय के 15-20 मिनट पहले पूरब में आसमान की रक्तिम लालिमा, सूर्यास्त के 15-20 मिनट बाद आसमान का रक्ताभ लालिमा, आँधी, हवा का रुख, गरजते बादल, बिजली चमकना, झोंके के साथ वर्षा, वर्षा के चिन्ह, इन्द्रधनुष, चीटियों का अंडे ले जाना, पतंगों का उड़ना, चंद्रमा के चारों ओर प्रभामण्डल, सूर्य के चारों ओर प्रभामण्डल, गर्म और उमस भरा माहौल और कुहरा -का छह महीने तक जाँच किया जिससे उनके सही होने के बारे में भरोसा किया जा सके।

बरसाती बादल (कम ऊँचाई पर स्थित, भूरा या काले बादल) 44 दिनों में 34 दिन वर्षा लाने वाले साबित हुए। जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के बायोटेक्नोलाॅजी विभाग के अध्यक्ष बी ए गोलाकिया ने 1996 में दूसरे परस्पर सम्बन्ध के बारे में सलाह दी। उनके अनुसार दिन में कौए के रंग के बादल दिखना और रात में आसमान का साफ रहना सूखाड़ के वर्ष के लक्षण हैं।

खगोलशास्त्रीय मूल


बादलों का सहारा लेकर मौसम पूर्वानुमान करने के सूत्र पंचांगों में मिल सकते हैं, इस हिन्दू खगोलशास्त्रीय तिथिपत्र का उपयोग हजारों वर्षों से होता रहा है। पंचांग बादलों के आकार और रुझान के आधार पर पूर्वानुमान करते हैं कि उस वर्ष किस प्रकार की वर्षा होगी। बादलों के प्रकार का निर्धारण एक सूत्र के आधार पर किया जाता है। नीलम और वरुणम (पंचांगों में उल्लेखित नौ प्रकार के बादलों में से दो प्रकार) को भारी वर्षा लाने वाला माना जाता है। जबकि कालम और पुष्करम को हल्की फुहारों का वाहक माना जाता है। पंचांगों में वर्णित बादलों के प्रकार आधुनिक वर्गीकरण की तरह का ही है।

पंचांगों द्वारा पूर्वानुमान का परीक्षण भी किया गया है। श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय और तिरुपति स्थित राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के शोधकर्ताओं ने 2012 में पंचांग में व्यक्त पूर्वानुमान और तिरुपति में 1992 से 2004 के बीच वास्तविक अवलोकनों की तुलना के आधार पर एक आलेख भारतीय विज्ञान और तकनीकी जर्नल में प्रकाशित कराया। शोधकर्ताओं ने पंचांग के मौसम पूर्वानुमान और वास्तविक वर्षापात में 63.6 प्रतिशत समानता पाई।

अक्टूबर 2002 में चेन्नई स्थित गैर-लाभकारी संगठन एम एस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन ने मौसम पूर्वानुमान के बारे में परम्परागत ज्ञान के दस्तावेजीकरण और उसकी विश्वसनीयता को जाँचने का एक प्रकल्प आरम्भ किया। इस प्रकल्प के दौरान बादलों के आकार और रंग के आधार पर वर्षा के अनेक सूचकों की पहचान की गई। उदाहरण के लिये अगर बादल में छोटी पतली लकीरें दिखें तो दो दिनों के भीतर वर्षा होने की सम्भावना होती है या अगर दिसम्बर और जनवरी में काले बादल दिखें तो तीसरे दिन वर्षा हो सकती है। इस तरह का अध्ययन आन्ध्र प्रदेश में भी किया गया।

सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट फार ड्राईलैंड एग्रीकल्चर की 2008 में प्रकाशित पुस्तक में राज्य के किसानों द्वारा व्यवहृत अनेक सूचकों का उल्लेख किया गया है। किसानों का कहना है कि काले बादल अगर पूरब की ओर जा रहे हों, उत्तर-पश्चिम दिशा के बादल, पश्चिम और दक्षिण में काले दीर्घाकार बादल, कम ऊँचाई के बादल, एक दूसरे पर आच्छादित बादल, कम ऊँचाई के बादल जो विपरीत दिशा में गतिमान हों, वर्षा के अल्पकालीन सूचक होते हैं। अन्य जैसे सूर्योदय और सूर्यास्त के समय लाल बादल मध्यकालीन सूचक हैं जो तीन से पाँच दिन में वर्षा की सूचना देते हैं।

स्थानीय प्रयोज्यनीयता


भारतीय मौसम विभाग द्वारा जारी होने वाले जिला स्तरीय वैज्ञानिक पूर्वानुमानों के विपरीत परम्परागत पूर्वानुमान क्षेत्र-स्तर पर काम करते हैं। हालांकि परम्परागत पद्धति अल्पकालीक, मध्यकालीक और दीर्घकालीक पूर्वानुमान प्रदान कर सकते हैं। आनंद कृषि विश्वविद्यालय के कृषिगत मौसम वैज्ञानिक विभाग में सहायक प्राध्यापक विद्याधर वैद्य कहते हैं कि विज्ञान दीर्घकालीन पूर्वानुमान की परम्परागत पद्धतियों का उपयोगी विकल्प प्रस्तुत नहीं कर सका है।

श्री कनानी कहते हैं कि हमने पिछले 22 वर्षों से अनेक परम्परागत पूर्वानुमान पद्धतियों का दस्तावेजीकरण और परीक्षण किया है। उनमें से सभी हमारी जाँच में खरे नहीं उतरे। उन पद्धतियों को हमने खारिज कर दिया और किसानों को उनका व्यवहार करने से हतोत्साहित किया। इसके साथ ही हमने किसानों को उन पद्धतियों का उपयोग करने के लिये प्रोत्साहित किया जो हर बार जाँच में सही साबित हुए, जैसे-होली के दिन हवा के बारे में भादली के कथन।’’ (देखें-युगों से प्रासंगिक)

यद्यपि वैज्ञानिक पूर्वानुमान को अधिक परिशुद्ध माना जाता है, भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान अक्सर गलत साबित हो जाते हैं। स्वामीनाथन फाउंडेशन में जेंडर और ग्रासरुट इंस्टीट्यूट की प्रमुख कोआर्डिनेटर की आर रेंगालक्ष्मी कहती हैं कि एक किसान का ज्ञान-सम्बन्धी स्तर को ज्ञान के नेटवर्क में सम्मिलित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान की दो भिन्न प्रणालियों में सम्पर्क बनना सम्भव है।

 

युगों से प्रासंगिक


सौराष्ट्र के किसान मौसम के दीर्घकालीन पुर्वानुमान करने में आज भी दसवीं/ग्यारहवीं सदी के विद्वान भादली के रचे गीतों का उपयोग करते हैं। भादली का एक गीत बताता है कि होली के दिन अगर हवा उत्तर और पश्चिम से आई तो उस साल भारी वर्षा होगी। अगर हवा पूरब से आई तो साल सूखे का होगा। उन्होंने इसी तरह का सह-सम्बन्ध अक्षय तृतीया की हवा और बरसात के आगमन के बीच भी बताया है।

 

सौराष्ट्र के किसान आज भी उनके गीतों का उपयोग दीर्घकालीन वर्षा के पूर्वानुमान करने में करते हैं और वे एकदम सही साबित होते हैं। 1990 में भारतीय मौसम विभाग ने पूरे देश में सामान्य वर्षा का पूर्वानुमान किया था। परन्तु सौराष्ट्र के किसानों को मध्य अगस्त तक वर्षा का इन्तजार ही रहा। भादली का एक दोहा कि अगर जेठ महीने के दूसरे दिन वर्षा के साथ बिजली चमकती हो तो अगले 72 दिनों तक वर्षा नहीं होगी-सही साबित हुआ। उस वर्ष सौराष्ट्र में 4 जून को वर्षा हुई और फिर 72 दिन सूखा के रहे, 15 अगस्त को भादली का कहा सच साबित हुआ।)

 

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