और दम तोड़ दिया जानकीदास तालाब ने

Submitted by RuralWater on Thu, 12/08/2016 - 15:22

तालाब की संरचना और इसके रख-रखाव के इन्तजाम देखने पर लगता है कि यह कई सौ साल पुराना स्थापत्य कला का नमूना है। जानकारों के मुताबिक यह तालाब बेरी के ही तालाब बनाने में महारत रखने वाले कुम्भकारों की ईंटों से बना। यहीं के राजमिस्त्रियों ने इसे बनाया, लेकिन इसका कलात्मक शिल्प और मजबूती देखकर लगता है मानो इसका निर्माण मुगलकालीन राज मिस्त्रियों ने किया है।

हरियाणा के बुजुर्ग एक किस्सा अक्सर सुनाते हैं, चीनी यात्री ह्वेन सांग ने अपनी यात्रा के दौरान जब किसी हरियाणवी महिला से पानी माँगा तो उसने पानी की जगह दूध का लोटा भरकर दे दिया। ह्वेन सांग ने कहा कि उन्होंने तो पानी माँगा था। जवाब में हरियाणवी महिला ने कहा, हमारे यहाँ मेहमानों को पानी पिलाने की परम्परा नहीं है। लेकिन हाल में जिस प्रकार से हमारे यहाँ परम्परागत जल संरचनाओं की बर्बादी हुई है, उसे देखकर तो लगता है कि दूध तो बहुत दूर की बात हरियाणा में पानी का गम्भीर संकट खड़ा हो जाएगा।

तालाबों की उपेक्षा के दौर में सार्वजनिक उपयोग हेतु बनाए गए यहाँ के तालाब अतिक्रमण, गन्दगी और कस्बे के मल-मूत्र के गड्ढों में तब्दील हो ही गए। ऐसे विशिष्ट तालाब भी नहीं बचे जिनका सेठ अपने लिये भी इस्तेमाल करते थे या फिर जो राजसी थे। बेरी के भिवानी रोड पर स्थित पुलिस थाने के लगभग सामने बने लाला जानकीदास के तालाब की हालत देखकर यही लगता है।

इस अत्यन्त भव्य तालाब की चारदीवारी खण्डहर के रूप में अब भी बची है, लेकिन इसकी हालत अच्छी नहीं है। इनमें से ईंटे निकलने लगी हैं। अत्यन्त सुन्दर और गहरी छाया वाले वृक्ष अब भी हैं। बेरी के तालाबों में यह अकेला तालाब है, जिसके रख-रखाव के लिये बाहरी चारदीवारी की गई है और चौकीदारी की व्यवस्था की गई है। तालाब की चारदीवारी में ताश के पत्तों से मिलती-जुलती खुदाई की गई है। तकरीबन 30 फुट गहरे इस तालाब में अभी भी 12-15 फुट तक पानी खड़ा है, लेकिन यह सड़ांध मारता है। चारों घाट अन्दर की ओर धँसने लगे हैं।

नरक जीते देवसरइन घाटों और भीतरी चारदीवारी के निर्माण पर 50 लाख से अधिक लखौरी ईंटें लगने का अनुमान है। इसके चौकीदारे का जिम्मा 55 वर्ष की भतेरी के परिवार के जिम्मे है। उनके बेटे राजमिस्त्री प्रदीप का परिवार भी यहीं रहता है। कई बार के आग्रह के बाद भतेरी लकड़ी का कच्चा-पक्का दरवाजा खोलती हैं। बकौल भतेरी लम्बे अरसे से इस तालाब की कोई सार-सम्भाल नहीं हो रही। हालांकि कई लोगों का मत है कि यह तालाब सेठों ने अपने लिये ही बनवाया था। लेकिन अधिकांश बुजुर्ग इससे सहमति नहीं रखते।

सामाजिक कार्यकर्ता रमेश शर्मा बताते हैं, तकरीबन 60 साल पहले तक सर्दियों में इस तालाब पर कढ़ाहों में पानी गर्म होता था। जो लोग यहाँ नहाने के लिये आते थे, वे तालाब से एक बाल्टी पानी लाकर कढ़ाहे में डाल देते थे और इसके बदले एक बाल्टी गर्म पानी ले लेते थे। तालाब गऊ घाट भी बना है। तैराकी प्रतियोगिता के लिये भी इस तालाब का इस्तेमाल होता था। ये तीनों बातें इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह तालाब सबके लिये सार्वजनिक था।

तालाब की संरचना और इसके रख-रखाव के इन्तजाम देखने पर लगता है कि यह कई सौ साल पुराना स्थापत्य कला का नमूना है। जानकारों के मुताबिक यह तालाब बेरी के ही तालाब बनाने में महारत रखने वाले कुम्भकारों की ईंटों से बना। यहीं के राजमिस्त्रियों ने इसे बनाया, लेकिन इसका कलात्मक शिल्प और मजबूती देखकर लगता है मानो इसका निर्माण मुगलकालीन राज मिस्त्रियों ने किया है।

तालाब से थोड़ा हटकर तकरीबन पाँच फुट ऊँचाई पर राजमहल सा बंगला है। इसमें प्रवेश के लिये 16 दरवाजे हैं। कई दर्जन रोशनदान और खिड़कियाँ हैं। इन रोशनदानों में लगे 250 से अधिक शीशे बताते हैं कि इस तालाब की सुन्दरता और उपयोगिता बढ़ाने के लिये सेठ जानकीदास ने कितने भाव से धन खर्च किया होगा। हालांकि इनमें से काफी शीशे अब टूट चुके हैं। इसके चारों ओर 32 खूबसूरत दरवाजे हैं। पत्थर के बने 64 स्तम्भ बरामदों की खूबसूरती और मजबूती बढ़ाते हैं।

खूबसूरत छोटे-छोटे घर भी तालाब के एक ओर बनाए गए हैं। जानकार बताते हैं कि जल क्रीड़ाओं के बाद लोग बंगले में बैठकर आराम करते थे। सामाजिक विषयों पर सामूहिक चर्चा का भी यह महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। चारों ओर से घने वृक्षों से घिरे इस अत्यन्त खूबसूरत तालाब का निर्माण 1924-1925 में हुआ। यहाँ के प्रतिष्ठित सेठ जानकीदास ने एक ट्रस्ट के सहयोग से इसे अपने भाई की स्मृति में बनवाया।

 

नरक जीते देवसर

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

भूमिका - नरक जीते देवसर

2

अरै किसा कुलदे, निरा कूड़दे सै भाई

3

पहल्यां होया करते फोड़े-फुणसी खत्म, जै आज नहावैं त होज्यां करड़े बीमार

4

और दम तोड़ दिया जानकीदास तालाब ने

5

और गंगासर बन गया अब गंदासर

6

नहीं बेरा कड़ै सै फुलुआला तालाब

7

. . .और अब न रहा नैनसुख, न बचा मीठिया

8

ओ बाब्बू कीत्तै ब्याह दे, पाऊँगी रामाणी की पाल पै

9

और रोक दिये वर्षाजल के सारे रास्ते

10

जमीन बिक्री से रुपयों में घाटा बना अमीरपुर, पानी में गरीब

11

जिब जमीन की कीमत माँ-बाप तै घणी होगी तो किसे तालाब, किसे कुएँ

12

के डले विकास है, पाणी नहीं तो विकास किसा

13

. . . और टूट गया पानी का गढ़

14

सदानीरा के साथ टूट गया पनघट का जमघट

15

बोहड़ा में थी भीमगौड़ा सी जलधारा, अब पानी का संकट

16

सबमर्सिबल के लिए मना किया तो बुढ़ापे म्ह रोटियां का खलल पड़ ज्यागो

17

किसा बाग्गां आला जुआं, जिब नहर ए पक्की कर दी तै

18

अपने पर रोता दादरी का श्यामसर तालाब

19

खापों के लोकतंत्र में मोल का पानी पीता दुजाना

20

पाणी का के तोड़ा सै,पहल्लां मोटर बंद कर द्यूं, बिजली का बिल घणो आ ज्यागो

21

देवीसर - आस्था को मुँह चिढ़ाता गन्दगी का तालाब

22

लोग बागां की आंख्यां का पाणी भी उतर गया

 

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