प्रदूषित होती जा रही है कालीसिंध नदी

Submitted by RuralWater on Fri, 11/18/2016 - 10:56

तमाम स्वछता अभियान के बावजूद यहाँ अभी भी नदी किनारे बड़ी तादाद में लोग हर दिन सुबह और शाम शौच के लिये आते हैं। नगर पंचायत के कचरा वाहन भी सारे शहर की गन्दगी इकट्ठा कर यहीं नदी के किनारे पर पटक जाते हैं। इससे बारिश के समय यह पानी के साथ मिलकर सड़ जाता है और नदी के पानी को भी प्रदूषित करता है। गटरों के गन्दे नाले के सारे ही आउटलेट नदी की ओर खुलते हैं और नगर की पूरी गन्दगी बहते हुए नदी के पानी में समाहित हो जाती है। हालत यह है कि दिवाली के बाद ही इस नदी का पानी सड़ने लगता है और किसी उपयोग का नहीं रह जाता। छोटी नदियों का सूखना बड़ी नदियों के लिये खतरे की घंटी है। देश की दो तिहाई छोटी नदियाँ सूख गई हैं और दिनों-दिन देश के नक्शे से गायब होती जा रही हैं। कई छोटी नदियाँ अब नालों में तब्दील हो चुकी हैं। कुछ सालों पहले तक हमारे यहाँ लगभग हर गाँव के आसपास एक छोटी नदी हुआ करती थी। लेकिन अब धीरे-धीरे ये लुप्त होती जा रही हैं। यह भी सच है कि मैदानी इलाकों में छोटी नदियों पर संकट ज्यादा है।

दरअसल मैदानी इलाकों में शहरीकरण होने और जनसंख्या के बढ़ते प्रभाव की वजह से नदियों पर भी बुरा असर पड़ा है। पहले इन नदियों का पानी लोगों ने बोरवेल लगाकर सोख लिया और अब नदी के पानी को गन्दा कर इसे नालों में तब्दील किया जा रहा है। यही छोटी नदियाँ यहाँ से प्रदूषण ले जाकर बड़ी नदियों को भी प्रदूषित करती हैं।

मध्य प्रदेश के मालवा में चम्बल की सहायक नदी कालीसिंध भी ऐसी ही छोटी नदी है पर यह भी प्रदूषण की मार से अछूती नहीं है। 20-25 साल पहले तक यह नदी सदानीरा हुआ करती थी और इसमें साफ-स्वच्छ पानी बहता रहता था लेकिन अब बीते कुछ सालों में यह तेजी से प्रदूषित होकर गन्दले नाले में तब्दील होती जा रही है।

बीते सालों में जिस तेजी से नदियों की दुर्दशा हुई है, उसमें कालीसिंध भी शामिल है। कभी यह नदी इलाके की समृद्धि की पहचान हुआ करती थी। लेकिन अब बरसात के बाद इसका पानी कमतर होते-होते सर्दियों के खत्म होते ही सूखने लगी है। नदी के जल्दी सूख जाने से जल स्तर भी लगातार कम होता चला गया और अब तो हालत यहाँ तक पहुँच गई है कि यहाँ पानी की तलाश में एक हजार से लेकर बारह सौ फीट तक खुदाई करना पड़ रहा है।

कालीसिंध नदी का उद्गम विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी (करीब 723 मीटर) देवास जिले के बागली विकासखण्ड के गाँव अमोदिया से है। कालीसिंध नदी देवास जिले से गुजरते हुए शाजापुर, राजगढ़ होकर राजस्थान के झालावाड़ में प्रवेश करती है। इसके बाद यह कोटा के पास चम्बल नदी में जा मिलती है। इसकी लम्बाई मध्य प्रदेश में करीब डेढ़ सौ किमी है।

कभी डग-डग रोटी, पग-पग नीर के लिये पहचाने जाने वाले इस इलाके में अब पानी बड़ी चुनौती बन गया है। देवास जिले के जिस बड़े हिस्से से कालीसिंध गुजरती है, वहाँ भी पानी का बड़ा संकट है। हर साल गर्मियों में पीने के पानी का संकट यहाँ बढ़ता ही जा रहा है। यहाँ के लोग फरवरी से ही पानी खरीदने को मजबूर हैं।

कुछ बोरिंग वाले इन्हें दो रुपए की एक छोटी केन के हिसाब से पानी बेचते हैं। इनके पास पानी खरीदने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। जलस्तर जैसे-जैसे कम होता जा रहा है, वैसे-वैसे खेतों पर लगे पुराने बोरिंग हाँफने लगते हैं और धीरे-धीरे सूख जाते हैं। इसका खामियाजा किसानों को उठाना पड़ रहा है। उन्हें हर साल नए बोरिंग करने पड़ रहे हैं। यहाँ गाँव-गाँव धरती का सीना छलनी करते हुए सैकड़ों बोरिंग हो चुके हैं।

देवास जिले के बागली क्षेत्र से उद्गम होकर करीब 40 किलोमीटर दूर इसी जिले के कस्बे सोनकच्छ पहुँचते ही कालीसिंध एक गन्दे नाले की तरह नजर आने लगती है। करीब 25 साल पहले तक यह नदी काफी अच्छी स्थिति में हुआ करती थी। लगभग 18 हजार की आबादी वाला सोनकच्छ कस्बा इन्दौर-भोपाल हाईवे पर इस नदी के किनारे पर ही बसा हुआ है। इसका पानी शहर के लोगों की प्यास बुझाने के काम बीते कई सालों से आया करता था। यह नदी यहाँ से बड़ी जलराशि ले जाकर आगे चंबल नदी में छोड़ती है।

कई पीढ़ियों से सोनकच्छ नगर के लिये पानी का स्रोत यही नदी रही है। हालांकि आज भी इसके पानी का उपयोग शहर को पानी पिलाने के लिये किया जाता है लेकिन अब यहाँ कई बोरवेल भी किये गए हैं। नगर के लिये जीवनदायिनी कही जाने वाली कालीसिंध नदी यहाँ स्थानीय प्रशासन और नगर परिषद की अनदेखी की वजह से बदहाल हो रही है। इसकी गन्दगी देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यहाँ नदी सफाई को तरस रही है।

स्थानीय पीपलेश्वर घाट पर बने डैम से पानी रोककर यहाँ के लोगों को पेयजल उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन अनदेखी इतनी कि डैम से लेकर नगर पंचायत की टंकी तक बने घाटों पर नदी के पानी को साफ करने का कोई जतन नहीं किया जाता। यहाँ नदी के पानी से सरेआम लोग वाहनों को और कपड़ों को धोते नजर आते हैं। यहाँ तक कि बिस्तर धोने से लेकर केमिकलयुक्त सर्फ और साबुन का प्रयोग भी धड़ल्ले से होता है। यही नहीं पशुपालक यहाँ मवेशियों को बिना रोक-टोक नहलाते हैं और मछली पकड़ने वाले नदी में करंट छोड़कर मछलियों को मारते हैं। इससे नदी का पानी पूरी तरह प्रदूषित हो रहा है।

तमाम स्वछता अभियान के बावजूद यहाँ अभी भी नदी किनारे बड़ी तादाद में लोग हर दिन सुबह और शाम शौच के लिये आते हैं। नगर पंचायत के कचरा वाहन भी सारे शहर की गन्दगी इकट्ठा कर यहीं नदी के किनारे पर पटक जाते हैं। इससे बारिश के समय यह पानी के साथ मिलकर सड़ जाता है और नदी के पानी को भी प्रदूषित करता है।

कालीसिंध नदीगटरों के गन्दे नाले के सारे ही आउटलेट नदी की ओर खुलते हैं और नगर की पूरी गन्दगी बहते हुए नदी के पानी में समाहित हो जाती है। हालत यह है कि दिवाली के बाद ही इस नदी का पानी सड़ने लगता है और किसी उपयोग का नहीं रह जाता। कुछ ही दिनों में यहाँ के गन्दे पानी से बदबू उठने लगती है और यह आसपास रहने वाले और इसके पुल से गुजरने वाले लोगों को परेशान करती है। नदी के किनारों पर सदियों पुराने मन्दिर-मस्जिद है और यहाँ साप्ताहिक हाट भी भरता है। फिर भी लोग नदी की साफ-सफाई की ओर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं।

सोनकच्छ के आसपास किनारे के करीब दर्जन भर गाँव के किसान सरेआम बगैर किसी शुल्क और बिना किसी अनुमति के नदी के पानी में 10 से 20 हॉर्स पावर तक की जल मोटर डालकर पानी खींच लेते हैं। वे इस पानी का उपयोग अपने खेतों में सिंचाई के लिये करते हैं। ऐसे में नगर पंचायत के लिये यहाँ के लोगों को पानी पीलाना मुश्किल हो जाता है। गर्मी के दिनों में नदी का पानी कम हो जाता है और पीने के लिये पानी उपलब्ध नहीं हो पाता।

शासकीय नियमों के मुताबिक पीने के पानी को प्रमुखता दी जाती है। पीने के पानी के बाद बचने वाले पानी को ही खेती के काम में लिया जा सकता है लेकिन यहाँ पहले ही किसान इस पानी का उपयोग सिंचाई के लिये कर लेते हैं। हैरत की बात है कि आज तक प्रशासन ने इन किसानों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की है। यही वजह है कि हर साल जनवरी-फरवरी के महीने तक यह लगातार पानी खींचते रहते हैं।

अब यह नदी देवास जिले के अधिकांश स्थानों पर सूख जाया करती है। लेकिन अब भी इसमें पानी का बहाव पर्याप्त होता है। यदि इसकी अच्छे तरीके से साफ-सफाई की जाये तो यह इलाके के पानी के संकट को काफी हद तक दूर कर सकती है, वही इससे आसपास के गाँवों में पर्याप्त जलस्तर भी बना रह सकता है अकेले पीपलरावा क्षेत्र में नदी से करीब 40 गाँवों का जलस्तर बना रहता है। सोनकच्छ के आसपास भी करीब 50 गाँव और बागली के आसपास 50 गाँवों का जलस्तर बनाए रखने वाली नदी अब उपेक्षित होती जा रही है।

साल-दर-साल कालीसिंध नदी का जलस्तर तेजी से घटता जा रहा है। गर्मी में अब इसके सूखने से जल संकट गहरा जाता है और लोगों को पीने के पानी की किल्लत का सामना करना पड़ता है। बीते साल गर्मी के दिनों में सोनकच्छ के लोगों को दो से पाँच दिनों में एक बार जलप्रदाय किया गया था। बावजूद इसके इस साल अब तक यहाँ पानी रोकने के लिये कोई एहतियाती कदम नहीं उठाए गए हैं। यदि यही स्थिति रही तो इस साल भी यहाँ लोगों को पीने के पानी का सामना करना पड़ सकता है।

कालीसिंध नदी का प्रवाह क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से फिलहाल कई जगह दूषित हो चुका है। नदी में कहीं भी पानी को ज्यादा दिनों तक रोक पाने का सामर्थ्य नहीं है। जगह-जगह रेत खनन हो रहा है। बीते कुछ सालों से बारिश कम होने तथा भूजल में कमी से यह इलाका पानी को मोहताज होता जा रहा है। जरूरी है कि कालीसिंध के नदी तंत्र को पर्यावरणीय तरीके से ठीक किया जाये ताकि वह बरसाती पानी को ज्यादा-से-ज्यादा सहेजने काबिल बन सके।

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