उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम

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Source
सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म, 2006

गुरु ने उन्हें परखा और कहा- रणांगण पर दिन-भर का युद्ध समाप्त होने के पश्चात रात्रि के समय मरणोन्मुख रणवीरों को पानी पिलाने का काम आप करेंगे। उस वृद्ध व्यक्ति ने प्रसन्नतापूर्वक यह काम स्वीकार किया। दो-एक दिनों के बाद गुरु के पास शिकायत आई यह वृद्ध तो सभी को पानी पिलाता है। सिक्ख धर्म ने हिन्दू-धर्म में बढ़ता जा रहा जात-पात का, ऊँच-नीचता का, कर्म-काण्ड का महत्त्व हटाने के लिये गुरु नानक के नेतृत्व के कारण बड़ा पराक्रम कर दिखाया। ‘गुरु-ग्रन्थ साहिब’और ‘सुखमनी साहिब’ इन ग्रन्थों के प्रचार से हिन्दुओं को भी नया मार्गदर्शन मिला। ग्रन्थ साहिब में दक्षिण के नामदेव से लेकर उत्तर भारत के कबीर, दादू इत्यादि सन्तों तक सभी जात-पात के साधु-सन्तों का आध्यात्मिक सिखावन देने वाला काव्य संग्रहित किया। जीवन की एकात्मता सभी अनुभूति सम्पन्न सन्तों के काव्य का जीवन का प्राण है यह स्पष्ट हुआ है ग्रन्थ साहिब में।

‘सुखमनी साहिब’ ने-

करम करत होवे निहकरम
तिसु वैसनों का निरमल धरम


ऐसा कहकर नैष्कर्म्य की महत्ता वैष्णव धर्म के आधार से गाकर सर्वत्र प्रसृत की। कर्म का, सेवा धर्म का पाठ समाज को पढ़ाया। कबीर तो योग मार्ग के अर्ध्वर्यु। ‘मन जीते जगु जीता’ यह तो वे कहेंगे ही। साथ ही-

मान का भरम मन ही ते भागा।
सहजरूप हरि खेलन लागा।।


ऐसा साकार-निराकार का द्वैत भी उन्होंने पिघलाकर दिखाया। भक्ति और ज्ञान की एकरूपता दिखा दी। गोपियों के प्रेम की महत्ता भी उन्होंने दर्शार्यी और अपनी नम्रता प्रकट करना वे भूले नहीं-

कबीर कबीर क्या कहे, जा जमुना के तीर
एक गोपि के प्रेम में बह गये कोटिक वीर!


दादू भी यह स्पष्ट करते हैं कि सच्चे सुख का रहस्य सर्वव्याप्ति में ही होता है-

सहज सुन्न सब ठौर है
सब घट सबही माँहि।
तहाँ निरंजन रमि रहै,
कोउ दुख व्यापै नाहि।।


सिख धर्म के अन्तिम मानव गुरु थे गुरु गोविन्द सिंह जी, उन्होंने देश प्रेम का पाठ तो पढ़ाया ही, साथ-साथ करुणा का, सबकी सेवा का रूप कैसा होता है यह भी अपने जीवन से प्रकट किया। देश के खातिर आत्म-सम्मान के लिये अपने बालक-पुत्रों को सूली वेदी पर चढ़ाया और साथ ही धर्म-धर्म का भेद मानव-धर्म के सामने टिक नहीं सकता यह भी समझाया।

युद्ध का प्रसंग था। एक निकट के गाँव के लोग इकट्ठा हुए थे। सबको कौन-कौन से काम करने हैं यह गुरु बता रहे थे। एक वृद्ध आगे निकल कर पूछने लगे- गुरुदेव, मुझे कौन सा काम देंगे आप! गुरु ने उन्हें परखा और कहा- रणांगण पर दिन-भर का युद्ध समाप्त होने के पश्चात रात्रि के समय मरणोन्मुख रणवीरों को पानी पिलाने का काम आप करेंगे। उस वृद्ध व्यक्ति ने प्रसन्नतापूर्वक यह काम स्वीकार किया। दो-एक दिनों के बाद गुरु के पास शिकायत आई यह वृद्ध तो सभी को पानी पिलाता है। अपने जख्मी सैनिकों के साथ शत्रु के सैनिकों को भी यह पानी पिला देता है। गुरु गोविन्द सिंह ने उस वृृद्ध को बुला दिया। उससे सब लोगों के सामने उन्होंने कहा, “मृत्यु के द्वार पर पड़े सैनिक-सैनिक में भेद कैसा? आपने बिल्कुल ठीक किया। सभी को अन्तिम क्षण में शान्ति दी। अब आपको जख्मों पर मलहम पट्टी करने का काम भी सौंपा जा सकता है।”

युद्ध तो कर्तव्य के रूप में महापुरुषों को करने पड़े। टाल नहीं सकते ऐसा दुष्कर्म है युद्ध। उसका रुचिपूर्वक अनुष्ठान किया या उसका उद्योग-धन्धा ही बना लिया तो वह विकृत सिद्ध होता है। परन्तु प्रेम तो सर्वव्याप्त हृदय का स्वभाव होता है। उसमें हिसाब नहीं रहता। खलील जिब्रान ने प्रेम के स्वरूप का अद्भुत वर्णन किया है। ‘प्रोफेट’ किताब में जिब्रान कहते है- ‘लव इज सफिशिएंट अनटू लव’ (Love is sufficient unto love) प्रेम स्वयं पूर्ण होता है, उसे अन्य किसी चीज की आवश्यकता नहीं है। ‘लव हैज नो अदर डिजायर बट टू फुलफिल इट सेल्फ’ (Love has no other desire but to fulfil itself) स्वयं को पूर्ण सार्थक करने के सिवाय प्रेम को दूसरी कोई भी इच्छा नहीं होती। प्रेम से किये कर्म में से आप स्वयं से, एक-दूसरे से और ईश्वर से जुड़ जाते हैं। कर्म के रूप में प्रेम दृश्य होता है, प्रकट होकर सामने आता है।

सभी सन्तों के साथ जिब्रान अपनी स्वतन्त्र परिभाषा में सर्वव्याप्ति की मानव के विकास की चोटी,अहं शून्यता की स्थिर और सन्तुलित अवस्था का उल्लेख कर देते हैं। ‘ओनली व्हेन यू आर एम्पटी आर यू ऐट स्टैंड-स्टिल एंड बेलेंस्ड’ (Only when you are empty are you at stand-still and balanced), ‘इन, योर लॉगिंग फॉर योर जायंट सेल्फ लाईज योर गुडनेस’ (In, your logging for your giant self lies your goodness), ‘इट वॉज दि बाउंडलेस इन यू… दि वास्ट मैन… इट इज इन दि वास्ट मैन दैट यू आर वास्ट’ (It was the boundless in you… the vast man it is in the vast man that you are vast)। ‘इट इज अ फ्लेम अॉफ स्पिरिट इन यू एवर गैदरिंग मोर अॉफ इटसेल्फ’ (It is a flame of spirit in you ever gathering more of itself)।

चीन और जापान में केवल बौद्ध धर्म ने ही युद्ध का और भोग-वृत्ति का निषेध नहीं किया। लाओत्से के ‘ताओ’ धर्म ने और कन्फ्यूशियस की विचार-आचार पद्धति ने युद्ध को और द्वेष-मत्सर को बालिशता ही माना। स्नेह, सहनशीलता और सत्यमय जीवन ही मनुष्य के लिये प्रगल्भता है। इन्हीं के विकास में से जीवन की एकता- ‘ताओ’ अनुभूत होती है। शिंटो धर्म की सिखावन भी इसी तरह की है। युद्ध करने का समर्थन अहिंसा के आदर्श के कारण कहीं भी मान्यता प्राप्त नहीं कर सका। अहिंसा के बिना प्रेम की सर्व समावेशकता के सिवा वैश्विक एकता की सम्भावना भी कैसे रहेगी?

दक्षिण भारत की ‘तिरुक्कुरल’ यह ढाई हजार वर्ष पहला का तमिल ग्रन्थ। तिरुवल्लुवर नामक सन्त के जीवन की एकता का दर्शन इसमें लोक-सुलभ पद्धति से लिखा है। बौद्ध, जैन, शैव, वैष्णव सभी मानते हैं कि यह भूमिका वैश्विक है। तिरुवल्लुवरजी का जीवन शान्ति का, क्रोध शून्यता का प्रतीक ही था। जिस तरह महाराष्ट्र के सन्त एकनाथ का जीवन तीन-चार सौ वर्ष पहले का ऐसा ही शान्ति का उद्गार था। किसी परधर्मिय व्यक्ति ने एकनाथ को चिढ़ाने के लिये, उनमें क्रोध उत्पन्न करने के लिये एक सौ आठ बार उन पर मुख से थूक डाली और उन्हें उतनी ही बार गंगा-स्नान करने के लिये मजबूर किया। एकनाथ को क्रोध नहीं आया। इसके बदले वह म्लेछ ही एकनाथ को प्रणाम करने और क्षमा माँगने आया तब एकनाथ ने कहा- “आपके कारण मुझे आज गोदावरी-गंगा का एक सौ आठ बार स्नान करने का मौका मिला! मैं धन्य हो गया!”

तिरुवल्लुवर के करुणामय हृदय की कहानी एकनाथ की कथा से थोड़ी भिन्न है लेकिन सभी के हित की चिन्ता वहन करने वाले इस सन्त का परिचय इस कहानी से अवश्य मिलता है। तिरुवल्लुवर की कपड़े की दुकान थी। नित्य ध्यानवस्था में स्थिर हुए इस सन्त को कर्मयोग भी सधा था। अनेक लोग अमीर-गरीब, विद्वान-अनपढ़ सभी प्रकार के लोग-उन्हें मानते थे। एक श्रीमन्त घर का लड़का लाड-प्यार से बिगड़ा हुआ सा था। वह रोज तिरुवल्लुवर जी की स्तुति का श्रवण करते-करते ऊब गया और अपने मित्रों के पास उसने कह दिया- “मैं इस सन्त को गुस्सा लाकर दिखा दूँगा। इसमें कौन सी कठिन बात है?” और वह मित्रों के साथ सन्त की दुकान पर पहुँच गया। “मुझे सुन्दर सी धोती खरीदनी है, आप सबसे बढ़िया धोती दिखायें” उसने कहा। तिरुवल्लुवर ने धोतियाँ उसके सामने डालीं। सबसे बढ़िया धोती को लड़के ने उठाकर देखा। नापसन्दगी से नाक सिकोड़कर उसने बोलते-बोलते उस उत्तम धोती के टुकड़े-टुकड़े कर दिये। ऊपर से यह कह दिया- “किसी काम की नहीं है यह आपकी दिखाई धोती व्यर्थ आ गए हम लोग आपकी दुकान पर!” वे टुकड़े सन्त के सामने पटककर अपने मित्रों को लेकर यह अमीर लड़का दुकान से निकलने लगा तब शान्तिपूर्वक तिरुवल्लुवर ने कहा- “इस वस्त्र को फाड़कर तुमने टुकड़े-टुकड़े किया। कोई खास बात नहीं है। यह केवल एक धोती का ही प्रश्न है। परन्तु अपने स्वयं के जीवन के भी तुम ऐसे ही फटे टुकड़े कर डालोगे तो दारिद्र्य और दुख के सिवा क्या हाथ लगेगा तुम्हारे? बेटा, इस पर सोच लो!” लड़के की पीठ सन्त की तरफ थी, वह निकल रहा था। लेकिन तिरुवल्लुवर के शब्द कान पर पड़ते ही उसने पलटकर तिरुवल्लुवर सन्त के चरण पकड़ लिये। रोते-रोते कहने लगा “अब आपके सिवा मुझे सन्मार्ग पर ले जाने वाला कौन गुरु मिलेगा?” वह लड़का सन्त के पास उनका शिष्य बनकर रह गया।

संस्कृत सुभाषित ने अपने देश का स्वभाव ही प्रकट किया हैः

अयं निजः परोवेति गणना लघु चेतसाम।
उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम।।


यह इतना मेरा, वह उतना तुम्हारा है इस तरह का हिसाब विभाजन की वृत्ति प्रकट करता है। यह वृत्ति संकुचित, अल्प हृदय के व्यक्तियों की होती है। जिनका हृदय उदार होता है, जीवन व्यापक होता है उनके लिये सम्पूर्ण वसुधा का एक ही छोटा सा परिवार-कुटुम्ब बनकर रह जाता है।

इसके भी एक कदम आगे बढ़कर आद्य शंकराचार्य ने कहा- ‘स्वदेशो भुवनत्रयम्’। स्वर्ग-पृथ्वी-पाताल इनकी त्रिलोकी ही अपना स्वदेश है। सभी अपने ही हैं। यह त्रिलोकी तो नटेश्वर भगवान् शंकर की नृत्यशाला है। उनकी उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय का नृत्य नाट्य अनन्त-काल से चलता रहा है। निराकार-साकार सहित जीवन का एकात्म सत्य अनुभूत होने पर भेद मिट जातें हैं और ईश्वर के खेल में हम उसके साथी-सहभागी बन जाते हैं। इसीलिये सभी धर्म, पन्थ, सारे सन्मार्ग काल के विभिन्न सन्दर्भों में अलग-अलग भले दिख पड़ते होंगे, लेकिन मूलतः एक ही सत्य के प्रकाशक होते हैं। उपनिषद यह बात कहे बिना कैसे रह सकते हैं?

गवाँ अनेका वर्णानां।
क्षारस्यास्ते एकवर्णता।।


गायों के वर्ण-रंग अनेक होते हैं, विविध रंगों के बाह्यतः दिख पड़ती हैं, परन्तु सभी का दूध मात्र एक वर्ण का शुभ्र रहता है।

इसलिये महान व्यक्तियों के जीवन-दर्शन और तत्त्व ज्ञानों का समन्वय करके, जो-जो अच्छा, व्यापक है उनको एकत्रित लाकर मानव जाति का, धरित्री का वातावरण सख्यभक्ति से व्याप्त बनाने का कार्य सर्वकाल करते रहना होगा। तब भोग वादकों, युद्धवाद को पराभूत करना सहज सम्भव होगा। विकास का युगानुकूल स्वरूप इसी वातावरण में से आकारित हो सकेगा।

उस विषय की ओर बढ़ने से पहले हमें अभी मध्य युग से आधुनिक युगपर्यन्त हो गये कुछ सन्तों का, महान व्यक्तियों का परिचय कर लेना है। अब तक हुए वैश्विक वृत्ति के समाज-सेवकों में से भी कुछ सेवकों से हम वाकिफ हो सकेंगे तो युगानुकूल विकास का तन्त्र विज्ञान भी कुछ हद तक सुझाया जा सकता है।

कश्मीर में चौदहवें शतक में नसरुद्दीन शेख का जन्म हुआ। हिन्दू-मुस्लिमों के मिश्र समाज को उन्होंने जो मार्ग-दर्शन किया वह आज भी पथ-प्रदर्शक होगा। गोपालन करने वाले एक गरीब घर में जन्में नसरुद्दीन को बचपन में मौलवी जी के पास पढ़ने भेज दिया गया। ‘एक’ अर्थ का उर्दू शब्द ‘अलीफ’ सीखने के बाद यह बालक आगे कुछ भी सीखने को तैयार ही नहीं हुआ। क्यों तुम आगे नहीं पढ़ोगे? ऐसा उससे जब पूछा तब उसका जवाब था- अल्लाह तो एक ही है, दो तो कुछ है ही नहीं, तो फिर मैं आगे क्या पढ़ूँ? कश्मीर के जंगलों में यह बढ़कर अकेला घूमा करता था और उपनिषद के उद्दालक के समान नसरुद्दीन को भी आसमान, पहाड़, पशु-पक्षी जल-स्त्रोत, वृक्ष, धरती इस प्राकृतिक वैविध्य ने सभी को आन्तरिक एकता की, परम्परावलम्बन की शिक्षा दी। वर्षानुवर्ष वन में उसकी निरीक्षण की, सबसे दोस्ती करने की तपस्या चलती रही। स्वयं जीवन जीने की कला उसने प्रकृति से सीख ली और सभी लोगों को सिखा भी दी उसने। सूत्रात्मक शब्दों में उसने जंगलों की देन क्या है सबको बताया। वह तो है मिट्टी और पानी। “जहाँ सघन वन होते हैं, वहाँ अन्न भरपूर होता है। येली वन पोषण तेली पोशी अन्न।” यह कश्मीरी भाषा में उसकी उक्ति सर्वतोमुखी हो गई। सन्तुलित और सम्पन्न पर्यावरण का स्वरूप अनायास उसके शब्दों में व्यक्त हुआ। अध्यात्म के जागृत अवभान में से यह स्फुरण हुआ था।

नसरुद्दीन को भारतीय ऋषि परम्परा का बहुत आकर्षण था। उनके निकटवर्तियों को, शिष्यगणों को उनके ऋषित्व के दर्शन बहुत अच्छी तरह से हुए थे। उनका द्रष्टापन, अल्लाह की भक्ति, लोक-जागृति का उनका कार्य यह सब देखकर उन लोगों ने उन्हें ‘नुन्द’ कहना शुरू किया और इसके साथ ऋषित्व जुड़ जाने से वे ‘नुन्द ऋषि’ कहलाएl उनके अनुयायियों में से भी कुछ को ‘ऋषि’ संज्ञा दी गई थी।

नुन्द ऋषि का गुरु था कश्मीर का प्रसिद्ध शैव-योगिनी ‘लल्लेश्वरी’ या ‘लालदीदी’। जन्म लेने पर नसरुद्दीन माँ का दूध नहीं पीता था। सबको चिन्ता हुई। लल्लेश्वरी जी कहीं से घर में आयी, उसे मालूम हुआ, बच्चा दूध पीने से इंकार करता है। तब इस छोटे अर्भक से उसने कहा- “जन्म ले लिया, अब माँ का दूध पीने में संकोच किस बात का?” इतना सुनने पर नसरुद्दीन ने दूध पीना शुरू किया। मान्यता की यह योगिनी हिन्दू-मुस्लिमों के ऐक्य की उद्गात्री थी। श्रीनगर तथा पूरे कश्मीर में आज भी इस लालदीदी के लिये पूज्य भावना है। वहाँ के मिश्र समाज में उसकी लोकप्रियता के प्रतीक रूप में उसके नाम से एक हाॅस्पिटल खोला गया है।

 

सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म

 

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम संख्या

अध्याय

1.

वायु, जल और भूमि प्रदूषण

2.

विकास की विकृत अवधारणा

3.

तृष्णा-त्याग, उन्नत जीवन की चाभी

4.

अमरत्व की आकांक्षा

5.

एकत्व ही अनेकत्व में अभिव्यक्त

6.

निष्ठापूर्वक निष्काम सेवा से ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति

7.

एकात्मता की अनुभूति के लिये शिष्यत्व की महत्त्वपूर्ण भूमिका

8.

सर्व-समावेश की निरहंकारी वृत्ति

9.

प्रकृति प्रेम से आत्मौपम्य का जीवन-दर्शन

10.

नई प्रकृति-प्रेमी तकनीक का विकास हो

11.

उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम

12.

अपना बलिदान देकर वृक्षों को बचाने वाले बिश्नोई

13.

प्रकृति विनाश के दुष्परिणाम और उसके उपाय

14.

मानव व प्रकृति का सामंजस्य यानी चिपको

15.

टिहरी - बड़े बाँध से विनाश (Title Change)

16.

विकास की दिशा डेथ-टेक्नोलॉजी से लाइफ टेक्नोलॉजी की तरफ हो

 

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