केरल की आपदा से सीखने का समय

Submitted by editorial on Sun, 09/16/2018 - 14:30
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दैनिक जागरण, आई नेक्स्ट, 16 सितम्बर, 2018
केरल बाढ़केरल बाढ़ (फोटो साभार - पंजाब केसरी)केरल में आई भीषण बाढ़ से हुई तबाही और देश के कई हिस्सों में आई बाढ़ से हुई क्षति को सबने देखा। केरल में तो 350 से अधिक लोग मारे गए और लाखों लोगों को बेघर होना पड़ा। कई को राहत शिविरों में ठिकाना मिला तो हजारों अब भी असहाय हालत में हैं।

सदी का सबसे बड़ा संकट झेल रहा केरल राज्य बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित होता जा रहा है। जिन्दगी थम गई है। रफ्तार रुक सी गई है। राष्ट्रीय आपदा राहत और बचाव बल (एनडीआरएफ) बचाव कार्य काफी जोर-शोर से कर रहा है।

आँकड़ों के मुताबिक, केरल में बारिश के बाद भीषण तबाही से 40 हजार हेक्टेयर से भी अधिक की फसलों का नुकसान हो चुका है। बाढ़ ने राज्य के इंफ्रास्ट्रक्चर की कमर किस हद तक तोड़ दी है, इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि लगभग एक लाख किलोमीटर सड़कें तबाह हो चुकी हैं।

आखिर केरल में आई इस आपदा के लिये जिम्मेदार कौन है? क्या किसी ने इस आपदा की आहट पहले नहीं सुनी थी और यदि सुनी थी तो क्यों नहीं इस पर अमल किया गया? इस विभीषिका के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह वास्तव में प्राकृतिक आपदा है या फिर यह मानवजनित आपदा है।

विशेषज्ञों की मानें तो कोई भी प्राकृतिक आपदा चेतावनी की तरह होती है। 2015 में जब चेन्नई में भीषण बाढ़ आई थी, तब भी इस पर उतना ध्यान नहीं दिया गया था। आज केरल की आपदा ने संकेत दिया है कि जलवायु परिवर्तन से आगे किस तरह की और कितनी भयावह स्थितियाँ पैदा हो सकती हैं।

फिलहाल अभी बाढ़ जैसी किसी भी आपदा को जलवायु परिवर्तन से सीधे तौर पर विशेषज्ञ नहीं जोड़ते पर भौतिक शास्त्र का मूलभूत सिद्धान्त बताता है कि धरती पर जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, वाष्पीकरण भी स्वाभाविक तौर पर बढ़ जाता है और वायुमंडल में पानी ज्यादा जमा होने लगता है और इसका नतीजा उतने ही स्वाभाविक रूप से अतिवृष्टि के रूप में सामने आता है।

पिछले कुछ समय में मौसम में तेजी से होने वाला बदलाव हमें लगातार चेतावनी देता रहा है, पर हम शायद उस तरफ से अपनी आँखें मूँदें बैठे हैं। वैसे मानसून के सीजन में यूँ तो भारी बारिश होती ही है लेकिन इस साल केरल में सामान्य 42 फीसदी अधिक बारिश हो चुकी है। बारिश का इतना अधिक होना भौतिक शास्त्र के उसी मूलभूत सिद्धान्त को पुष्ट करता है।

एक अध्ययन के अनुसार, धरती का तापमान जैसे-जैसे बढ़ता है वैसे-वैसे ही आने वाले तूफानों की ताकत बढ़ती जाती है। यही नहीं जलवायु में तेजी से होने वाले इन परिवर्तनों के कारण सदी के अन्त तक अतिवृष्टि की सम्भावनाओं में छह गुना इजाफा होने का अनुमान है। केरल के नदी-नाले इतनी भारी बारिश के लिये तैयार नहीं थे, जिससे वहाँ भीषण बाढ़ की स्थिति बन गई।

आमतौर पर बारिश के पानी को बहने से रोकने में सबसे बड़ी भूमिका पेड़ निभाते हैं लेकिन बीते 40 साल में केरल से लगभग आधे जंगल साफ हो चुके हैं। आँकड़ों में खत्म हो चुके जंगलों का यह इलाका 9000 वर्ग किलोमीटर के आस-पास बताया जाता है। इसका दूसरा मतलब यह भी है कि बारिश के पानी को रोकने का प्राकृतिक बन्दोबस्त यानी कि जंगलों के न होने से वह तेजी से नदी-नालों में समा रहा है और बाढ़ जैसी विपदा का कारण बन रहा है। यही नहीं बाँधों की संख्या का अधिकाधिक होना भी बाढ़ की विपदा बढ़ाने में सहायक हो रहा है।

केरल की बाढ़ की तस्वीरों ने एक और चिन्ताजनक पहलू की तरफ ध्यान खींचा है। इनमें देखा गया है कि बारिश और बाढ़ के दौरान जगह-जगह किस पैमाने पर भूस्खलन हुआ है। इसने विपदा की गम्भीरता को और बढ़ाया है। विशेषज्ञों के अनुसार, भू-आकृति में बदलाव की प्रक्रिया बारिश के प्रति काफी संवेदनशील होती है।

केरल में विनाशकारी बाढ़ से ठीक एक महीने पहले एक सरकारी रिपोर्ट ने चेतावनी दी थी कि यह राज्य जल संसाधनों के प्रबन्धन के मामले में दक्षिण भारतीय राज्यों में सबसे खराब स्तर पर है। इस अध्ययन में हिमालय से सटे राज्यों को छोड़कर 42 अंकों के साथ उसे 12वाँ स्थान मिला है।

गंगा आन्दोलन से जुड़े अनिल प्रकाश बताते हैं कि केरल की स्थिति के लिये जंगलों की कटाई के साथ-साथ बड़ी संख्या में बाँधों का निर्माण जिम्मेदार है। जगह-जगह बाँध बनाकर सरकारें नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करती हैं। केरल में भारी बारिश के बाद यदि प्रशासन कम-से-कम 30 बाँधों से समयबद्ध तरीके से धीरे-धीरे पानी छोड़ता तो केरल में बाढ़ इतनी विनाशकारी नहीं होती। जब पिछले हफ्ते बाढ़ उफान पर थी, तब 80 से अधिक बाँधों से पानी छोड़ा गया। इस राज्य में कुल 41 नदियाँ बहती हैं।

इस साल की शुरुआत में केन्द्रीय गृह मंत्रालय के एक आकलन में केरल के बाढ़ को लेकर सबसे असुरक्षित 10 राज्यों में रखा गया था। देश में आपदा प्रबन्धन नीतियाँ भी हैं लेकिन इस रिपोर्ट के आने के बावजूद केरल ने किसी भी ऐसी तबाही के खतरे को कम करने के लिये कोई कदम नहीं उठाए।

भारत के उन दूसरे हिस्सों में भी जहाँ वनों की कटाई की गई है, वहाँ बहुत कम समय में भारी बारिश की वजह से पहले भी तबाही मची है। तेजी से होते शहरीकरण और बुनियादी ढाँचों के निर्माण की वजह से बाढ़ की विभीषिका से प्राकृतिक तौर पर रक्षा करने वाली दलदली जमीनें और झीलें गुम होती जा रही हैं।

भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र की हालत भी कुछ अच्छी नहीं है। आज भी मेघालय में सबसे अधिक बारिश होती है पर जंगलों के लगातार काटे जाने से अब वहाँ के झरने सूखने लगे हैं और इसका असर है कि वहाँ आज जल संकट की स्थिति पैदा हो गई है।

आज जरूरत है कि केरल में आई इस प्राकृतिक आपदा से हम सीख लें और प्रकृति से छेड़छाड़ बन्द करें। सरकारें भी इस दिशा में ठोस कार्रवाई करें। बाढ़ सम्भावित और इससे त्रस्त क्षेत्रों का मानचित्र बनवाकर लोगों को ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के बारे में लगातार जागरूक करें। उन्हें शिक्षित करें और उनको पर्यावरण सम्बन्धी मसलों से सीधे जोड़े। इससे सरकार के नीतिगत निर्णयों का स्तर भी सुधरेगा। इस सबके साथ यह भी मानना होगा कि जलवायु परिवर्तन से और बारिश के तौर-तरीकों में बदलाव से नदियों का व्यवहार भी बदलेगा ही।

लिहाजा नदियों के व्यवहार को अध्ययन में जितनी जल्दी शामिल किया जाएगा उतनी ही तेजी से शहरों के ड्रेनेज सिस्टम को भी समय रहते परिवर्तित किया जा सकेगा। इससे बाढ़ जैसी विपदा की भीषणता को नियंत्रित किया जा सकेगा। बाढ़ जैसी विपदाएँ किसी एक क्षेत्र विशेष के लिये चुनौती नहीं हैं। यह वैश्विक चुनौती है। इसके प्रभाव भी समय के साथ और विनाशकारी होने वाले हैं इसलिये हर एक को, हर समुदाय को इसकी गम्भीरता को समझना होगा। समाधान ढूँढना होगा।

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