जानें मलेरिया को, आप भी बचें-दूसरों को भी बचाएँ

Submitted by RuralWater on Tue, 06/07/2016 - 15:59
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राजस्थान पत्रिका, 15 मई, 2016

मलेरिया होने का कारण प्लाज्मोडियम नाम का परजीवी है। इसका एक प्रकार फैल्सीपेरम मेलिया सबसे गम्भीर होता है। मलेरिया से ज्यादातर मौतें फैल्सीपेरम प्रजाति के कारण ही होती हैं। जब मलेरिया मच्छर मलेरिया रोगी को काटकर स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तो वह मलेरिया का रोगी हो जाता है। उसे लगभग एक हफ्ते - 10 दिन बाद बुखार आता है। इस तरह पीड़ित से फिर मच्छर और मच्छर से स्वस्थ व्यक्ति के चक्र में यह बीमारी फैलती रहती है। मलेरिया एक मौसमी बीमारी मानी जाती रही है, लेकिन अब बढ़ती आबादी, गन्दगी और संक्रमण के कारण साल के किसी भी महीने में मलेरिया का खतरा हो सकता है। मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से प्लाज्मोडियम फेल्सीपेरम, वाईवेक्स जैसे पैरासाइट्स के माध्यम से शरीर में मलेरिया का आक्रमण होता है। यह सब मादा मच्छर के कारण होता है, नर एनाफिलीज मच्छर रक्त का भूखा नहीं, वह पौधों से अपना भोजन लेता है।

जानें कैसे फैलता है जानलेवा मलेरिया


मलेरिया होने का कारण प्लाज्मोडियम नाम का परजीवी है। इसका एक प्रकार फैल्सीपेरम मेलिया सबसे गम्भीर होता है। मलेरिया से ज्यादातर मौतें फैल्सीपेरम प्रजाति के कारण ही होती हैं। जब मलेरिया मच्छर मलेरिया रोगी को काटकर स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तो वह मलेरिया का रोगी हो जाता है। उसे लगभग एक हफ्ते - 10 दिन बाद बुखार आता है। इस तरह पीड़ित से फिर मच्छर और मच्छर से स्वस्थ व्यक्ति के चक्र में यह बीमारी फैलती रहती है।

मच्छर के काटने से मनुष्य शरीर में घुसे स्पोरोजाइट तेजी से लीवर में पहुँच जाते हैं। वहाँ वो तेजी से मीरोजाइट रूप में बदल जाते हैं। इसके बाद वो लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला करते हैं। ऐसा मच्छर के काटने के 10-15 दिनों बाद होता है।

लाल रक्त कोशिकाओं में ये परजीवी 48-72 घंटों में तेजी से अपनी संख्या बढ़ाते हैं। इन कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन चट कर जाने के बाद वो कोशिकाओं से बाहर निकल जाते हैं। ऐसा लाखों कोशिकाओं में एक साथ होता है। अब परजीवियों की एक नई फौज और लाल रक्त कोशिकाओं पर हमला करती है। कुछ दिनों तक यह चक्र चलता रहता है। इस दौरान कंपकंपी आती है और बुखार भी होता है। इसी से मलेरिया का बुखार हर दूसरे या तीसरे दिन होता है।

मच्छर में परजीवी का जीवन


मलेरिया परजीवी का पहला शिकार तथा वाहक मादा एनोफिलीज मच्छर बनती है। वयस्क मच्छर संक्रमित मनुष्य को काटने पर उसके रक्त से मलेरिया परजीवी को ग्रहण कर लेते हैं। रक्त में मौजूद परजीवी के जननाणु (Gametocytes) मच्छर की आहार नली (Mid Gut) में नर और मादा के रूप में विकसित होते हैं और फिर मिलकर अंडाणु बनाते हैं, जो मच्छर की आहार नली की भित्तियों में पलने लगते हैं। परिपक्व होने पर ये फूटते हैं और इसमें से निकलने वाले बीजाणु उस मच्छर की लार-ग्रंथियों में पहुँच जाते हैं। जब मच्छर फिर एक स्वस्थ मनुष्य को काटता है तो त्वचा में लार के साथ-साथ बीजाणु भी भेज देता है।

इंसान में परजीवी का जीवन


मलेरिया परजीवी का मानव में विकास दो चरणों में होता है। लीवर में प्रथम चरण और लाल रक्त कोशिकाओं में दूसरा चरण। जब एक संक्रमित मच्छर मानव को काटता है तो बीजाणु (Sporozoites) रक्त में प्रवेश कर लीवर में पहुँचते हैं और शरीर में प्रवेश पाने के 30 मिनट के भीतर ही ये लीवर की कोशिकाओं को संक्रमित कर देते हैं। फिर यो लीवर में अलैंगिक जनन करने लगते हैं। यह चरण 6 से 15 दिन चलता है। इस जनन से हजारों अंशाणु (Merozoites) बनते हैं जो अपनी मेहमान कोशिकाओं को तोड़कर रक्त-प्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं तथा लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित करना शुरू कर देते हैं।

1. 2015 में मलेरिया के करीब 20 करोड़ से ज्यादा मामले रजिस्टर हुए हैं जिनमें लगभग पाँच लाख लोगों की मौत हुई है।

2. दुनिया की लगभग 3 अरब 20 करोड़ आबादी पर मलेरिया का खतरा है।

3. पिछले एक साल में 97 देश ऐसे रहे हैं जहाँ एक से दूसरे में लोगों - शरणार्थियों की आवाजाही के कारण मलेरिया फैला है।

4. पिछले 15 सालों में चिकित्सा सुविधाओं और बढ़ती जागरुकता के कारण मलेरिया से मरने वालों की संख्या में 60 प्रतिशत कमी आई है। लगभग 62 लाख लोगों की जान बचाई जा चुकी है।

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