कमी भोजन की नहीं प्रबन्धन की है

Submitted by RuralWater on Fri, 05/13/2016 - 09:55


.सूखे और पानी से त्रस्त बुन्देलखण्ड में जहाँ भूख से मौतें हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर केन्द्र और राज्य सरकार के बीच पानी एक्सप्रेस को लेकर विवाद में मशगूल हैं।

जिस समय देश विकासोन्मुखी व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उभर कर आये नए भारत की वर्षगाँठ की बधाईयाँ लेने व देने में मशगूल था, ठीक उसी समय एक ऐसी भी खबर आई जो राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों से वंचित रह गई। वह खबर एक ऐसे राज्य से आई जहाँ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली व खाद्य सुरक्षा योजनाओं की बानगी देश-दुनिया में दी जाती रही है।

ललितपुर जिले के गुगुरवारा गाँव के एक 45 साल केे शख्स की भूख से मौत अभी छह मई को हो गई। उसकी लाश ललितपुर में लावारिस मिली थी। सुखलाल की पत्नी तेजा के मुताबिक घर में चार दिन से चूल्हा नहीं जला था। इससे कुछ दिन पहले ही बांदा जिले में नत्थू नाम के शख्स की भूख से मौत हो चुकी थी।

सुखलाल की जेब से सूखी रोटी के टुकड़े मिले थे और प्रशासन भूख से मौत, समय पर राहत पहुँचाने जैसे कागजी घोड़े दौड़ाने लगा था। चार एकड़ खेत का मालिक तीन साल से लगातार सूखे के कारण कर्ज में दब गया था। उसके खेत का मोटर पम्प भी साहूकार उठाकर ले गए थे। वह काम की तलाश में भटक रहा था, लेकिन काम नहीं था, उसका अन्तोदय कार्ड भी कुछ महीनों पहले सरकारी लालफीताशाही में उलझ कर निरस्त हो गया था।

कुछ लोग कह रहे थे कि वह कर्ज और भूख के चलते मानसिक विक्षिप्त हो गया था। जिस देश में नए खरीदे गए अनाज को रखने के लिये गोदामों में जगह नहीं है, जहाँ सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ा-घर का पेट भरता है, वहाँ ऐसे भी लोग हैं जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते हैं।

बंगाल के बन्द हो गए चाय बागानों में आये रोज मजूदरों के भूख के कारण दम तोड़ने की बात हो या फिर महाराष्ट्र में अरबपति शिरडी मन्दिर के पास ही मेलघाट में हर साल हजारों बच्चों की कुपोषण से मौत की खबर या फिर राजस्थान के बारां जिले में सहरिया आदिवासियों की बस्ती में पैदा होने वाले कुल बच्चें के अस्सी फीसदी के उचित खुराक ना मिल पाने के कारण छोटे में ही मर जाने के वाकिए.... यह इस देश में हर रोज हो रहा है, लेकिन विज्ञापन में मुस्कुराते चेहरों, दमकती सुविधाओं के फेर में वास्तविकता से परे उन्मादित भारतवासी तक ऐसी खबरें या तो पहुँच नहीं रही हैं या उनकी संवेदनाओं को झकझोर नहीं रही हैं।

हाल की ही रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना बुन्देलखण्ड के ललितपुर जिले की है। मृतक ने अपनी डायरी में लिखा था -

‘मरो-मरो सब कोई कहे, पर मरना न जाने कोई,
एक बार ऐसा मरो कि फिर न मरना होए’।


उसके तीन बच्चे स्कूल में मिलने वाले मिड डे मील के बदौलत जिन्दगी चला रहे थे, रविवार या शाला अवकाश के दिन बच्चे भी फांका करते थे। गाँव के प्रधान कनई रजक का कहना कि गाँव के ज्यादातर घरों में अनाज की कमी है। हालांकि अब प्रशासन सुखलाल को पागल करार देकर भूख से मौत का कलंक मिटाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन मृतक के मानसिक अस्थिर होने, उसके पास काम ना होने से हम इस राष्ट्रीय शर्म से खुद को परे नहीं कर सकते हैं। फिर उसकी डायरी का हर पन्ना उसकी बेबसी, भूख और अन्धकारमय भविष्य की दर्दनाक कथा कह रहा है और इस मार्मिक अभिव्यक्ति को एक पागल-कृत्य कहकर नकारना अपने आप में मार्मिक व गैरसंवेदनशील है।

भूख से मौत वह भी उस देश में जहाँ खाद्य और पोषण सुरक्षा की कई योजनाएँ अरबों रुपए की सब्सिडी पर चल रही हैं, जहाँ मध्यान्ह भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चे को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो, जहाँ हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो; दर्शाता है कि योजनाओं व हितग्राहियों के बीच अभी भी पर्याप्त दूरी है।

वैसे भारत में हर साल पाँच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आँकड़े संयुक्त राष्ट्र संगठन ने जारी किये हैं। ऐसे में पिछले नवरात्रि पर गुजरात के गाँधीनगर जिले के एक गाँव में माता की पूजा के नाम पर 16 करोड़ रुपए दाम के साढ़े पाँच लाख किलो शुद्ध घी को सड़क पर बहाने, मध्य प्रदेश में एक राजनीतिक दल के महासम्मेलन के बाद नगर निगम के सात ट्रकों में भर कर पूड़ी व सब्जी कूड़ेदान में फेंकने की घटनाएँ बेहद दुभाग्यपूर्ण व शर्मनाक प्रतीत होती हैं।

हर दिन कई लाख लोगों के भूखे पेट सोने के गैर सरकारी आँकड़ों वाले भारत देश के ये आँकड़े भी विचारणीय हैं। देश में हर साल उतना गेहूँ बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूँ की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को साल भर भरपेट खाना दिया जा सकता है।

हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इस लिये बेकाम हो जाते हैं, क्योंकि उसे रखने के लिये हमारे पास माकूल भण्डारण की सुविधा नहीं है। देश के कुल उत्पादित सब्जी, फल का 40 फीसदी समय पर मंडी तक नहीं पहुँच पाने के कारण सड़-गल जाता है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है।

जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी को सड़ने से बचा सके। एक साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूँ खुले में पड़े होने के कारण मिट्टी हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पाँच हजार वेयर हाउस बनाए जा सकते हैं। यह आँकड़ा किसी से दबा-छुपा नहीं है, बस जरूरत है तो एक प्रयास करने की। यदि पंचायत स्तर पर ही एक क्विंटल अनाज का आकस्मिक भण्डारण व उसे जरूरतमन्द को देने की नीति का पालन हो तो कम-से-कम कोई भूखा तो नहीं मरेगा।

विकास, विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी की नई छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना ना मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिये भी कलंक हैं। हर जरूरतमन्द को अन्न पहुँचे इसके लिये सरकारी योजनाओं को तो थोड़ा चुस्त-दुरुस्त होना होगा, समाज को भी थोड़ा संवेदनशील बनना होगा। हो सकता है कि हम इसके लिये पाकिस्तान से कुछ सीख लें जहाँ शादी व सार्वजनिक समारोह में पकवान की संख्या, मेहमानों की संख्या तथा खाने की बर्बादी पर सीधे गिरफ्तारी का कानून है। जबकि हमारे यहाँ होने वाले शादी समारोह में आमतौर पर 30 प्रतिशत खाना बेकार जाता है। गाँव स्तर पर अन्न बैंक, प्रत्येक गरीब, बेरोजगार के आँकड़े रखना जैसे कार्य में सरकार से ज्यादा समाज को अग्रणी भूमिका निभानी होगी।

बहरहाल हमें एकमत से स्वीकार करना होगा कि अंबिकापुर जिले में एक आदिवासी बच्चे की ऐसी मौत हम सभी के लिये शर्म की बात है। यह विडम्बना है कि मानवता पर इतना बड़ा धब्बा लगा और उस इलाके के एक कर्मचारी या अफसर को सरकार ने दोषी नहीं पाया, जबकि ये अफसरान इलाके की हर उपलब्धि को अपनी बताने से अघाते नहीं हैं।

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